सांसद निधि का पैसा पड़ा रहा, रिपोर्ट दौड़ती रही! कंगना के सवालों ने खोली ‘विकास’ की पोल

मंडी दिशा कमेटी की बैठक में सांसद कंगना रनौत अधिकारियों से सांसद निधि खर्च पर सवाल करती हुईं, रश्मि प्रधान की रिपोर्ट

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मंडी में दिशा कमेटी की बैठक में कंगना रनौत का सख्त तेवर, सांसद निधि खर्च को लेकर अधिकारियों पर बरसीं; 11 करोड़ में सिर्फ 50 लाख खर्च होने का दावा और 90 प्रतिशत खर्च की रिपोर्ट पर उठे सवाल

रश्मि प्रधान की रिपोर्ट

मंडी में विकास की कहानी शायद कुछ ऐसी लिखी जा रही है, जिसमें सड़क बाद में बनती है और उसकी रिपोर्ट पहले तैयार हो जाती है। पुल जमीन पर आए या न आए, फाइल में उसकी प्रगति जरूर दिखाई दे सकती है। पैसा खर्च हुआ या नहीं, रिपोर्ट में खर्च का प्रतिशत चमक सकता है। और जनता अगर सोशल मीडिया पर सवाल पूछ बैठे तो उसे शायद यह समझाया जा सकता है कि विकास कागजों पर पूरी गति से दौड़ रहा है।

लेकिन इस बार कहानी में एक ऐसा मोड़ आया, जहां मंडी लोकसभा सीट से सांसद कंगना रनौत ने अधिकारियों से ही पूछ लिया कि आखिर विकास की यह तेज रफ्तार दिखाई कहां दे रही है?

मंडी में जिला विकास समन्वय एवं निगरानी समिति यानी दिशा कमेटी की बैठक के दौरान कंगना रनौत का सख्त तेवर देखने को मिला। बैठक में सांसद निधि की रकम के इस्तेमाल को लेकर उन्होंने अधिकारियों से तीखे सवाल किए और कामकाज पर नाराजगी जताई।

मामला केवल इतना नहीं था कि पैसा खर्च क्यों नहीं हुआ। असली सवाल तो यह था कि अगर पैसा खर्च नहीं हुआ था तो रिपोर्ट में लगभग 90 प्रतिशत खर्च होने की जानकारी आखिर कैसे पहुंच गई?

यहीं से शुरू होती है मंडी के विकास की वह व्यंग्यात्मक कहानी, जिसमें रकम करीब 11 करोड़ रुपये बताई गई, खर्च महज 50 लाख रुपये के आसपास बताया गया और रिपोर्टिंग की दुनिया में आंकड़ों ने ऐसी छलांग लगाई कि जमीन पीछे छूट गई।

11 करोड़ की निधि और 50 लाख का खर्च… बाकी पैसा आखिर गया कहां?

बैठक में कंगना रनौत ने कहा कि उनकी सांसद निधि के तहत करीब 11 करोड़ रुपये उपलब्ध थे, लेकिन इसमें से केवल लगभग 50 लाख रुपये ही खर्च किए गए

अब सामान्य आदमी का गणित बड़ा सीधा होता है।

पैसा आया तो काम होना चाहिए। काम होना है तो पैसा खर्च होना चाहिए। और पैसा खर्च नहीं हुआ तो काम भी शायद जमीन पर नजर नहीं आएगा।

लेकिन सरकारी व्यवस्था का गणित कभी-कभी इससे थोड़ा अलग दिखाई देता है।

यहां सवाल यह नहीं रह जाता कि पैसा क्यों नहीं खर्च हुआ। सवाल यह भी हो जाता है कि जब पैसा खर्च ही नहीं हुआ तो विकास की रिपोर्ट में तस्वीर इतनी चमकदार कैसे दिखाई गई?

कंगना रनौत के अनुसार उन्हें लगातार ऐसी रिपोर्ट दी जाती रही, जिसमें सांसद निधि का करीब 90 प्रतिशत पैसा खर्च होने की बात बताई गई। बाद में एजेंसियों की रिपोर्ट में कथित तौर पर स्थिति अलग सामने आई। अब इसे व्यंग्य में समझिए।

अगर रिपोर्ट में 90 प्रतिशत पैसा खर्च हो गया और जमीन पर 50 लाख रुपये ही खर्च हुए, तो क्या बाकी पैसा किसी ऐसे विकास मार्ग पर चला गया जिसकी लोकेशन अभी गूगल मैप भी खोज रहा है? या फिर रिपोर्ट तैयार करने वाली कलम की रफ्तार विकास कार्यों से भी तेज थी?

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यही वह सवाल है जिसने दिशा कमेटी की बैठक को महज एक सरकारी समीक्षा बैठक से निकालकर रिपोर्ट बनाम जमीन की हकीकत की बहस में बदल दिया।

विकास की फाइल दौड़ी, जनता वहीं खड़ी रही!

सरकारी दफ्तरों में फाइलों की अपनी जिंदगी होती है। फाइल खुलती है। नोटिंग होती है। टिप्पणी होती है। जवाब आता है। फिर अगली टिप्पणी होती है। उसके बाद शायद बैठक होती है। बैठक में फिर प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत होती है।

और इस पूरी प्रक्रिया के बीच जनता इंतजार करती रहती है। सड़क कब बनेगी? नाली कब बनेगी? पुल कब तैयार होगा? सामुदायिक भवन कब उपयोग में आएगा? योजना कब जमीन पर उतरेगी?

इन सवालों का जवाब कभी-कभी इतना लंबा होता है कि पूछने वाला ही थक जाए। कंगना रनौत ने बैठक में लंबित विकास कार्यों को लेकर नाराजगी जताते हुए अधिकारियों को काम में तेजी लाने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि मंडी जिले में विकास कार्य लंबे समय से लंबित हैं और जनता सोशल मीडिया पर लगातार सवाल उठा रही है। यानी जनता ने अब शिकायत का पुराना रास्ता छोड़कर रील वाला रास्ता पकड़ लिया है।

सरकारी कार्यालय में शिकायत लिखने में समय लगता है। सोशल मीडिया पर वीडियो बनाइए, सवाल पूछिए और देखते ही देखते मामला हजारों लोगों तक पहुंच सकता है। शायद यही वजह है कि कंगना ने बैठक में जनता की सोशल मीडिया नाराजगी का भी जिक्र किया।

जनता रील बना रही है और अधिकारी…?

कंगना रनौत के मुताबिक जनता रोजाना रील बनाकर विकास कार्यों की स्थिति पर सवाल उठा रही है। यह हमारे समय का नया लोकतांत्रिक तरीका है। पहले जनता कहती थी—“साहब, सड़क बनवा दीजिए।” फिर आवेदन देती थी। फिर ज्ञापन देती थी। फिर अधिकारियों के चक्कर लगाती थी।

अब मोबाइल निकालती है और कहती है—“देखिए साहब, सड़क अभी भी ऐसी ही है।” और अगर वीडियो वायरल हो गया तो शायद वही सड़क अचानक प्रशासनिक प्राथमिकता बन जाए। कंगना ने अधिकारियों पर तंज कसते हुए कहा कि अधिकारी दफ्तर में बैठकर हंसने और उन्हें कोसने में लगे हैं।

व्यंग्य का सबसे दिलचस्प हिस्सा तब आया जब उन्होंने अधिकारियों की कार्यशैली पर टिप्पणी करते हुए कहा कि “एक्टिंग में तो अधिकारी उनसे भी आगे हैं।”

अब अभिनेत्री से यह सुनना कि अधिकारी एक्टिंग में उनसे आगे हैं, अपने आप में सरकारी व्यवस्था के लिए एक तरह का पुरस्कार भी हो सकता है और चेतावनी भी।

क्योंकि अगर रिपोर्ट में काम 90 प्रतिशत पूरा दिख रहा हो और जमीन पर कहानी कुछ और हो, तो अभिनय की प्रतिभा पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

‘फूहड़’ और ‘निठल्ले’ जैसे शब्दों से गरम हुई बैठक

बैठक के दौरान कंगना का गुस्सा इतना बढ़ गया कि उन्होंने अधिकारियों के लिए ‘फूहड़’ और ‘निठल्ले’ जैसे तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया। अब सरकारी बैठक में शब्दों का तापमान बढ़ना अपने आप में खबर बन जाता है।

आम तौर पर बैठकों में शब्द होते हैं—“आवश्यक कार्रवाई”, “शीघ्र निस्तारण”, “प्रगति सुनिश्चित करें”, “समयबद्ध कार्यवाही” और “प्रकरण का परीक्षण”।

लेकिन जब इन शब्दों के बीच ‘निठल्ले’ जैसे शब्द प्रवेश कर जाएं तो बैठक की कार्यवाही अचानक ज्यादा मानवीय लगने लगती है। हालांकि तीखे शब्दों से ज्यादा महत्वपूर्ण वह सवाल है जिसके कारण नाराजगी सामने आई।

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अगर विकास कार्य लंबित हैं, पैसा उपलब्ध है और फिर भी पैसा खर्च नहीं हो रहा, तो जिम्मेदारी आखिर किसकी है? यही सवाल मंडी की बैठक से बाहर निकलकर अब सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बन सकता है।

सांसद निधि का पैसा: खर्च करने की जिम्मेदारी किसकी?

सांसद निधि का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों को गति देना है। ऐसे में उपलब्ध धनराशि का समय पर उपयोग होना स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण है। कंगना रनौत ने अधिकारियों से सांसद निधि से जारी धनराशि के इस्तेमाल को लेकर परफॉर्मेंस रिपोर्ट मांगी।

अब यह रिपोर्ट शायद सिर्फ कागज का एक और पुल नहीं होनी चाहिए। क्योंकि अगर एक रिपोर्ट में 90 प्रतिशत खर्च दिखाई देता है और दूसरी स्थिति में खर्च बहुत कम निकलता है, तो सवाल रिपोर्ट की विश्वसनीयता का भी है।

आखिर वह कौन-सा आंकड़ा सही था? पहला? दूसरा? या फिर तीसरा आंकड़ा अभी किसी फाइल में तैयार हो रहा है? यह व्यंग्य जरूर है, लेकिन सवाल गंभीर है।

क्योंकि सरकारी योजनाओं में आंकड़े केवल संख्या नहीं होते। उनके पीछे जनता का पैसा होता है। किसी योजना की मंजूरी, उसका बजट और उसका खर्च—ये सभी बातें अंततः जनता के विकास से जुड़ी होती हैं।

कागज पर विकास बनाम जमीन पर विकास

भारत में विकास की सबसे बड़ी परीक्षा फाइल में नहीं, जमीन पर होती है। फाइल कह सकती है कि सड़क स्वीकृत है। जनता पूछती है—सड़क बनी कहां? रिपोर्ट कह सकती है कि काम प्रगति पर है। जनता पूछती है—काम चल कहां रहा है?

आंकड़ा कह सकता है कि धनराशि खर्च हो चुकी है। जनता पूछती है—उस खर्च का परिणाम दिखाई क्यों नहीं दे रहा? यही कागज बनाम जमीन का अंतर प्रशासनिक व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा सवाल है।

मंडी की बैठक में सामने आई सांसद निधि की स्थिति इसी अंतर को लेकर सवाल खड़े करती है। कंगना रनौत ने अधिकारियों को लंबित विकास कार्यों में तेजी लाने और उपलब्ध धनराशि का सही तरीके से इस्तेमाल करने के निर्देश दिए हैं। लेकिन असली परीक्षा निर्देश देने के बाद शुरू होगी।

क्या अब काम वास्तव में तेजी से होंगे? क्या सांसद निधि की राशि समय पर खर्च होगी? क्या रिपोर्ट और जमीन की स्थिति एक जैसी दिखाई देगी? और क्या जनता को अगली बार विकास का वीडियो बनाने की जरूरत नहीं पड़ेगी?

रिपोर्टिंग का खेल खत्म होगा या आंकड़े फिर जीतेंगे?

यहां सबसे बड़ा सवाल केवल कंगना बनाम अधिकारी नहीं है। मामला इससे बड़ा है। मामला है सरकारी रिपोर्टिंग की विश्वसनीयता का। अगर किसी सांसद को एक रिपोर्ट कुछ बताती है और बाद में दूसरी जांच या एजेंसी की रिपोर्ट कुछ और स्थिति बताती है, तो जवाबदेही तय होना जरूरी है। क्योंकि लोकतंत्र में जनता केवल यह जानना नहीं चाहती कि पैसा कितना आया।

जनता यह भी जानना चाहती है कि पैसा कितना खर्च हुआ, किस काम पर खर्च हुआ और उस खर्च का परिणाम क्या निकला। वरना विकास की कहानी भी फिल्मी कहानी जैसी हो जाएगी—पोस्टर शानदार, ट्रेलर जबरदस्त और फिल्म देखने पहुंचो तो पता चले कि शूटिंग अभी शुरू ही नहीं हुई।

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कंगना के गुस्से के पीछे छिपा बड़ा सवाल

कंगना रनौत का गुस्सा चाहे राजनीतिक नजरिए से देखा जाए या प्रशासनिक नजरिए से, लेकिन उनके द्वारा उठाया गया मूल सवाल महत्वपूर्ण है। जब जनता विकास मांग रही है, धनराशि उपलब्ध है और फिर भी काम समय पर नहीं हो रहे, तो बीच में अड़चन कहां है?

क्या प्रक्रिया बहुत धीमी है? क्या विभागों के बीच समन्वय की कमी है? क्या स्वीकृति और क्रियान्वयन के बीच कोई बड़ी प्रशासनिक समस्या है? क्या निगरानी व्यवस्था कमजोर है? या फिर समस्या कहीं उस रिपोर्टिंग सिस्टम में है, जिसमें कागज पर प्रगति जमीन से ज्यादा तेज दौड़ जाती है? इन सवालों का जवाब केवल एक बैठक से नहीं मिलेगा।

इसके लिए जरूरी है कि सांसद निधि से जुड़े कार्यों की योजना, स्वीकृति, आवंटन, खर्च और वास्तविक प्रगति को सार्वजनिक रूप से देखा जाए। तभी पता चलेगा कि विकास की गाड़ी वास्तव में सड़क पर चल रही है या अभी भी सरकारी फाइल के पन्नों के बीच पार्क है।

जनता पूछ रही है—आखिर असली रिपोर्ट कौन सी है?

मंडी की दिशा कमेटी की बैठक ने एक ऐसा सवाल छोड़ दिया है, जिसका जवाब केवल अधिकारियों या सांसद को नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था को देना चाहिए।

अगर करीब 11 करोड़ रुपये उपलब्ध बताए गए और उसमें से लगभग 50 लाख रुपये खर्च होने की बात सामने आई, तो इतनी बड़ी राशि के इस्तेमाल में देरी क्यों हुई?

अगर सांसद को लगातार करीब 90 प्रतिशत खर्च होने की रिपोर्ट दी जा रही थी, तो वह रिपोर्ट किस आधार पर तैयार हुई? और अगर बाद की रिपोर्ट में स्थिति अलग निकली, तो पहली रिपोर्ट की जिम्मेदारी किसकी थी?

यही इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सवाल है। क्योंकि जनता को न तो तीखे शब्द चाहिए और न ही चमकदार रिपोर्ट। जनता को चाहिए जमीन पर दिखाई देने वाला विकास। उसे सड़क चाहिए तो सड़क चाहिए। उसे पुल चाहिए तो पुल चाहिए। उसे अस्पताल, स्कूल, पानी, रास्ता और दूसरी मूलभूत सुविधाएं चाहिए तो वे सुविधाएं चाहिए।

वह यह नहीं पूछती कि फाइल किस टेबल पर है। वह यह भी नहीं पूछती कि रिपोर्ट किस रंग की है। वह केवल इतना देखती है कि काम हुआ या नहीं हुआ।

और शायद मंडी की इस बैठक का सबसे बड़ा व्यंग्य भी यही है—अगर विकास सचमुच 90 प्रतिशत हो चुका था, तो फिर जनता को उसकी तलाश में रील बनाने की जरूरत क्यों पड़ रही थी?

मंडी में कंगना रनौत की नाराजगी ने सांसद निधि के खर्च, सरकारी रिपोर्टिंग और लंबित विकास कार्यों पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। आरोपों और दावों की वास्तविकता संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड और जांच से ही स्पष्ट होगी, लेकिन बैठक ने एक बुनियादी सवाल जरूर सामने ला दिया है—सरकारी कागजों में दर्ज विकास और जनता की आंखों से दिखाई देने वाले विकास में आखिर इतना अंतर क्यों है?

क्योंकि लोकतंत्र में अंततः रिपोर्ट नहीं, नतीजा बोलता है। और अगर रिपोर्ट कुछ और कहे तथा सड़क पर खड़ा आदमी कुछ और दिखाए, तो सवाल उठना तय है— आखिर सच किसके पास है—फाइल के पास या जनता के पास?

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Author: यायावर

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