16 अक्टूबर 2026 6:04 अपराह्न

लो जी, हो गया जी! “80वें” स्वतंत्रता दिवस की सरकारी रस्मों का महाउत्सव

व्यंग्यकार अनिल अनूप की तस्वीर के साथ 80वें स्वतंत्रता दिवस की सरकारी रस्मों, ध्वजारोहण, स्कूल कार्यक्रम और लड्डू वितरण को दर्शाती फीचर इमेज

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ब्यंग्य अनिल अनूप

लो जी, हो गया जी!

80वें स्वतंत्रता दिवस की सारी सरकारी प्रक्रियाएं लगभग उसी गरिमामय ढंग से पूरी हो चुकी हैं, जिस गरिमामय ढंग से हर साल पूरी होती हैं। मुख्य कार्यक्रम सम्पन्न हो गया। मंच सज गया, कुर्सियां लग गईं, माइक ने दो-चार बार अपनी स्वतंत्रता का प्रदर्शन किया, भाषण हुए, तालियां बजीं और फिर धीरे-धीरे राष्ट्रभक्ति अपने-अपने कार्यालयों, घरों और मोबाइल फोन में वापस चली गई।

अब मुख्य कार्यक्रम के बाद उसकी उप-क्रियाएं चल रही हैं। कहीं झंडा फहरा दिया गया है, कहीं फहराने की तैयारी पूरी हो गई होगी और कहीं शायद यह तय किया जा रहा होगा कि झंडे को ठीक से कहां लगाया जाए ताकि फोटो में भी अच्छा आए और निरीक्षण करने वाले साहब की नजर में भी।

देश आजाद हुए इतने वर्ष हो गए, लेकिन सरकारी कार्यक्रमों की अपनी एक स्वतंत्र परंपरा बन चुकी है। यहां स्वतंत्रता का मतलब केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है। स्वतंत्रता का एक अर्थ यह भी है कि हर साल वही कार्यक्रम अपनी पूरी स्वतंत्रता के साथ दोहराया जा सके।

झंडा लहराया या बस फहरा दिया?

15 अगस्त आते ही सबसे पहले सरकारी दफ्तरों को याद आता है कि भाई, झंडा भी कोई चीज होती है। फिर झंडे की खोज शुरू होती है।

कहीं झंडा अलमारी से निकलता है, कहीं किसी संदूक से, कहीं उसे बड़े सम्मान के साथ ऐसे स्थान से निकाला जाता है जहां पिछले वर्ष के बाद से किसी ने झांककर भी नहीं देखा था।

फिर उसकी स्थिति देखी जाती है। झंडा ठीक है तो ठीक। थोड़ा मुड़ा हुआ है तो उसे सीधा कर लिया जाएगा। ज्यादा मुड़ा हुआ है तो इस उम्मीद के साथ टांग दिया जाएगा कि हवा खुद राष्ट्रीय सम्मान की जिम्मेदारी संभाल लेगी।

और फिर वह क्षण आता है—ध्वजारोहण! झंडा फहरा दिया गया। बस। राष्ट्रभक्ति की पहली सरकारी किश्त जारी।

अब यह अलग बात है कि कहीं झंडा शान से लहरा रहा होगा और कहीं बेचारा खंभे पर इस तरह लटका होगा जैसे उसे भी सरकारी फाइलों की तरह आगे बढ़ने का इंतजार हो। हमारे यहां समारोह की सफलता का एक महत्वपूर्ण पैमाना यह भी है कि झंडा फोटो में दिखाई दे रहा है या नहीं।

फोटो में झंडा आ गया तो कार्यक्रम सफल। साथ में अधिकारी आ गए तो बहुत सफल। अधिकारी के पीछे कर्मचारी आ गए तो शानदार। और यदि फोटो में मिठाई का डिब्बा भी दिखाई दे जाए तो फिर समझिए स्वतंत्रता दिवस ने अपनी पूर्णता प्राप्त कर ली।

सबसे पहले किसकी स्वतंत्रता छिनती है? मीडिया वालों की!

लेकिन जनाब, स्वतंत्रता दिवस की असली उथल-पुथल कई बार 15 अगस्त को नहीं, उससे काफी पहले शुरू हो जाती है। और इस उथल-पुथल का एक ऐसा वर्ग भी है जिसकी चर्चा मंचों पर कम होती है—मीडिया वाले।

सरकारी कार्यालयों में जहां स्वतंत्रता दिवस की तैयारियां धीरे-धीरे आकार ले रही होती हैं, वहीं मीडिया के दफ्तरों में एक अलग ही स्वतंत्रता संग्राम शुरू हो जाता है।

जैसे-जैसे 15 अगस्त नजदीक आता है, विज्ञापनों का हिसाब-किताब सामने आने लगता है। किस विभाग से कितना विज्ञापन आया, किस संस्थान से कितना आना बाकी है, किस अधिकारी ने आश्वासन दिया है, किसने फाइल आगे बढ़ा दी है और किसने कहा है—“देखिए, बजट आते ही करवा देंगे।”

और बेचारा रिपोर्टर! उसके हाथ में कलम है, सामने खबरें हैं, लेकिन दिमाग में एक अलग कैलकुलेटर चल रहा होता है। कहां जाना है? किससे मिलना है? किसे स्वतंत्रता दिवस की शुभकामना देनी है? किस कार्यालय में विज्ञापन की बात करनी है? किसे फोन करना है? किसे फिर फोन करना है? और किसे तीसरी बार फोन करने से पहले यह सोचना है कि कहीं सामने वाला यह न समझ ले कि पत्रकारिता छोड़कर विज्ञापन एजेंसी खोल ली गई है!

कई छोटे-बड़े मीडिया संस्थानों में विज्ञापन लक्ष्य पूरा करने का दबाव अपने आप में एक अलग कहानी है। कहीं रिपोर्टरों को विज्ञापन जुटाने का अतिरिक्त जिम्मा मिलता है, कहीं कमीशन की उम्मीद उन्हें कार्यालय से कार्यालय तक दौड़ाती है। हजार-पांच सौ रुपये के कमीशन के चक्कर में बेचारे रिपोर्टर की हालत ऐसी हो जाती है कि स्वतंत्रता दिवस आने से पहले उसे स्वयं स्वतंत्र होने का समय नहीं मिलता।

सुबह खबर के लिए निकलता है, दोपहर विज्ञापन के लिए दौड़ता है, शाम खबर लिखता है और रात को हिसाब लगाता है कि लक्ष्य अभी कितने हजार रुपये दूर है।

ऊपर से संपादकीय सवाल अलग— “भाई, खबर भेजी?”

रिपोर्टर मन ही मन कहता होगा—“खबर भी भेज दूंगा साहब, पहले देश की अर्थव्यवस्था में अपना छोटा-सा योगदान करके लौट तो आने दीजिए!”

यह बात पूरे मीडिया जगत पर आरोप नहीं है। अनेक पत्रकार पूरी ईमानदारी से केवल रिपोर्टिंग करते हैं और विज्ञापन की व्यवस्था से उनका कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता। लेकिन छोटे और स्थानीय मीडिया संस्थानों में पत्रकारिता और विज्ञापन के बीच पैदा होने वाला यह तनाव वास्तविकता का एक ऐसा पक्ष है जिस पर हंसते हुए भी विचार करना चाहिए।

आखिर पत्रकार खबर लिखे या विज्ञापन का लक्ष्य पूरा करे? यदि उसे खबरों के साथ विज्ञापन जुटाने की जिम्मेदारी भी दे दी जाए, तो वह पत्रकार कम और चलता-फिरता मार्केटिंग विभाग ज्यादा हो जाता है।

और फिर 15 अगस्त आता है। सरकारी दफ्तर सजते हैं। विज्ञापन निकलते हैं। शुभकामना संदेश छपते हैं। फोटो लगती हैं। और पत्रकार सोचता है—“चलो जी, स्वतंत्रता दिवस की एक और परीक्षा पास हुई!”

स्कूलों में स्वतंत्रता की सबसे ज्यादा हलचल

स्वतंत्रता दिवस का सबसे बड़ा उत्साह सरकारी दफ्तरों में नहीं, स्कूलों में दिखाई देता है। बच्चे तैयार, शिक्षक तैयार, मंच तैयार, माइक तैयार, मुख्य अतिथि तैयार और सबसे महत्वपूर्ण—बच्चों को कार्यक्रम में लगाने की पूरी तैयारी।

बच्चे वैसे तो पढ़ाई के लिए स्कूल जाते हैं, लेकिन 15 अगस्त के आसपास उन्हें अचानक देशभक्ति के बहुआयामी कलाकार में बदल दिया जाता है। कोई कविता सुनाएगा, कोई भाषण देगा, कोई देशभक्ति गीत गाएगा, कोई भारत माता बनेगा, कोई भगत सिंह, कोई गांधीजी, कोई सैनिक और कुछ भाग्यशाली बच्चे नृत्य करेंगे।

यहां स्वतंत्रता दिवस का एक बड़ा लोकतांत्रिक सिद्धांत दिखाई देता है—जिस बच्चे को पढ़ाई से स्वतंत्रता नहीं मिली, उसे मंच पर नृत्य करने की स्वतंत्रता अवश्य मिल सकती है।

कभी-कभी लगता है कि बच्चों के कार्यक्रम में इतनी विविधता होती है कि यदि कोई विदेशी प्रतिनिधि गलती से स्कूल पहुंच जाए तो वह भारत की शिक्षा व्यवस्था से अधिक हमारी सांस्कृतिक प्रतिभा से प्रभावित होकर लौटे।

लेकिन यहां एक बात साफ है—बच्चे इसमें दोषी नहीं हैं। उन्हें जो कहा जाता है, वे वही करते हैं। असली सवाल हमारी प्राथमिकताओं का है।

मिठाई और टॉफी का राष्ट्रीय महत्व

फिर आती है मिठाई। मिठाई स्वतंत्रता दिवस का वह अध्याय है जिस पर किसी समिति, आयोग या विशेषज्ञ की जरूरत नहीं पड़ती। बच्चों को मिठाई मिलेगी। कहीं लड्डू, कहीं बूंदी, कहीं पेड़ा और कहीं बजट के हिसाब से टॉफी।

बच्चा टॉफी लेकर भी खुश है। उसे अभी यह गणित नहीं आता कि स्वतंत्रता दिवस के बजट में प्रति बच्चे कितनी मिठाई स्वीकृत हुई थी और वास्तविकता में कितनी पहुंची। वह तो बस टॉफी देखकर प्रसन्न है। और यही उसकी सबसे बड़ी खूबी है। बच्चा सरकार से हिसाब नहीं मांगता। वह टॉफी लेता है और मुस्कुरा देता है। काश बड़े भी इतने सरल होते!

हालांकि मिठाई का वितरण भी अपने आप में एक प्रशासनिक कला है। पहले मुख्य अतिथि को, फिर प्रधानाचार्य को, फिर वरिष्ठ शिक्षक को, फिर विशिष्ट अतिथि को और फिर बाकी व्यवस्था। बच्चे अपनी बारी का इंतजार करते रहते हैं। देश ने उन्हें लोकतंत्र दिया है और मिठाई ने उन्हें कतार में लगना सिखाया है।

पढ़ाई कम, नृत्य ज्यादा?

अब आते हैं उस राष्ट्रीय प्रश्न पर जिस पर किसी शिक्षा नीति की बैठक में शायद चर्चा नहीं होती—15 अगस्त को बच्चे कितना पढ़ते हैं और कितना नाचते हैं?

कुछ विद्यालयों में ऐसा लगता है कि स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए बच्चों ने महीनों की तैयारी की है। रिहर्सल पर रिहर्सल, गीत पर गीत, नृत्य पर नृत्य, स्टेज की तैयारी, पोशाक की तैयारी और फिर वही बच्चा, जो किताब खोलते ही पांच मिनट में जम्हाई लेने लगता है, देशभक्ति गीत पर पूरे उत्साह से ऐसी ऊर्जा दिखाता है कि अध्यापक भी सोचने लगते हैं—अगर यही ऊर्जा गणित की किताब में लगा दी जाती तो शायद देश का भविष्य सचमुच बदल जाता।

लेकिन व्यंग्य का उद्देश्य बच्चों को दोष देना नहीं है। बच्चे तो वही कर रहे हैं जो उनसे कहा गया।

असल सवाल यह है कि क्या स्वतंत्रता दिवस का अर्थ केवल कार्यक्रमों की संख्या बढ़ाना है? क्या बच्चों को यह भी बताया जा रहा है कि स्वतंत्रता केवल झंडा फहराने का नाम नहीं, बल्कि जिम्मेदारी समझने का नाम है?

क्या उन्हें यह बताया जाता है कि सड़क पर कूड़ा न फेंकना भी देशभक्ति है? सरकारी संपत्ति को नुकसान न पहुंचाना भी देशभक्ति है? ईमानदारी से काम करना भी देशभक्ति है? दूसरे के अधिकार का सम्मान करना भी देशभक्ति है? और परीक्षा में नकल न करना भी शायद बहुत बड़ी देशभक्ति है। लेकिन इन बातों के लिए मंच, माइक और डांस की जरूरत नहीं होती। शायद इसलिए ये बातें कार्यक्रमों में थोड़ी कम सुनाई देती हैं।

बच्चों की जगह कर्मचारी, टॉफी की जगह लड्डू

अब स्कूल से सरकारी दफ्तर की तरफ लौटिए। यहां दृश्य लगभग वही है, बस कलाकार बदल गए हैं। बच्चों की जगह कर्मचारी हैं, टॉफी की जगह लड्डू हैं और नृत्य की जगह चर्चा है।

ध्वजारोहण हुआ। राष्ट्रगान हुआ। दो-चार शब्द कहे गए। देश की उपलब्धियां गिनाई गईं और भविष्य के संकल्प बताए गए। इसके बाद माहौल धीरे-धीरे उस परिचित सरकारी सहजता में लौट आता है, जिसमें लोग एक-दूसरे से कुशल-क्षेम पूछते हुए यह भी पता कर लेते हैं कि आज छुट्टी कितनी जल्दी मिल सकती है।

किसी को लड्डू चाहिए, किसी को चाय। कोई कार्यक्रम की व्यवस्था पर चर्चा करता है, कोई अधिकारी के भाषण पर और कोई इस बात पर कि इस बार लड्डू पिछले वर्ष से छोटे हैं या बड़े।

अर्थात राष्ट्रनिर्माण का गंभीर विमर्श धीरे-धीरे मिष्ठान्न समीक्षा में बदल जाता है। यही हमारे सरकारी समारोहों की खूबसूरती है। यहां राष्ट्र भी है, व्यवस्था भी है और लड्डू भी।

भाषणों में विभाग की कमियां कौन बताएगा?

अब आइए स्वतंत्रता दिवस के सबसे गंभीर और सबसे मजेदार हिस्से—भाषण—पर। मंच पर अधिकारी आते हैं। चेहरे पर गरिमा, हाथ में कागज और आवाज में राष्ट्र के प्रति समर्पण। भाषण शुरू होता है। देश ने यह उपलब्धि हासिल की। विभाग ने वह काम किया। सरकार ने यह योजना चलाई। जनता को वह सुविधा मिली। हमने यह लक्ष्य पूरा किया। भविष्य में हम और बेहतर करेंगे।

तालियां।

लेकिन एक छोटा-सा सवाल है— क्या किसी भाषण में कभी कोई अधिकारी यह भी कहता है कि हमारे विभाग से अब तक यह गलती हुई, यहां हमारी कमी रही, इस योजना में हम विफल रहे और इस काम को हम समय पर पूरा नहीं कर पाए?

सवाल थोड़ा शरारती है, लेकिन अनुचित नहीं।

मान लीजिए किसी विभाग में सड़कें खराब हैं, तो भाषण में सड़क सुधार की उपलब्धियां गिनाई जाएंगी। पानी की समस्या है तो जलापूर्ति की योजनाएं गिनाई जाएंगी। अस्पताल में डॉक्टर कम हैं तो स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार का उल्लेख होगा। स्कूल में शिक्षक कम हैं तो शिक्षा के क्षेत्र में किए गए प्रयासों का विवरण मिलेगा।

लेकिन यह सुनना दुर्लभ है— “भाइयो और बहनो, हमारे विभाग ने पिछले वर्ष इस मामले में गलती की। हमने जनता की शिकायतों का समय पर निस्तारण नहीं किया। कुछ योजनाएं लक्ष्य के अनुरूप नहीं चलीं। कुछ जगह हमारी निगरानी कमजोर रही। इन कमियों को हम स्वीकार करते हैं और इन्हें सुधारने की जिम्मेदारी लेते हैं।”

अगर ऐसा भाषण कभी हो जाए तो शायद लोग तालियां बजाने से पहले एक-दूसरे की तरफ देखकर पूछें—“भाई, आज कोई नया विभाग आ गया है क्या?” क्योंकि हमारी सार्वजनिक भाषा में उपलब्धि स्वीकार करना सामान्य है, लेकिन अपनी विफलता स्वीकार करना अभी भी साहस का काम समझा जाता है।

जबकि वास्तविक लोकतंत्र में आत्मालोचना कमजोरी नहीं, मजबूती है। स्वतंत्रता दिवस का भाषण केवल उपलब्धियों का वार्षिक बुलेटिन नहीं होना चाहिए। उसमें आत्ममंथन की भी जगह होनी चाहिए।

एक अधिकारी अगर कहे कि “हमसे गलती हुई”, तो इससे विभाग छोटा नहीं होता। बल्कि जनता का विश्वास बढ़ सकता है। लेकिन हमारे यहां शायद यह डर रहता है कि यदि मंच से कमी स्वीकार कर ली तो अगले दिन कोई पूछ बैठेगा—“साहब, अब सुधार कब होगा?”

इसलिए सुरक्षित रास्ता यही है कि उपलब्धियां बोलिए, संकल्प बोलिए, भविष्य बोलिए और वर्तमान की असुविधाजनक कमियों को बहुत प्यार से किनारे कर दीजिए। आखिर स्वतंत्रता दिवस है। इतनी स्वतंत्रता तो भाषण को मिलनी ही चाहिए!

राष्ट्रभक्ति का फोटो संस्करण

आजकल स्वतंत्रता दिवस का एक नया अध्याय भी जुड़ गया है—सोशल मीडिया। पहले झंडा फहराया जाता था। अब झंडा फहराने से पहले कैमरा खोजा जाता है।

फिर फोटो। फिर दूसरी फोटो। फिर समूह फोटो। फिर एक ऐसी फोटो जिसमें झंडा, अधिकारी, मंच, माइक और फूलों की माला सब एक साथ आ जाएं। फिर फोटो सोशल मीडिया पर। कैप्शन—“राष्ट्र के 80वें स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर…” आगे इतना लिखा जाता है कि पाठक को लगने लगे कि स्वतंत्रता दिवस नहीं, संविधान की पूरी प्रस्तावना फिर से लिखी जा रही है।

फोटो के नीचे शुभकामनाएं। फिर तिरंगा। फिर राष्ट्रभक्ति वाले चिन्ह। और अगले ही दिन वही सोशल मीडिया किसी दूसरे विवाद से भर जाता है। यही आधुनिक राष्ट्रभक्ति का डिजिटल संस्करण है। देशभक्ति अब केवल दिल में नहीं रहती। वह स्टेटस में भी दिखाई देनी चाहिए।

असली स्वतंत्रता की थोड़ी-सी बात

व्यंग्य का काम केवल हंसाना नहीं है। अगर स्वतंत्रता दिवस पर हम केवल यह गिनते रहें कि कितने लड्डू बंटे, कितने बच्चों ने नृत्य किया, कितने भाषण हुए और कितने फोटो सोशल मीडिया पर गए, तो शायद हम उस दिन के वास्तविक अर्थ से थोड़ा दूर चले जाएंगे।

आजादी केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं है। यह रोजमर्रा का व्यवहार भी है। जब कोई कर्मचारी अपना काम ईमानदारी से करता है, तब स्वतंत्रता मजबूत होती है। जब कोई अधिकारी बिना दबाव के सही निर्णय लेता है, तब लोकतंत्र मजबूत होता है। जब कोई शिक्षक बच्चों को केवल कार्यक्रम के लिए नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक बनाने के लिए पढ़ाता है, तब स्वतंत्रता का अर्थ गहरा होता है।

जब कोई नागरिक सड़क पर कूड़ा डालने के बजाय उसे उचित स्थान पर डालता है, तब राष्ट्र थोड़ा साफ होता है। जब कोई व्यक्ति रिश्वत देने और लेने से इनकार करता है, तब तिरंगा थोड़ा ऊंचा होता है। जब हम जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरे नागरिक के अधिकार का सम्मान करते हैं, तब स्वतंत्रता का उत्सव वास्तव में मनाया जाता है। और जब हम यह पूछने का साहस करते हैं कि “सरकारी योजना का लाभ वास्तव में किसे मिला?”, तब लोकतंत्र की आवाज थोड़ी और मजबूत होती है।

लो जी, फिर मिलेंगे अगले साल!

फिलहाल तो 80वां स्वतंत्रता दिवस भी अपनी तमाम औपचारिकताओं के साथ सम्पन्न हो गया। झंडा फहरा दिया गया। राष्ट्रगान हो गया। भाषण हो गया। बच्चे नाच लिए। मिठाई बंट गई। कर्मचारियों ने लड्डू खा लिए। पत्रकारों ने खबरें और तस्वीरें भेज दीं, विज्ञापन का हिसाब भी कहीं न कहीं मिल गया। फोटो खिंच गई। सोशल मीडिया भर गया। और अब धीरे-धीरे कुर्सियां हटेंगी, माइक समेटा जाएगा, मंच खाली होगा और कार्यालय अपने पुराने ढर्रे पर लौट आएंगे। बच्चों की किताबें फिर खुलेंगी। फाइलें फिर चलेंगी। अधिकारी फिर बैठक करेंगे। कर्मचारी फिर अपनी सीट संभालेंगे। और जनता फिर अपनी समस्याएं लेकर उसी व्यवस्था के दरवाजे पर खड़ी होगी। तब शायद किसी को याद आए कि अभी-अभी हमने स्वतंत्रता दिवस मनाया था।

लेकिन चिंता की कोई बात नहीं। अगला स्वतंत्रता दिवस आने में केवल एक साल है। तब फिर झंडा निकलेगा। फिर मंच सजेगा। फिर भाषण होगा। फिर बच्चे नाचेंगे। फिर मिठाई बंटेगी। फिर फोटो खिंचेगी। फिर सोशल मीडिया पर राष्ट्रभक्ति की नई फसल लहलहाएगी। और फिर हम सब गर्व से कहेंगे— “लो जी, हो गया जी!”

बस एक काम रह जाएगा। यह देखना कि देश सचमुच कितना आगे बढ़ा और हमारा समारोह कितना आगे बढ़ा। क्योंकि समारोह तो हर साल आगे बढ़ जाता है। अब जरूरत सिर्फ इतनी है कि उसके साथ-साथ हमारी सोच, हमारी जिम्मेदारी, हमारी पत्रकारिता, हमारी प्रशासनिक जवाबदेही और हमारी नागरिकता भी थोड़ा आगे बढ़ जाए।

तभी झंडा केवल खंभे पर नहीं, हमारे व्यवहार में भी लहराएगा। और तब स्वतंत्रता दिवस केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं रहेगा—वह सचमुच नागरिकों का उत्सव बन जाएगा। तब तक के लिए… लड्डू संभालकर रखिए। देशभक्ति का अगला सरकारी पैकेट आने तक वही काम आएगा!

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