दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट
गोंडा। खाद्य पदार्थों की शुद्धता को लेकर चल रही बहस एक बार फिर तेज हो गई है। 50 करोड़ रुपये के मानहानि मुकदमे का सामना कर रहे भाजपा के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने गोंडा में मीडिया से बातचीत के दौरान कई ऐसे बयान दिए, जिनसे खाद्य सुरक्षा, मिलावटखोरी और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। उन्होंने दावा किया कि बाजार में घी समेत कई खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल हैं और इस पूरे मामले की व्यापक जांच होनी चाहिए।
पूर्व सांसद ने अपने ऊपर दर्ज मानहानि मुकदमे का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने जो बातें उठाई हैं, वे आम जनता के स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी हैं। उनका कहना था कि यदि इस मुद्दे को उठाने के कारण उन्हें कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ता है तो भी वह पीछे हटने वाले नहीं हैं।
50 करोड़ के मुकदमे के बीच भी कायम हैं अपने दावों पर
गोंडा में पत्रकारों से बातचीत के दौरान बृजभूषण शरण सिंह ने कहा कि पतंजलि फूड्स लिमिटेड ने उनके खिलाफ मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 50 करोड़ रुपये का मानहानि मुकदमा दायर किया है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में चर्चा, आलोचना और विवाद कोई नई बात नहीं है।
उन्होंने कहा कि राजनीति में “चर्चा, पर्चा और खर्चा” हमेशा साथ चलते हैं। कभी किसी अन्य कारण से चर्चा होती है तो कभी किसी और विषय पर। इस समय वह कथित नकली घी के मुद्दे को लेकर चर्चा में हैं और उन्हें इससे कोई आपत्ति नहीं है।
पूर्व सांसद ने कहा कि यदि अदालत उन्हें दोषी ठहराती है और जेल भेजती है तो वह कानूनी प्रक्रिया का सम्मान करेंगे। उन्होंने यहां तक कहा कि ऐसी स्थिति में वह जमानत कराने के बजाय जेल जाना पसंद करेंगे।
जेल जाने से जागरूकता बढ़ने का किया दावा
बृजभूषण शरण सिंह ने कहा कि यदि उन्हें जेल जाना पड़ा तो यह केवल एक व्यक्ति की सजा नहीं होगी, बल्कि खाद्य पदार्थों में मिलावट के खिलाफ एक बड़े जनजागरण का माध्यम बन सकता है।
उनका कहना था कि आज गांवों से लेकर शहरों तक नकली मिठाई, नकली मावा, नकली दही, नकली तेल और अन्य खाद्य पदार्थ खुलेआम बिक रहे हैं। आम लोग इन्हें असली समझकर खरीदते और उपयोग करते हैं, जबकि उनके स्वास्थ्य पर इसके गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं।
उन्होंने कहा कि खाद्य सुरक्षा का प्रश्न किसी एक कंपनी या एक उत्पाद तक सीमित नहीं है। यह करोड़ों उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य और जीवन से जुड़ा विषय है, इसलिए सरकार और संबंधित एजेंसियों को इस दिशा में और अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
कई उत्पादों और कारोबारी दावों पर उठाए सवाल
मीडिया से बातचीत के दौरान पूर्व सांसद ने संबंधित कंपनी के कई उत्पादों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि कंपनी के कुछ उत्पाद पहले भी विवादों में रहे हैं और विभिन्न स्तरों पर जांच तथा कानूनी प्रक्रियाओं का सामना कर चुके हैं।
उन्होंने कहा कि जिस कंपनी के अनेक उत्पादों को लेकर समय-समय पर प्रश्न उठे हों और जिसे विभिन्न मामलों में सफाई देनी पड़ी हो, वह आज उनके खिलाफ मानहानि का मुकदमा कर रही है।
बातचीत के दौरान उन्होंने उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में वर्ष 2022 में सामने आए खाद्य सुरक्षा विभाग के एक मामले का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि ऐसे मामलों को देखते हुए खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता की नियमित और निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
विदेशों का भी किया जिक्र
अपने आरोपों को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने दावा किया कि कुछ उत्पादों को लेकर विदेशों में भी आपत्तियां उठ चुकी हैं। उन्होंने कनाडा और सिंगापुर का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां से आने वाले पदार्थों को लेकर भी सवाल खड़े किए जाने चाहिए।
हालांकि इन दावों के समर्थन में उन्होंने मीडिया के सामने कोई नया दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया, लेकिन उन्होंने अपने आरोपों को दोहराते हुए कहा कि उपभोक्ताओं को उत्पाद खरीदते समय अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है।
उनका कहना था कि खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर केवल विज्ञापनों या प्रचार अभियानों के आधार पर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि वैज्ञानिक परीक्षणों और प्रमाणित मानकों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
अपने डेयरी मॉडल का दिया उदाहरण
घी की शुद्धता पर सवाल उठाते हुए बृजभूषण शरण सिंह ने अपने डेयरी प्रबंधन का उदाहरण भी दिया। उन्होंने बताया कि उनके यहां लगभग 150 गायें हैं और उनसे सीमित मात्रा में घी का उत्पादन होता है।
उन्होंने दावा किया कि एक महीने में लगभग 100 किलोग्राम शुद्ध घी तैयार होता है। पशुओं के चारे, देखभाल, दवाइयों, श्रम और अन्य खर्चों को देखते हुए शुद्ध घी का उत्पादन सस्ता नहीं हो सकता।
उनका कहना था कि जब उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है, तब बहुत कम कीमत पर बड़ी मात्रा में शुद्ध घी उपलब्ध कराने के दावों पर स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने कहा कि उपभोक्ताओं को उत्पाद की कीमत के साथ उसकी गुणवत्ता पर भी ध्यान देना चाहिए।
खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर उठे नए प्रश्न
पूर्व सांसद के ताजा बयान के बाद एक बार फिर खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बहस तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि मिलावटखोरी और नकली खाद्य पदार्थों की समस्या देश के अनेक हिस्सों में समय-समय पर सामने आती रही है। ऐसे मामलों में अंतिम निष्कर्ष जांच एजेंसियों, खाद्य सुरक्षा विभाग और न्यायालयों की प्रक्रिया के बाद ही सामने आते हैं।
खाद्य सुरक्षा से जुड़े जानकारों का कहना है कि उपभोक्ताओं को केवल प्रमाणित और विश्वसनीय स्रोतों से ही खाद्य सामग्री खरीदनी चाहिए। साथ ही किसी भी उत्पाद को लेकर संदेह होने पर संबंधित विभागों को सूचना देनी चाहिए ताकि उसकी जांच कराई जा सके।
आरोप, मुकदमा और बहस—तीनों पर टिकी निगाहें
गोंडा में दिए गए इस बयान के बाद अब लोगों की निगाहें दो मोर्चों पर टिक गई हैं। पहला, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में चल रहा 50 करोड़ रुपये के मानहानि मुकदमे का कानूनी पक्ष और दूसरा, खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर उठाए गए आरोपों की वास्तविकता।
फिलहाल इतना तय है कि इस बयान ने खाद्य सुरक्षा, मिलावटखोरी और उपभोक्ता अधिकारों पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। आने वाले दिनों में अदालत की कार्यवाही, संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया और संभावित जांच की दिशा इस पूरे विवाद की तस्वीर को और स्पष्ट कर सकती है।
खाद्य पदार्थों की शुद्धता का प्रश्न केवल व्यापारिक प्रतिस्पर्धा का विषय नहीं, बल्कि आम नागरिकों के स्वास्थ्य और विश्वास से जुड़ा मामला है। यही कारण है कि गोंडा से उठी यह बहस अब व्यापक स्तर पर ध्यान आकर्षित कर रही है।
























