मैं कूड़ा हूँ साहब! सालभर बदनाम, जन्मदिन पर अचानक राष्ट्रनिर्माण का हिस्सा

कूड़े की आत्मकथा पर व्यंग्यात्मक फीचर इमेज, जिसमें लेखक अनिल अनूप, कूड़े का कार्टून चरित्र और स्वच्छता अभियान का दृश्य दिखाई दे रहा है

सुनने के लिए यहां क्लिक करें

लेखक एवं प्रस्तुति : अनिल अनूप

सुबह मेरी नींद कुछ ऐसी टूटी जैसे कोई वीआईपी मेहमान बिना सूचना के दरवाजे पर आ गया हो। देखा तो मेरे आसपास झाड़ू, कैमरे, बैनर और सरकारी हलचल का पूरा इंतजाम था। मैं हैरान रह गया—जिसे लोग रोज देखकर नाक सिकोड़ते हैं, आज उसी कूड़े के आगे कैमरे झुक रहे थे! मैंने सोचा, जरूर मेरी किस्मत में कोई बड़ा पद लिखा है। बाद में पता चला कि प्रधानमंत्री का जन्मदिन है और स्वच्छता अभियान होना है। उस दिन पहली बार समझ आया कि कूड़ा होना बुरी बात नहीं, बस सही दिन और सही कैमरे के सामने होना चाहिए!

मेरा नाम कूड़ा है। कुछ लोग मुझे गंदगी कहते हैं, कुछ कचरा, कुछ अपशिष्ट और कुछ ऐसे भी हैं जो सरकारी बैठकों में मेरा नाम लेते समय अंग्रेजी का सहारा लेकर मुझे “सॉलिड वेस्ट” कह देते हैं। लेकिन मेरी असली पहचान वही है जो आप रोज अपने घर, दुकान, दफ्तर और बाजार से निकालकर सड़क किनारे छोड़ आते हैं। मैं वर्षों से इस देश की सड़कों, गलियों और नालियों का पुराना निवासी हूँ। मैंने सरकारें बदलते देखी हैं, नारे बदलते देखे हैं, योजनाएँ बदलते देखे हैं, लेकिन अपने प्रति लोगों का व्यवहार बहुत कम बदलते देखा है।

साल भर मेरी जिंदगी बहुत सामान्य रहती है। लोग मुझे देखकर नाक सिकोड़ते हैं, नगर निकाय मुझे देखकर फाइलें पलटते हैं और अधिकारी मुझे देखकर बैठकों में चिंता प्रकट करते हैं। फिर भी मैं वहीं का वहीं पड़ा रहता हूँ। लेकिन इस बार कुछ अलग हुआ। सुबह-सुबह मेरे आसपास असाधारण हलचल शुरू हो गई। लोग दौड़ रहे थे, फोन घनघना रहे थे, बैनर बंध रहे थे, कुर्सियाँ सज रही थीं। पहले तो मुझे लगा कि कोई मंत्री आ रहा होगा या कोई नई योजना लॉन्च होने वाली होगी। फिर पता चला कि आज प्रधानमंत्री का जन्मदिन है और स्वच्छता अभियान चलाया जाना है। उसी क्षण मुझे पहली बार लगा कि शायद आज मेरा भी दिन है।

थोड़ी देर बाद दो कर्मचारी आए। उन्होंने मेरे आसपास पड़े कूड़े का निरीक्षण किया। कुछ हिस्सा उठाकर ले गए और कुछ हिस्सा वहीं छोड़ दिया। मैं हैरान था। यदि सफाई करनी थी तो पूरी करते, और यदि नहीं करनी थी तो मुझे चैन से पड़ा रहने देते। तभी अनुभव ने कान में फुसफुसाकर कहा—“घबराओ मत, यह सफाई नहीं, कार्यक्रम की तैयारी है।” तब मेरी समझ में आया कि मैं आज कूड़ा कम और मंच-सज्जा का हिस्सा अधिक हूँ।

See also  एक गीत, जो रोता नहीं—चलता है ; ‘आवारा हूँ, या गर्दिश में हूँ, आसमान का तारा हूँ’ , भटकते मनुष्य की आत्मा का अमर गीत

कुछ देर बाद नई-नवेली झाड़ुओं का एक दल वहाँ पहुँचा। ऐसी चमकदार झाड़ुएँ मैंने जीवन में पहली बार देखी थीं। उनके तिनके इतने सीधे थे कि लगता था अभी-अभी किसी सौंदर्य प्रतियोगिता से लौटकर आई हों। एक झाड़ू ने दूसरी से पूछा, “बहन, हमें कहाँ लाया गया है?” दूसरी बोली, “सुना है राष्ट्र निर्माण करने।” तीसरी ने गर्व से गर्दन तानी, “आज प्रधानमंत्री का जन्मदिन है, हम राष्ट्रीय कर्तव्य निभाने आई हैं।” मैं इतना हँसा कि मेरे भीतर फँसी पॉलीथीन तक खड़खड़ा उठी। मैंने कहा, “बेटियों, यहाँ राष्ट्र निर्माण बाद में होगा, पहले फोटो निर्माण होगा।”

इतने में गाड़ियों का काफिला दिखाई दिया। ऐसी गाड़ियाँ जिनके आने पर सड़क के गड्ढे भी कुछ क्षणों के लिए अपने अस्तित्व पर शर्मिंदा हो जाते हैं। दरवाजे खुले। सफेद कुर्ते निकले। इस्त्री लगी जैकेटें निकलीं। चमकदार जूते निकले। सुगंधित इत्र निकले। और फिर वे लोग निकले जिनके आते ही कैमरों में अचानक जान आ जाती है। हर हाथ में एक झाड़ू थमा दी गई। मैं पहली बार समझ पाया कि लोकतंत्र में झाड़ू भी कभी-कभी राजदंड का रूप धारण कर लेती है।

तभी एक आवाज आई—“रुकिए सर, कैमरा अभी तैयार नहीं है।” झाड़ू रुक गई। नेता जी रुक गए। अधिकारी रुक गए। मैं भी सम्मानवश चुप हो गया। दो मिनट बाद दूसरी आवाज आई—“जी सर, अब हो गया।” और उसी क्षण स्वच्छता अभियान प्रारंभ हुआ। मुझे उस दिन पता चला कि इस देश में कुछ सफाइयाँ कैमरे के आदेश पर शुरू होती हैं।

नेता जी झाड़ू चला रहे थे, लेकिन झाड़ू जमीन से कम और हवा से ज्यादा संवाद कर रही थी। एक फोटोग्राफर बोला, “सर थोड़ा नीचे।” नेता जी नीचे हुए। दूसरा बोला, “सर थोड़ा ऊपर।” नेता जी ऊपर हुए। तीसरा बोला, “सर मुस्कुराइए।” चौथा बोला, “सर गंभीर रहिए।” पाँचवाँ बोला, “सर जनता की तरफ देखिए।” मुझे लगा कि बेचारे नेता जी सफाई कम और अभिनय अधिक कर रहे हैं। झाड़ू भी शायद असमंजस में थी कि उसे धूल हटानी है या कैमरे के लिए उपयुक्त मुद्रा बनानी है।

मेरे पास पड़ी धूल भी परेशान थी। उसने मुझसे पूछा, “भैया, मैं उड़ूँ या न उड़ूँ?” मैंने पूछा, “क्यों?” वह बोली, “यदि मैं नहीं उड़ी तो फोटो में सफाई दिखाई नहीं देगी और यदि उड़ गई तो किसी का कुर्ता खराब हो सकता है।” मैंने कहा, “बहन, लोकतंत्र में धूल होना आसान नहीं है। यहाँ तुम्हें भी संतुलन बनाकर चलना पड़ता है।”

See also  “कवितांजलि” : संवेदनाओं, सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों का सजग काव्य-दर्पण

उधर मीडिया के साथी अपने स्वर्णिम क्षण में थे। वे ऐसे दौड़ रहे थे जैसे सड़क पर कूड़ा नहीं, कोई दुर्लभ जीव दिखाई दे गया हो। एक कैमरे वाले ने कहा, “सर एक बार फिर झाड़ू चलाइए।” दूसरे ने कहा, “सर वीडियो के लिए दोबारा।” तीसरे ने कहा, “सर इस एंगल से।” मुझे लगा कि यदि यह कार्यक्रम दस मिनट और चला तो सड़क से पहले नेता जी साफ हो जाएँगे। झाड़ू बेचैन थी, धूल असमंजस में थी, सड़क चुप थी, लेकिन कैमरा अत्यंत प्रसन्न था। आखिर उसी का दिन था।

इस पूरे दृश्य में एक आदमी ऐसा भी था जिस पर किसी की नजर नहीं थी। वह थोड़ा दूर खड़ा था। उसके हाथ में पुरानी झाड़ू थी। उसके कपड़ों पर धूल थी। उसके चेहरे पर थकान थी। वह नगर निकाय का सफाई कर्मचारी था। वही आदमी जो बारह महीने सड़कें साफ करता है। वही आदमी जो बरसात में नालियों में उतरता है। वही आदमी जिसे कोई बाइट नहीं देता, कोई माला नहीं पहनाता, कोई मंच पर नहीं बुलाता। वह चुपचाप सब देख रहा था। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। शायद उसे मालूम था कि कार्यक्रम समाप्त होने के बाद वास्तविक काम उसी को करना है।

और सच यही हुआ। कुछ देर बाद नेता जी चले गए। अधिकारी चले गए। कैमरे चले गए। सोशल मीडिया के लिए तस्वीरें चुन ली गईं। बधाई संदेश प्रसारित हो गए। राष्ट्रनिर्माण की औपचारिक प्रक्रिया पूरी हो गई। तब वह सफाई कर्मचारी आगे आया और उसने बिना किसी कैमरे, बिना किसी उद्घोषणा और बिना किसी भाषण के सचमुच सफाई शुरू कर दी। मुझे उसी ने उठाया। मुझे लगा जैसे नाटक समाप्त होने के बाद मंच पर वास्तविक कलाकार आया हो।

जब मैं उठाया जा रहा था तो सड़क ने मुझसे पूछा, “क्या हुआ?” मैंने कहा, “राष्ट्र निर्माण।” सड़क बोली, “और सफाई?” मैंने कहा, “वह अब शुरू हुई है।” सड़क कुछ देर चुप रही। फिर बोली, “अच्छा, वही आदमी कर रहा है जो रोज करता है?” मैंने कहा, “हाँ, वही।” सड़क ने एक लंबी साँस ली और फिर शांत हो गई।

शाम को एक झाड़ू मेरे पास आई। वह उदास थी। मैंने पूछा, “क्या हुआ?” वह बोली, “मुझे लगा था कि आज बहुत काम करूँगी। लेकिन पूरा दिन फोटो खिंचवाने में निकल गया।” मैंने उसे समझाया, “निराश मत हो। इस देश में कई बार प्रतीक काम से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं। आज तुम सफाई का उपकरण कम और कार्यक्रम का मुख्य अतिथि ज्यादा थीं।”

See also  सांसद निधि का पैसा पड़ा रहा, रिपोर्ट दौड़ती रही! कंगना के सवालों ने खोली ‘विकास’ की पोल

मुझे प्रधानमंत्री के जन्मदिन से कोई शिकायत नहीं है। देश के प्रधानमंत्री हैं। लोग सम्मान करते हैं, शुभकामनाएँ देते हैं, सेवा कार्य करते हैं, रक्तदान करते हैं, पौधारोपण करते हैं, स्वच्छता अभियान चलाते हैं। यह सब होना भी चाहिए। शिकायत यदि है तो केवल उस प्रवृत्ति से है जो हर अच्छे काम को कैमरे की कैद में बदल देना चाहती है। जो सेवा से ज्यादा प्रदर्शन में विश्वास करती है। जो झाड़ू को श्रम का प्रतीक कम और फोटो का प्रॉप ज्यादा बना देती है।

मैं कूड़ा हूँ। मैंने बहुत कुछ देखा है। मैंने नेताओं को बदलते देखा है, अधिकारियों को बदलते देखा है, नारों को बदलते देखा है, अभियानों को बदलते देखा है। लेकिन कैमरे के सामने सफाई करने का उत्साह कभी नहीं बदला। कभी-कभी मुझे लगता है कि इस देश में सबसे भाग्यशाली वस्तु कैमरा है। कूड़ा तो सफाई के बाद गायब हो जाता है, झाड़ू कार्यक्रम के बाद कोने में रख दी जाती है, नेता अगले आयोजन में चले जाते हैं, अधिकारी अगली बैठक में व्यस्त हो जाते हैं, लेकिन तस्वीर बची रहती है। वही तस्वीर अगले दिन अखबार में छपती है, सोशल मीडिया पर घूमती है और प्रमाण बन जाती है कि स्वच्छता अभियान सफल रहा।

शायद हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना भी यही है। सड़क से ज्यादा एंगल चमकता है, झाड़ू से ज्यादा बाइट चलती है, सफाई से ज्यादा उसकी तस्वीर वायरल होती है। फिर भी उम्मीद बची रहती है क्योंकि इस देश में अभी भी लाखों लोग ऐसे हैं जो बिना कैमरे के सफाई करते हैं, बिना भाषण के काम करते हैं और बिना प्रचार के जिम्मेदारी निभाते हैं। वास्तविक स्वच्छता उन्हीं से शुरू होती है। बाकी सब तो लोकतंत्र का वार्षिक झाड़ू महोत्सव है।

और मैं… मैं अगले वर्ष फिर किसी सड़क किनारे पड़ा मिलूँगा। शायद फिर किसी जन्मदिन, किसी सप्ताह, किसी पखवाड़े या किसी अभियान का हिस्सा बन जाऊँ। तब तक के लिए विदा। यदि रास्ते में मिलूँ तो मुझे देखकर केवल नाक मत सिकोड़िएगा। संभव है अगली बार मैं फिर किसी राष्ट्रीय कार्यक्रम का सम्मानित अतिथि बनने वाला हूँ।

यायावर
Author: यायावर

यायावर

2 Responses

  1. संपादक अनिल ज़ी…… आप का एक एक वाक्य सत्य को प्रतिबिम्ब की तरह सत्य को दिखला रहा है

  2. अभिशाप के दंश से उतपीड़ित है हिंदुस्तान का कूड़ा. यहां का कूड़ा कूड़ा नहीं, जैसे कोई बॉलीवुड का संघर्षशील कलाकार हो, जिसे आम तौर पर स्ट्रगलर कह सकते हैं, जो बरसों से कैमरे की चाह में भटक रहा हो… यह देश की दुर्दशा की दर्दनाक कहानी है… लेखक ने कूड़ा के दर्द को जीया है, भोगा है, एहसास किया है. लेखक के जज़्बे को सलाम 🙏

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Read More

Cricket Live Score

Rashifal

और पढ़ें