वंश की कहानी में बेटियों का नाम आखिर क्यों नहीं? पनगोत्रा की चिट्ठी — अंक 13

स्तंभकार केवल कृष्ण पनगोत्रा की तस्वीर के साथ बेटियों के नाम वाली पारिवारिक वंशावली की प्रतीकात्मक तस्वीर

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वंशावली के पन्नों से बेटियों का नाम गायब करना सिर्फ एक पुरानी परंपरा का मामला नहीं, बल्कि परिवार की आधी पहचान को दर्ज न करने का सवाल है। बेटी जन्म से उसी परिवार की संतान है; विवाह उसके जन्मसंबंध को समाप्त नहीं करता। आज कानून ने भी महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकारों को स्पष्ट मान्यता दी है और सामाजिक जीवन में बेटियां माता-पिता की जिम्मेदारियां बराबरी से निभा रही हैं। जब बेटी संपत्ति में अपने कानूनी अधिकार की हकदार हो सकती है, माता-पिता की सेवा कर सकती है और उनकी अंतिम जिम्मेदारियां निभा सकती है, तो परिवार की वंश-स्मृति में उसका नाम दर्ज करने से परहेज क्यों? वंशावली अगर इतिहास है, तो उसमें बेटियों का नाम कोई एहसान नहीं—उनके अस्तित्व और पारिवारिक संबंध का सम्मानजनक दस्तावेज है।

लेखक : केवल कृष्ण पनगोत्रा, जम्मू-कश्मीर से

अजीज पाठकों,

कुछ महीने पहले हमारे गांव के एक वरिष्ठ सदस्य हरिद्वार से लौटे तो उनके हाथ में हमारे परिवार की पुरानी वंशावली थी। कई पीढ़ियों से संभालकर रखी गई उस बही को जब उन्होंने परिवार के लोगों के सामने खोला तो जैसे समय की कोई पुरानी खिड़की खुल गई। पन्ने पुराने थे, लिखावट कहीं साफ तो कहीं धुंधली, लेकिन नामों की कड़ियां आज भी एक-दूसरे से जुड़ी हुई थीं। सबसे ऊपर किसी पूर्वज का नाम था, फिर उसके पुत्रों के नाम, उनके पुत्रों के नाम और उसके बाद अगली पीढ़ियां। देखते-देखते वह वंशवृक्ष हमारी पीढ़ी तक पहुंच गया था।

किसी परिवार की वंशावली आखिर होती भी ऐसी ही है। एक नाम से शुरू होकर शाखाएं निकलती हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी फैलती चली जाती हैं। परिवार का कोई व्यक्ति उस बही को खोलता है तो उसे केवल नाम नहीं दिखाई देते, बल्कि उसके पीछे एक पूरा इतिहास खड़ा दिखाई देता है—कौन कहां से आया, किस गांव में रहा, किससे उसका रिश्ता जुड़ा, किस पीढ़ी ने परिवार को आगे बढ़ाया और समय के साथ परिवार की शाखाएं किस दिशा में फैलती गईं। लेकिन उस बही को देखते हुए मेरे मन में एक सवाल अटक गया।

इस पूरे परिवार वृक्ष में बेटियां कहां हैं?

पन्ने पलटते-पलटते कई पुरुषों के नाम सामने आए। पिता, पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र और फिर उनकी अगली पीढ़ियां। लेकिन परिवार की बेटियों के नाम या तो दिखाई नहीं दिए या कहीं-कहीं केवल किसी रिश्ते के संदर्भ में उनका उल्लेख था। वे बेटियां, जिन्होंने उसी घर में जन्म लिया था, उसी आंगन में खेली थीं, उसी मां की गोद में पली थीं और उसी पिता के स्नेह में बड़ी हुई थीं, वंशावली के वृक्ष में उनकी अपनी कोई स्पष्ट शाखा क्यों नहीं थी? यही सवाल इस चिट्ठी की वजह बना।

वंश केवल नामों की सूची नहीं, परिवार की स्मृति है

हम अक्सर वंशावली को केवल पूर्वजों के नामों की सूची समझ लेते हैं। वास्तव में यह परिवार की स्मृति का दस्तावेज भी है। इसमें किसी परिवार की कई पीढ़ियों का सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास छिपा होता है।

एक परिवार की कल्पना कीजिए। उसमें पिता हैं, माता हैं, दो बेटे हैं और दो बेटियां हैं। समय बीतता है। बेटों के विवाह होते हैं, उनके बच्चे होते हैं और अगली पीढ़ी में उनके पुत्रों और पौत्रों के नाम दर्ज होते जाते हैं। बेटियां भी विवाह करती हैं, अपने-अपने परिवार बसाती हैं, बच्चे पैदा करती हैं, अपने मायके से रिश्ता बनाए रखती हैं और अपने माता-पिता के सुख-दुख में बराबर खड़ी रहती हैं।

फिर भी परिवार की वंशावली में उनका नाम क्यों गायब हो जाता है? क्या विवाह के बाद बेटी का अपने माता-पिता से रिश्ता खत्म हो जाता है? क्या बेटी उस परिवार की संतान नहीं रहती? क्या जन्म देने वाले माता-पिता की स्मृतियों में उसका स्थान केवल विवाह तक सीमित है?

और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—अगर बेटी परिवार की संतान है, तो परिवार की स्मृति में उसका नाम क्यों नहीं होना चाहिए? यहीं से हमें अपनी पुरानी सामाजिक व्यवस्था पर दोबारा विचार करने की जरूरत महसूस होती है।

पितृसत्तात्मक सोच की लंबी परंपरा

हमारे समाज की संरचना लंबे समय तक पितृसत्तात्मक रही है। परिवार का नाम, संपत्ति, वंश और सामाजिक पहचान मुख्य रूप से पुरुषों के माध्यम से आगे बढ़ाने की परंपरा मजबूत रही। बेटा विवाह के बाद भी अपने पिता के घर और कुल से जुड़ा रहता था, जबकि बेटी विवाह के बाद दूसरे परिवार में चली जाती थी। यही सामाजिक व्यवस्था धीरे-धीरे इस धारणा में बदल गई कि वंश केवल बेटों से चलता है।

बेटी को ‘पराया धन’ कहा गया। उसके विवाह को उसके जीवन की सबसे बड़ी सामाजिक घटना माना गया। उसका नया घर ही उसका स्थायी घर समझ लिया गया। नतीजा यह हुआ कि परिवार की कई पीढ़ियों की लिखित स्मृतियों में बेटियां पीछे छूटती चली गईं। लेकिन समाज बदल रहा है।

आज बेटी शिक्षा प्राप्त कर रही है, नौकरी कर रही है, माता-पिता की आर्थिक सहायता कर रही है, बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल कर रही है और कई मामलों में बेटों से कहीं अधिक जिम्मेदारी निभा रही है। ऐसे में पुरानी वंशावली व्यवस्था पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।

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जब बेटी अंतिम संस्कार कर सकती है तो वंशावली में नाम क्यों नहीं?

यह सवाल धार्मिक परंपराओं से भी जुड़ता है। हिंदू धार्मिक परंपरा में लंबे समय तक पिता के अंतिम संस्कार, पिंडदान, श्राद्ध और अन्य कर्मकांडों को मुख्यतः पुत्र के दायित्व के रूप में देखा गया। इसी कारण पुत्र को परिवार और धार्मिक उत्तराधिकार की दृष्टि से विशेष स्थान मिला।

लेकिन समय के साथ धार्मिक व्याख्याओं और सामाजिक व्यवहार में बदलाव आया है। अनेक स्थानों पर बेटियों ने अपने माता-पिता का अंतिम संस्कार किया है। बेटियों द्वारा मुखाग्नि देने, श्राद्ध करने और अन्य संस्कारों में भाग लेने के उदाहरण सामने आए हैं।

धार्मिक परंपराओं की व्याख्या में मतभेद हो सकते हैं और अलग-अलग संप्रदायों तथा आचार्यों की मान्यताएं भी अलग हो सकती हैं, लेकिन इतना स्पष्ट है कि आज बेटी को केवल इसलिए धार्मिक कर्तव्यों से दूर रखने की धारणा सर्वमान्य नहीं रह गई है कि वह बेटी है।

जब बेटी अपने पिता के जीवन के अंतिम संस्कार में संतान के रूप में आगे आ सकती है, जब वह माता-पिता की सेवा और धार्मिक दायित्व निभा सकती है, तो फिर परिवार की वंश-स्मृति में उसका नाम दर्ज करने पर आपत्ति किस बात की है? यही इस पूरी बहस का सबसे बड़ा प्रश्न है।

बेटी का नाम संपत्ति और वंश—दोनों से अलग करके देखना होगा

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। वंशावली में नाम दर्ज होना और संपत्ति में हिस्सा मिलना दो अलग-अलग बातें हैं।

किसी बेटी का नाम परिवार की वंशावली में दर्ज करने का अर्थ यह नहीं है कि उसी क्षण वह किसी विशेष भूमि या संपत्ति की मालिक बन गई। वंशावली परिवार के संबंधों और पीढ़ियों की जानकारी का दस्तावेज हो सकती है, जबकि संपत्ति के अधिकार अलग-अलग कानूनी दस्तावेजों और उत्तराधिकार के नियमों से निर्धारित होते हैं।

पुराने समय में शायद यह डर भी रहा होगा कि यदि बेटी का नाम दर्ज किया गया तो भविष्य में संपत्ति पर उसका दावा सामने आएगा। इसलिए कई परिवारों ने बेटियों के नाम ही दर्ज नहीं किए। लेकिन आज इस सोच को बदलने की आवश्यकता है।

भारत में उत्तराधिकार संबंधी कानूनों में बेटियों के अधिकारों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। विशेष रूप से हिंदू उत्तराधिकार कानून में हुए बदलावों के बाद पुत्रियों को पैतृक संपत्ति में पुत्रों के समान अधिकारों से संबंधित महत्वपूर्ण कानूनी संरक्षण मिला है, हालांकि वास्तविक अधिकार किसी मामले के तथ्यों, संपत्ति की प्रकृति और लागू कानून पर निर्भर करते हैं। इसलिए वंशावली में बेटी का नाम दर्ज करना और संपत्ति का कानूनी बंटवारा—इन दोनों को एक ही चीज मानना उचित नहीं होगा।

हरिद्वार की पांडा वंशावली और राजस्व वंशावली अलग हैं

यहां एक और भ्रम दूर करना जरूरी है। हरिद्वार के तीर्थ पुरोहितों या पांडा समुदाय द्वारा रखी जाने वाली वंशावली और सरकारी राजस्व अभिलेखों में तैयार की जाने वाली पारिवारिक या उत्तराधिकार संबंधी जानकारी एक जैसी नहीं होती।

हरिद्वार की पांडा वंशावली मूल रूप से धार्मिक यात्राओं, पारिवारिक परंपराओं और पीढ़ियों की स्मृति से जुड़ी बही होती है। तीर्थयात्री जब हरिद्वार जाते हैं तो अपने परिवार की पुरानी जानकारी उसमें दर्ज या अद्यतन करवाते हैं। कई परिवारों के लिए ये बहियां पीढ़ियों पुरानी सामाजिक और पारिवारिक स्मृति का महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

दूसरी ओर भूमि और उत्तराधिकार से जुड़े सरकारी रिकॉर्ड राजस्व प्रशासन की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। उनमें नाम दर्ज होना संपत्ति और उत्तराधिकार संबंधी कानूनी स्थिति से जुड़ सकता है।

इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि हरिद्वार की पांडा बही अपने आप भूमि का कानूनी स्वामित्व निर्धारित करती है। लेकिन इससे हमारी मूल बात कमजोर नहीं होती। बल्कि सवाल और मजबूत हो जाता है। अगर पांडा की बही परिवार की पीढ़ियों की स्मृति है, तो उस स्मृति में बेटियों को क्यों भुलाया जाए?

पांडा की बही में दर्ज होता रहा है परिवार का इतिहास

हरिद्वार की पारंपरिक वंशावलियों में परिवार के मूल स्थान, पूर्वजों, गोत्र, रिश्तों, जन्म-विवाह-मृत्यु और धार्मिक यात्राओं जैसी अनेक प्रकार की जानकारी मिलती रही है। कई बार दान-पुण्य या धार्मिक अनुष्ठानों से संबंधित विवरण भी दर्ज किए जाते हैं।

इन बहियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनके माध्यम से परिवार कई पीढ़ियां पीछे जाकर अपने संबंधों को खोज सकता है।

किसी व्यक्ति को यह जानना हो कि उसके पूर्वज किस गांव से आए थे, परिवार की शाखा कहां से निकली थी या किसी पुराने रिश्ते का आधार क्या था, तो ऐसी वंशावलियां उपयोगी हो सकती हैं। लेकिन यदि परिवार की आधी आबादी ही इस इतिहास में दर्ज नहीं है तो इतिहास अधूरा नहीं हो जाएगा?

एक परिवार में बेटा भी जन्म लेता है और बेटी भी। मां बेटे को जन्म देती है तो बेटी को भी जन्म देती है। पिता बेटे का पिता होता है तो बेटी का भी पिता होता है। फिर वंश की कहानी में एक का नाम मुख्य और दूसरे का गौण क्यों?

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विवाह बेटी को मिटा नहीं देता

हमारी सामाजिक सोच में शायद सबसे गहरी धारणा यही रही है कि विवाह के बाद बेटी दूसरे परिवार की हो जाती है। लेकिन विवाह किसी व्यक्ति के जन्म संबंधों को मिटा नहीं देता।

बेटी का विवाह हो सकता है, उसका उपनाम बदल सकता है, उसका निवास बदल सकता है, उसकी पारिवारिक जिम्मेदारियां बदल सकती हैं, लेकिन उसके जन्मदाता माता-पिता कौन थे—यह तथ्य नहीं बदलता।

अगर किसी परिवार का बेटा विवाह करता है तो उसकी पत्नी का नाम कई बार वंशावली में किसी न किसी रूप में दर्ज हो जाता है। फिर उसी परिवार की बेटी, जो किसी दूसरे परिवार की पत्नी बनकर जाती है, उसका नाम अपने जन्म परिवार की वंशावली में क्यों नहीं रह सकता? यही असमानता हमें सोचने पर मजबूर करती है।

वंशावली को यदि रक्त-संबंध, पारिवारिक स्मृति और सामाजिक इतिहास का दस्तावेज माना जाए तो बेटी का नाम उसमें स्वाभाविक रूप से होना चाहिए।

बेटी केवल रिश्ते का नाम नहीं, परिवार की एक पूरी कहानी है

किसी वंशावली में बेटी का नाम लिखना केवल एक नाम लिखना नहीं होगा। उसके साथ परिवार की एक पूरी कहानी जुड़ जाएगी।

वह किसकी बेटी थी? किस घर में जन्मी? उसका विवाह किस परिवार में हुआ? उसने किस पीढ़ी को जन्म दिया? उसका मायका कौन-सा था? उसकी संतानों का अपने ननिहाल से रिश्ता क्या था? इन सवालों के जवाब आने वाली पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

आज हमारे पास मोबाइल फोन हैं, डिजिटल रिकॉर्ड हैं और इंटरनेट है। लेकिन सौ साल बाद इन सबमें से कितना बचेगा, कौन जानता है? पुरानी वंशावली की हस्तलिखित बही शायद तब भी किसी संदूक में सुरक्षित मिले और कोई पोता या परपोता उसे खोलकर अपने पूर्वजों को खोज रहा हो।

तब वह यह भी पूछेगा—मेरी दादी का नाम कहां है? मेरी नानी का नाम कहां है? इस परिवार की बेटियों का इतिहास कहां है? अगर आज हम उनका नाम दर्ज कर देंगे तो आने वाली पीढ़ियां कम से कम यह सवाल तो नहीं पूछेंगी कि परिवार की आधी कहानी गायब क्यों है।

मां के बिना वंश की कहानी पूरी कैसे होगी?

बेटियों के नाम की बात करते हुए हमें माताओं को भी भूलना नहीं चाहिए। वंशावली में केवल पुरुषों के नाम दर्ज होते रहे और महिलाओं की पहचान किसी पुरुष से जोड़कर लिखी जाती रही तो यह परिवार की आधी स्मृति को सीमित कर देता है।

एक व्यक्ति की मां कौन थी, वह किस परिवार से आई थी, उसका मायका कहां था—ये बातें भी पारिवारिक इतिहास का हिस्सा हैं।

आज यदि हम वंशावली को अधिक समावेशी बनाना चाहते हैं तो बेटियों के साथ माताओं और बहनों की पहचान को भी सम्मानपूर्वक दर्ज करने की परंपरा विकसित की जा सकती है। यह किसी परंपरा को नष्ट करना नहीं है। यह परंपरा को समय के साथ अधिक मानवीय बनाना है।

कानून ने बदला है समाज का नजरिया

कानून और समाज का रिश्ता हमेशा एक-दूसरे को प्रभावित करता रहा है। कई अधिकार ऐसे हैं जिन्हें समाज ने पहले सहज रूप से स्वीकार नहीं किया, लेकिन कानून ने उन्हें स्पष्टता दी। महिलाओं के संपत्ति अधिकार भी इसी परिवर्तन का हिस्सा हैं।

पुत्रियों को संपत्ति के अधिकार से संबंधित कानूनी प्रावधानों में महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं। सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों ने भी बेटियों के उत्तराधिकार अधिकारों की व्याख्या में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

लेकिन यहां सावधानी जरूरी है। किसी सरकारी रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना, वंशावली में नाम होना और संपत्ति में कानूनी हिस्सेदारी—इन तीनों की अपनी-अपनी प्रक्रिया और कानूनी स्थिति है।

इसलिए किसी भी भूमि या संपत्ति विवाद में स्थानीय राजस्व रिकॉर्ड, उत्तराधिकार कानून और संबंधित प्रशासनिक प्रक्रिया को देखना आवश्यक है।

लेकिन पारिवारिक वंशावली के मामले में इतना तो सरल है कि बेटी का नाम दर्ज करने से परिवार का इतिहास अधिक पूरा होगा।

बदलाव शुरू हो चुका है

अच्छी बात यह है कि बदलाव शुरू हो चुका है।

आज अनेक परिवार हरिद्वार जाकर अपनी पुरानी वंशावली को अपडेट कराते समय बेटियों, बहनों और माताओं के नाम भी दर्ज कराने की इच्छा व्यक्त करते हैं। कई परिवार अपने स्तर पर डिजिटल फैमिली ट्री बना रहे हैं। पुराने फोटो, जन्म प्रमाणपत्र, विवाह प्रमाणपत्र और परिवार के अन्य दस्तावेजों को भी सुरक्षित रखा जा रहा है।

यह परिवर्तन केवल आधुनिक शिक्षा का परिणाम नहीं है। इसके पीछे अपनी जड़ों को बचाने की चिंता भी है।

नई पीढ़ी अब पूछती है कि हमारा मूल गांव कौन सा था? हमारे दादा के पिता का नाम क्या था? हमारी दादी का मायका कहां था? हमारी बुआ कौन थीं? हमारी नानी किस परिवार से थीं?

यही सवाल वंशावली को केवल पुरुषों की सूची से आगे ले जाकर परिवार का वास्तविक इतिहास बनाने की दिशा में ले जा सकते हैं।

अब पांडा की बही में एक नई शुरुआत क्यों न हो?

मेरी नजर में सवाल किसी परंपरा को दोषी ठहराने का नहीं है।

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हर परंपरा का अपना इतिहास होता है। उसे उस समय की सामाजिक परिस्थितियों के संदर्भ में समझना चाहिए। लेकिन कोई परंपरा यदि समय के साथ अधूरी दिखाई देने लगे तो उसमें सुधार की गुंजाइश जरूर होनी चाहिए।

हरिद्वार की पुरानी बहियां हमारी सांस्कृतिक स्मृति हैं। उन्हें बचाना चाहिए। उनके पारंपरिक स्वरूप का सम्मान होना चाहिए। लेकिन उसी के साथ परिवार यदि चाहे तो अपनी नई पीढ़ियों के नामों के साथ बेटियों और महिलाओं की जानकारी भी स्पष्ट रूप से दर्ज करा सकता है।

क्यों न एक परिवार की नई वंशावली में यह लिखा जाए— फलां व्यक्ति की संतानें—फलां पुत्र, फलां पुत्री, फलां पुत्री। फिर उनकी आगे की पारिवारिक जानकारी भी दर्ज हो। इससे परिवार की शाखाएं कम नहीं होंगी। बल्कि वंशवृक्ष और विस्तृत हो जाएगा।

वंश का अर्थ केवल पुरुष रेखा क्यों?

यह सवाल शायद सबसे असहज है, लेकिन पूछना जरूरी है। यदि वंश का अर्थ परिवार की पीढ़ियों का इतिहास है तो उसे केवल पुरुषों की रेखा तक सीमित क्यों किया जाए? बेटे से अगली पीढ़ी आती है तो बेटी से भी अगली पीढ़ी आती है। बेटे की संतान परिवार का हिस्सा है तो बेटी की संतान भी उसी बेटी के जीवन की अगली पीढ़ी है।

हां, अलग-अलग समाजों में वंश, गोत्र, कुल और पारिवारिक पहचान की अपनी परंपरागत परिभाषाएं हैं। उन्हें एक झटके में बदलना संभव भी नहीं है और जरूरी भी नहीं। लेकिन पारिवारिक इतिहास लिखने की बात हो तो वहां किसी संतान को केवल उसके लिंग के कारण गायब कर देना आज के समय में विचार का विषय जरूर होना चाहिए।

आने वाली पीढ़ी के लिए हमारी जिम्मेदारी

हम आज जो दर्ज करते हैं, कल वही इतिहास बन जाता है। आज किसी पुरानी बही में एक नाम लिखना शायद मामूली काम लगे। लेकिन सौ वर्ष बाद वही नाम किसी परिवार के लिए सबसे कीमती जानकारी हो सकता है।

किसी पोती को यह जानना हो सकता है कि उसकी परदादी का नाम क्या था। किसी बेटे को अपनी बहन की संतानों का इतिहास जानना हो सकता है। किसी शोधकर्ता को किसी गांव के सामाजिक इतिहास को समझना हो सकता है। किसी परिवार को अपनी जड़ों की तलाश करनी हो सकती है। तब एक पूरा और समावेशी वंशवृक्ष बहुत काम आएगा।

इसलिए मेरी विनम्र अपील है कि जब अगली बार हम अपनी पारिवारिक वंशावली अपडेट करवाने जाएं तो केवल यह न देखें कि हमारे पिता, दादा और परदादा के नाम दर्ज हैं या नहीं।

यह भी देखें कि हमारी मां का नाम है या नहीं, हमारी बहनों का नाम है या नहीं, हमारी बेटियों का नाम है या नहीं। अगर नहीं है तो उसे दर्ज करवाने की पहल करें। यह किसी अधिकार की छीना-झपटी नहीं है। यह किसी परंपरा के खिलाफ विद्रोह भी नहीं है। यह अपने ही परिवार की कहानी को पूरा करने की कोशिश है।

आखिर में एक छोटी-सी बात

वंशवृक्ष की कल्पना कीजिए। एक पुराना पेड़ है। उसकी जड़ें जमीन के भीतर हैं। तना मजबूत है। शाखाएं चारों दिशाओं में फैली हैं। कुछ शाखाओं पर फल हैं, कुछ पर पत्ते। कोई शाखा आगे जाकर दूसरे हिस्से में फैल गई है।

क्या हम उस पेड़ की आधी शाखाओं को केवल इसलिए काट देंगे कि वे दूसरी दिशा में बढ़ गई हैं? बेटियां भी परिवार की ऐसी ही शाखाएं हैं।

वे विवाह के बाद दूसरे घर चली जाती हैं, लेकिन उनकी जड़ें उसी घर की मिट्टी में होती हैं। उनके भीतर उसी परिवार की स्मृतियां होती हैं। उनके बच्चों के लिए वही घर ननिहाल होता है। उनके माता-पिता उनके माता-पिता ही रहते हैं।

तो फिर परिवार की वंशावली में उनकी जगह क्यों न हो? मेरे लिए इस चिट्ठी का निष्कर्ष बहुत सरल है—

वंशावली केवल यह बताने का दस्तावेज नहीं होनी चाहिए कि परिवार में कौन-कौन से पुरुष हुए। उसे यह भी बताना चाहिए कि उस परिवार को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आकार देने वाली बेटियां और महिलाएं कौन थीं।

अगर हम सचमुच अपनी जड़ों को बचाना चाहते हैं तो हमें अपनी आधी जड़ों को अंधेरे में नहीं छोड़ना चाहिए। अगली बार जब कोई पुरानी बही खुले और उसमें पीढ़ियों के नाम लिखे दिखाई दें, तो एक बार उन खाली जगहों को भी देखिए।

हो सकता है वहां किसी बेटी का नाम आपका इंतजार कर रहा हो। और शायद उस नाम को लिख देना ही उस परिवार के इतिहास को पहली बार पूरा कर दे। अगले हफ्ते फिर मुलाकात करेंगे।

तब तक— राम-राम, नमस्कार, सत श्री अकाल, अल्लाह हाफ़िज़!

आपका
केवल कृष्ण पनगोत्रा
जम्मू-कश्मीर से

[नोट : यह रचना विभिन्न प्रकार की खोज, अध्ययन, सामाजिक अनुभव और पारिवारिक वंशावली की परंपराओं पर आधारित विचारात्मक आलेख है। धार्मिक परंपराओं तथा संपत्ति/उत्तराधिकार से संबंधित किसी विशिष्ट मामले में संबंधित विधिक एवं धार्मिक विशेषज्ञ की सलाह ली जानी चाहिए।]

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