व्यंग्य | अनिल अनूप
कौआ उड़ गया। बस, तीन शब्द हैं। न कोई भारी-भरकम दर्शन, न कोई कठिन शब्दावली, न कोई विदेशी भाषा का तड़का। मगर आज के परिवेश में इन तीन शब्दों की ताकत इतनी बढ़ गई है कि अगर इन्हें ठीक जगह पर रख दिया जाए तो पूरा का पूरा सामाजिक, राजनीतिक, डिजिटल, पारिवारिक और सरकारी तंत्र अपनी-अपनी जगह से उड़ता हुआ दिखाई देने लगता है।
कभी कौआ केवल छत की मुंडेर से उड़ता था। अब कौआ फाइल से उड़ता है, वादे से उड़ता है, जिम्मेदारी से उड़ता है, खबर से उड़ता है, बजट से उड़ता है, नौकरी की उम्मीद से उड़ता है, मोबाइल की बैटरी से उड़ता है और कभी-कभी तो आदमी का होश भी उड़ जाता है।
पहले जमाने में घर की दादी किसी बच्चे को बहलाने के लिए कहती थीं—“देखो, कौआ उड़ गया।” बच्चा गर्दन घुमाकर कौए को खोजने लगता था। आज बच्चा नहीं, पूरा समाज गर्दन घुमाकर पूछ रहा है—“अरे! कौआ गया कहाँ?” और जवाब मिलता है—“भाई साहब, कौआ उड़ गया!” बस, मामला खत्म।
कौआ उड़ गया—अर्थात जिम्मेदारी भी उड़ गई
आज की व्यवस्था में “कौआ उड़ गया” एक तरह का राष्ट्रीय मुहावरा बन चुका है। कोई समस्या सामने आई नहीं कि सबसे पहले जिम्मेदारी उड़ती है।
सड़क में गड्ढा है। जनता पूछती है—“किसकी जिम्मेदारी है?” विभाग कहता है—“हमारी नहीं।” दूसरा विभाग कहता है—“वह काम हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।” तीसरा विभाग कहता है—“टेंडर किसी और का था।” ठेकेदार कहता है—“बारिश ज्यादा हो गई।” बारिश कहती है—“मैं तो अपना काम कर रही थी।” और आखिर में गड्ढा वहीं रह जाता है।
यानी जिम्मेदारी का कौआ उड़ गया। जनता खड़ी है, गड्ढा खड़ा है, सवाल खड़ा है—बस जवाब उड़ गया।
राजनीति में कौआ सबसे तेज उड़ता है
राजनीति में तो कौआ उड़ने की कला ने बाकायदा उच्च शिक्षा का रूप ले लिया है। चुनाव से पहले नेता जी आते हैं। कहते हैं—“क्षेत्र की तस्वीर बदल देंगे।” जनता पूछती है—“कैसे?” नेता जी मुस्कुराते हैं। “सब होगा।” “कब होगा?” “बहुत जल्दी।” “कितने दिन में?” “सरकार बनते ही।”
सरकार बन जाती है। जनता फिर पूछती है—“वह जो आपने कहा था?” नेता जी कहते हैं—“कौन-सा?” जनता कहती है—“वही, तस्वीर बदलने वाला।” नेता जी चारों तरफ देखते हैं। “अरे भाई, कौआ उड़ गया!”
वादे का कौआ उड़ गया। घोषणा का कौआ उड़ गया। घोषणापत्र का कौआ उड़ गया। और जनता अगले चुनाव तक फिर उसी मुंडेर पर बैठी रह गई।
हालांकि राजनीति में कौआ उड़ने के बाद भी उसका पंख कभी-कभी दिखाई देता रहता है। उसे देखकर जनता को उम्मीद होती है कि शायद कौआ वापस आएगा। फिर चुनाव आता है। लाउडस्पीकर बजता है। और कौआ वापस!
सोशल मीडिया ने तो कौए को रॉकेट बना दिया
पहले कौआ उड़ता था तो लोग देखते थे। अब सोशल मीडिया में कोई खबर उड़ती है तो कौआ भी शर्मा जाए। किसी ने सुबह एक संदेश लिखा—“आज से देश में सभी चीजें मुफ्त!” दोपहर तक वह संदेश दस लाख लोगों तक पहुँच जाता है। शाम को पता चलता है कि संदेश लिखने वाले को खुद नहीं मालूम कि उसने लिखा क्या था।
कोई पूछता है—“स्रोत क्या है?” जवाब आता है—“व्हाट्सऐप पर आया है।” बस! इतना प्रमाण आजकल कभी-कभी अदालत के दस्तावेज से भी ज्यादा प्रभावशाली हो जाता है।
फिर कोई दूसरा संदेश आता है—“यह खबर गलत है।” लोग कहते हैं—“कौन कह रहा है?” “व्हाट्सऐप पर आया है।” अर्थात सत्य का कौआ उड़ गया। असत्य का कौआ बैठ गया। और जनता दोनों को देखकर ताली बजा रही है।
खबर में भी कौआ उड़ गया
पत्रकारिता में एक समय खबर खोजने के लिए पत्रकार को निकलना पड़ता था। अब कई बार खबर खुद मोबाइल पर आकर बैठ जाती है। एक वीडियो आया। ऊपर लिखा था—“ताजा खबर।” नीचे लिखा था—“देखिए पूरा सच।” वीडियो देखा गया। सच का कहीं पता नहीं।
फिर दूसरा वीडियो आया—“पहले वीडियो का पूरा सच।” उसमें भी आधा सच। फिर तीसरा वीडियो—“दोनों वीडियो का असली सच।” अब पत्रकार बेचारा सोच रहा है कि सच आखिर बैठा कहाँ है?
उधर सच बोलता है—“भाई, मैं तो कब का उड़ गया!”
आज खबर की उम्र भी कौए की तरह हो गई है। सुबह जो सबसे बड़ी खबर होती है, शाम तक वह किसी को याद नहीं रहती। क्योंकि तब तक नया कौआ उड़ चुका होता है।
सरकारी दफ्तर में कौआ उड़ने की परंपरा
सरकारी दफ्तरों में “कौआ उड़ गया” की परंपरा सबसे व्यवस्थित है। आप शिकायत लेकर पहुँचे। बाबू ने फाइल खोली। फाइल को देखा। फाइल ने बाबू को देखा। दोनों के बीच कुछ क्षणों का मौन हुआ। फिर बाबू बोले—“यह फाइल हमारे पास नहीं है।” आप कहते हैं—“लेकिन अभी तो आपके सामने है।” बाबू गंभीर हो जाते हैं—“कागज आपके सामने है, फाइल हमारे पास नहीं।”
आप चकराते हैं। “फिर फाइल कहाँ है?” बाबू कहते हैं—“ऊपर गई है।” “ऊपर कहाँ?” “ऊपर।” “किसके पास?” “साहब के पास।” “साहब कहाँ हैं?” “मीटिंग में।” “कब आएंगे?” “पता नहीं।” यानी फाइल का कौआ उड़ गया।
कुछ महीनों बाद फाइल मिलती है। उस पर धूल की इतनी मोटी परत होती है कि पुरातत्व विभाग उसे देखकर कह सकता है—“इसे संरक्षित किया जाना चाहिए।”
नौकरी के इंतजार में भी कौआ उड़ गया
आज बेरोजगार युवा से पूछिए—“नौकरी कैसी चल रही है?” वह कहेगा—“चल कहाँ रही है, दौड़ रही है!”
कभी परीक्षा की तारीख आती है। फिर बदल जाती है। कभी परिणाम आने वाला होता है। फिर प्रक्रिया लंबी हो जाती है। कभी भर्ती निकलती है। फिर विवाद हो जाता है। कभी परीक्षा होती है। फिर कोई खबर आ जाती है।
युवा कहता है—“मेरी उम्र तो निकल रही है।” व्यवस्था मुस्कुराती है—“कौआ उड़ गया!” युवा कहता है—“मेरा क्या?” व्यवस्था—“अगली भर्ती देखिए।” अगली भर्ती आती है। फिर वही कहानी। कौआ उड़ गया।
शिक्षा व्यवस्था में भी कौआ उड़ रहा है
स्कूल में बच्चा पूछता है—“गुरुजी, परीक्षा कब होगी?” गुरुजी कहते हैं—“समय पर।” बच्चा पूछता है—“समय कब है?” गुरुजी कहते हैं—“जब विभाग बताएगा।”
विभाग कहता है—“जब बोर्ड बताएगा।” बोर्ड कहता है—“जब शासन बताएगा।” शासन कहता है—“जब सब तैयार होगा।” बच्चा पूछता है—“तब तक?” जवाब आता है—“पढ़ते रहो।”
बच्चा पढ़ता रहता है। फिर मोबाइल खोलता है। मोबाइल कहता है—“एक जरूरी सूचना!” बच्चा पढ़ाई भूल जाता है। शिक्षा का कौआ उड़ गया।
परिवार में कौआ उड़ने की कहानी
घर में पति पत्नी से कहता है—“आज जल्दी घर आऊँगा।” पत्नी कहती है—“ठीक है, सब्जी लेते आना।” पति कहता है—“बिल्कुल।”
ऑफिस से निकलते समय दोस्त मिल गया। दोस्त बोला—“चलो, चाय पीते हैं।” एक चाय दो हुई। दो चार हुई। चार के साथ चर्चा हुई। चर्चा के साथ राजनीति आई। राजनीति के साथ बहस आई। बहस के साथ पकौड़े आए। फिर रात हो गई।
घर पहुँचकर पत्नी ने पूछा—“सब्जी?” पति ने माथा पकड़ा। “अरे!” पत्नी—“क्या हुआ?” पति—“कौआ उड़ गया!” सब्जी का कौआ उड़ गया। वादा उड़ गया। और अब पति की शाम भी उड़ने वाली है।
बाजार में ग्राहक का कौआ उड़ गया
सब्जी मंडी में ग्राहक पूछता है—“भैया, आलू कितने के?” दुकानदार कहता है—“आज बहुत सस्ता है।” ग्राहक खुश। “कितने?” “बस इतने रुपये किलो।”
ग्राहक कहता है—“इतना सस्ता?” दुकानदार मुस्कुराता है—“जी।” ग्राहक जब थैला लेकर घर पहुँचता है तो पत्नी पूछती है—“इतने पैसे में इतना कम आलू?”
ग्राहक कहता है—“दुकानदार ने कहा था सस्ता है।” पत्नी—“सस्ता कहाँ है?” ग्राहक सोचता है। फिर उसे याद आता है—“सस्ता होने का कौआ उड़ गया।”
ऑनलाइन खरीदारी और कौआ
ऑनलाइन खरीदारी में कौआ उड़ने की गति और भी तेज है। मोबाइल पर दिखता है—“आज ही खरीदें, 70 प्रतिशत तक की छूट!” ग्राहक कहता है—“वाह!” उत्पाद कार्ट में डालता है।
फिर देखता है—छूट के बाद डिलीवरी शुल्क। फिर टैक्स। फिर प्लेटफॉर्म शुल्क। फिर सुविधा शुल्क। अंत में जो कीमत बनती है, उसे देखकर ग्राहक पूछता है—“छूट कहाँ गई?” मोबाइल चुप। कौआ उड़ गया।
महँगाई का कौआ
महँगाई भी बड़ी चतुर चिड़िया है। कल जो चीज सौ रुपये की थी, आज पूछो तो दुकानदार कहता है—“एक सौ बीस।” आप पूछते हैं—“इतनी महँगी?” दुकानदार कहता है—“क्या करें साहब, ऊपर से महँगा आया है।”
आप ऊपर देखते हैं। ऊपर आसमान साफ है। दुकानदार कहता है—“सप्लायर।” सप्लायर कहता है—“मंडी।” मंडी कहती है—“मौसम।” मौसम कहता है—“वैश्विक परिस्थिति।” और वैश्विक परिस्थिति इतनी दूर बैठी है कि उससे सवाल करने के लिए वीजा चाहिए। इस बीच ग्राहक की जेब कहती है—“मेरा कौआ उड़ गया।”
मोबाइल की बैटरी भी कहती है—कौआ उड़ गया
आज आदमी की सबसे बड़ी चिंता कभी-कभी देश, समाज या परिवार नहीं, मोबाइल की बैटरी होती है। 99 प्रतिशत। “अभी बहुत है।” 80 प्रतिशत। “अभी पूरा दिन चलेगा।” 50 प्रतिशत। “चार्जर कहाँ है?” 20 प्रतिशत। “किसी का हॉटस्पॉट मिलेगा?” 10 प्रतिशत। “भगवान!” 5 प्रतिशत। अब आदमी की आत्मा शरीर में और मोबाइल की आत्मा चार्जर में। 2 प्रतिशत। वह कहता है—“बस एक जरूरी कॉल।” मोबाइल बंद। कौआ उड़ गया!
इंटरनेट गया तो आधुनिक मनुष्य का क्या हुआ?
एक दिन अचानक इंटरनेट बंद हो जाए। पहले दस सेकंड आदमी मोबाइल देखेगा। फिर नेटवर्क देखेगा। फिर मोबाइल को ऊपर उठाएगा। फिर कमरे से बाहर जाएगा। फिर छत पर जाएगा। फिर पड़ोसी की छत पर नजर डालेगा।
फिर कहेगा—“नेट नहीं चल रहा।” पड़ोसी कहेगा—“मेरे यहाँ भी नहीं।” दोनों कुछ क्षण एक-दूसरे को देखेंगे। और अचानक उन्हें याद आएगा कि सामने वाला इंसान है।
वे बातचीत करने लगेंगे। लगभग पाँच मिनट बाद एक बोलेगा—“नेट आ गया क्या?” दूसरा मोबाइल देखेगा—“नहीं।” दोनों फिर मोबाइल में लग जाएंगे। मानव संवाद का कौआ उड़ गया।
रिश्तों में भी कौआ उड़ गया
आज रिश्ते कभी-कभी इतने डिजिटल हो गए हैं कि जन्मदिन पर सामने बैठा बेटा पिता से कहता है—“पापा, आपको टैग किया है।”
पिता पूछते हैं—“कहाँ?” “फेसबुक पर।” पिता कहते हैं—“बेटा, मैं सामने बैठा हूँ।” बेटा—“वही तो!”
माँ कहती है—“बेटा, खाना खा लो।” बेटा—“एक मिनट।” वह एक मिनट बीस मिनट का होता है। माँ खाना ठंडा करके वापस रख देती है। प्यार का कौआ उड़ गया।
सोशल मीडिया की प्रसिद्धि
कल तक जिसे मोहल्ले में कोई नहीं पहचानता था, आज उसकी एक रील पर पाँच लाख व्यू आ गए। वह सुबह उठा और बोला—“अब मैं सेलिब्रिटी हूँ।”
पत्नी बोली—“दूध ले आना।” वह बोला—“मैं सेलिब्रिटी हूँ।” पत्नी—“तो क्या दूध भी फॉलोअर्स लेकर आएंगे?” सेलिब्रिटी चुप। दूध का कौआ उड़ गया।
भाषणों में कौआ
भाषणों का भी अपना कौआ है। “हम व्यवस्था बदल देंगे।” “हम भ्रष्टाचार खत्म कर देंगे।” “हम युवाओं का भविष्य बदल देंगे।” “हम हर घर तक विकास पहुँचाएँगे।” “हम किसानों की आय बढ़ाएँगे।”
तालियाँ बजती हैं। मंच से नेता उतरते हैं। माइक बंद होता है। लाइट बंद होती है। भीड़ चली जाती है। और भाषण? कौआ उड़ गया। अगले दिन नया भाषण। नया कौआ। नई मुंडेर। नई तालियाँ।
दफ्तर की मीटिंग
मीटिंग में बॉस पूछते हैं—“यह काम किसने करना था?” कमरे में सन्नाटा। एक कर्मचारी पानी पीता है। दूसरा फाइल देखने लगता है। तीसरा मोबाइल में व्यस्त हो जाता है। चौथा खिड़की के बाहर देखने लगता है।
बॉस फिर पूछते हैं—“किसने करना था?” सबकी नजरें एक ऐसे कर्मचारी पर टिक जाती हैं जो छुट्टी पर है। बॉस कहते हैं—“उसे बुलाइए।”
वह अगले दिन आता है। पूछता है—“सर, क्या हुआ?” बॉस—“आपने काम क्यों नहीं किया?” वह—“सर, मुझे तो बताया ही नहीं गया।” बॉस—“किसने बताना था?” सब चुप। कौआ उड़ गया।
जिम्मेदारी का सबसे सुरक्षित ठिकाना
हमारे समय की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यह है कि जिम्मेदारी को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक सुरक्षित पहुँचाने की तकनीक विकसित हो गई है।
आप पूछिए—“गलती किसकी है?” जवाब—“पिछली सरकार की।” पिछली सरकार कहती है—“उससे पहले वाली की।” वह कहती है—“अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति की।” अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति कहती है—“हमसे मत पूछिए।” और आखिर में गलती अनाथ हो जाती है। क्योंकि गलती का कौआ उड़ चुका होता है।
अपराध, दुर्घटना और बयान
कोई घटना होती है। सबसे पहले बयान आता है—“मामले की जांच की जा रही है।” फिर—“दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।” फिर—“कड़ी कार्रवाई होगी।” फिर—“मामला गंभीर है।” फिर—“जांच रिपोर्ट आने दीजिए।” फिर—“कानून अपना काम करेगा।” और कुछ समय बाद जनता पूछती है—“क्या हुआ?” जवाब—“जांच चल रही है।” कहाँ? वहीं, जहाँ से कौआ उड़ गया था।
और अंत में कौआ आदमी के भीतर बैठा है
सबसे बड़ा व्यंग्य यह नहीं कि कौआ उड़ गया। सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि हम हर बार कौए के उड़ने के बाद भी उसी मुंडेर पर बैठे रहते हैं।
हमें पता है कि वादा उड़ सकता है। हमें पता है कि खबर उड़ सकती है। हमें पता है कि फाइल उड़ सकती है। हमें पता है कि जिम्मेदारी उड़ सकती है। हमें पता है कि कीमत उड़ सकती है। हमें पता है कि नौकरी की उम्मीद उड़ सकती है।
फिर भी हम हर बार उसी भरोसे से नई मुंडेर पर बैठ जाते हैं। क्यों? क्योंकि मनुष्य उम्मीद का प्राणी है। और शायद इसी उम्मीद के कारण दुनिया अभी तक चल रही है।
कौआ उड़ता रहेगा। लेकिन एक दिन शायद कोई बच्चा मुंडेर पर खड़े होकर पूछेगा—“कौआ उड़ गया?” और कोई समझदार व्यक्ति जवाब देगा—“हाँ, कौआ उड़ गया। मगर इस बार हम उसके पीछे नहीं उड़ेंगे। हम यहीं खड़े रहकर देखेंगे कि मुंडेर पर क्या बचा है।”
शायद यही जागरूकता की शुरुआत होगी। क्योंकि व्यंग्य का उद्देश्य केवल हँसाना नहीं होता। वह हँसी के बीच आईना भी रख देता है।
और आईने में अगर अपना चेहरा दिखाई दे जाए तो समझिए व्यंग्य सफल हुआ। आज हमारे आसपास हर मोड़ पर कोई न कोई कौआ उड़ रहा है। कभी जिम्मेदारी का। कभी वादे का। कभी भरोसे का। कभी खबर का। कभी रिश्ते का। कभी समय का। और कभी-कभी तो हमारा अपना धैर्य भी पंख लगाकर उड़ जाता है।
फिर भी हम कहते हैं—“कोई बात नहीं।” क्योंकि हमें मालूम है—“कौआ उड़ गया!”
लेकिन सवाल यह है कि कौआ उड़ गया तो क्या हम भी उड़ जाएँ? नहीं। कौआ उड़ने दीजिए। हम जमीन पर रहें। सवाल पूछें। हँसें। हँसाएँ। और जहाँ जरूरी हो, मुंडेर पर बैठे उस कौए की तरफ देखकर इतना जरूर कहें—“भाई, उड़ना तुम्हारा काम है; लेकिन जवाबदेही से उड़कर बच निकलना हमारा काम नहीं।”
यही तीन शब्द—“कौआ उड़ गया”—आज के समय का सबसे सरल, सबसे मजेदार और शायद सबसे गहरा व्यंग्य बन सकते हैं। क्योंकि कौआ चाहे जितनी ऊँची उड़ान भर ले, उसकी परछाईं आखिरकार जमीन पर ही पड़ती है। और जनता उसी जमीन पर खड़ी है।
—अनिल अनूप


























One Response
वर्तमान व्यवस्था पर सटीक व्यंग्य के साथ लेखक ने अपनी लेखनी का सदुपयोग किया है। लेखक का गहन चिंतन व मनन इस लेख से बड़ी कुशलता से उजागर होता हुआ नजर आता है। व्यवस्था के साथ वर्तमान का कौआ भी खूब उड़ रहा है।किस डाल पर बैठेगा कहा नही जा सकता। लेखक को बहुत बहुत साधुवाद