संपादकीय अनिल अनूप
हिमालय को हमने हमेशा बर्फ से ढकी ऊंची चोटियों, शांत घाटियों, कल-कल बहती नदियों और आध्यात्मिक आस्था की भूमि के रूप में देखा है। लेकिन क्या हिमालय अब पहले जैसा रहा है? क्या उसकी बर्फ, उसके ग्लेशियर, उसकी बारिश और उसकी ढलानें किसी बड़े बदलाव की कहानी कह रही हैं?
नेपाल में 26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा के निकट ग्लेशियर का हिस्सा टूटने के बाद आई तबाही ने इन सवालों को फिर सामने खड़ा कर दिया है। ऊंचाई वाले क्षेत्र से बर्फ, चट्टान और मलबा नीचे आया, जिससे नदी का प्रवाह प्रभावित हुआ। इसके बाद पानी और मलबे के तेज प्रवाह ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। इस आपदा में बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने और कई लोगों के लापता होने की खबरों ने पूरे हिमालयी क्षेत्र की आपदा-सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
यह घटना नेपाल तक सीमित मानकर भुला देना आसान है, लेकिन हिमालय किसी एक देश की भौगोलिक सीमा में बंटा हुआ पर्वत तंत्र नहीं है। नेपाल से लेकर भारत के उत्तराखंड तक फैला यह पूरा क्षेत्र बदलती जलवायु, ग्लेशियरों के पीछे हटने, अस्थिर पर्वतीय ढलानों और बढ़ते मानवीय दबाव से प्रभावित हो रहा है।
यही वजह है कि नेपाल की यह त्रासदी बद्रीनाथ-माणा क्षेत्र के लिए भी एक गंभीर चेतावनी के रूप में देखी जानी चाहिए।
क्या सचमुच बदल रहा है हिमालय?
यह सवाल भावनात्मक नहीं, वैज्ञानिक भी है। उत्तराखंड के ऊपरी अलकनंदा क्षेत्र में स्थित बद्रीनाथ और भारत-तिब्बत सीमा के निकट माणा गांव के आसपास कई ऊंची पर्वतीय ढलानों पर ग्लेशियर मौजूद हैं। इनमें कुछ ऐसे बर्फीले पिंड हैं जिन्हें वैज्ञानिक हैंगिंग ग्लेशियर कहते हैं।
हैंगिंग ग्लेशियर ऐसे ग्लेशियर या बर्फीले हिस्से होते हैं जो अपेक्षाकृत खड़ी पर्वतीय ढलानों पर टिके रहते हैं। इनकी स्थिति अस्थिर होने पर बर्फ का हिस्सा टूट सकता है। यदि टूटने वाली बर्फ अपने साथ चट्टान, मिट्टी और अन्य मलबा लेकर नीचे आती है, तो घटना सामान्य हिमस्खलन से कहीं अधिक खतरनाक रूप ले सकती है। यही कारण है कि अलकनंदा बेसिन पर किया गया वैज्ञानिक अध्ययन महत्वपूर्ण है।
npj Natural Hazards में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान की गई है। शोधकर्ताओं ने इनके संभावित जोखिम का आकलन करते हुए विशेष रूप से बद्रीनाथ-माणा के ऊपरी अलकनंदा क्षेत्र को अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण माना है।
इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि इन सभी ग्लेशियरों से तत्काल खतरा है। लेकिन यह जरूर बताता है कि हिमालयी क्षेत्र में बर्फ की अस्थिरता को अब केवल प्राकृतिक सौंदर्य के नजरिए से नहीं देखा जा सकता।
माणा के लोगों ने अपनी आंखों से देखा है बदलाव
वैज्ञानिक आंकड़े अपनी जगह हैं, लेकिन पहाड़ों में रहने वाले लोग मौसम और प्रकृति के बदलाव को वर्षों से महसूस करते आए हैं।
माणा गांव के दो बार ग्राम प्रधान रह चुके पीतांबर सिंह मोलपा बताते हैं कि उनके बचपन और युवावस्था के समय आसपास के ऊंचे क्षेत्रों में गर्मियों के शुरुआती महीनों तक काफी बर्फ दिखाई देती थी।
उनके अनुसार पांडुकेश्वर से आगे विष्णुप्रयाग घाटी की ओर बढ़ने पर कई स्थानों पर ग्लेशियर दिखाई देते थे। हनुमान चट्टी पार करने के बाद वातावरण में बर्फीली ठंडक स्पष्ट महसूस होती थी। लेकिन समय के साथ परिस्थितियों में बदलाव आया है।
मोलपा के अनुसार सतोपंथ ग्लेशियर को उन्होंने वर्षों के दौरान पीछे खिसकते देखा है। वसुधारा के सामने मौजूद ग्लेशियर भी पहले की तुलना में पीछे चला गया है। उनका कहना है कि 1970 और 1980 के दशक के बाद कई छोटे ग्लेशियर या तो समाप्त हो गए अथवा काफी पीछे चले गए।
स्थानीय लोगों के ऐसे अनुभवों को वैज्ञानिक निष्कर्षों का विकल्प नहीं माना जा सकता, लेकिन वे हिमालयी पर्यावरण में दीर्घकालिक बदलावों को समझने के लिए महत्वपूर्ण स्थानीय संकेत जरूर देते हैं।
मौसम का मिजाज भी बदल रहा है?
बदलाव केवल ग्लेशियरों तक सीमित नहीं दिखाई देता। पीतांबर सिंह मोलपा के मुताबिक पहले वर्षा का स्वरूप अधिक पूर्वानुमान योग्य लगता था। अब कई बार प्री-मानसून में तेज बारिश देखने को मिलती है, मानसून के दौरान अपेक्षाकृत कम वर्षा होती है और पोस्ट-मानसून में फिर भारी बारिश हो जाती है।
स्थानीय प्राकृतिक जलस्रोतों में भी बदलाव महसूस किया गया है। कुछ स्रोत समय के साथ सूख गए, जबकि बरसात में उनमें फिर पानी दिखाई देता है। स्थानीय नालों के प्रवाह में भी बदलाव महसूस होने की बात कही जाती है। इन अनुभवों को जब वैज्ञानिक अध्ययनों के साथ रखकर देखा जाता है तो तस्वीर अधिक गंभीर दिखाई देती है।
अलकनंदा बेसिन पर किए गए अध्ययन में तापमान वृद्धि और वर्षा के बदलते स्वरूप को ग्लेशियरों तथा पर्वतीय ढलानों की स्थिरता से जुड़े महत्वपूर्ण कारकों में शामिल किया गया है। यानी सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि ग्लेशियर कितनी तेजी से पिघल रहे हैं। सवाल यह भी है कि ग्लेशियरों के पीछे हटने से पहाड़ की पूरी संरचना पर क्या असर पड़ रहा है?
ग्लेशियर पीछे हटता है तो खतरा कैसे बढ़ सकता है?
ग्लेशियर का पीछे हटना सुनने में केवल बर्फ कम होने की प्रक्रिया जैसा लगता है। लेकिन ऊंचे हिमालय में इसके दूरगामी भू-आकृतिक प्रभाव हो सकते हैं।
जब कोई मुख्य ग्लेशियर पीछे हटता है तो उसके साथ जुड़े छोटे या सहायक ग्लेशियर अलग हो सकते हैं। कुछ बर्फीले हिस्से अत्यधिक खड़ी ढलानों पर रह जाते हैं। यही क्षेत्र आगे चलकर अस्थिर बर्फ के रूप में जोखिम पैदा कर सकते हैं। यदि ऐसा हिस्सा टूटता है तो केवल बर्फ नीचे नहीं आती।
उसके साथ चट्टानें टूट सकती हैं। मिट्टी और मलबा बह सकता है। नीचे बह रही नदी का रास्ता बंद हो सकता है। नदी के प्रवाह में अस्थायी बांध बन सकता है। और फिर जब यह प्राकृतिक अवरोध टूटता है तो जमा पानी अचानक नीचे की ओर दौड़ सकता है। यही स्थिति सामान्य बाढ़ की तुलना में कहीं अधिक विनाशकारी हो सकती है। नेपाल की घटना ने इसी प्रकार की संभावित श्रृंखलाबद्ध आपदा को लेकर चिंता बढ़ाई है।
बद्रीनाथ-माणा के लिए वैज्ञानिक मॉडल की चेतावनी
बद्रीनाथ-माणा क्षेत्र की संवेदनशीलता को लेकर वैज्ञानिक अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शोधकर्ताओं ने केवल ग्लेशियरों की संख्या नहीं गिनी, बल्कि संभावित हिमस्खलन और मलबा-प्रवाह की मॉडलिंग भी की है। अध्ययन में बद्रीनाथ और माणा के आसपास मौजूद 25 हैंगिंग ग्लेशियरों को आधार बनाकर संभावित सबसे खराब स्थिति का मॉडल तैयार किया गया। इस मॉडल में यह आकलन किया गया कि यदि किसी हैंगिंग ग्लेशियर का अस्थिर हिस्सा पूरी तरह टूटकर नीचे आता है तो उसका संभावित प्रभाव कितना व्यापक हो सकता है।
मॉडल के अनुसार चरम परिस्थिति में बर्फ, चट्टान और मलबे के प्रवाह की ऊंचाई बद्रीनाथ क्षेत्र में अधिकतम करीब 51 मीटर, बद्रीनाथ-माणा सड़क क्षेत्र में करीब 48 मीटर और हनुमान चट्टी के आसपास करीब 40 मीटर तक हो सकती है।
यहां एक बात बिल्कुल स्पष्ट समझना जरूरी है। ये आंकड़े किसी निश्चित भविष्य की बाढ़ की भविष्यवाणी नहीं हैं। ये एक वैज्ञानिक worst-case scenario का मॉडल है, जिसका उद्देश्य यह समझना है कि यदि अत्यंत गंभीर ग्लेशियर टूटने की घटना होती है तो संभावित प्रभाव कितना बड़ा हो सकता है। और यही मॉडल हमें सावधान करता है।
खतरा ग्लेशियर से ज्यादा उसके नीचे बसती दुनिया का है
प्राकृतिक खतरा तभी बड़ी मानवीय आपदा बनता है जब उसके रास्ते में बड़ी संख्या में लोग और निर्माण मौजूद हों। बीते वर्षों में हिमालयी पर्यटन तेजी से बढ़ा है। तीर्थयात्रियों की संख्या बढ़ी है। सड़कें चौड़ी हुई हैं। होटल और दूसरी व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ी हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों में रणनीतिक आधारभूत ढांचा भी विकसित हुआ है।
यह विकास आवश्यकताओं से प्रेरित है, लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। यदि संभावित मलबा-प्रवाह के रास्ते में लगातार निर्माण होता रहा तो प्राकृतिक खतरा मानव आपदा में बदलने की संभावना बढ़ेगी।
अलकनंदा बेसिन के अध्ययन में इसी बढ़ते exposure की ओर ध्यान दिलाया गया है। अध्ययन के मॉडल के अनुसार वर्ष 2000 में संभावित रूप से प्रभावित निर्मित क्षेत्र लगभग 8 हजार वर्ग मीटर था, जो 2030 तक बढ़कर लगभग 1.52 लाख वर्ग मीटर होने का अनुमान लगाया गया है।
संभावित रूप से प्रभावित आबादी का अनुमान भी लगभग 380 से बढ़कर 8,540 तक पहुंचने का संकेत देता है। यह आंकड़ा हमें ग्लेशियर से अधिक एक दूसरी चिंता की ओर ले जाता है— हम जोखिम वाले पहाड़ों के सामने कितनी तेजी से अपनी आबादी और निर्माण बढ़ा रहे हैं?
2021 की चमोली आपदा अभी भूली नहीं है
उत्तराखंड के लिए यह चेतावनी बिल्कुल नई नहीं है। 2021 की चमोली रॉक-आइस एवलांच ने दिखा दिया था कि हिमालय में बर्फ और चट्टान के टूटने की घटना कितनी तेजी से विनाशकारी रूप ले सकती है।
उस घटना में भारी मात्रा में बर्फ, चट्टान और मलबा घाटी में नीचे आया था। ऋषिगंगा और धौलीगंगा घाटियों में इसका गंभीर असर पड़ा और जलविद्युत परियोजनाओं समेत व्यापक नुकसान हुआ।
अलकनंदा क्षेत्र के वैज्ञानिक अध्ययन में 1970 और 1978 की उन घटनाओं का भी उल्लेख है जब हिमस्खलन के कारण अलकनंदा नदी का प्रवाह कुछ समय के लिए बाधित हुआ था।
इन घटनाओं से एक बात स्पष्ट है—हिमालय में बर्फ का टूटना कभी-कभी केवल बर्फ का गिरना नहीं होता। यह नदी, चट्टान, मलबे और पानी को जोड़कर एक नई और ज्यादा खतरनाक आपदा पैदा कर सकता है।
नेपाल की घटना से भारत को क्या सीखना चाहिए?
नेपाल में हुई त्रासदी को लेकर भारत को भय पैदा करने के बजाय तैयारी बढ़ाने की जरूरत है। सबसे पहली आवश्यकता है कि हिमालय के संवेदनशील ग्लेशियरों की पहचान और जोखिम का नियमित वैज्ञानिक आकलन किया जाए। हर ग्लेशियर पर लगातार निगरानी करना संभव नहीं हो सकता। इसलिए सबसे अधिक जोखिम वाले ग्लेशियरों को प्राथमिकता देकर निगरानी का मजबूत नेटवर्क तैयार किया जाना चाहिए। उपग्रह तस्वीरें इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
इसके साथ जमीन पर वैज्ञानिक सर्वेक्षण, रडार आधारित निगरानी, स्वचालित सेंसर और कैमरा नेटवर्क को जोड़ा जा सकता है। नदियों में अचानक जलस्तर और प्रवाह परिवर्तन का पता लगाने वाली रियल-टाइम प्रणालियां विकसित करनी होंगी।
और सबसे महत्वपूर्ण—इन तमाम तकनीकी प्रणालियों से मिलने वाली चेतावनी सीधे स्थानीय प्रशासन और ग्रामीण समुदाय तक पहुंचनी चाहिए। क्योंकि आपदा के समय कुछ मिनट भी जीवन और मृत्यु के बीच अंतर पैदा कर सकते हैं।
माणा के स्थानीय अनुभवों को भी वैज्ञानिक निगरानी से जोड़ना होगा
आपदा प्रबंधन केवल दिल्ली या देहरादून के नियंत्रण कक्ष से नहीं किया जा सकता। माणा, बद्रीनाथ, हनुमान चट्टी और आसपास के गांवों में रहने वाले लोगों के पास मौसम और पहाड़ को देखने का अपना अनुभव है। कब बर्फ असामान्य रूप से गिर रही है? किस नाले में पानी का स्वरूप बदला है? किस ढलान पर नई दरार दिखाई दे रही है? कहां अचानक मलबा जमा हो रहा है? किस ऊंचाई पर बर्फ की स्थिति पिछले वर्षों से अलग है?
ऐसी स्थानीय सूचनाएं यदि वैज्ञानिक निगरानी तंत्र के साथ जोड़ दी जाएं तो जोखिम पहचानने की क्षमता कहीं बेहतर हो सकती है। स्थानीय समुदाय को केवल आपदा का संभावित पीड़ित मानने के बजाय पहली चेतावनी प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
क्या हर घटना का कारण जलवायु परिवर्तन है?
यहां भी संतुलित वैज्ञानिक दृष्टिकोण जरूरी है। हिमालय में भूस्खलन, हिमस्खलन, ग्लेशियर टूटना और चट्टान गिरना प्राकृतिक प्रक्रियाएं हैं। हर घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम बताना उचित नहीं होगा। लेकिन यह भी उतना ही सही है कि तापमान में वृद्धि और वर्षा के स्वरूप में बदलाव हिमालयी पर्यावरण की परिस्थितियों को बदल रहे हैं।
अध्ययन में पिछले दो दशकों में हिमालय में तापमान वृद्धि को वैश्विक औसत से अधिक तेजी से बढ़ने की बात कही गई है। इसके साथ ग्लेशियरों के पीछे हटने और सहायक ग्लेशियरों के अलग होने जैसी प्रक्रियाओं को भी रेखांकित किया गया है। इसलिए जलवायु परिवर्तन को किसी एक आपदा का अकेला कारण बताने के बजाय उसे जोखिम बढ़ाने वाली पृष्ठभूमि के रूप में समझना ज्यादा वैज्ञानिक दृष्टिकोण होगा।
हिमालय में विकास चाहिए, लेकिन पहाड़ की कीमत पर नहीं
हिमालय में विकास रुकना नहीं चाहिए। बद्रीनाथ-माणा जैसे क्षेत्रों में बेहतर सड़कें, स्वास्थ्य सेवाएं, संचार व्यवस्था और स्थानीय रोजगार की जरूरत है। सीमावर्ती क्षेत्रों में आधारभूत ढांचा देश की रणनीतिक आवश्यकता भी है।
लेकिन विकास का मॉडल बदलना होगा। मैदानी इलाकों के नियम पहाड़ों पर लागू नहीं किए जा सकते। जहां वैज्ञानिक रूप से मलबा-प्रवाह का खतरा अधिक है वहां निर्माण की अनुमति पर पुनर्विचार होना चाहिए। जहां ढलान कमजोर है वहां इंजीनियरिंग सुरक्षा के बिना सड़क चौड़ीकरण नहीं होना चाहिए। जहां ग्लेशियर जोखिम अधिक है वहां स्थायी संरचनाओं की सीमा तय करनी होगी।
और सबसे जरूरी—हर बड़े निर्माण से पहले climate risk assessment और disaster risk assessment को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। हमें यह तय करना होगा कि विकास पहाड़ को मजबूत कर रहा है या पहाड़ की प्राकृतिक क्षमता को कमजोर।
अब चेतावनी व्यवस्था नहीं बनी तो अगली खबर फिर ‘आपदा’ होगी
नेपाल की त्रासदी के बाद कुछ दिनों तक दुनिया का ध्यान उस क्षेत्र पर रहेगा। राहत अभियान चलेंगे, नुकसान का आकलन होगा और विशेषज्ञ कारणों पर चर्चा करेंगे। फिर खबरें दूसरी घटनाओं के नीचे दब जाएंगी। लेकिन हिमालय नहीं बदलेगा। वह अपनी गति से बदलता रहेगा। ग्लेशियर पीछे हटते रहेंगे। बर्फीले हिस्से अस्थिर होते रहेंगे। बारिश का स्वरूप बदलता रहेगा। नदियां बहती रहेंगी। और हम उनके किनारे निर्माण करते रहेंगे। इसलिए असली चुनौती नेपाल की घटना को याद रखना नहीं, बल्कि उससे नीति बनाना है।
बद्रीनाथ-माणा क्षेत्र में जोखिम मानचित्र सार्वजनिक किए जाने चाहिए। संवेदनशील क्षेत्रों में चेतावनी संकेत और निकासी मार्ग स्पष्ट होने चाहिए। स्थानीय लोगों और पर्यटकों के लिए नियमित आपदा अभ्यास होने चाहिए। मोबाइल आधारित अलर्ट प्रणाली को मजबूत किया जाना चाहिए। और सबसे बढ़कर, वैज्ञानिकों की चेतावनियों को फाइलों में बंद रखने के बजाय उन्हें प्रशासनिक फैसलों का आधार बनाना होगा।
हिमालय सवाल पूछ रहा है
क्या हिमालय बदल रहा है? स्थानीय अनुभव कहते हैं—बदलाव महसूस किया जा रहा है। ग्लेशियरों पर वैज्ञानिक अध्ययन कहते हैं—परिवर्तन दर्ज किया जा रहा है। मौसम के आंकड़े बताते हैं—तापमान और वर्षा के स्वरूप में बदलाव हो रहे हैं। चमोली जैसी घटनाएं बताती हैं—बर्फ और चट्टान का संयुक्त मलबा कितना विनाशकारी हो सकता है।
और नेपाल की ताजा त्रासदी फिर याद दिलाती है कि हिमालयी आपदा एक घटना तक सीमित नहीं रहती। एक ग्लेशियर टूट सकता है, नदी रुक सकती है, प्राकृतिक अवरोध बन सकता है और उसके बाद अचानक पानी और मलबे की विनाशकारी लहर नीचे उतर सकती है।
बद्रीनाथ-माणा के सामने चुनौती इसलिए केवल ग्लेशियरों की नहीं है। चुनौती है—बदलते हिमालय को समझने की। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हिमालय स्थिर नहीं है। वह एक जीवित, गतिशील और संवेदनशील पर्वतीय तंत्र है। उसके साथ विकास करना है तो उसकी सीमाओं को समझना होगा। ग्लेशियरों की निगरानी करनी होगी। जोखिम वाले क्षेत्रों को चिह्नित करना होगा। स्थानीय समुदायों को तैयार करना होगा। और ऐसी चेतावनी प्रणाली बनानी होगी जो आपदा आने के बाद नहीं, आपदा के संकेत मिलते ही लोगों तक पहुंच जाए।
नेपाल की तबाही को केवल एक पड़ोसी देश की त्रासदी समझना आसान है। लेकिन यदि हमने उससे सबक नहीं लिया तो कल यही सवाल हमारे सामने भी खड़ा हो सकता है— जब पहाड़ पहले ही संकेत दे रहा था, तब हमने उसकी आवाज क्यों नहीं सुनी? हिमालय बदल रहा है। सवाल यह है कि हम कब बदलेंगे?

— अनिल अनूप

























