न आगे बढ़ने की राह, न लौटने का रास्ता, बस में सिमटी तीर्थयात्रियों की जिंदगी

नेपाल में सड़क मार्ग बाधित होने के बाद बस के पास परेशान खड़े राजस्थान के बुजुर्ग, महिलाएं और अन्य तीर्थयात्री

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मिश्री लाल कोरी की रिपोर्ट

धादिंग (नेपाल)। तीर्थयात्रा पर निकले राजस्थान के कोटा और बारा जिलों के श्रद्धालुओं ने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि उनकी आस्था की यह यात्रा अचानक ऐसी मुश्किल में बदल जाएगी, जहां आगे बढ़ने के लिए सड़क नहीं होगी और पीछे लौटने का रास्ता भी आसान नहीं रहेगा। नेपाल में सड़क मार्ग बाधित होने के बाद बुजुर्गों, बच्चों, महिलाओं और युवतियों सहित तीर्थयात्रियों का एक समूह बस समेत रास्ते में फंस गया है। अब इस समूह के सामने सबसे बड़ा सवाल दर्शन या यात्रा के अगले पड़ाव का नहीं, बल्कि सुरक्षित ठिकाने, भोजन और घर वापसी का है।

काठमांडू से लगभग 65 किलोमीटर दूर कृष्णभीर इलाके में सड़क कट जाने के कारण यह तीर्थयात्री समूह आगे नहीं बढ़ पा रहा है। जिस बस से श्रद्धालु लंबी धार्मिक यात्रा पर निकले थे, वही अब उनके लिए अस्थायी आश्रय बन गई है। बस के भीतर यात्रियों का सामान रखा है और उसी के बीच बुजुर्ग तथा बच्चे समय काटने को मजबूर हैं। बाहर सड़क का टूटा हिस्सा और बंद रास्ता उनकी परेशानी को लगातार बढ़ा रहा है।

सड़क टूटी तो थम गई पूरी यात्रा

राजस्थान के कोटा और बारा से निकला यह समूह कई धार्मिक स्थलों के दर्शन कर नेपाल पहुंचा था। 29 अगस्त को नेपाल में प्रवेश करने के बाद यात्रियों ने पशुपतिनाथ मंदिर के दर्शन किए। इसके बाद उनकी योजना बिहार, झारखंड, कामाख्या, ओडिशा और गंगासागर होते हुए वापस लौटने की थी। यात्रा का कार्यक्रम पहले से तय था और श्रद्धालु धार्मिक स्थलों के दर्शन को लेकर उत्साहित थे।

लेकिन कृष्णभीर में सड़क कट जाने के बाद पूरी योजना अचानक बदल गई। बस आगे नहीं जा सकती और जिस रास्ते से समूह आया था, वहां से वापस लौटना भी आसान नहीं है। ऐसे में यात्रियों को समझ नहीं आ रहा कि वे आगे जाएं तो कैसे और पीछे लौटें तो किस रास्ते से।

यात्रियों का कहना है कि स्थानीय स्तर पर उन्हें बताया जा रहा है कि पुल और सड़क का निर्माण पूरा होने में करीब 15 दिन लग सकते हैं। यह अवधि उनके लिए सबसे बड़ी चिंता का कारण बन गई है। सवाल यह है कि यदि वास्तव में सड़क खुलने में 15 दिन लगते हैं तो इतने लंबे समय तक बुजुर्गों, बच्चों और महिलाओं को कहां रखा जाएगा?

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बस बनी रात गुजारने का सहारा

दिन का समय किसी तरह बीत जाता है, लेकिन रात होते ही यात्रियों की मुश्किल कई गुना बढ़ जाती है। सड़क किनारे रात गुजारना सुरक्षित और सुविधाजनक नहीं है। यात्रियों के मुताबिक स्थानीय स्तर पर सड़क पर ठहरने की अनुमति भी नहीं मिल रही थी। ऐसे में बस ही उनके लिए रात गुजारने का एकमात्र सहारा बन गई।

समूह में महिलाएं और बच्चियां भी हैं। उनके लिए खुले स्थान या सड़क किनारे रात बिताना विशेष चिंता का विषय है। बुजुर्गों और छोटे बच्चों की मौजूदगी ने भी यात्रियों की चिंता बढ़ा दी है। लगातार रास्ते में रहने से थकान, भोजन और आवश्यक सुविधाओं की समस्या सामने आने लगी है।

यात्री बद्रीलाल मीणा कहते हैं कि बस में महिलाएं, बच्चियां और बच्चे हैं। ऐसी स्थिति में 15 दिन तक रुकना बेहद कठिन होगा। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि इतनी लंबी अवधि कैसे गुजरेगी और बच्चों तथा बुजुर्गों की देखभाल कैसे की जाएगी।

प्रशासन की 15 दिन की आशंका ने बढ़ाई चिंता

रास्ता कब खुलेगा, इसे लेकर फिलहाल यात्रियों के पास कोई निश्चित जानकारी नहीं है। स्थानीय पुलिस-प्रशासन की ओर से पुल और रास्ता तैयार होने में कम से कम 15 दिन लगने की बात कही जा रही है। यही अनुमान अब यात्रियों के लिए सबसे बड़ी परेशानी बन गया है।

हनुमान सिंह कहते हैं कि यदि पुल बनने में 15 दिन लगते हैं तो इतने लंबे समय तक यहां रुकना संभव नहीं है। उनके सामने बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा तथा भोजन की व्यवस्था सबसे बड़ी चिंता है। यात्रियों को यह भी डर है कि रास्ता कब खुलेगा, इसकी कोई निश्चित तारीख नहीं होने के कारण उनकी पूरी यात्रा का कार्यक्रम बिगड़ जाएगा।

राशन भी सीमित है। यात्रियों का कहना है कि वे तीर्थयात्रा के लिए पर्याप्त सामान लेकर निकले थे, लेकिन कई दिनों तक किसी अनिश्चित स्थान पर फंसे रहने के हिसाब से उनकी तैयारी नहीं थी। जितना राशन था, वह धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। ऐसे में यदि रास्ता लंबे समय तक बंद रहता है तो भोजन और दैनिक जरूरतों की व्यवस्था भी चुनौती बन सकती है।

छोटी गाड़ियों से निकलने का सुझाव, लेकिन खर्च की चिंता

यात्रियों को कथित तौर पर सलाह दी जा रही है कि बस को वहीं छोड़कर छोटी गाड़ियों के जरिए काठमांडू से हटौंडा की ओर जाने वाले वैकल्पिक मार्ग का इस्तेमाल किया जाए। लेकिन यात्रियों के सामने यह विकल्प भी आसान नहीं है।

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नाथूलाल मीणा बताते हैं कि बस में बड़ी संख्या में यात्री हैं। यदि बस छोड़कर छोटी गाड़ियों से जाना पड़े तो कई वाहनों की जरूरत होगी। पांच-छह यात्रियों के लिए एक वाहन लेना पड़े तो पूरे समूह को निकालने के लिए कई गाड़ियां चाहिए होंगी। इसके लिए अतिरिक्त किराया देना पड़ेगा, जो हर यात्री के लिए आसान नहीं है।

यात्रियों की दूसरी चिंता सामान को लेकर है। बस में उनके कपड़े, धार्मिक सामग्री, निजी सामान और यात्रा से जुड़ी आवश्यक वस्तुएं हैं। यदि बस छोड़कर दूसरी गाड़ियों से आगे बढ़ते हैं तो बस और सामान की सुरक्षा कैसे होगी, इसका भी कोई स्पष्ट जवाब उन्हें नहीं मिल रहा।

आगे की यात्रा भी बनी पहेली

रामस्वरूप मीणा कहते हैं कि किसी तरह यदि वे सोनौली तक पहुंच भी जाते हैं तो वहां से आगे की यात्रा कैसे पूरी होगी, यह स्पष्ट नहीं है। बस छोड़ने की स्थिति में आगे की पूरी यात्रा व्यवस्था बदल जाएगी। उनके मुताबिक श्रद्धालु तीर्थयात्रा के लिए निकले थे और उन्हें रास्ते में इस तरह फंस जाने की उम्मीद नहीं थी।

रामस्वरूप धारीवाल भी कहते हैं कि यात्रा पर निकलते समय किसी ने नहीं सोचा था कि ऐसी स्थिति पैदा हो जाएगी। अब न आगे जाने का रास्ता साफ है और न पीछे लौटने का कोई आसान उपाय। हर तरफ चिंता का माहौल है।

कैलाशचंद बताते हैं कि समूह में बुजुर्ग और बच्चे होने के कारण परेशानी और ज्यादा बढ़ गई है। दिन तो किसी तरह निकल जाता है, लेकिन रात होते ही चिंता बढ़ जाती है। सबसे बड़ा सवाल यही रहता है कि अगली सुबह क्या होगा और रास्ता कब खुलेगा।

गांव पालिका ने दिया ठहराने का भरोसा

इस बीच गजुरी गांव पालिका की ओर से तीर्थयात्रियों की परेशानी को देखते हुए राहत की पहल की गई है। गांव पालिका अध्यक्ष गणेश लाल श्रेष्ठ ने भरोसा दिलाया है कि किसी अतिथि को परेशानी नहीं होने दी जाएगी। तीर्थयात्रियों के समूह को नवनिर्मित गांव पालिका भवन में ठहराने की व्यवस्था किए जाने की बात कही गई है।

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यह पहल यात्रियों के लिए फिलहाल राहत की खबर है। यदि उन्हें सुरक्षित भवन में ठहरने की जगह मिल जाती है तो महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की रात गुजारने की समस्या कुछ हद तक कम हो सकती है। हालांकि उनकी मूल समस्या सड़क खुलने और सुरक्षित रूप से आगे या वापस जाने की ही बनी हुई है।

स्थानीय स्तर पर यह भी स्पष्ट किया गया है कि वापसी का स्थायी समाधान रास्ता बनने के बाद ही संभव हो पाएगा। यानी फिलहाल यात्रियों को वैकल्पिक व्यवस्था के भरोसे रहना होगा।

इंतजार में बीत रहे हैं तीर्थयात्रा के दिन

धादिंग से गल्छी होते हुए गजुरी मार्ग पर खड़ी बस अब इस समूह के लिए महज एक वाहन नहीं रह गई है। यही बस उनका अस्थायी घर, सामान रखने की जगह और रात में आश्रय बन गई है। श्रद्धालु लगातार रास्ता खुलने की जानकारी लेने की कोशिश कर रहे हैं।

जिन लोगों ने धार्मिक स्थलों के दर्शन और आध्यात्मिक अनुभव के लिए यह यात्रा शुरू की थी, वे अब अनिश्चितता और चिंता के बीच समय गुजार रहे हैं। किसी को बच्चों की चिंता है, किसी को बुजुर्गों की, तो कोई राशन और यात्रा खर्च को लेकर परेशान है।

बद्रीलाल मीणा की आवाज में इस चिंता को महसूस किया जा सकता है। उनका कहना है कि वे किसी तरह सुरक्षित यहां से निकलना चाहते हैं। यह बात इस पूरे समूह की स्थिति को बयां करती है।

यह घटना सिर्फ एक सड़क बाधित होने की कहानी नहीं है, बल्कि उन यात्रियों की मुश्किल का उदाहरण है जो लंबी दूरी की धार्मिक यात्रा पर निकले और अचानक प्राकृतिक या भौगोलिक परिस्थितियों के कारण बीच रास्ते में फंस गए। फिलहाल इन तीर्थयात्रियों की नजर सड़क पर है। उन्हें उम्मीद है कि रास्ता जल्द खुलेगा और वे अपनी यात्रा पूरी कर सकेंगे।

लेकिन जब तक सड़क नहीं खुलती, तब तक उनके सामने सबसे जरूरी सवाल यही है—बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं के साथ सुरक्षित ठहरने की व्यवस्था कैसे हो और घर लौटने का रास्ता कब खुले?

फिलहाल श्रद्धालु उम्मीद लगाए बैठे हैं कि बंद रास्ते के साथ उनकी उम्मीदें भी बंद नहीं होंगी और जल्द ही कोई सुरक्षित समाधान सामने आएगा।

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Author: यायावर

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