JGDगुस्ताख दिल

योगी की पाती : चिट्ठी स्कूल पहुँची, मगर व्यवस्था रास्ता भूल गई

"योगी की पाती", "स्कूल चलो अभियान"

✍️ व्यंग्य की भूमिका

सरकारी अभियानों की सबसे बड़ी खूबी यह होती है कि वे पोस्टरों पर हमेशा सफल दिखाई देते हैं, जबकि उनकी असली परीक्षा ज़मीन पर होती है। ‘योगी की पाती’ भी शिक्षा के प्रति संवेदनशील संदेश देती है, लेकिन यह व्यंग्य उसी संदेश और व्यवस्था की वास्तविकताओं के बीच पसरे फासले पर हल्की मुस्कान के साथ गंभीर सवाल उठाता है। उद्देश्य किसी व्यक्ति पर कटाक्ष नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर आईना रखना है, जहाँ हर साल अभियान तो चलता है, पर शिक्षा अब भी अपने गंतव्य की तलाश में है।

-अनिल अनूप की कलम से

जुलाई का महीना आते ही बादलों से पहले सरकारी संदेश बरसने लगते हैं। खेत में किसान चाहे अभी धान की रोपाई में उलझा हो, लेकिन दीवारों, अखबारों और सोशल मीडिया पर सरकार बच्चों को स्कूल भेजने की रोपाई शुरू कर देती है। इस बार भी मुख्यमंत्री जी की “पाती” आई है। पाती इतनी आत्मीय है कि लगता है जैसे घर के बड़े-बुज़ुर्ग ने अपने हाथ से चिट्ठी लिखी हो। फर्क बस इतना है कि गाँव के डाकिए की जगह सूचना विभाग ने उसका ठेका ले लिया है।

पाती में लिखा है—”स्कूल चलो।” सुनकर अच्छा लगता है। आखिर शिक्षा से बड़ा कोई धन नहीं। लेकिन सवाल यह है कि स्कूल केवल बच्चों को जाना है या व्यवस्था को भी कभी स्कूल जाना चाहिए? क्योंकि बच्चे तो हर साल पहुँच जाते हैं, व्यवस्था हर साल अनुपस्थित मिलती है।

सरकारी विज्ञापन में बच्चे ऐसे दौड़ते हुए दिखते हैं जैसे स्कूल नहीं, ओलंपिक का फाइनल हो। उनके चेहरों पर ऐसी मुस्कान होती है मानो स्कूल के गेट पर प्रवेश करते ही ज्ञान की वर्षा होगी, प्रयोगशालाएँ खुली होंगी, पुस्तकालय बुला रहा होगा और शिक्षक कबीर, विवेकानंद तथा अब्दुल कलाम का सम्मिलित रूप बनकर उनका इंतजार कर रहे होंगे।

लेकिन गाँव के असली स्कूल में प्रवेश करते ही सबसे पहले स्वागत करता है टूटा हुआ गेट, उखड़ा हुआ प्लास्टर और बरामदे में बैठी बकरियाँ। वहाँ ज्ञान की देवी से पहले बिजली विभाग की अनुपस्थिति दिखाई देती है। पंखा छत से लटका तो रहता है, लेकिन उसकी किस्मत भी विद्यार्थियों जैसी होती है—चलने का इंतजार करते-करते साल गुजर जाता है।

पाती में लिखा गया है कि “शिक्षा जीवन की सबसे अनमोल संपत्ति है।” इसमें कोई विवाद नहीं। मगर अनमोल संपत्ति की रखवाली जिस भवन में हो रही है, उसकी हालत देखकर लगता है कि संपत्ति कहीं रास्ते में ही गुम हो गई। कहीं शिक्षक तीन हैं और कक्षाएँ आठ। कहीं बच्चे सौ हैं और कमरे दो। कहीं शौचालय है तो पानी नहीं, कहीं पानी है तो नल नहीं, और कहीं नल भी है तो उसकी टोंटी किसी ने लोकतंत्र की तरह उखाड़ ली है।

आजकल स्कूलों की सबसे बड़ी पहचान शिक्षा नहीं, योजनाएँ हैं। कभी यूनिफॉर्म योजना, कभी जूता योजना, कभी बैग योजना, कभी टैबलेट योजना। लगता है जैसे पढ़ाई सहायक पात्र हो और योजनाएँ मुख्य अभिनेत्री। बच्चे भी पूछने लगे हैं—”सर, इस साल किताब कब मिलेगी?” शिक्षक मुस्कुराकर कहते हैं—”बेटा, पहले योजना की फाइल पास होने दो, ज्ञान तो भागा नहीं जा रहा।”

मध्याह्न भोजन की कहानी भी कम रोचक नहीं। सरकारी कागजों में दाल इतनी गाढ़ी होती है कि चम्मच सीधी खड़ी रहे। सब्जी इतनी पौष्टिक कि डॉक्टर भी सलाम करें। लेकिन कई जगह बच्चों की थाली में पहुँचते-पहुँचते पौष्टिकता रास्ता बदल लेती है। कभी नमक ज्यादा, कभी दाल गायब, कभी चावल में कंकड़। फिर भी बच्चे खाते हैं, क्योंकि भूख किसी सरकारी आदेश का इंतजार नहीं करती।

पाती में अभिभावकों से कहा गया है कि बच्चों को नियमित स्कूल भेजिए। बिल्कुल भेजिए। लेकिन क्या कभी किसी पाती में यह भी लिखा जाएगा कि शिक्षक समय से आएँ, निरीक्षक बिना सूचना के निरीक्षण करें, और अधिकारी केवल फोटो खिंचवाने नहीं, समस्या सुनने भी जाएँ? क्योंकि शिक्षा केवल बच्चों की जिम्मेदारी नहीं, पूरी व्यवस्था की परीक्षा है।

आज शिक्षा का सबसे बड़ा उत्सव कैमरे के सामने होता है। जैसे ही मंत्री जी या अधिकारी जी स्कूल पहुँचते हैं, बच्चे नई यूनिफॉर्म पहन लेते हैं, दीवारें रातों-रात रंग जाती हैं, झाड़ू इतनी लगती है कि मकड़ी भी अपना जाला समेट लेती है। फोटो खिंचती है, ताली बजती है, अखबार में खबर छपती है और अगले दिन स्कूल फिर अपने पुराने लोकतांत्रिक स्वरूप में लौट आता है।

डिजिटल शिक्षा का भी खूब प्रचार है। स्मार्ट क्लास, ई-लर्निंग, ऑनलाइन कंटेंट—सब सुनने में बहुत आधुनिक लगता है। लेकिन जहाँ मोबाइल नेटवर्क पेड़ पर चढ़कर आता हो और बिजली सप्ताह में तीन दिन छुट्टी पर रहती हो, वहाँ डिजिटल शिक्षा किसी विज्ञान कथा से कम नहीं लगती। बच्चे टैबलेट से पहले चार्जर खोजते हैं और चार्जर से पहले बिजली।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि हर साल “स्कूल चलो अभियान” चलता है। इतने वर्षों से अभियान चल रहा है कि अब लगता है स्कूल कहीं भाग रहा है और सरकार उसके पीछे बच्चों को लेकर दौड़ रही है। अगर हर साल अभियान ही चलाना पड़े तो इसका मतलब है कि मंजिल अभी भी दूर है। शायद अब “स्कूल सुधरो अभियान” की भी उतनी ही जरूरत है जितनी “स्कूल चलो अभियान” की।

मुख्यमंत्री जी अपनी पाती में लिखते हैं कि “विद्यालय ज्ञान का मंदिर है।” बिल्कुल है। लेकिन मंदिर में यदि पुजारी ही समय से न पहुँचे, घंटी टूट जाए, दीपक में तेल न हो और छत से पानी टपकता रहे, तो श्रद्धालु कितनी देर तक श्रद्धा बचाए रखेगा?

सरकारी विद्यालयों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वहाँ शिक्षा से अधिक योजनाएँ पढ़ाई जाती हैं। पहले बच्चों का नामांकन। फिर आधार लिंक। फिर बैंक खाता। फिर डीबीटी। फिर यूनिफॉर्म। फिर जूता। फिर बैग। फिर टैबलेट। फिर पोर्टल। फिर ऐप। फिर ऑनलाइन उपस्थिति। फिर निरीक्षण। बीच में यदि समय बच जाए तो थोड़ा गणित और हिंदी भी पढ़ा दी जाती है।

आज का सरकारी शिक्षक गुरु कम और डेटा एंट्री ऑपरेटर ज्यादा दिखाई देता है। उसके पास चॉक से अधिक पासवर्ड हैं और ब्लैकबोर्ड से ज्यादा पोर्टल। वह बच्चों को ‘क’ से ‘कबूतर’ कम और अधिकारियों को ‘ओटीपी’ ज्यादा बताता है। शिक्षा विभाग ने शायद यह मान लिया है कि यदि इंटरनेट चल गया, तो शिक्षा अपने आप डाउनलोड हो जाएगी। पोस्टर में बच्चे दौड़ते हुए दिखाई देते हैं। असली जिंदगी में बच्चे दौड़ते नहीं, पैदल चलते हैं। कई किलोमीटर तक।

किसी का स्कूल तीन किलोमीटर दूर है। किसी का पाँच। किसी के रास्ते में नदी है। किसी के रास्ते में जंगल। और किसी के रास्ते में गरीबी। गरीबी सबसे बड़ा स्पीड ब्रेकर है। वह बच्चे को स्कूल से पहले मजदूरी सिखा देती है। सरकार पोस्टर छापती है—“हर बच्चा स्कूल जाए।” गरीबी जवाब देती है—“पहले घर में चूल्हा जले।”

दोनों की बहस में सबसे ज्यादा नुकसान बच्चे का होता है। मुख्यमंत्री जी ने अपनी पाती में माता-पिता से अपील की है कि वे बच्चों को नियमित विद्यालय भेजें। बहुत अच्छी बात है। लेकिन कभी किसी पाती में अधिकारियों से भी यह अपील क्यों नहीं लिखी जाती कि—

“प्रिय अधिकारियों, कृपया महीने में एक बार बिना सूचना दिए विद्यालय जाइए।” “प्रिय शिक्षकों, समय पर विद्यालय आइए।” “प्रिय इंजीनियरों, शौचालय बनाकर उसे पानी से भी जोड़ दीजिए।”“प्रिय बाबुओं, फाइल पर धूल कम और हस्ताक्षर ज्यादा कीजिए।”

शायद इसलिए कि जनता को सलाह देना आसान है, व्यवस्था को आईना दिखाना कठिन। विद्यालयों में मध्याह्न भोजन भी लोकतंत्र का सुंदर उदाहरण है। कागजों में दाल ऐसी बनती है कि होटल वाले शरमा जाएँ। सब्जी इतनी पौष्टिक कि डॉक्टर भी सलाह देने लगें। फल भी मिलते हैं। दूध भी मिलता है। अंडा भी कहीं-कहीं।लेकिन बच्चे से पूछिए—

वह कहेगा— “सर, आज नमक ज्यादा था।” “सर, आज दाल पतली थी।” “सर, आज रसोइया नहीं आई थी।” “सर, आज गैस खत्म थी।”

सरकारी रिपोर्ट और बच्चे की थाली का रिश्ता भी बड़ा विचित्र है। दोनों एक ही देश में रहते हैं, लेकिन कभी मिलते नहीं। आजकल शिक्षा का सबसे बड़ा पर्व निरीक्षण है। जैसे ही सूचना मिलती है कि अधिकारी आने वाले हैं, विद्यालय अचानक बदल जाता है। जो पौधे छह महीने से सूखे थे, उनमें रातों-रात हरियाली आ जाती है। जो दीवारें साल भर धूल से ढकी थीं, वे एक दिन में चमक उठती हैं। बच्चे पूरी यूनिफॉर्म में दिखाई देते हैं। शिक्षक पूरी उपस्थिति में। रसोई पूरी सक्रियता में। और प्रधानाध्यापक पूरी विनम्रता में।

अधिकारी जाते ही विद्यालय फिर लोकतांत्रिक स्वतंत्रता प्राप्त कर लेता है। आजकल विद्यालयों में स्मार्ट क्लास की भी खूब चर्चा है। स्मार्ट बोर्ड लग गया। प्रोजेक्टर लग गया। वाई-फाई की घोषणा हो गई।लेकिन बिजली ने कहा— “भाइयों, मैं महीने में दस दिन ही आऊँगी।”

नेटवर्क बोला— “मैं पेड़ पर चढ़ने के बाद ही मिलूँगा।”

और बच्चों ने कहा— “सर, पहले पंखा चला दीजिए।”

स्मार्ट क्लास आखिर गर्मी से नहीं जीत सकी। सरकारी पोस्टर में विद्यालय किसी सपनों की दुनिया जैसा लगता है। कक्षा में मुस्कुराते बच्चे। साफ दीवारें। हरी घास। सुंदर बेंच। लेकिन देश का बड़ा हिस्सा अभी भी ऐसी जगहों पर है जहाँ बच्चे जमीन पर बैठकर भविष्य लिखते हैं। उनकी कॉपी घुटने पर टिकती है और सपना आसमान पर।

सबसे रोचक बात यह है कि हर वर्ष नया नारा आता है। पहले— “सब पढ़ें, सब बढ़ें।”

फिर— “स्कूल चलो अभियान।”

फिर— “मिशन प्रेरणा।”

फिर— “निपुण भारत।”

नारे बदलते रहे। पोस्टर बदलते रहे। रंग बदलते रहे। लेकिन कुछ विद्यालयों की दीवारों का प्लास्टर आज भी नहीं बदला। लगता है नारे सबसे तेजी से विकसित होने वाली सरकारी प्रजाति हैं। पोस्टर में मुख्यमंत्री जी कलम से पत्र लिख रहे हैं। उन्हें देखकर लगा कि शायद अगली पाती में एक और अनुच्छेद जुड़ना चाहिए—

“प्रिय प्रदेशवासियों, यदि विद्यालय में शिक्षक कम हों, तो कृपया चिंता न करें। हमारा पोस्टर पर्याप्त संख्या में उपलब्ध है। उसे देखकर प्रेरित होते रहिए।”

यह व्यंग्य किसी व्यक्ति पर नहीं है। न ही किसी सरकार पर। यह उस व्यवस्था पर है जिसने शिक्षा को कभी आँकड़ों में, कभी अभियानों में और कभी विज्ञापनों में इतना उलझा दिया कि बच्चा कहीं पीछे छूट गया।

असल सवाल यह नहीं है कि पोस्टर सुंदर है या नहीं। पोस्टर सचमुच सुंदर है। सवाल यह है कि क्या हर विद्यालय भी उतना ही सुंदर है? क्या हर बच्चे के हाथ में समय पर किताब है? क्या हर कक्षा में शिक्षक है? क्या हर विद्यालय में बिजली है? क्या हर छात्रा सुरक्षित शौचालय का उपयोग कर पा रही है? क्या हर शिक्षक पढ़ाने के अलावा फाइलों से मुक्त है?

यदि इन सवालों का उत्तर “हाँ” हो जाए, तब किसी पोस्टर की आवश्यकता ही नहीं बचेगी। तब “स्कूल चलो अभियान” नहीं चलाना पड़ेगा। बच्चे स्वयं दौड़ेंगे। अभिभावक स्वयं भेजेंगे। शिक्षक स्वयं गर्व करेंगे। और सरकार को चिट्ठियाँ नहीं लिखनी पड़ेंगी। क्योंकि शिक्षा तब पोस्टर का विषय नहीं, समाज का स्वभाव बन जाएगी। तब मुख्यमंत्री की कलम केवल पाती नहीं लिखेगी, बल्कि इतिहास लिखेगी। और उस इतिहास में यह दर्ज होगा कि एक समय ऐसा भी था जब सरकार हर साल बच्चों को स्कूल बुलाने के लिए अभियान चलाती थी। फिर एक दिन विद्यालय इतने अच्छे हो गए कि अभियान की आवश्यकता समाप्त हो गई।

उस दिन “योगी की पाती” सचमुच एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ बन जाएगी—क्योंकि तब चिट्ठी नहीं, व्यवस्था स्वयं बच्चों को पुकार रही होगी।

(यह व्यंग्य शिक्षा व्यवस्था में मौजूद विरोधाभासों और सरकारी अभियानों की प्रतीकात्मक प्रस्तुति है। इसका उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था पर सकारात्मक विमर्श और आत्ममंथन को प्रोत्साहित करना है।)

मुख्यमंत्री जी की पाती में आत्मीयता है, सद्भावना है और शिक्षा के प्रति चिंता भी झलकती है। उस चिंता पर किसी को संदेह नहीं। लेकिन पाती की स्याही तभी सार्थक होगी जब गाँव के हर बच्चे को किताब समय पर मिले, हर कक्षा में शिक्षक मौजूद हों, हर स्कूल में साफ शौचालय हो, हर प्रयोगशाला में उपकरण हों और हर पुस्तकालय में किताबें।

क्योंकि शिक्षा केवल भाषणों, पोस्टरों और विज्ञापनों से नहीं आती। वह आती है शिक्षक की तैयारी से, विद्यालय की व्यवस्था से और उस वातावरण से जहाँ बच्चा सवाल पूछने से डरे नहीं।

व्यंग्य की विडंबना यही है कि सरकारी पोस्टर में बच्चा स्कूल की ओर दौड़ रहा है, जबकि असल जिंदगी में कई बार स्कूल ही सुविधाओं की ओर दौड़ रहा होता है। पोस्टर में मुख्यमंत्री जी कलम से भविष्य लिख रहे हैं, लेकिन कई विद्यालयों में बच्चे आज भी टूटी हुई स्लेट और अधूरी कॉपियों से अपना वर्तमान लिख रहे हैं।

इसलिए पाती पढ़िए, प्रेरणा लीजिए, बच्चों को स्कूल भेजिए—लेकिन साथ ही यह सवाल पूछना भी मत छोड़िए कि जिस शिक्षा को “सबसे अनमोल संपत्ति” कहा जा रहा है, उसकी रखवाली आखिर कब अनमोल तरीके से होगी? क्योंकि देश का भविष्य केवल बच्चों के कंधों पर टंगे बस्ते में नहीं, उस व्यवस्था के कंधों पर भी टिका है जो हर साल नया पोस्टर छपवाती है, नई पाती लिखती है और फिर अगले जुलाई का इंतजार करने लगती है।

आखिर शिक्षा की असली परीक्षा बच्चे नहीं, व्यवस्था दे रही है—और परिणाम अभी भी “पुनर्मूल्यांकन हेतु लंबित” है।

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❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

योगी की पाती क्या है?

यह उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से ‘स्कूल चलो अभियान’ के तहत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का प्रदेशवासियों और अभिभावकों के नाम प्रेरक संदेश है, जिसमें बच्चों को विद्यालय से जोड़ने का आह्वान किया गया है।

इस व्यंग्य का मुख्य उद्देश्य क्या है?

इस व्यंग्य का उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था, सरकारी अभियानों और जमीनी वास्तविकताओं के बीच मौजूद विरोधाभासों को हास्य और कटाक्ष के माध्यम से सामने लाना है।

क्या यह व्यंग्य किसी व्यक्ति विशेष पर आधारित है?

नहीं। यह किसी व्यक्ति पर नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था और सरकारी अभियानों की कार्यशैली पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी है।

स्कूल चलो अभियान का उद्देश्य क्या है?

इस अभियान का उद्देश्य प्रत्येक बच्चे का विद्यालय में नामांकन सुनिश्चित करना, ड्रॉपआउट बच्चों की वापसी कराना तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के प्रति जनजागरूकता बढ़ाना है।

यह व्यंग्य पाठकों को क्या संदेश देता है?

सिर्फ पोस्टर और अभियानों से नहीं, बल्कि बेहतर विद्यालय, प्रशिक्षित शिक्षक और मजबूत शिक्षा व्यवस्था से ही शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो सकता है।

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