“कवितांजलि” : संवेदनाओं, सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों का सजग काव्य-दर्पण
शिक्षाविद् व साहित्यकार वल्लभ लखेश्री ‘सारंग’ के प्रथम काव्य-संग्रह की विस्तृत समीक्षा
समीक्षक : अनिल अनूप
हिंदी साहित्य की समकालीन काव्यधारा में जब संवेदनाओं का क्षरण, सामाजिक विघटन और मानवीय मूल्यों का अवमूल्यन लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है, तब ऐसे समय में शिक्षाविद्, सामाजिक चिंतक और साहित्य साधक वल्लभ लखेश्री ‘सारंग’ का प्रथम काव्य-संग्रह “कवितांजलि” एक सकारात्मक, प्रेरणास्पद और विचारोत्तेजक हस्तक्षेप के रूप में सामने आता है। यह केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि एक ऐसे संवेदनशील मन की अभिव्यक्ति है जिसने समाज, संस्कृति, राष्ट्र, मनुष्य और मानवीय रिश्तों को गहराई से महसूस किया है।
राजस्थान के फलोदी निवासी वल्लभ लखेश्री ‘सारंग’ शिक्षा, सामाजिक चेतना और साहित्यिक सक्रियता से लंबे समय से जुड़े रहे हैं। पुस्तक में उपलब्ध परिचय के अनुसार वे आलोचक, सामाजिक चिंतक, राजनीतिक विश्लेषक, पत्रकार, संपादक और साहित्य मंचों के सक्रिय सहभागी रहे हैं। यही कारण है कि उनकी कविताओं में केवल भावुकता नहीं, बल्कि अनुभवजन्य यथार्थ, सामाजिक दृष्टि और जीवन का विस्तृत बोध दिखाई देता है।
“कवितांजलि” की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें जीवन के लगभग सभी पक्षों को छूने का प्रयास किया गया है। पुस्तक की भूमिका और आरंभिक अंशों से स्पष्ट होता है कि कवि ने प्रेम, करुणा, सामाजिक विसंगतियाँ, राष्ट्रवाद, नारी चेतना, पर्यावरण, युवा पीढ़ी, पाखंड-विरोध, आध्यात्मिकता और मानवीय संघर्षों को अपनी कविता का विषय बनाया है। यह विविधता पुस्तक को केवल निजी अनुभूतियों तक सीमित नहीं रहने देती, बल्कि इसे सामाजिक दस्तावेज का स्वरूप प्रदान करती है।
पुस्तक का आरंभ “सृजन वंदना”, “कलम का पैगाम”, “शब्दों का संसार”, “मेरी कविता”, “मेरी कलम”, “कलम की धार” जैसी कविताओं से होता है। इन शीर्षकों से ही स्पष्ट हो जाता है कि कवि के लिए लेखन मात्र शौक नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी है। कवि स्वयं लिखते हैं कि—
“शब्दों में पिरोई गई भावनाएँ अभिव्यक्ति देती हैं, काव्य सृजनात्मक अवसर देता है तथा सृजन जिज्ञासु जनों के लिए प्रेरणा, चेतना और आनंद की मददगार होती है।”
यह कथन वस्तुतः पूरे संग्रह की वैचारिक भूमिका बन जाता है। कवि शब्द को केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं मानता, बल्कि परिवर्तन का अस्त्र भी समझता है। इसी भाव को आगे बढ़ाते हुए संग्रह में उद्धृत पंक्तियाँ—
“हम शब्दों के रश्मि सुमन, शब्दों के समर में कूद पड़े।
भर तरकश कलम बाण से, साहित्य के रण में अड़ पड़े।”
—कवि की साहित्यिक प्रतिबद्धता को प्रकट करती हैं। यहाँ कविता मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि संघर्ष का माध्यम है।
“कवितांजलि” का एक महत्वपूर्ण पक्ष इसकी सामाजिक चेतना है। कवि समाज में व्याप्त विसंगतियों, अन्याय और नैतिक पतन को लेकर गहरी चिंता व्यक्त करता है। वह केवल आलोचना नहीं करता, बल्कि जागरण की भूमिका भी निभाता है। पुस्तक में अनेक स्थानों पर कवि व्यवस्था, भ्रष्टाचार, सामाजिक विभाजन और नैतिक गिरावट पर प्रहार करता दिखाई देता है। उसकी भाषा सीधी है, लेकिन प्रभावशाली है। वह दुरूह प्रतीकों या जटिल बिंबों का सहारा लेने के बजाय सहज अभिव्यक्ति में विश्वास करता है।
समकालीन हिंदी कविता में अक्सर यह शिकायत की जाती रही है कि कविता आम पाठक से दूर होती जा रही है। “कवितांजलि” इस दूरी को कम करती है। इसकी भाषा सरल, संवादपरक और लोकानुभव से जुड़ी हुई है। यही कारण है कि यह संग्रह केवल साहित्य के गंभीर अध्येताओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामान्य पाठक भी इससे सहज रूप से जुड़ सकेगा।
संग्रह में राष्ट्रप्रेम और सामाजिक एकता का स्वर भी अत्यंत प्रखर है। कवि राष्ट्रवाद को केवल राजनीतिक अवधारणा के रूप में नहीं देखता, बल्कि उसे सांस्कृतिक और मानवीय चेतना से जोड़ता है। उसकी कविताएँ राष्ट्रीय अस्मिता, सामाजिक समरसता और मानवीय एकजुटता की पक्षधर दिखाई देती हैं। वर्तमान समय में जब समाज अनेक प्रकार के विभाजनों से जूझ रहा है, तब ऐसी कविताएँ एक सकारात्मक संदेश देती हैं।
नारी विषयक संवेदनाएँ भी “कवितांजलि” का महत्वपूर्ण आयाम हैं। पुस्तक के परिचयात्मक अंशों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि कवि ने नारी विमर्श और उपेक्षित वर्ग की पीड़ा को अपनी कविताओं में स्थान दिया है। यह उल्लेखनीय है कि कवि नारी को केवल करुणा का पात्र बनाकर प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि उसकी गरिमा, संघर्ष और अस्तित्व को भी स्वर देता है। इससे संग्रह का सामाजिक दायरा और व्यापक हो जाता है।
पर्यावरण और प्रकृति के प्रति कवि की चिंता भी पुस्तक में अनेक स्थानों पर दिखाई देती है। आधुनिक विकास के बीच प्रकृति के विनाश और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण को कवि गहराई से महसूस करता है। यह दृष्टि बताती है कि कवि केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि चिंतनशील भी है। उसके लिए साहित्य समाज और प्रकृति दोनों के संरक्षण का माध्यम है।
युवा पीढ़ी को लेकर भी कवि आशावादी दिखाई देता है। वह युवाओं को संघर्ष, जागरूकता और नैतिकता का संदेश देता है। पुस्तक में उद्धृत पंक्तियाँ—
“नवजवान के जोश को सुनो, जीवन साधन क्या कहती है।
आग न लगाओ अपने घर में, जुबान बोलती क्यों रहती है।”
—युवाओं को आत्मविनाश से दूर रहकर सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं। कवि यहाँ उपदेशात्मक नहीं लगता, बल्कि एक अनुभवी मार्गदर्शक की तरह संवाद करता है।
“कवितांजलि” की शैलीगत विशेषताओं की बात करें तो इसकी भाषा में लोकधर्मी सहजता है। कवि अलंकारों और जटिल संरचनाओं की अपेक्षा भाव की स्पष्टता को महत्व देता है। यही कारण है कि उसकी कविताएँ सीधे हृदय तक पहुँचती हैं। संग्रह में कहीं-कहीं पारंपरिक छंदों की झलक मिलती है तो कहीं मुक्त छंद की स्वतंत्रता भी दिखाई देती है। यह मिश्रण कवि की अभिव्यक्ति को लचीला और प्रभावी बनाता है।
हालाँकि साहित्यिक दृष्टि से देखें तो कुछ कविताओं में भाव की पुनरावृत्ति और उपदेशात्मकता अधिक महसूस होती है। कहीं-कहीं कविताएँ नारेधर्मिता की सीमा तक भी पहुँचती हैं। लेकिन यह संग्रह का स्थायी दोष नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कवि का मूल उद्देश्य सामाजिक चेतना और प्रेरणा का संचार करना है। प्रथम काव्य-संग्रह होने के नाते यह स्वाभाविक भी है कि कवि अपने विचारों को सीधे रूप में अभिव्यक्त करना चाहता हो।
इस संग्रह का सबसे मजबूत पक्ष इसकी ईमानदारी है। कवि कृत्रिम बौद्धिकता का प्रदर्शन नहीं करता। वह जीवन को जिस रूप में देखता और महसूस करता है, उसी रूप में प्रस्तुत करता है। यही सहजता पाठक को पुस्तक से जोड़ती है। उसकी कविताएँ बनावटी नहीं लगतीं, बल्कि अनुभव की मिट्टी से उपजी हुई प्रतीत होती हैं।
पुस्तक का शीर्षक “कवितांजलि” भी अत्यंत सार्थक है। यह मानो कवि की ओर से समाज, साहित्य और मानवीय मूल्यों को समर्पित एक भावांजलि है। संग्रह की कविताएँ पाठक को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि सोचने के लिए भी विवश करती हैं। यही किसी भी सार्थक साहित्य की पहचान होती है।
विशेष रूप से उल्लेखनीय यह है कि वल्लभ लखेश्री ‘सारंग’ की पृष्ठभूमि शिक्षा और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रही है। उन्होंने केवल साहित्य सृजन ही नहीं किया, बल्कि सामाजिक सेवा, पर्यावरण संरक्षण और मानवीय मूल्यों के लिए भी कार्य किया। पुस्तक के परिचय में दर्ज देहदान संबंधी संकल्प उनके मानवीय दृष्टिकोण को और अधिक विश्वसनीय बनाता है। जब कवि का जीवन और उसकी कविता एक-दूसरे के निकट दिखाई देते हैं, तब उसकी रचनाएँ अधिक प्रभावशाली बन जाती हैं।
समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में जहाँ एक ओर अत्यधिक बौद्धिक और प्रयोगवादी लेखन दिखाई देता है, वहीं “कवितांजलि” जैसी पुस्तकें आम पाठक और साहित्य के बीच सेतु का कार्य करती हैं। इसकी भाषा में आत्मीयता है, विचारों में स्पष्टता है और भावों में सच्चाई है। यही कारण है कि यह संग्रह पाठकों के बीच सहज स्वीकार्यता प्राप्त कर सकता है।
हालाँकि “कवितांजलि” अपनी विषय-विविधता, सामाजिक चेतना और मानवीय संवेदनाओं के कारण एक प्रभावशाली काव्य-संग्रह के रूप में उभरती है, फिर भी पुस्तक के कुछ पक्ष ऐसे हैं जिन पर भविष्य में और गंभीरता से ध्यान दिए जाने की आवश्यकता महसूस होती है। विशेष रूप से पुस्तक का आवरण पृष्ठ अपेक्षित प्रभाव उत्पन्न नहीं कर पाता। किसी भी पुस्तक का कवर केवल सजावट नहीं होता, बल्कि वही पाठक और पुस्तक के बीच पहला संवाद स्थापित करता है। “कवितांजलि” जैसे गंभीर और बहुआयामी काव्य-संग्रह को अधिक आकर्षक, कलात्मक और विषयानुकूल आवरण मिलना चाहिए था, ताकि पहली दृष्टि में ही पाठक उसके भीतर छिपी वैचारिक और साहित्यिक गरिमा को महसूस कर सके। वर्तमान स्वरूप कहीं-कहीं कामचलाऊ प्रतीत होता है, जो पुस्तक की साहित्यिक ऊँचाई के अनुरूप प्रभाव नहीं छोड़ पाता।
इसके साथ ही पुस्तक की कीमत भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करती है। आज का समय डिजिटल उपभोग और त्वरित सामग्री का समय है, जहाँ बड़ी संख्या में पाठक मुफ्त सामग्री पढ़ने के अभ्यस्त हो चुके हैं। ऐसे दौर में कविता जैसी गंभीर विधा की पुस्तक के लिए साढ़े तीन सौ रुपये खर्च करने वाले पाठकों की संख्या सीमित हो जाती है। यह केवल “कवितांजलि” की समस्या नहीं, बल्कि समकालीन हिंदी साहित्य के सामने उपस्थित व्यापक चुनौती है। यदि साहित्य को अधिकाधिक पाठकों तक पहुँचाना है तो प्रकाशन, मूल्य निर्धारण और प्रस्तुति—तीनों स्तरों पर समयानुकूल रणनीति अपनानी होगी। भविष्य में लेखक और प्रकाशक यदि पुस्तक के किफायती संस्करण, पेपरबैक या डिजिटल संस्करण पर विचार करें, तो यह संग्रह कहीं अधिक व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँच सकता है।
वल्लभ लखेश्री ‘सारंग’ केवल कवि नहीं, बल्कि बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी साहित्यकार हैं। सरकारी शिक्षा सेवा से निवृत्ति के बाद भी उन्होंने स्वयं को निष्क्रिय नहीं होने दिया, बल्कि सामाजिक सरोकारों से सक्रिय रूप से जुड़े रहे। विशेष रूप से दलित, पीड़ित और वंचित वर्गों की सहायता के प्रति उनका झुकाव उनके मानवीय दृष्टिकोण को और अधिक विश्वसनीय बनाता है। यही सामाजिक अनुभव उनकी कविताओं को केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं रहने देता, बल्कि उन्हें जीवन के यथार्थ से जोड़ देता है।
साहित्य, समाज सेवा और सार्वजनिक जीवन—इन तीनों क्षेत्रों में उनकी सक्रियता यह संकेत देती है कि आधुनिक समय में साहित्य को केवल पुस्तकालयों या गोष्ठियों तक सीमित रखकर उसकी सार्थकता सिद्ध नहीं की जा सकती। आज साहित्य को समाज की वास्तविक समस्याओं, पीड़ित वर्गों और जनचेतना से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ने की आवश्यकता है। वल्लभ लखेश्री की सामाजिक और राजनीतिक मंचों पर भागीदारी इसी नए युगबोध की ओर संकेत करती है, जहाँ साहित्यकार केवल दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय सामाजिक हस्तक्षेपकर्ता की भूमिका में दिखाई देता है।
“कवितांजलि” इसी अर्थ में महत्वपूर्ण हो उठती है कि यह केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की वैचारिक यात्रा है जिसने शिक्षा, समाज, राजनीति और मानवीय संघर्षों को नजदीक से देखा और महसूस किया है। यही अनुभव उनकी कविताओं में संवेदना, प्रतिरोध और सामाजिक चेतना के रूप में व्यक्त होता है। आधुनिक समय में साहित्य को यदि प्रासंगिक बने रहना है, तो उसे बहुआयामी सामाजिक भूमिका निभानी होगी—और वल्लभ लखेश्री ‘सारंग’ का व्यक्तित्व इसी आवश्यकता का एक जीवंत उदाहरण बनकर सामने आता है।
अंततः कहा जा सकता है कि वल्लभ लखेश्री ‘सारंग’ का प्रथम काव्य-संग्रह “कवितांजलि” एक सार्थक और संवेदनशील साहित्यिक प्रयास है। यह संग्रह केवल कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि जीवन, समाज और मानवीय मूल्यों के प्रति एक सजग साहित्यकार की प्रतिबद्धता का दस्तावेज है। इसमें सामाजिक चेतना है, मानवीय करुणा है, राष्ट्रप्रेम है, युवा ऊर्जा है और साहित्य के प्रति गहरा सम्मान भी।
“कवितांजलि” उन पाठकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जो कविता में केवल शब्दों का सौंदर्य नहीं, बल्कि जीवन की सच्चाइयों और समाज की धड़कनों को भी महसूस करना चाहते हैं। वल्लभ लखेश्री ‘सारंग’ ने अपने प्रथम संग्रह से यह संकेत दे दिया है कि वे केवल कवि नहीं, बल्कि समाज और समय को गहराई से देखने वाले सजग साहित्यकार हैं। हिंदी साहित्य जगत को उनसे भविष्य में और अधिक परिपक्व, व्यापक और प्रभावशाली रचनाओं की अपेक्षा रहेगी।







