खास बात

एक पत्र, कई सवाल : पत्रकारिता में अधिकार पहले या दायित्व?

जनगणदूत के एक ब्यूरो चीफ द्वारा भेजे गए पत्र ने पत्रकारिता में अधिकार, दायित्व और जवाबदेही पर नई बहस छेड़ दी है।

— अंजनी कुमार त्रिपाठी, समाचार संपादक, जनगणदूत

पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व का क्षेत्र है। यहां पदनाम से अधिक महत्व कार्य, विश्वसनीयता और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता का होता है। हाल ही में जनगणदूत के एक ब्यूरो चीफ द्वारा संस्थान को एक पत्र भेजा गया। पत्र में उल्लेख किया गया कि बड़े समाचार पत्रों और न्यूज़ चैनलों में ब्यूरो चीफ को नियमित वेतन मिलता है, जबकि छोटे संस्थानों में व्यवस्थाएं अलग होती हैं। यह भी संकेत दिया गया कि पत्रकारों को सम्मानजनक आर्थिक व्यवस्था मिलनी चाहिए।

हर सहयोगी को अपनी बात रखने का अधिकार है और जनगणदूत इस अधिकार का सम्मान करता है। लेकिन इस पत्र ने कुछ ऐसे प्रश्न भी खड़े किए हैं, जिनका उत्तर केवल संस्थान नहीं, बल्कि स्वयं संबंधित ब्यूरो चीफ को भी देना चाहिए।

क्या किसी मीडिया संस्थान में केवल ब्यूरो चीफ का पदनाम मिल जाने से नियमित वेतन का नैतिक और व्यावसायिक अधिकार स्वतः प्राप्त हो जाता है? या फिर इसके लिए अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन भी आवश्यक है?

देश के बड़े मीडिया संस्थानों में ब्यूरो चीफ को निश्चित रूप से वेतन मिलता है, लेकिन वहां तक पहुंचने वाले पत्रकार वर्षों के अनुभव, उत्कृष्ट समाचार लेखन, तथ्यपरक रिपोर्टिंग, वीडियो पत्रकारिता, डिजिटल कौशल और नेतृत्व क्षमता के आधार पर उस स्थान तक पहुंचते हैं। वे प्रतिदिन संस्थान को ऐसा कार्य देते हैं, जो उसकी साख और आय—दोनों को मजबूत करता है।

अब यदि जनगणदूत के संबंधित ब्यूरो चीफ की बात करें तो कुछ तथ्य स्वतः सामने आते हैं।

क्या उन्होंने नियमित रूप से स्वयं समाचार लिखे? क्या वे बिना किसी सहायता के प्रकाशन योग्य समाचार तैयार कर पाए? क्या उन्होंने घटनास्थल से वीडियो बाइट लेकर डिजिटल पत्रकारिता की आवश्यकताओं को पूरा किया? क्या उन्होंने जनगणदूत के विस्तार, पाठक संख्या बढ़ाने या संस्थान की पहचान मजबूत करने में कोई उल्लेखनीय योगदान दिया? क्या उन्होंने अपने जिले से एक भी विज्ञापन या आर्थिक सहयोग संस्थान को उपलब्ध कराया? क्या उन्होंने टीम निर्माण, नए संवाददाताओं को जोड़ने या संगठनात्मक विकास में कोई भूमिका निभाई?

यदि इन प्रश्नों के उत्तर सकारात्मक होते, तो उनके पत्र का नैतिक आधार और भी मजबूत दिखाई देता। लेकिन जब योगदान और अपेक्षा के बीच संतुलन दिखाई नहीं देता, तब स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं।

पत्रकारिता में वेतन पद का नहीं, कार्य का सम्मान होता है। केवल प्रेस कार्ड, परिचय-पत्र या पदनाम किसी व्यक्ति को आर्थिक अधिकार नहीं दिलाते। हर संस्था अपने संसाधनों और कार्यप्रणाली के अनुसार सहयोगियों का मूल्यांकन करती है। यह सिद्धांत केवल मीडिया में ही नहीं, बल्कि हर पेशे में लागू होता है।

यह भी समझना आवश्यक है कि जनगणदूत जैसे उभरते डिजिटल समाचार संस्थान और बड़े कॉर्पोरेट मीडिया समूहों की आर्थिक संरचना समान नहीं हो सकती। बड़े मीडिया घरानों के पास विशाल विज्ञापन नेटवर्क, निवेश और संसाधन होते हैं। वहीं क्षेत्रीय समाचार संस्थान सीमित संसाधनों में जनपक्षधर पत्रकारिता को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं। ऐसे में प्रत्येक ब्यूरो चीफ केवल समाचार भेजने वाला प्रतिनिधि नहीं, बल्कि संस्थान के विकास का सहभागी भी होता है।

दुर्भाग्य से संबंधित ब्यूरो चीफ के पत्र में अधिकारों की चर्चा तो विस्तार से की गई, लेकिन अपने योगदान का उल्लेख लगभग नहीं किया गया। यदि कोई सहयोगी स्वयं समाचार लेखन में दक्ष नहीं है, वीडियो बाइट नहीं ले सकता, संस्थान के लिए विज्ञापन नहीं जुटाता, डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय नहीं है और संगठनात्मक विकास में भी योगदान नहीं देता, तो केवल दूसरे मीडिया संस्थानों का उदाहरण देकर नियमित वेतन की अपेक्षा करना वस्तुनिष्ठ दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।

यह लेख किसी व्यक्ति विशेष की आलोचना के लिए नहीं लिखा गया है। उद्देश्य केवल इतना है कि पत्रकारिता में अधिकार और दायित्व दोनों का संतुलन बना रहे। यदि हम केवल अधिकारों की बात करेंगे और कर्तव्यों की उपेक्षा करेंगे, तो पत्रकारिता की मूल भावना कमजोर होगी।

जनगणदूत की नीति हमेशा स्पष्ट रही है—जो सहयोगी ईमानदारी, निष्ठा और परिणाम के साथ संस्थान को आगे बढ़ाएगा, उसका सम्मान भी होगा और उसके योगदान का मूल्यांकन भी होगा। लेकिन संस्थान से अपेक्षा रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को पहले यह भी देखना चाहिए कि उसने स्वयं संस्थान के लिए क्या किया है।

पत्रकारिता में सम्मान खरीदा नहीं जाता, अर्जित किया जाता है। वेतन भी केवल पद के कारण नहीं, बल्कि उस कार्य के कारण मिलता है जो संस्थान और समाज—दोनों के लिए उपयोगी हो।

जनगणदूत अपने सभी सहयोगियों का सम्मान करता है और चाहता है कि प्रत्येक संवाददाता तथा प्रत्येक ब्यूरो चीफ अपनी क्षमता का सर्वोत्तम प्रदर्शन करे। यदि योगदान बढ़ेगा, गुणवत्ता बढ़ेगी और संस्थान मजबूत होगा, तो सहयोगियों की प्रगति भी स्वाभाविक रूप से सुनिश्चित होगी। इसलिए यह बहस केवल एक पत्र तक सीमित नहीं है। यह पूरे मीडिया जगत के सामने खड़ा एक प्रश्न है— पत्रकारिता में अधिकार पहले आते हैं या दायित्व? इस प्रश्न का उत्तर प्रत्येक पत्रकार को स्वयं अपने कार्य से देना होगा।


अंजनी कुमार त्रिपाठी
समाचार संपादक, जनगणदूत

संपादकीय टिप्पणी: इस लेख का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष की आलोचना, अवमानना या भावनाओं को आहत करना नहीं है। हमारा प्रयास केवल पत्रकारिता के अधिकारों और दायित्वों के बीच संतुलन पर सकारात्मक एवं रचनात्मक संवाद स्थापित करना है, ताकि संस्था और सहयोगी दोनों पारस्परिक विश्वास, जवाबदेही और बेहतर कार्यसंस्कृति के साथ आगे बढ़ सकें।

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