विशेष रिपोर्ट : टिक्कू आपचे
यदि आप सोचते हैं कि आज की फिल्मों में चार-पांच गाने बहुत होते हैं, तो भारतीय सिनेमा के इतिहास का एक ऐसा अध्याय है जो आपको हैरान कर देगा। लगभग 94 वर्ष पहले एक ऐसी फिल्म बनी थी, जिसमें एक-दो नहीं बल्कि पूरे 72 गाने थे। इनमें 31 गजलें, 9 ठुमरियां, 4 होली गीत और कई अन्य संगीत रचनाएं शामिल थीं। यही वजह है कि यह फिल्म आज भी विश्व सिनेमा के इतिहास में एक अनोखा रिकॉर्ड अपने नाम दर्ज किए हुए है।
इस अद्भुत फिल्म का नाम था ‘इंद्रसभा’, जो वर्ष 1932 में रिलीज हुई थी। भारतीय सिनेमा में बोलती फिल्मों का दौर शुरू हुए अभी एक वर्ष ही हुआ था और निर्माता नए प्रयोगों के जरिए दर्शकों को आकर्षित करने में जुटे थे। ऐसे समय में आई ‘इंद्रसभा’ ने संगीत, शायरी और रंगमंच को इस तरह पर्दे पर उतारा कि वह इतिहास का हिस्सा बन गई।
बोलती फिल्मों के शुरुआती दौर की अनूठी पेशकश
भारतीय सिनेमा में ध्वनि का आगमन 1931 में फिल्म ‘आलम आरा’ से हुआ था। इसके बाद दर्शकों में उन फिल्मों की मांग बढ़ने लगी जिनमें गीत-संगीत की भरमार हो। इसी माहौल में प्रसिद्ध फिल्म निर्माण कंपनी मदन थिएटर्स ने ‘इंद्रसभा’ का निर्माण किया।
फिल्म की अवधि करीब 211 मिनट यानी 3 घंटे 31 मिनट थी। उस दौर में लंबी फिल्मों का चलन था, लेकिन ‘इंद्रसभा’ की खासियत उसकी लंबाई नहीं बल्कि उसमें शामिल गीतों की अभूतपूर्व संख्या थी। आज भी कोई फिल्म इसके रिकॉर्ड को नहीं तोड़ सकी है।
उर्दू रंगमंच की अमर कृति से जन्मी थी ‘इंद्रसभा’
‘इंद्रसभा’ का आधार प्रसिद्ध उर्दू नाटक ‘इंदर सभा’ था, जिसे उन्नीसवीं शताब्दी के जाने-माने साहित्यकार सैयद आगा हसन अमानत ने लिखा था। यह नाटक अपने संगीत, शायरी और कल्पनालोक की कहानी के कारण बेहद लोकप्रिय हुआ था।
जब इसे फिल्म के रूप में बनाया गया तो मूल नाटक की संगीत प्रधान शैली को पूरी तरह बरकरार रखा गया। परिणामस्वरूप फिल्म में गीतों की संख्या इतनी अधिक हो गई कि वह अपने आप में एक रिकॉर्ड बन गई।
आखिर क्यों रखे गए 72 गाने?
आज के दर्शकों को यह संख्या अविश्वसनीय लग सकती है, लेकिन उस दौर में संगीत ही फिल्म की आत्मा माना जाता था। ‘इंद्रसभा’ में गाने केवल मनोरंजन का साधन नहीं थे, बल्कि वे कहानी को आगे बढ़ाने का प्रमुख माध्यम थे।
उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार फिल्म में शामिल संगीत रचनाओं में—
- 31 गजलें
- 9 ठुमरियां
- 4 होली गीत
- 15 पारंपरिक गीत
- 2 चौबोले
- 5 छंद
शामिल थे।
यानी फिल्म वस्तुतः एक विशाल संगीत महोत्सव जैसी थी, जिसमें भारतीय उपमहाद्वीप की विभिन्न संगीत विधाओं का समावेश किया गया था।
कौन थे फिल्म के कलाकार?
फिल्म में उस दौर के चर्चित कलाकारों ने अभिनय किया था। इनमें प्रमुख नाम थे—
- मास्टर निसार
- जहांआरा कज्जन
- मुख्तार बेगम
- अब्दुल रहमान काबुली
उस समय प्लेबैक सिंगिंग की व्यवस्था नहीं थी, इसलिए कलाकारों को स्वयं गाना पड़ता था। यही कारण था कि अभिनय के साथ-साथ गायन में दक्ष कलाकारों को विशेष महत्व मिलता था।
विशेष रूप से जहांआरा कज्जन अपने समय की लोकप्रिय अभिनेत्री और गायिका थीं। उनकी आवाज और प्रस्तुति ने फिल्म को अलग पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
संगीतकार ने निभाई बड़ी जिम्मेदारी
इतने विशाल संगीत संग्रह को एक फिल्म में समाहित करना आसान काम नहीं था। फिल्म का संगीत नागरदास नायक ने तैयार किया था। सीमित तकनीकी संसाधनों वाले उस दौर में दर्जनों गीतों की रिकॉर्डिंग और प्रस्तुति अपने आप में बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।
आज भी कायम है विश्व रिकॉर्ड
‘इंद्रसभा’ की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका वह रिकॉर्ड है, जो लगभग एक सदी बाद भी बरकरार है। विभिन्न स्रोतों में गीतों की संख्या 69, 71 और 72 बताई जाती है, लेकिन व्यापक रूप से स्वीकार किया गया आंकड़ा 72 गीतों का ही है।
फिल्म इतिहास से जुड़े कई अभिलेखों और अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड स्रोतों में इसे एक फिल्म में सर्वाधिक गीतों के लिए जाना जाता है। यही कारण है कि ‘इंद्रसभा’ को भारतीय सिनेमा की सबसे अनोखी संगीत प्रधान फिल्मों में गिना जाता है।
उस दौर का सिनेमा और आज का अंतर
आज अधिकांश फिल्मों में दो से छह गाने ही होते हैं। कई फिल्मों में तो गीतों की आवश्यकता भी महसूस नहीं की जाती। लेकिन 1930 के दशक में संगीत ही दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने का सबसे बड़ा माध्यम था।
‘इंद्रसभा’ उस युग की सांस्कृतिक सोच का प्रतिनिधित्व करती है, जब सिनेमा, साहित्य और संगीत एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए थे। यही कारण है कि यह फिल्म केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज भी मानी जाती है।
भारतीय सिनेमा की अमूल्य धरोहर
आज भले ही ‘इंद्रसभा’ का नाम आम दर्शकों के बीच कम सुनाई देता हो, लेकिन फिल्म इतिहासकार इसे भारतीय सिनेमा के सबसे महत्वपूर्ण प्रयोगों में से एक मानते हैं। यह फिल्म उस दौर की कलात्मक महत्वाकांक्षा, संगीत प्रेम और रचनात्मक साहस का प्रतीक है।
72 गीतों का यह रिकॉर्ड केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस युग की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रमाण है। लगभग 94 वर्ष बाद भी ‘इंद्रसभा’ भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक ऐसी मिसाल बनी हुई है, जिसके बारे में जानकर हर फिल्म प्रेमी हैरान हुए बिना नहीं रह सकता।
























