‘दो रंग’ ने रचा रंगमंच और साहित्य का संवेदनशील संगम, रीता दास राम के एकल अभिनय ने जीता दर्शकों का दिल

मुंबई के ‘दो रंग’ नाट्य आयोजन में रीता दास राम के एकल अभिनय और रंगमंचीय प्रस्तुति के साथ रिपोर्टर शामी एम. इरफ़ान

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शामी एम. इरफ़ान की रिपोर्ट

मुंबई। साहित्य और रंगमंच के बीच संवाद को जीवंत करने वाली एकल नाट्य प्रस्तुति श्रृंखला ‘दो रंग’ में इस बार कहानी, स्त्री-अस्मिता, एकांत, आत्मसंघर्ष और मानवीय संवेदनाओं का ऐसा प्रभावशाली संगम देखने को मिला, जिसने बारिश के बीच भी दर्शकों को अंत तक बांधे रखा। आकृति मंच के तत्वावधान में 16 अगस्त को स्वर संगम फाउंडेशन के ‘विरुंगला केंद्र’ में आयोजित इस विशेष रंगमंचीय संध्या में अभिनेत्री, कवयित्री एवं लेखिका रीता दास राम ने प्रसिद्ध साहित्यकार निर्मल वर्मा की कहानी ‘धूप का एक टुकड़ा’ का एकल अभिनय प्रस्तुत कर खूब सराहना हासिल की।

मुंबई में हुई इस साहित्यिक-रंगमंचीय प्रस्तुति की खासियत यह रही कि खराब मौसम और लगातार बारिश के बावजूद साहित्य तथा रंगमंच से जुड़े लोगों के साथ बड़ी संख्या में दर्शक कार्यक्रम स्थल तक पहुंचे। इससे साफ दिखाई दिया कि गंभीर साहित्य और सार्थक रंगमंच के प्रति मुंबई के दर्शकों की रुचि आज भी मजबूत है। ‘दो रंग’ की यह शाम केवल दो नाटकों का मंचन नहीं थी, बल्कि साहित्यिक रचनाओं को रंगभाषा में पुनः अनुभव करने का अवसर भी बनी।

‘धूप का एक टुकड़ा’ में स्त्री के अकेलेपन और अंतर्द्वंद्व की कहानी

निर्मल वर्मा की चर्चित पुस्तक ‘तीन एकांत’ में शामिल कहानी ‘धूप का एक टुकड़ा’ अपने भीतर अकेलेपन, रिश्तों की जटिलता, जीवन की इच्छाओं और व्यक्ति के वैचारिक संघर्ष को समेटे हुए है। कहानी एक ऐसी परित्यक्ता स्त्री के जीवन की परतें खोलती है, जो परिस्थितियों के सामने टूटने के बजाय अपने अस्तित्व और जीवन-दृष्टि को समझने की कोशिश करती है।

रीता दास राम ने इस जटिल स्त्री चरित्र को एकल अभिनय के माध्यम से मंच पर उतारने का चुनौतीपूर्ण निर्णय लिया। कहानी की नायिका विदेशी स्त्री है। ऐसे चरित्र को हिंदी रंगमंच पर केवल एक कलाकार द्वारा प्रस्तुत करना अभिनय की दृष्टि से आसान नहीं था। भाषा, भाव-भंगिमा, मानसिकता और चरित्र की आंतरिक बेचैनी को एक साथ दर्शकों तक पहुंचाना कलाकार के लिए बड़ी चुनौती थी।

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रीता दास राम ने अपने अभिनय में इस चुनौती को संवेदनशीलता के साथ स्वीकार किया। उन्होंने संवादों के साथ-साथ चेहरे के भाव, देहभाषा, मौन और आवाज के उतार-चढ़ाव को भी चरित्र निर्माण का माध्यम बनाया। परिणामस्वरूप मंच पर मौजूद अकेली अभिनेत्री के माध्यम से दर्शकों को उस स्त्री का पूरा संसार दिखाई देने लगा, जिसमें प्रेम, विछोह, स्मृतियां, इच्छाएं, प्रश्न और जीवन के प्रति उसका अपना नजरिया शामिल था।

पहली बार सोलो अभिनय, फिर भी प्रभावशाली प्रस्तुति

रीता दास राम के लिए ‘धूप का एक टुकड़ा’ का मंचन इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि कवयित्री और लेखिका के रूप में सक्रिय रहने के बाद यह उनका पहला सोलो अभिनय अनुभव था। एकल अभिनय में कलाकार को किसी सह-अभिनेता के सहारे के बिना पूरी प्रस्तुति का भावनात्मक और नाटकीय भार स्वयं उठाना पड़ता है।

इस दृष्टि से उनकी प्रस्तुति को मिली दर्शकीय सराहना विशेष महत्व रखती है। कहानी के भीतर मौजूद स्त्री के मनोवैज्ञानिक संसार को उन्होंने केवल संवादों के सहारे नहीं, बल्कि अभिनय की सूक्ष्मता से अभिव्यक्त किया। उनके अभिनय में कहीं आत्मविश्वास दिखाई दिया तो कहीं पात्र का अकेलापन और आंतरिक द्वंद्व भी प्रभावी ढंग से सामने आया।

इस प्रस्तुति का निर्देशन लेखक एवं निर्देशक राजीव रोहित ने किया। रीता दास राम के सोलो अभिनय के निर्णय और कहानी के चयन को स्वीकार करते हुए उन्होंने प्रस्तुति को आवश्यक मार्गदर्शन दिया। निर्देशन ने कहानी की साहित्यिक संवेदना को बनाए रखते हुए उसे रंगमंच की जरूरतों के अनुरूप प्रस्तुत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

‘दो रंग’ में कृष्ण चंदर की रचना का भी मंचन

‘दो रंग’ श्रृंखला की दूसरी प्रस्तुति के रूप में प्रसिद्ध लेखक कृष्ण चंदर की रचना ‘मेरे दोस्त का बेटा’ का मंचन किया गया। इसमें संतोष जाधव ने एकल अभिनय किया। इस प्रस्तुति ने भी दर्शकों के बीच अपनी अलग छाप छोड़ी।

एक ही कार्यक्रम में दो अलग-अलग साहित्यिक रचनाओं को एकल अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत करना ‘दो रंग’ की अवधारणा को सार्थक करता दिखाई दिया। एक ओर निर्मल वर्मा की मनोवैज्ञानिक और अंतर्मुखी कथा थी, तो दूसरी ओर कृष्ण चंदर की रचना के माध्यम से जीवन और मानवीय संबंधों की दूसरी संवेदना सामने आई।

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नाटक के लिए संगीत राजीव रोहित के पुत्र साहिल ने दिया। संगीत ने मंचीय वातावरण को प्रभावी बनाने में अपनी भूमिका निभाई और प्रस्तुति के भावनात्मक पक्ष को मजबूती दी।

साहित्य और रंगमंच प्रेमियों की रही उल्लेखनीय उपस्थिति

कार्यक्रम का आरंभ कमलेश नारायण कमल ने किया। उन्होंने दोनों नाटकों की पृष्ठभूमि, उनके साहित्यिक संदर्भ और मंचीय प्रस्तुति की अवधारणा के बारे में जानकारी दी। इससे दर्शकों को नाटकों को समझने के लिए आवश्यक संदर्भ मिला।

कार्यक्रम का संचालन हरि प्रसाद राय ने किया, जबकि शैलेश सिंह ने आभार व्यक्त किया। आयोजन में साहित्य और रंगमंच से जुड़े अनेक प्रमुख लोग उपस्थित रहे। हृदयेश मयंक, हरि प्रसाद राय, रमन मिश्र, राकेश शर्मा, शैलेश सिंह, अनिल गौड़, दिनेश शाकुल, अजय रोहिल्ला, आभा बोधिसत्व, प्रशांत जैन, मुख्तार खान, संजय भिसे, हरि मृदुल और आर.एस. विकल सहित अनेक साहित्य एवं रंगमंच प्रेमियों ने कार्यक्रम में सहभागिता की।

इसके अलावा राजेश विक्रांत, सैयद सलमा, बृजमोहन पांडेय, राम नरेश राम, आशु, कमलेश शर्मा, पुलक चक्रवर्ती, सुनील कुमार, सोनू पाहूजा, कृष्णा गौतम, पंकज कुमार, कुंदन कुमार, उमेश और विनोद सिंह सहित कई अतिथियों ने कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।

महिलाओं की प्रतिक्रिया ने रीता दास राम को किया भावुक

प्रस्तुति के बाद रीता दास राम ने दर्शकों की उपस्थिति और मिली सराहना के लिए आभार व्यक्त किया। उन्होंने विशेष रूप से कार्यक्रम में उपस्थित महिलाओं की आत्मीय प्रतिक्रिया का उल्लेख किया। उनके अनुसार, महिला दर्शकों की प्रतिक्रिया ने उन्हें पात्र के साथ भावनात्मक रूप से और अधिक जोड़ दिया।

उनकी यह बात भी महत्वपूर्ण रही कि किसी साहित्यिक चरित्र को मंच पर उतारना केवल अभिनय की तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि उसके भीतर प्रवेश करने और उसकी संवेदनाओं को समझने की यात्रा भी है। ‘धूप का एक टुकड़ा’ की नायिका के अंतर्मन को मंच पर जीवंत करने का अनुभव उनके लिए इसी तरह की रचनात्मक यात्रा रहा।

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रीता दास राम ने अपने गुरु हूबनाथ पाण्डेय के प्रति भी आभार व्यक्त किया, जिन्होंने रिहर्सल के लिए स्थान उपलब्ध कराया। उन्होंने अपने पति नरेश और पुत्र सैश के निरंतर प्रेम, सहयोग और प्रोत्साहन को भी इस प्रस्तुति की सफलता में महत्वपूर्ण बताया।

बारिश के बीच दर्शकों की मौजूदगी बनी आयोजन की खास पहचान

मुंबई की बारिश अक्सर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए चुनौती बन जाती है, लेकिन 16 अगस्त की शाम ‘दो रंग’ के आयोजन में दर्शकों की उपस्थिति ने इस धारणा को पीछे छोड़ दिया। खराब मौसम के बावजूद दर्शकों का पहुंचना इस बात का संकेत रहा कि साहित्य और रंगमंच के गंभीर विषयों को लेकर आज भी एक समर्पित दर्शक वर्ग मौजूद है।

‘धूप का एक टुकड़ा’ में स्त्री के एकांत और जीवन-दृष्टि का सवाल हो या ‘मेरे दोस्त का बेटा’ के जरिए मानवीय संबंधों की पड़ताल—दोनों प्रस्तुतियों ने अलग-अलग रंगों में दर्शकों के सामने साहित्य को मंच पर अनुभव करने का अवसर दिया।

‘दो रंग’ की शाम ने छोड़ी यादगार छाप

आकृति मंच की एकल नाट्य प्रस्तुति श्रृंखला ‘दो रंग’ का यह आयोजन साहित्य और रंगमंच के बीच रचनात्मक रिश्ते को मजबूत करने वाली पहल के रूप में सामने आया। निर्मल वर्मा की कहानी को रीता दास राम ने जिस संवेदनशीलता से मंच पर प्रस्तुत किया, वह उनके लिए सोलो अभिनय की नई शुरुआत भी बनी और दर्शकों के लिए एक यादगार रंगानुभव भी।

बारिश के बीच जुटे दर्शक, साहित्यिक रचनाओं की रंगमंचीय व्याख्या, कलाकारों का समर्पण और कार्यक्रम के बाद मिली आत्मीय प्रतिक्रियाओं ने इस शाम को विशेष बना दिया। मुंबई की इस रंगमंचीय संध्या में ‘दो रंग’ ने यह संदेश भी दिया कि जब साहित्य की गहराई और रंगमंच की जीवंतता साथ आती है, तो मंच पर केवल कहानी नहीं रहती—वह दर्शकों के अनुभव का हिस्सा बन जाती है।

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Author: यायावर

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