चित्रकूट की बाढ़, पाठा की पीड़ा और राहत के बाद पुनर्वास की वास्तविक चुनौती के संबंध में सार्वजनिक पत्र

चित्रकूट बाढ़ 2026 में पाठा क्षेत्र की तबाही, जलमग्न गांव, टूटी सड़कें, बर्बाद फसलें, राहत कार्य और ब्यूरो रिपोर्टर सूरज सिंह राणा की तस्वीर।

सुनने के लिए यहां क्लिक करें

संपादक के नाम सार्वजनिक पत्र

माननीय संपादक महोदय,

चित्रकूट  को अक्सर हम राम की तपोभूमि, धर्मनगरी और आस्था की नगरी के रूप में जानते हैं। मंदाकिनी के किनारे रामघाट, कामदगिरि, मंदिरों की घंटियां, साधु-संतों की वाणी और श्रद्धालुओं की भीड़ इस जिले की पहचान का बड़ा हिस्सा हैं। लेकिन चित्रकूट की पहचान केवल इतनी नहीं है। इस जिले का एक दूसरा चेहरा भी है—पाठा की पथरीली धरती, जंगलों के बीच बसे छोटे-छोटे गांव, कच्चे घर, मेहनतकश किसान, मजदूर, आदिवासी परिवार और वे ग्रामीण जिनके लिए हर बरसात उम्मीद से ज्यादा चिंता लेकर आती है।

आज उसी चित्रकूट की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं।

मैं यह पत्र केवल एक समाचार लिखने के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों की आवाज को सामने लाने के लिए लिख रहा हूं जिनके घरों में बाढ़ का पानी घुसा, जिनकी गृहस्थी बह गई, जिनके खेतों में खड़ी फसल पानी में समा गई, जिनके गांवों की सड़कें और रपटे टूट गए और जिनके सामने अब पानी उतरने के बाद जीवन को फिर से खड़ा करने की चुनौती खड़ी है।

चित्रकूट की बाढ़ को केवल रामघाट की तस्वीरों से मत देखिए

महोदय, चित्रकूट में हाल की बाढ़ का सबसे दिखाई देने वाला दृश्य रामघाट और आसपास के इलाके में सामने आया। लगातार कई दिनों तक मंदाकिनी खतरे के निशान से ऊपर बहती रही। एक समय रामघाट के आसपास करीब 400 दुकानें और 200 मकान पानी में डूबने की रिपोर्ट सामने आई। गलियों और सड़कों पर पानी भर गया और धर्मनगरी का वह हिस्सा, जहां सामान्य दिनों में श्रद्धालुओं की आवाजाही रहती है, जलमग्न हो गया। लेकिन चित्रकूट की बाढ़ की कहानी रामघाट पर खत्म नहीं होती।

राजापुर, कर्वी, मानिकपुर और पाठा के गांवों तक इसकी मार पहुंची। प्रशासनिक रिपोर्टों के अनुसार 36 गांव प्रभावित हुए और करीब 13,906 से 13,913 लोगों तक बाढ़ का असर पहुंचा। अलग-अलग तारीखों पर जारी आंकड़ों में मामूली अंतर है, लेकिन दोनों आंकड़े यह बताते हैं कि संकट कुछ घरों तक सीमित नहीं था, बल्कि हजारों लोगों की जिंदगी प्रभावित हुई।

मंदाकिनी का जलस्तर अपने उच्चतम स्तर पर 135.20 मीटर तक पहुंचने के बाद 128 मीटर के आसपास आया। 688 लोगों को सुरक्षित निकाले जाने की जानकारी भी सामने आई। राहत अभियान में भोजन और राहत किट का वितरण किया गया।

ये आंकड़े प्रशासन की सक्रियता भी बताते हैं और संकट की गहराई भी। लेकिन आंकड़ों के पीछे जो जिंदगी है, वह इससे कहीं बड़ी कहानी कहती है।

पाठा में बाढ़ सिर्फ पानी नहीं लाती, घर की नींव तक हिला देती है

पाठा का भूगोल बाकी चित्रकूट से अलग है। यहां पहाड़ हैं, जंगल हैं, पथरीले रास्ते हैं और छोटे-छोटे गांव-मजरे हैं। बरदहा जैसी नदियां और बरसाती नाले सामान्य दिनों में जीवन का हिस्सा लगते हैं, लेकिन जब लगातार बारिश होती है तो वही जलधाराएं रास्तों, खेतों और घरों के लिए खतरा बन जाती हैं।

हाल की बारिश में मानिकपुर के पाठा इलाके में बरदहा नदी उफान पर आई। डोडामाफी, जारोमाफी और आसपास के गांवों में लोगों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। डोडामाफी क्षेत्र में कच्चे मकानों के गिरने और घरों में पानी भरने से लोगों की गृहस्थी बर्बाद हुई। एक रिपोर्ट के अनुसार अकेले डोडामाफी में 15 मकान गिरने की सूचना सामने आई थी। अनाज और भूसा भी पानी में बर्बाद हुआ। सोचिए, एक गरीब परिवार के लिए घर की दीवार केवल ईंट-मिट्टी नहीं होती।

वही दीवार उसकी सुरक्षा है। वहीं उसकी गृहस्थी है। वहीं उसके बच्चों की नींद है। वहीं उसकी बूढ़ी मां का सहारा है। जब वह दीवार गिरती है तो सिर्फ छत नहीं गिरती, परिवार की वर्षों की मेहनत का भरोसा भी टूट जाता है।

स्थानीय पाठा-बुंदेली लहजे में ग्रामीण की पीड़ा को यूं समझा जा सकता है— “का बचा है बाबू, पानी घर मा घुस गवा। अनाज-भूसा सब बह गवा, छप्पर गिर गवा। अब बाल-बच्चन का लेके कहां जाई?”

यह किसी एक व्यक्ति का सत्यापित शब्दशः बयान नहीं, बल्कि प्रभावित ग्रामीण परिवारों की बताई परिस्थिति और स्थानीय बोलचाल की भाषा में उनकी सामूहिक पीड़ा का रूप है।

एक और आवाज उसी मिट्टी से निकलती है— “हम गरीब मनई हैं, खेती-बारी अउ मजदूरी से पेट पलत है। खेतवा पानी मा डूब गवा तो अगली फसल का भरोसा का रहि गवा?”

यह सवाल केवल एक किसान का नहीं है। यह उस पूरे ग्रामीण अर्थशास्त्र का सवाल है जहां एक मौसम की फसल खराब होने का अर्थ अगले कई महीनों तक कर्ज, मजदूरी और राशन की चिंता हो सकता है।

सड़कें टूटीं तो सिर्फ रास्ता नहीं टूटा, गांव का संपर्क टूटा

बाढ़ के बाद सबसे बड़ी चुनौती केवल पानी उतरना नहीं है। असली परीक्षा तब शुरू होती है जब गांव अपने ही जिले से कटने लगते हैं।

See also  समरसता का संदेश लेकर धर्मनगरी पहुंची कलश वंदन यात्रा, रविदास धाम के विकास पर फिर उठे सवाल

5 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार चित्रकूट जिले में बाढ़ और मूसलाधार बारिश से 55 सड़कें, पुलिया और रपटे क्षतिग्रस्त हुए। करीब आठ किलोमीटर सड़कें बहने और कई मार्गों पर बड़े गड्ढे बनने की जानकारी सामने आई। दो रपटे पूरी तरह बह गए, जबकि 22 रपटे क्षतिग्रस्त बताए गए। यह संख्या केवल निर्माण विभाग की फाइल का आंकड़ा नहीं है।

इसका मतलब है कि किसी गांव की गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाना कठिन हो सकता है। किसी बीमार बुजुर्ग को समय पर दवा नहीं मिल सकती। बच्चे स्कूल नहीं पहुंच सकते। किसान मंडी तक फसल नहीं ले जा सकता। मजदूर काम की जगह तक नहीं पहुंच सकता।

मानिकपुर के पाठा में जारोमाफी का रपटा सड़क समेत बह गया। कई स्थानों पर आवागमन बंद हुआ। टिकरिया के पास भी सड़क और रपटे को नुकसान पहुंचने की खबर सामने आई।

ग्रामीण की जुबान में दर्द कुछ यूं है— “रास्ता टूट गवा तौ समझो गांव टूट गवा। बजार दूर, अस्पताल दूर, स्कूल दूर। पानी उतर भी जाई, पर सड़क कब बनिहै—ई डर अबहिन से सतावत है।”

यही वह बिंदु है जहां हमें बाढ़ को केवल प्राकृतिक आपदा मानकर आगे बढ़ जाने के बजाय ग्रामीण बुनियादी ढांचे पर गंभीरता से विचार करना होगा।

फसलें डूबीं तो आने वाला मौसम भी संकट में पड़ गया

बाढ़ का पानी खेत से उतर जाता है, लेकिन किसान के नुकसान का पानी इतनी जल्दी नहीं उतरता।

रिपोर्टों के अनुसार चित्रकूट में बारिश और बाढ़ से 156 गांवों की फसलों पर असर पड़ा। प्रभावित गांवों में मानिकपुर, मऊ, कर्वी, पहाड़ी और अन्य क्षेत्रों के गांव शामिल बताए गए हैं। राजस्व, कृषि और बीमा से जुड़ी टीमों के माध्यम से फसल क्षति के सर्वे की प्रक्रिया शुरू होने की बात सामने आई।

यहां हमें एक बात समझनी होगी।

जिस किसान ने बीज खरीदा, खेत जोता, खाद डाली, मजदूरी की, बारिश की उम्मीद की और फसल को लहलहाते देखा—उसके लिए बाढ़ का पानी सिर्फ खेत में नहीं आता, वह उसकी पूरी आर्थिक गणित को बहा ले जाता है।

यदि फसल खराब हुई तो किसान को अगली बुवाई के लिए फिर पैसे चाहिए होंगे। यदि घर भी क्षतिग्रस्त हुआ तो घर के लिए पैसे चाहिए होंगे। यदि पशुओं का चारा बह गया तो पशुपालन पर भी संकट आएगा।

एक ग्रामीण की स्थानीय शैली में यह पीड़ा कुछ इस तरह सामने आती है— “खेती डूबी, घर बिगड़ो, चारा गवा। सरकार मदद करै तो अच्छा, नाहीं तौ साहूकार के दरवज्जे जावै का पड़े।” यह वाक्य हमारे ग्रामीण संकट की पूरी अर्थव्यवस्था समझने के लिए काफी है।

प्रशासन की सक्रियता को भी ईमानदारी से दर्ज किया जाना चाहिए

महोदय, इस पत्र का उद्देश्य केवल शिकायत करना नहीं है। वास्तविक स्थिति से मुंह मोड़ना पत्रकारिता नहीं है।

बाढ़ के दौरान प्रशासन ने राहत और बचाव अभियान चलाया। 688 लोगों को सुरक्षित निकालने की जानकारी सामने आई। प्रभावित 36 गांवों में राहत पहुंचाई गई। हजारों लंच पैकेट और राहत किट वितरित किए जाने की रिपोर्ट भी सामने आई।

पाठा क्षेत्र में स्थानीय स्तर पर शिक्षक संघ और अन्य सामाजिक संगठनों ने भी राहत कार्य में भागीदारी की। डोडामाफी में करीब दो हजार बाढ़ प्रभावितों को भोजन कराया गया और लगभग 500 लंच पैकेट वितरित किए गए।

यह तस्वीर बताती है कि संकट के समय प्रशासन, सामाजिक संगठन और आम नागरिक मिलकर बड़ी राहत खड़ी कर सकते हैं।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 6 सितंबर को चित्रकूट का दौरा कर बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण किया और प्रभावित परिवारों से मुलाकात की। करीब 800 परिवारों को राहत सामग्री वितरित की गई तथा पूरी तरह क्षतिग्रस्त मकानों के तीन परिवारों को 1.20-1.20 लाख रुपये की सहायता दिए जाने की जानकारी सामने आई।यह राहत आवश्यक है।

लेकिन सवाल यह है कि राहत के बाद क्या?

बाढ़ उतर गई है, लेकिन संकट अभी नहीं उतरा

मंदाकिनी का पानी घट सकता है। बरदहा शांत हो सकती है। गलियों से पानी निकल सकता है। रामघाट की सीढ़ियां फिर दिखाई दे सकती हैं।

लेकिन जिन दुकानों में कीचड़ भर गया, जिन घरों की दीवारें गिर गईं, जिन किसानों की फसल चली गई, जिन रास्तों के रपटे बह गए और जिन परिवारों का सामान पानी में खराब हो गया—उनके लिए बाढ़ अभी खत्म नहीं हुई है।

उनकी बाढ़ अब पुनर्वास की बाढ़ है। अब उन्हें मुआवजा चाहिए। घर चाहिए। सड़क चाहिए। फसल का सर्वे चाहिए। बीमा का भुगतान चाहिए। बच्चों की पढ़ाई सामान्य चाहिए। पशुओं के लिए चारा चाहिए। पीने के साफ पानी की व्यवस्था चाहिए। और सबसे जरूरी—अगली बारिश के डर से मुक्ति चाहिए।

See also  गौशालाओं की धनराशि में कटौती और वसूली के आरोप, जांच की मांग

बार-बार की बाढ़ को केवल राहत सामग्री से नहीं रोका जा सकता

यह सवाल अब चित्रकूट के नीति-निर्माताओं और प्रशासन के सामने गंभीरता से खड़ा होना चाहिए कि हर साल बाढ़ आने के बाद राहत बांटने की व्यवस्था पर्याप्त है या हमें बाढ़ की मूल वजहों पर काम करना चाहिए। मंदाकिनी का कैचमेंट क्षेत्र लगभग 300 वर्ग किलोमीटर में फैला होने की जानकारी सामने आई है।

यदि नदी के प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्र में अतिक्रमण है, यदि जल निकासी के रास्ते अवरुद्ध हैं, यदि छोटे नालों और जलधाराओं की प्राकृतिक दिशा बाधित है, यदि पुल-पुलियों का डिजाइन स्थानीय जलप्रवाह के अनुरूप नहीं है, तो समस्या केवल एक बरसात की नहीं होगी।

मुख्यमंत्री ने भी मंदाकिनी के कैचमेंट क्षेत्र में अतिक्रमण के चिन्हांकन और नियमानुसार कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। यह निर्णय केवल कागज पर नहीं रहना चाहिए। चित्रकूट को दीर्घकालीन बाढ़ प्रबंधन योजना चाहिए।

पाठा के लिए अलग बाढ़ और आपदा योजना क्यों नहीं?

पाठा का भूगोल मैदानी क्षेत्र जैसा नहीं है। यहां पहाड़ हैं, जंगल हैं, छोटे गांव और मजरे हैं। कई रास्ते प्राकृतिक जलधाराओं को पार करते हैं। इसलिए पाठा के लिए अलग आपदा प्रबंधन मॉडल बनाया जाना चाहिए।

कहां पानी तेजी से आता है? कौन से गांव पहले कटते हैं? कौन से रपटे सबसे ज्यादा जोखिम वाले हैं? किस गांव में कितने कच्चे मकान हैं? कहां सुरक्षित ऊंची जमीन उपलब्ध है? किस रास्ते से एंबुलेंस पहुंच सकती है? किस गांव में नाव की आवश्यकता पड़ती है? कहां सामुदायिक राहत केंद्र बनाया जा सकता है?

इन सवालों के जवाब बाढ़ आने के बाद नहीं, बाढ़ आने से पहले तैयार होने चाहिए।

गांव की आवाज को राहत सूची में जगह मिले

महोदय, आपदा प्रबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी तब होती है जब कागज पर बना नक्शा जमीन की वास्तविकता से अलग हो।

गांव का व्यक्ति जानता है कि किस नाले में अचानक पानी आता है। वह जानता है कि किस रपटे पर पानी पहले चढ़ता है। वह जानता है कि किस रास्ते से रात में निकलना असंभव हो जाता है। वह जानता है कि किस घर की दीवार पहले से कमजोर है।

इसलिए ग्रामीणों को केवल राहत लेने वाला व्यक्ति न समझा जाए। उन्हें आपदा प्रबंधन का सहभागी बनाया जाए।

ग्राम स्तर पर बाढ़ स्वयंसेवक दल बनें। प्राथमिक विद्यालयों और पंचायत भवनों को आवश्यकता के अनुसार अस्थायी राहत केंद्र बनाया जाए। जरूरी दवाओं, पेयजल, सूखे राशन और पशुचारे का स्थानीय भंडारण हो।

बाढ़ पीड़ितों की सूची में कोई छूट न जाए

यह भी बहुत महत्वपूर्ण है कि राहत और मुआवजे की सूची पारदर्शी हो।

जिसका घर गिरा है, उसे सहायता मिले ।जिसकी फसल खराब हुई है, उसका सर्वे हो।जिसकी दुकान बर्बाद हुई है, उसके नुकसान का आकलन हो। जिसके पशुओं का चारा बहा है, उसकी समस्या भी दर्ज हो।

क्योंकि गरीब परिवारों का नुकसान अक्सर कागज पर छोटा दिखाई देता है, जबकि उनके लिए वही नुकसान जीवन बदल देने वाला होता है।

एक परिवार के घर से यदि दस बोरी अनाज बह गया तो सरकारी रिपोर्ट में वह केवल कुछ हजार रुपये का नुकसान हो सकता है, लेकिन उस परिवार के लिए वह कई महीनों की खाद्य सुरक्षा थी।

रामनगरी की चमक के पीछे पाठा की अंधेरी रात न छूटे

चित्रकूट में धार्मिक पर्यटन महत्वपूर्ण है। रामघाट की दुकानें, होटल, धर्मशालाएं, आश्रम और पर्यटन गतिविधियां स्थानीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं।

बाढ़ ने इस अर्थव्यवस्था को भी चोट पहुंचाई। रामघाट और आसपास के इलाकों में सैकड़ों मकानों और दुकानों के डूबने की रिपोर्ट सामने आई। लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि चित्रकूट का पर्यटन तभी मजबूत होगा जब उसके गांव मजबूत होंगे।

जो जिला अपने सबसे दूर बसे गांव को सुरक्षित नहीं कर सकता, वहां केवल पर्यटन केंद्र को सुंदर बनाकर विकास की पूरी तस्वीर नहीं बनाई जा सकती।

रामघाट की सफाई जरूरी है, लेकिन पाठा की टूटी सड़क भी उतनी ही जरूरी है।

मंदिरों की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन ग्रामीण का कच्चा घर भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

पर्यटक की सुविधा जरूरी है, लेकिन किसान की फसल भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

यही संतुलित चित्रकूट होगा।

बाढ़ के साथ बीमारी का खतरा भी आता है

पानी उतरने के बाद सबसे बड़ी चिंता स्वास्थ्य की होती है। गंदा पानी, कीचड़, सड़ते जैविक पदार्थ, दूषित पेयजल और मच्छरों का प्रकोप ग्रामीण क्षेत्रों में बीमारी का कारण बन सकता है।

इसलिए बाढ़ प्रभावित गांवों में केवल सफाई अभियान पर्याप्त नहीं होगा। पीने के पानी की जांच, क्लोरीनेशन, दवाओं की उपलब्धता, मच्छररोधी उपाय और स्वास्थ्य शिविर जरूरी हैं। विशेषकर बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पहले से कमजोर परिवारों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

See also  विकास के दावों के बीच बदहाल कोल आदिवासी समाज, पुल और सरकारी योजनाओं का वर्षों से इंतजार video

पशुओं की पीड़ा भी दर्ज हो

गांव का जीवन केवल मनुष्यों से नहीं चलता। किसान का बैल, गाय, भैंस, बकरी और अन्य पशु उसकी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं।

जब भूसा बह जाता है, चारा खराब हो जाता है और खेतों में पानी भर जाता है तो पशुपालक परिवार की आय भी प्रभावित होती है। इसलिए राहत योजना में मानव खाद्यान्न के साथ पशुचारा और पशु चिकित्सा को भी बराबर महत्व दिया जाना चाहिए।

अब सवाल भविष्य का है

महोदय, चित्रकूट ने बाढ़ का पानी देख लिया। अब उसे बाढ़ से सीख लेने की जरूरत है।

55 सड़कें, पुलिया और रपटों का क्षतिग्रस्त होना एक चेतावनी है। आठ किलोमीटर सड़क के बह जाने की सूचना केवल निर्माण विभाग की समस्या नहीं है। 156 गांवों की फसलों पर असर केवल कृषि विभाग की समस्या नहीं है। 36 गांवों और लगभग 14 हजार प्रभावित लोगों का आंकड़ा केवल राजस्व विभाग की फाइल नहीं है। यह पूरा जिले का सवाल है। चित्रकूट को ऐसी योजना चाहिए जिसमें नदी, पहाड़, जंगल, सड़क, गांव, खेती और पर्यटन को एक साथ देखा जाए।

हमारी मांग राहत से आगे की है

इस सार्वजनिक पत्र के माध्यम से प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के समक्ष कुछ मूलभूत सवाल रखना चाहता हूं।

क्या सभी बाढ़ प्रभावित गांवों का घर-घर सर्वे पूरा होगा? क्या क्षतिग्रस्त मकानों की सहायता समयबद्ध तरीके से मिलेगी? क्या फसल क्षति का वैज्ञानिक सर्वे कर किसानों को उचित मुआवजा और बीमा भुगतान सुनिश्चित किया जाएगा? क्या क्षतिग्रस्त 55 सड़कों, पुलियों और रपटों की मरम्मत के साथ भविष्य के लिए उनका स्थायी समाधान होगा? क्या पाठा के संवेदनशील गांवों के लिए पूर्व चेतावनी प्रणाली मजबूत की जाएगी? क्या मंदाकिनी और अन्य नदियों के कैचमेंट क्षेत्र में अतिक्रमण की समस्या पर स्थायी कार्रवाई होगी? क्या बाढ़ के बाद स्वास्थ्य और पेयजल की निगरानी तब तक जारी रहेगी जब तक गांव पूरी तरह सामान्य नहीं हो जाते?

और सबसे बड़ा सवाल— क्या अगले मानसून से पहले हम वही तस्वीर दोबारा बनने से रोक पाएंगे?

चित्रकूट को दया नहीं, दीर्घकालीन व्यवस्था चाहिए

बाढ़ के समय सहायता मिलना जरूरी है।

राहत किट जरूरी है। लंच पैकेट जरूरी हैं।रेस्क्यू जरूरी है। लेकिन इससे आगे भी एक चित्रकूट है। वह चित्रकूट जो बाढ़ उतरने के बाद अपने घर की टूटी दीवार उठाएगा।

वह किसान जो दोबारा खेत में बीज डालेगा। वह दुकानदार जो कीचड़ साफ करके अपनी दुकान खोलेगा। वह बच्चा जो फिर स्कूल जाने का रास्ता तलाशेगा। वह महिला जो घर की बची हुई गृहस्थी को समेटेगी।

और वह बुजुर्ग जो अगली बारिश के बाद फिर आसमान की ओर देखकर पूछेगा— **“अबकी पानी कइसे रोकी?” **यही प्रश्न इस पूरे सार्वजनिक पत्र का केंद्र है।

अंतिम निवेदन

महोदय, चित्रकूट को केवल धार्मिक नक्शे पर मत देखिए। इसे मानवीय नक्शे पर देखिए।

यहां राम की कथा है तो ग्रामीण की व्यथा भी है। यहां मंदाकिनी की आस्था है तो उसी मंदाकिनी का प्रलय भी है। यहां मंदिरों की घंटियां हैं तो पाठा के घरों में रोते बच्चों की आवाज भी है। यहां पर्यटक हैं तो खेत में अपनी फसल के लिए चिंतित किसान भी है।और यही चित्रकूट का पूरा सच है।

इसलिए बाढ़ की तस्वीर को पानी उतरने के साथ समाप्त मान लेना सबसे बड़ी भूल होगी।

पानी उतर गया है, लेकिन हजारों परिवारों के जीवन में संकट अभी भी मौजूद है।

जरूरत है कि राहत के बाद पुनर्वास की गति तेज हो। क्षति का निष्पक्ष आकलन हो। किसानों को समय पर सहायता मिले। टूटे रास्तों को स्थायी रूप से दुरुस्त किया जाए। पाठा के गांवों के लिए अलग आपदा प्रबंधन योजना बने। नदी के प्राकृतिक प्रवाह और कैचमेंट क्षेत्र की रक्षा हो। और सबसे महत्वपूर्ण—गांव के आदमी की आवाज को सरकारी फाइल में एक आंकड़े के रूप में नहीं, बल्कि एक नागरिक के अधिकार के रूप में दर्ज किया जाए।

चित्रकूट की जनता ने बाढ़ का पानी सह लिया है। अब उसे व्यवस्था की संवेदनशीलता चाहिए। उसे केवल यह आश्वासन नहीं चाहिए कि अगली बार मदद पहुंच जाएगी। उसे भरोसा चाहिए कि अगली बार ऐसी तबाही कम होगी।

यही इस सार्वजनिक पत्र का आग्रह है। यही पाठा की पथरीली धरती की पुकार है। यही मंदाकिनी के किनारे बसे चित्रकूट की आज की सबसे बड़ी जरूरत है।

चित्रकूट को केवल रामनगरी कहकर मत छोड़िए—यह उन लाखों सांसों की धरती भी है जो हर मौसम में संघर्ष करके जीवन को बचाए रखती हैं।

सादर।

सूरज सिंह राणा
ब्यूरो रिपोर्टर
चित्रकूट

यायावर
Author: यायावर

यायावर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Read More

Cricket Live Score

Rashifal

और पढ़ें