काली मिर्च में काला खेल! गोंद-मैदा से बन रहा ‘महंगा मसाला’, यूपी में मिलावट का सच

गाजियाबाद में मिलावटी काली मिर्च के कारोबार पर कार्रवाई और रिपोर्टर कमलेश कुमार चौधरी की तस्वीर

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रिपोर्टर : कमलेश कुमार चौधरी

गाजियाबाद में सामने आई नकली काली मिर्च की फैक्ट्री ने एक बार फिर उस सवाल को बाजार के बीच खड़ा कर दिया है, जिसे उपभोक्ता अक्सर स्वाद और कीमत के शोर में भूल जाता है—आखिर हमारी रसोई तक पहुंच रहा मसाला वास्तव में मसाला है या मुनाफे के लिए तैयार किया गया कोई रासायनिक और कृत्रिम मिश्रण?

दिल्ली से सटे गाजियाबाद में खाद्य सुरक्षा विभाग और पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में जिस तरीके से छोटी और सस्ती काली मिर्च को गोंद, मैदा और रिफाइंड सोयाबीन तेल की मदद से बड़ा, भारी और चमकदार बनाकर कथित तौर पर ए-ग्रेड काली मिर्च के रूप में तैयार किया जा रहा था, वह मिलावट के बदलते तौर-तरीकों की गंभीर तस्वीर सामने लाता है। 17 सितंबर 2026 की रात लोनी बॉर्डर थाना क्षेत्र के बेहटा हाजीपुर स्थित एक फैक्ट्री में हुई कार्रवाई में करीब 13.5 लाख रुपये का माल बरामद किया गया और फैक्ट्री मालिक लोकेश गुप्ता को गिरफ्तार किया गया। विभाग ने पांच नमूने जांच के लिए प्रयोगशाला भेजे हैं।

मामला केवल काली मिर्च की मिलावट तक सीमित नहीं है। पिछले छह महीनों में उत्तर प्रदेश में मसालों को लेकर हुई कार्रवाई, नमूनों की संख्या, जब्त सामग्री और सामने आए अलग-अलग तरीके यह संकेत देते हैं कि मिलावट का कारोबार केवल किसी एक शहर, किसी एक मसाले या किसी एक छोटे कारोबारी तक सीमित मानना वास्तविक तस्वीर को छोटा करके देखना होगा।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि छापेमारी में जब्त हर नमूना कानूनी रूप से मिलावटी या असुरक्षित सिद्ध हो चुका हो, ऐसा नहीं माना जा सकता। अंतिम निष्कर्ष प्रयोगशाला जांच और संबंधित कानूनी प्रक्रिया के बाद ही निकलता है। लेकिन जब बड़ी मात्रा में संदिग्ध सामग्री सीज होती है, नमूने प्रयोगशाला भेजे जाते हैं और कुछ मामलों में अनुपयुक्त सामग्री नष्ट कराई जाती है, तो यह बाजार की निगरानी के सामने मौजूद जोखिम का ठोस संकेत जरूर है।

छह महीने का आंकड़ा: मसालों पर प्रदेशव्यापी कार्रवाई कितनी बड़ी थी?

2026 में मसालों को लेकर उत्तर प्रदेश खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन ने विशेष अभियान चलाया। जून में सामने आए विभागीय अभियान के आंकड़ों के अनुसार प्रदेशभर में 813 मसालों के नमूने प्रयोगशालाओं में जांच के लिए भेजे गए। इस कार्रवाई के दौरान 283.5 क्विंटल मसाले सीज किए गए, जिनकी अनुमानित कीमत 50.23 लाख रुपये बताई गई। इसके अलावा 41.24 क्विंटल ऐसे मसाले नष्ट कराए गए, जिन्हें उपयोग योग्य नहीं माना गया; इनकी कीमत करीब 10.46 लाख रुपये आंकी गई।

यह आंकड़ा अपने आप में कोई यह निष्कर्ष नहीं देता कि 813 में से कितने नमूने मिलावटी निकले। लेकिन यह जरूर बताता है कि विभाग को मसाला कारोबार में इतने बड़े पैमाने पर निगरानी की जरूरत महसूस हुई कि निर्माण इकाइयों से लेकर स्टॉकिस्ट, वितरक और थोक कारोबारियों तक विशेष अभियान चलाना पड़ा।

इसी अवधि में अलीगढ़ में खाद्य सुरक्षा विभाग ने मसाला कारोबारियों के यहां अभियान चलाकर नौ प्रतिष्ठानों से हल्दी, लाल मिर्च, धनिया और जीरा समेत 11 नमूने लिए। इन्हें प्रयोगशाला भेजा गया और रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई की बात कही गई।

इसका मतलब यह नहीं कि हर दुकान दोषी है। बल्कि यह कि मसालों की गुणवत्ता की जांच केवल पैकेट देखकर नहीं की जा सकती।

गाजियाबाद की फैक्ट्री में क्या मिला?

गाजियाबाद का मामला इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां मिलावट का तरीका सामान्य अर्थों में सिर्फ किसी सस्ते पदार्थ को मिलाने तक सीमित नहीं था। रिपोर्ट के अनुसार छोटी और सस्ती काली मिर्च को पहले गोंद के चूर्ण और मैदे से तैयार पेस्ट में डुबोया जाता था। इसके बाद उसे सुखाकर जूट के बोरों पर रगड़कर आकार और सतह को बेहतर किया जाता था तथा अंत में रिफाइंड सोयाबीन तेल की पॉलिश दी जाती थी।

कार्रवाई के दौरान लगभग 1200 किलोग्राम छोटी दाने वाली कच्ची काली मिर्च, करीब 975 किलोग्राम तैयार मिलावटी काली मिर्च, 60 बोरे मैदा, 18 बोरे गोंद का चूर्ण और 37 टिन रिफाइंड सोयाबीन तेल बरामद होने की जानकारी सामने आई है। कुल बरामद सामग्री का अनुमानित मूल्य करीब 13.5 लाख रुपये बताया गया है।

यानी खेल केवल मसाले में कुछ मिलाने का नहीं था। यहां मसाले की शक्ल, आकार, वजन और चमक बदलकर उसकी बाजार कीमत और पहचान बदलने की कोशिश का आरोप सामने आया है।

यही वह बिंदु है जहां उपभोक्ता सबसे ज्यादा असहाय दिखाई देता है।

क्योंकि पैकेट खोलने से पहले वह कैसे जान पाएगा कि चमकदार काली मिर्च वास्तव में अच्छी गुणवत्ता की है या उसे कृत्रिम तरीके से बड़ा और आकर्षक बनाया गया है?

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काली मिर्च में मिलावट नई नहीं, तरीके जरूर बदल रहे हैं

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी FSSAI की मसालों संबंधी मार्गदर्शिका में काली मिर्च में पपीते के बीज, हल्के बेरियों और यहां तक कि बुरादे जैसे भराव पदार्थों की संभावित मिलावट का उल्लेख है। उसी मार्गदर्शिका में पिसे मसालों में स्टार्च, चोकर और बुरादे जैसी मिलावट के उदाहरण भी दिए गए हैं।

इसलिए गाजियाबाद का मामला किसी बिल्कुल अनजान प्रवृत्ति का अकेला उदाहरण नहीं है। फर्क इतना है कि अब मिलावट करने वाले सिर्फ पदार्थ मिलाकर मात्रा बढ़ाने तक सीमित नहीं दिखते; कुछ मामलों में मूल उत्पाद की दृश्य पहचान बदलने का प्रयास भी सामने आता है।

FSSAI के मानकों में काली मिर्च के लिए नमी, राख, वाष्पशील तेल, पिपरीन और अन्य गुणवत्ता मानक निर्धारित हैं। यानी काली मिर्च की गुणवत्ता केवल उसके काले रंग या बड़े दाने से तय नहीं होती।

यही कारण है कि बाजार में दिखने वाली चमकदार और बड़ी काली मिर्च को देखकर उपभोक्ता के लिए उसकी वास्तविक गुणवत्ता तय करना संभव नहीं है।

अप्रैल में कुशीनगर ने भी दिखाई तस्वीर

मसालों की मिलावट का खतरा केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में अप्रैल 2026 में सामने आई रिपोर्ट के अनुसार खाद्य सुरक्षा विभाग ने एक वर्ष की अवधि में संदेह के आधार पर जीरा, दालचीनी, काली मिर्च, हल्दी और पैकेट बंद मसालों के 16 नमूने जांच के लिए भेजे थे।

प्रयोगशाला रिपोर्ट में इनमें से आठ नमूने मानक पर खरे नहीं उतरे। रिपोर्ट के अनुसार जीरा के दो में से एक, दालचीनी के चार में से एक, काली मिर्च के दो में से एक, पैकेट बंद हल्दी के छह में से तीन और पैकेट बंद मसाले के दो में से एक नमूना मानक पर खरा नहीं उतरा। काली मिर्च के मामले में पपीते के बीज की मिलावट का उदाहरण सामने आया।

यह आंकड़ा ध्यान देने योग्य है, लेकिन इसे पूरे उत्तर प्रदेश के बाजार का प्रतिनिधि प्रतिशत मानना सही नहीं होगा। यह एक जिले में एक वर्ष के दौरान लिए गए सीमित नमूनों का परिणाम है।

फिर भी सवाल गंभीर है—अगर छोटे नमूना समूह में भी अलग-अलग मसालों में मानक से विचलन मिल रहा है, तो नियमित और वैज्ञानिक निगरानी कितनी जरूरी है?

बहराइच में बिना लाइसेंस चल रही मसाला इकाई

जून 2026 में बहराइच के नानपारा बाईपास रोड पर खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्रवाई में एक कथित अवैध मसाला कारखाना पकड़ा गया। रिपोर्ट के मुताबिक वहां हल्दी, धनिया और मिर्च पाउडर तैयार किया जा रहा था और इकाई के पास खाद्य लाइसेंस नहीं था। टीम ने करीब 2.99 लाख रुपये का सामान सील किया तथा पांच मसालों के नमूने जांच के लिए भेजे। वहां मसालों को रंगने के लिए हानिकारक रंग होने की भी जानकारी सामने आई।

बरामद सामग्री में 830 किलोग्राम हल्दी पाउडर, 400 किलोग्राम धनिया पाउडर, 93 किलोग्राम मिर्च पाउडर, 65 किलोग्राम रंग और 960 किलोग्राम धनिया भूसी शामिल होने की बात कही गई।

यह मामला मिलावट के दूसरे पहलू की ओर इशारा करता है—सिर्फ उत्पाद में क्या मिलाया जा रहा है, यह सवाल नहीं है; उत्पाद कहां, किस लाइसेंस के तहत और किन परिस्थितियों में तैयार हो रहा है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

फतेहपुर में एक्सपायर्ड मसालों पर कार्रवाई

जून 2026 में फतेहपुर में खाद्य एवं औषधि सुरक्षा विभाग के अभियान के दौरान 50 किलोग्राम एक्सपायर्ड मसाले नष्ट कराए गए और 13 किलोग्राम मसाले सीज किए गए। चार नमूने प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजे गए।

यह मामला मिलावट से थोड़ा अलग है, लेकिन उपभोक्ता सुरक्षा के लिहाज से उतना ही महत्वपूर्ण है।

क्योंकि खाद्य सुरक्षा का अर्थ सिर्फ यह नहीं है कि भोजन में कोई जहरीला पदार्थ मिला है या नहीं। खाद्य सामग्री की गुणवत्ता, उसकी वैध अवधि, भंडारण, लेबलिंग और स्वच्छता भी खाद्य सुरक्षा का हिस्सा हैं।

फरवरी की कार्रवाई ने भी दिखाई थी बड़ी तस्वीर

छह महीने की अवधि को समझने के लिए फरवरी 2026 की कार्रवाई भी संदर्भ देती है। होली और रमजान से पहले गाजियाबाद और हापुड़ में खाद्य सुरक्षा विभाग ने मिलावट के खिलाफ अभियान चलाया था।

आगरा में भी फरवरी में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2024-25 की जांच रिपोर्ट में 27 मसाला नमूनों में 20 नमूने मानक पर खरे नहीं उतरे थे। उसी रिपोर्ट में दूध, घी, पनीर और खाद्य तेल के नमूनों में भी बड़ी संख्या में गैर-अनुरूपता दर्ज होने की बात कही गई।

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यहां भी सावधानी जरूरी है—ये आंकड़े 2024-25 की रिपोर्ट से जुड़े थे, इसलिए इन्हें 2026 के पूरे उत्तर प्रदेश के वर्तमान बाजार की स्थिति बताने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। लेकिन यह जरूर दिखाते हैं कि मिलावट और खाद्य गुणवत्ता का संकट किसी एक मौसम का विषय नहीं है।

जून-जुलाई में कार्रवाई का पैमाना और बढ़ा

जून 2026 के विशेष अभियान के बाद जुलाई में जारी आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में खाद्य सुरक्षा विभाग ने विभिन्न खाद्य श्रेणियों के खिलाफ व्यापक कार्रवाई की।

पूरे प्रदेश में 3,537 निरीक्षण, 2,075 छापेमारी और 2,965 खाद्य नमूने जांच के लिए लिए गए। कार्रवाई में करीब 2,929.86 क्विंटल खाद्य सामग्री, अनुमानित मूल्य 11.66 करोड़ रुपये, जब्त किए जाने की जानकारी दी गई। इसके अतिरिक्त 551.71 क्विंटल असुरक्षित या अपमिश्रित खाद्य सामग्री, जिसकी अनुमानित कीमत 63.17 लाख रुपये बताई गई, नष्ट कराई गई।

इसी अभियान में मसालों के 1,055 नमूने लिए गए। लगभग 419.7 क्विंटल मसाले, अनुमानित मूल्य 67.78 लाख रुपये, जब्त किए गए और 80.47 क्विंटल मसाले, अनुमानित मूल्य 15.17 लाख रुपये, मानव उपभोग के लिए अनुपयुक्त पाए जाने पर नष्ट कराए गए।

यह आंकड़ा महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे भी ठीक संदर्भ में पढ़ना चाहिए। ये कार्रवाई के आंकड़े हैं, 1,055 नमूनों में कितने अंतिम रूप से असुरक्षित या मिलावटी निकले, इसका अर्थ यह आंकड़ा अपने आप नहीं बताता।

असली सवाल: मिलावट होती क्यों है?

मिलावट के पीछे सबसे बड़ा आर्थिक तर्क बेहद सरल है—कम लागत में ज्यादा माल और ज्यादा कीमत।

यदि सस्ती कच्ची सामग्री को किसी प्रक्रिया से महंगे उत्पाद जैसा दिखाया जा सकता है तो मुनाफा बढ़ता है। गाजियाबाद में सामने आया मामला इसी आर्थिक गणित का उदाहरण है। छोटी काली मिर्च को गोंद, मैदा और तेल की मदद से बड़ा और चमकदार बनाने का कथित प्रयास इसी सोच की ओर इशारा करता है। लेकिन इसमें केवल मिलावटखोर की भूमिका देखना भी पर्याप्त नहीं होगा।

आपूर्ति श्रृंखला में कच्चा माल खरीदने वाला, प्रोसेस करने वाला, पैक करने वाला, थोक वितरक, दुकानदार और अंत में उपभोक्ता तक पहुंचने वाली पूरी व्यवस्था में निगरानी जरूरी है। एक छोटी अवैध फैक्ट्री बंद कर देने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होती, यदि उसी नेटवर्क की दूसरी इकाइयां दूसरे स्थान पर काम कर रही हों।

उपभोक्ता के सामने सबसे बड़ी मुश्किल क्या है?

मसालों की मिलावट का एक बड़ा संकट यह है कि हर मिलावट आंख से दिखाई नहीं देती।

कभी रंग असली जैसा बनाया जाता है, कभी वजन बढ़ाया जाता है, कभी सस्ता पदार्थ मिलाया जाता है और कभी उत्पाद की पूरी दृश्य पहचान बदलने की कोशिश की जाती है।

FSSAI ने मसालों में संभावित मिलावट के कई उदाहरण बताए हैं, जिनमें काली मिर्च में पपीते के बीज, हल्दी में रंग या लेड क्रोमेट और मिर्च में कृत्रिम रंग जैसी मिलावट शामिल हैं। इसलिए सोशल मीडिया पर चलने वाले हर घरेलू टेस्ट को अंतिम वैज्ञानिक प्रमाण मान लेना भी उचित नहीं है। संदेह की स्थिति में नमूने की प्रयोगशाला जांच ही अधिक विश्वसनीय आधार है।

कानून में भी प्रावधान, चुनौती अमल की

खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के तहत अलग-अलग उल्लंघनों के लिए दंड का प्रावधान है। उदाहरण के लिए अधोमानक खाद्य पदार्थ के लिए धारा 51 में पांच लाख रुपये तक के दंड का प्रावधान है।

खाद्य पदार्थ में बाहरी या अवांछित पदार्थ पाए जाने पर धारा 54 के तहत एक लाख रुपये तक का दंड हो सकता है।

वहीं मिलावटकारी पदार्थ रखने या उसके निर्माण, भंडारण, बिक्री या वितरण के मामलों में धारा 57 के तहत परिस्थितियों के अनुसार दो लाख रुपये तक और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक adulterant के मामले में दस लाख रुपये तक के दंड का प्रावधान है। कानून मौजूद है। विभागीय कार्रवाई भी हो रही है। नमूने लिए जा रहे हैं। माल जब्त और नष्ट भी किया जा रहा है।

फिर भी समस्या का अगला सवाल यही है—क्या कार्रवाई इतनी नियमित है कि मिलावट का जोखिम बाजार में प्रवेश करने से पहले ही रोका जा सके? यहीं व्यवस्था की असली परीक्षा है।

सिर्फ त्योहारों पर अभियान से नहीं रुकेगा कारोबार

मिलावट के खिलाफ अभियान अक्सर त्योहारों के आसपास तेज होता है। यह जरूरी भी है, क्योंकि उस समय खाद्य पदार्थों की मांग तेजी से बढ़ती है। लेकिन मसाले केवल होली, दीपावली, ईद या किसी त्योहार पर नहीं खाए जाते। मसाला रोज की रसोई का हिस्सा है।

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इसलिए निगरानी भी सालभर होनी चाहिए। निर्माण इकाइयों, पैकिंग केंद्रों, गोदामों, थोक बाजारों और वितरण नेटवर्क पर जोखिम आधारित निरीक्षण बढ़ाने की जरूरत है।

FSSAI भी खाद्य कारोबारियों के जोखिम के आधार पर निरीक्षण की व्यवस्था की बात करता है। केंद्र सरकार ने मार्च 2026 में संसद को बताया था कि FSSAI ने Risk Based Inspection System विकसित किया है, जिसमें खाद्य कारोबार के जोखिम के आधार पर निरीक्षण की आवृत्ति तय की जाती है। यह व्यवस्था कागज से जमीन तक कितनी प्रभावी है, इसका मूल्यांकन नियमित रूप से होना चाहिए।

मसाला बाजार के लिए सबसे जरूरी है ट्रेसिंग

गाजियाबाद में जब फैक्ट्री पकड़ी गई तो जांच का अगला सवाल यही है कि तैयार माल कहां-कहां भेजा जाता था। रिपोर्ट के अनुसार विभाग और पुलिस यह पता लगाने में जुटे हैं कि तैयार काली मिर्च की सप्लाई किन बाजारों तक हुई और इस काम में और कौन लोग शामिल थे। यही जांच किसी एक फैक्ट्री की कार्रवाई को बड़े नेटवर्क तक पहुंचा सकती है।

यदि किसी इकाई से 975 किलोग्राम तैयार माल मिलता है तो केवल उस माल को जब्त कर लेना पर्याप्त नहीं। उससे पहले खरीदा गया कच्चा माल कहां से आया, तैयार माल किसे बेचा गया, किस ब्रांड या नाम से बाजार में गया और किन दुकानों तक पहुंचा—इन सवालों के जवाब भी जरूरी हैं। यही supply-chain tracing मिलावट के कारोबार की कमर तोड़ने का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।

उपभोक्ता क्या करे?

पहली बात—बहुत सस्ता देखकर खुश न हों। बाजार मूल्य से असामान्य रूप से कम कीमत कई बार गुणवत्ता पर सवाल खड़ा कर सकती है। दूसरी बात—पैक्ड मसाले खरीदते समय लेबल, लाइसेंस संबंधी जानकारी, बैच, निर्माण और वैधता अवधि देखें। तीसरी बात—खुले मसाले खरीदते समय स्रोत और स्वच्छता पर ध्यान दें। चौथी बात—किसी उत्पाद की गुणवत्ता पर गंभीर संदेह हो तो उसे केवल सोशल मीडिया के घरेलू परीक्षण से प्रमाणित मानने के बजाय खाद्य सुरक्षा विभाग को सूचना दें।

अलीगढ़ में खाद्य सुरक्षा विभाग ने संदिग्ध या मिलावटी खाद्य पदार्थों की सूचना के लिए टोल-फ्री नंबर 1800-180-5533 का उल्लेख किया था। और सबसे महत्वपूर्ण बात—मिलावट की शिकायत करते समय उत्पाद, दुकान, बिल और पैकेट की जानकारी सुरक्षित रखें।

मसाला सिर्फ स्वाद नहीं, सार्वजनिक स्वास्थ्य का सवाल है

गाजियाबाद की फैक्ट्री से बरामद 13.5 लाख रुपये का माल शायद पूरे उत्तर प्रदेश के मसाला बाजार का प्रतिनिधित्व नहीं करता। न ही जून-जुलाई के अभियानों में जब्त हुई सामग्री को देखकर यह कहना तथ्यात्मक होगा कि प्रदेश में बिकने वाला हर मसाला मिलावटी है। लेकिन इन कार्रवाइयों को अलग-अलग घटनाएं मानकर छोड़ देना भी तस्वीर का दूसरा सिरा छिपाना होगा।

एक तरफ प्रदेश में हजारों निरीक्षण और छापेमारी हो रही हैं। दूसरी तरफ मसालों के हजारों नमूने जांच के लिए भेजे जा रहे हैं। कहीं एक्सपायर्ड माल नष्ट हो रहा है, कहीं बिना लाइसेंस फैक्ट्री पकड़ी जा रही है, कहीं रंग या अन्य संदिग्ध सामग्री बरामद हो रही है और कहीं काली मिर्च को कृत्रिम तरीके से बड़ा और चमकदार बनाने का आरोप सामने आ रहा है।

यह विरोधाभास बताता है कि निगरानी जरूरी है, लेकिन निगरानी का मतलब सिर्फ छापा नहीं—नियमित जांच, प्रयोगशाला रिपोर्ट, आपूर्ति श्रृंखला की पड़ताल, दोष सिद्ध होने पर प्रभावी कार्रवाई और उपभोक्ता तक सही जानकारी पहुंचना भी है।

मिलावटखोर के लिए यह शायद लागत घटाने और मुनाफा बढ़ाने का कारोबार हो। लेकिन उपभोक्ता के लिए वही मिलावट भरोसे, स्वास्थ्य और जेब—तीनों का नुकसान है।

काली मिर्च का दाना छोटा हो सकता है, मसाले की मात्रा रसोई में कम हो सकती है, लेकिन जब उसमें जानबूझकर ऐसा पदार्थ शामिल किया जाता है जो उसके वास्तविक स्वरूप को बदल देता है, तो सवाल सिर्फ स्वाद का नहीं रह जाता। सवाल यह है कि हमारी थाली में जो चीज जिस नाम से पहुंच रही है, क्या वह वास्तव में वही चीज है?

गाजियाबाद से लेकर बहराइच, कुशीनगर, फतेहपुर, अलीगढ़ और लखनऊ तक सामने आई कार्रवाइयां इसी सवाल को लगातार सामने ला रही हैं। और इसका जवाब केवल उपभोक्ता को नहीं, पूरे खाद्य तंत्र को देना होगा।

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Author: यायावर

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