धर्मेन्द्र की रिपोर्ट
नरैनी। सरकारी अस्पतालों में मरीजों को समय पर इलाज और जांच की सुविधा मिले, इसके लिए स्वास्थ्य विभाग की ओर से निर्धारित समय-सारिणी और ड्यूटी व्यवस्था लागू है। लेकिन नरैनी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में शुक्रवार सुबह सामने आई स्थिति ने इन व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। अस्पताल में सुबह आठ बजे से मरीज इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचने लगे, लेकिन करीब 8:50 बजे तक कमरा नंबर 1, 2 और 3 में चिकित्सक मौजूद नहीं मिले। इतना ही नहीं, जांच लैब भी सुबह नौ बजे तक बंद बताई गई।
सुबह-सुबह अस्पताल पहुंचे मरीजों और उनके परिजनों को डॉक्टर का इंतजार करना पड़ा। बीमारी और परेशानी से जूझ रहे लोगों के लिए सरकारी अस्पताल की ओपीडी में समय पर चिकित्सक न मिलना केवल असुविधा का विषय नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़ा करता है। मरीज इस उम्मीद में सीएचसी पहुंचते हैं कि उन्हें निजी अस्पतालों की तुलना में कम खर्च में समय पर चिकित्सकीय परामर्श और जांच मिल जाएगी। ऐसे में यदि निर्धारित समय के आसपास भी चिकित्सक और जांच सुविधा उपलब्ध न हो तो सबसे ज्यादा परेशानी दूरदराज से आने वाले गरीब और सामान्य परिवारों को उठानी पड़ती है।
मरीजों की शिकायत पर सीएचसी पहुंचे समाजसेवी
मिली जानकारी के अनुसार मरीजों की शिकायत के बाद समाजसेवी सोनू करवरिया शुक्रवार सुबह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र नरैनी पहुंचे। मौके पर अस्पताल की स्थिति देखने के दौरान उन्होंने पाया कि सुबह करीब 8:50 बजे तक कमरा नंबर 1, 2 और 3 में चिकित्सक मौजूद नहीं थे। उस समय अस्पताल में मरीजों की आवाजाही शुरू हो चुकी थी और कई लोग चिकित्सकीय परामर्श के लिए इंतजार कर रहे थे।
समाजसेवी ने मौके की स्थिति को गंभीरता से लेते हुए संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी देने की पहल की। उन्होंने स्थिति की GPS फोटो लेकर सीएचसी अधीक्षक डॉ. विकास यादव तथा मुख्य चिकित्साधिकारी, बांदा को जानकारी दी। इसका उद्देश्य अस्पताल में चिकित्सकों की समयबद्ध उपस्थिति और मरीजों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक स्थिति से अधिकारियों को अवगत कराना बताया गया।
यह पूरा मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सकों की उपस्थिति केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं होती। ओपीडी का समय मरीजों के लिए बेहद अहम होता है। सुबह के समय ही बड़ी संख्या में लोग पर्चा बनवाकर डॉक्टर को दिखाने पहुंचते हैं। ऐसे में यदि डॉक्टर उपलब्ध नहीं हों तो मरीजों की कतार बढ़ती जाती है और अस्पताल में अव्यवस्था की स्थिति बन सकती है।
सुबह आठ बजे से कतार, डॉक्टर का इंतजार
नरैनी सीएचसी में शुक्रवार सुबह आठ बजे से मरीजों की भीड़ जुटने लगी थी। ग्रामीण और आसपास के क्षेत्रों से लोग इलाज की उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंचे थे। किसी को बीमारी की जांच करानी थी तो किसी को चिकित्सकीय परामर्श की जरूरत थी। लेकिन चिकित्सकों की उपलब्धता को लेकर मरीजों को इंतजार करना पड़ा।
मरीजों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही रहा कि जब अस्पताल की सेवाएं निर्धारित समय से संचालित होनी चाहिए तो चिकित्सकों की मौजूदगी को लेकर इतनी देर क्यों हुई? यदि किसी डॉक्टर की ड्यूटी किसी अन्य स्थान पर लगाई गई थी, आकस्मिक कारण से अनुपस्थित थे या किसी प्रशासनिक वजह से ओपीडी प्रभावित हुई, तो इसकी स्पष्ट जानकारी मरीजों को मिलनी चाहिए। पारदर्शिता से ऐसी स्थिति में अनावश्यक भ्रम और नाराजगी दोनों को कम किया जा सकता है।
9 बजे तक बंद रही जांच लैब!
मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू सीएचसी की जांच लैब से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार सुबह करीब नौ बजे तक जांच लैब बंद रही। स्वास्थ्य केंद्र में आने वाले अनेक मरीजों को चिकित्सकीय परामर्श के साथ रक्त, मूत्र या अन्य आवश्यक जांचों की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में डॉक्टर और जांच सुविधा दोनों समय पर उपलब्ध न होने पर मरीज को अस्पताल में अधिक समय बिताना पड़ सकता है।
स्वास्थ्य सेवाओं में डॉक्टर की सलाह और जांच व्यवस्था एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। डॉक्टर उपलब्ध होने के बाद यदि जरूरी जांच के लिए मरीज को इंतजार करना पड़े तो उपचार की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए केवल चिकित्सकों की उपस्थिति ही नहीं, बल्कि जांच लैब और अन्य आवश्यक सुविधाओं का निर्धारित समय पर संचालन भी उतना ही जरूरी है।
अधिकारियों तक पहुंची शिकायत, कार्रवाई का आश्वासन
मौके की स्थिति सामने आने के बाद सोनू करवरिया ने सीएचसी अधीक्षक डॉ. विकास यादव और बांदा के मुख्य चिकित्साधिकारी को मामले की जानकारी दी। बताया गया कि अधिकारियों की ओर से व्यवस्था में जल्द सुधार और आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन दिया गया है।
अब असली सवाल इसी आश्वासन से आगे शुरू होता है। क्या नरैनी सीएचसी में चिकित्सकों की समयबद्ध उपस्थिति सुनिश्चित होगी? क्या जांच लैब निर्धारित समय पर खुलेगी? क्या मरीजों को ओपीडी शुरू होने के समय ही चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी? या फिर यह मामला भी शिकायत, आश्वासन और कुछ दिनों की चर्चा के बाद फाइलों में दब जाएगा?
मरीजों की परेशानी का समाधान केवल आश्वासन से नहीं, बल्कि अस्पताल की दैनिक व्यवस्था में दिखाई देने वाले सुधार से होगा। स्वास्थ्य केंद्र में आने वाला व्यक्ति किसी सरकारी प्रक्रिया का हिस्सा बनने नहीं, बल्कि इलाज कराने आता है। इसलिए उसकी सबसे पहली अपेक्षा यही होती है कि उसे समय पर डॉक्टर मिले और आवश्यक जांच की सुविधा भी उपलब्ध हो।
सरकारी अस्पताल में समय की कीमत समझनी होगी
सरकारी अस्पतालों में आने वाले मरीजों का बड़ा वर्ग आर्थिक रूप से सीमित संसाधनों वाला होता है। ऐसे मरीज निजी अस्पतालों की महंगी फीस से बचने के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर निर्भर रहते हैं। यदि उन्हें सरकारी अस्पताल में भी घंटों इंतजार करना पड़े तो उनकी परेशानी कई गुना बढ़ जाती है।
कई मरीज बीमारी की हालत में लंबी दूरी तय करके स्वास्थ्य केंद्र पहुंचते हैं। उनके साथ परिजन होते हैं, जिनका समय और आने-जाने का खर्च भी जुड़ा होता है। ऐसे में अस्पताल में डॉक्टर की अनुपस्थिति या जांच सुविधा के देर से शुरू होने का असर केवल अस्पताल परिसर तक सीमित नहीं रहता।
इसीलिए चिकित्सकों और कर्मचारियों की समयबद्ध उपस्थिति की निगरानी स्वास्थ्य विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारियों में शामिल होनी चाहिए। यदि किसी दिन किसी कारण से डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं, तो वैकल्पिक व्यवस्था और मरीजों को स्पष्ट सूचना देना भी जरूरी है।
व्यवस्था बदलेगी या फिर दोहराए जाएंगे पुराने सवाल?
नरैनी सीएचसी से सामने आया यह मामला स्वास्थ्य विभाग के लिए एक मौके की तरह भी देखा जा सकता है। अधिकारियों ने सुधार और आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन दिया है। अब क्षेत्र के लोगों की निगाह इस बात पर रहेगी कि अगले दिनों में अस्पताल की व्यवस्था वास्तव में बदलती है या नहीं।
मरीजों और क्षेत्रवासियों ने चिकित्सकों तथा कर्मचारियों की समयबद्ध उपस्थिति, ओपीडी के निर्धारित समय पर संचालन और जांच लैब को समय से खोलने की मांग की है। लोगों का कहना है कि सरकारी अस्पताल की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जहां मरीज को इलाज के लिए इंतजार कम से कम करना पड़े और उसे स्पष्ट जानकारी मिल सके।
दरअसल, स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा कागजों पर दर्ज उपस्थिति या अधिकारियों के आश्वासन से नहीं, बल्कि अस्पताल पहुंचने वाले मरीज के अनुभव से होती है। यदि सुबह आठ बजे मरीज अस्पताल पहुंच जाता है और लगभग 8:50 बजे तक डॉक्टरों के कमरे खाली मिलते हैं, जबकि जांच सुविधा भी निर्धारित समय तक शुरू नहीं होती, तो स्वाभाविक रूप से व्यवस्था की निगरानी पर सवाल उठेंगे।
अब गेंद स्वास्थ्य विभाग के पाले में है। शिकायत अधिकारियों तक पहुंच चुकी है, मौके की स्थिति की जानकारी भी दी जा चुकी है और सुधार का आश्वासन भी सामने आ चुका है। ऐसे में नरैनी के मरीज यह देखना चाहेंगे कि अगले कदम के रूप में केवल कार्रवाई का भरोसा मिलता है या वास्तव में अस्पताल की सुबह की तस्वीर बदलती है।
























