1854 में झांसी की रानी की ओर से ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध कानूनी संघर्ष करने वाले ऑस्ट्रेलियाई बैरिस्टर जॉन लैंग की विरासत, उनकी लगभग भुला दी गई कब्र और डॉ. अनिल दीक्षित के शोध से उठते हैं इतिहास, संरक्षण और राष्ट्रीय स्मृति के बड़े सवाल
आलेख : अनिल अनूप
इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं होती कि कोई महत्वपूर्ण घटना भूल जाती है, बल्कि यह होती है कि उसे एक बार फिर खोज लेने, पहचान लेने और सार्वजनिक मंच पर सम्मान दे देने के बाद भी हम उसे स्थायी राष्ट्रीय स्मृति का हिस्सा नहीं बना पाते। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और ऑस्ट्रेलियाई बैरिस्टर जॉन लैंग की कहानी इसी विडंबना का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। 1857 की क्रांति में अदम्य साहस और रणभूमि की वीरता के लिए अमर हुई रानी लक्ष्मीबाई ने हथियार उठाने से पहले अपने राज्य और दत्तक उत्तराधिकारी के अधिकारों के लिए कानून का रास्ता भी अपनाया था। इसी कानूनी संघर्ष में उनके साथ खड़े हुए थे ऑस्ट्रेलिया में जन्मे बैरिस्टर, लेखक और पत्रकार जॉन लैंग। लगभग डेढ़ सौ वर्ष बाद जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 में ऑस्ट्रेलिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री टोनी एबॉट से मुलाकात के दौरान जॉन लैंग और रानी लक्ष्मीबाई के ऐतिहासिक संबंध को विशेष रूप से स्मरण किया, तब लगा था कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के साझा इतिहास का यह भूला हुआ अध्याय एक नई पहचान प्राप्त करेगा। लेकिन आज प्रश्न यह है कि उस ऐतिहासिक स्मरण के बाद आखिर क्या हुआ? क्या जॉन लैंग की विरासत को व्यवस्थित रूप से संरक्षित किया गया? क्या रानी लक्ष्मीबाई की कानूनी लड़ाई को इतिहास के मुख्य विमर्श में स्थान मिला? क्या इस विषय पर शोध करने वालों के निष्कर्षों को किसी राष्ट्रीय परियोजना, अभिलेखीय कार्यक्रम या शैक्षिक पहल में बदला गया? और यदि डॉ. अनिल दीक्षित जैसे शोधकर्ताओं ने इस लगभग विस्मृत इतिहास को नए सिरे से खोजने, समझने और सामने लाने में वर्षों लगाए, तो आज उस शोध का उपयोग आखिर किस काम में हो रहा है?
2014 का वह क्षण, जब जॉन लैंग फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर आए
नवंबर 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा केवल भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंधों के राजनीतिक और आर्थिक आयामों के कारण महत्वपूर्ण नहीं थी। इस यात्रा के दौरान इतिहास का एक ऐसा अध्याय भी सामने आया, जो सामान्यतः भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंधों की चर्चा में शामिल नहीं होता था। समकालीन समाचार रिपोर्टों के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी ने तत्कालीन ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री टोनी एबॉट को रानी लक्ष्मीबाई की ओर से ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध जॉन लैंग द्वारा 1854 में किए गए कानूनी प्रयास से संबंधित स्मृति-चिह्न भेंट किया और जॉन लैंग के भारत से जुड़े ऐतिहासिक संबंधों का उल्लेख किया।
यहां एक तथ्यात्मक सावधानी आवश्यक है। सार्वजनिक विवरणों में कहीं इस उपहार को रानी लक्ष्मीबाई की ओर से जॉन लैंग द्वारा प्रस्तुत याचिका से संबंधित बताया गया, जबकि प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़े फोटो विवरण में इसे जॉन लैंग के भारत से संबंध पर आधारित एक फोटो कोलाज के रूप में वर्णित किया गया है। इसलिए इतिहास के इस प्रसंग को लिखते समय यह कहना अधिक सटीक होगा कि प्रधानमंत्री मोदी ने जॉन लैंग और रानी लक्ष्मीबाई की ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई से जुड़े भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंध को विशेष रूप से स्मरण कराया और उसे कूटनीतिक सम्मान दिया।
लेकिन इसी बिंदु से सबसे बड़ा सवाल शुरू होता है। किसी भूले हुए ऐतिहासिक व्यक्तित्व को अंतरराष्ट्रीय मंच पर याद कर लेना निश्चय ही महत्वपूर्ण है, पर क्या केवल स्मरण ही पर्याप्त है? यदि जॉन लैंग को भारत और ऑस्ट्रेलिया के साझा इतिहास के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया था तो उसके बाद उस विरासत को संरक्षित करने, उसके दस्तावेजों को व्यवस्थित करने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए कौन-सी संस्थागत पहल हुई? इतिहास केवल भाषणों और उपहारों से जीवित नहीं रहता। इतिहास तब जीवित रहता है जब उसके दस्तावेज संरक्षित हों, उसके पात्रों पर शोध हो, उसके स्थलों की पहचान बनी रहे और उसकी कहानी शिक्षा तथा सार्वजनिक चेतना का हिस्सा बने।
रानी लक्ष्मीबाई की कहानी केवल तलवार और रणभूमि की कहानी नहीं है
रानी लक्ष्मीबाई का नाम सुनते ही भारतीय जनमानस में एक वीर योद्धा की छवि उभरती है। घोड़े पर सवार रानी, युद्धभूमि में संघर्ष और अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध अदम्य प्रतिरोध की छवि भारतीय स्वतंत्रता चेतना का स्थायी हिस्सा है। लेकिन उनके जीवन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण परत ऐसी भी है, जिसे लोकप्रिय इतिहास ने अपेक्षाकृत कम स्थान दिया है। वह है उनकी कानूनी लड़ाई।
महाराजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद झांसी के उत्तराधिकार का प्रश्न केवल पारिवारिक नहीं रहा था। यह औपनिवेशिक सत्ता और भारतीय रियासतों के अधिकारों के बीच संघर्ष का प्रश्न बन गया। रानी लक्ष्मीबाई ने दत्तक पुत्र दामोदर राव के अधिकारों के आधार पर झांसी पर अपने शासनाधिकार को बनाए रखने का प्रयास किया। लेकिन लॉर्ड डलहौजी की हड़प नीति, जिसे Doctrine of Lapse के नाम से जाना गया, ने झांसी को ब्रिटिश सत्ता में मिलाने का रास्ता तैयार किया।
रानी लक्ष्मीबाई ने तत्काल युद्ध का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने पहले कानूनी रास्ता अपनाया। उन्होंने अपने अधिकारों के समर्थन में दस्तावेज और तर्क प्रस्तुत किए। इसी दौर में ऑस्ट्रेलियाई मूल के बैरिस्टर जॉन लैंग उनकी कानूनी लड़ाई से जुड़े। उपलब्ध ऐतिहासिक और अकादमिक संदर्भों में 1854 के दौरान रानी की ओर से गवर्नर जनरल को प्रस्तुत ज्ञापनों तथा जॉन लैंग की भूमिका का उल्लेख मिलता है।
यही तथ्य रानी लक्ष्मीबाई के व्यक्तित्व को और अधिक व्यापक बनाता है। वे केवल युद्धभूमि की नायिका नहीं थीं। वे अपने राज्य के अधिकारों के लिए संवैधानिक और कानूनी रास्ते का उपयोग करने वाली एक राजनीतिक शासक भी थीं। उन्होंने पहले न्याय की अपेक्षा की, तर्क रखा और कानून के माध्यम से अपने अधिकारों की रक्षा का प्रयास किया। जब औपनिवेशिक सत्ता ने उस रास्ते को बंद कर दिया, तब संघर्ष का इतिहास बदल गया।
इस दृष्टि से जॉन लैंग की भूमिका भारतीय स्वतंत्रता इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। वे उस दौर की औपनिवेशिक व्यवस्था के भीतर मौजूद एक ऐसे विदेशी बैरिस्टर थे, जिन्होंने भारतीय शासक के अधिकारों के पक्ष में कानूनी संघर्ष किया। यह तथ्य भारत के न्यायिक इतिहास, औपनिवेशिक इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन के अध्ययन में विशेष स्थान पाने योग्य है।
जॉन लैंग कौन थे और भारत से उनका रिश्ता इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
जॉन लैंग का जन्म 1816 में ऑस्ट्रेलिया में हुआ था। वे बैरिस्टर होने के साथ लेखक और पत्रकार भी थे। भारत में रहते हुए उन्होंने पत्रकारिता की और औपनिवेशिक समाज तथा ब्रिटिश प्रशासन के अनेक पक्षों पर लिखा। वे अपने समय के उन यूरोपीय मूल के व्यक्तियों में शामिल थे, जिनका भारत से संबंध केवल प्रशासनिक या औपनिवेशिक हितों तक सीमित नहीं था। उन्होंने भारतीय समाज को देखा, समझा और कई मामलों में औपनिवेशिक सत्ता के रवैये पर प्रश्न भी उठाए।
उनका भारत से संबंध इतना गहरा था कि उनका जीवन और मृत्यु दोनों भारतीय इतिहास की भूमि से जुड़े हुए हैं। वे भारत में रहे, यहीं सक्रिय रहे और उनकी कब्र भी भारत में है। इसीलिए जॉन लैंग को केवल “ऑस्ट्रेलियाई वकील” कह देना उनके ऐतिहासिक महत्व को सीमित कर देता है। वे भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच एक साझा ऐतिहासिक सेतु हैं।
आज भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंध रक्षा, व्यापार, शिक्षा, प्रौद्योगिकी और हिंद-प्रशांत रणनीति के आधार पर तेजी से मजबूत हो रहे हैं। लेकिन दोनों देशों के संबंधों की एक ऐसी ऐतिहासिक जड़ भी है, जिसके बारे में बहुत कम चर्चा होती है। जॉन लैंग उसी जड़ का हिस्सा हैं। एक ऑस्ट्रेलियाई नागरिक ने औपनिवेशिक भारत में एक भारतीय रानी के अधिकारों की रक्षा के लिए ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध कानूनी लड़ाई में भूमिका निभाई। यह केवल एक रोचक ऐतिहासिक प्रसंग नहीं है, बल्कि दोनों देशों के साझा इतिहास का महत्वपूर्ण प्रतीक है।
मोदी ने इतिहास को सम्मान दिया, लेकिन उसके बाद संस्थागत स्मृति क्यों नहीं बनी?
2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा जॉन लैंग और रानी लक्ष्मीबाई के ऐतिहासिक संबंध को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर याद किया जाना एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक संकेत था। इससे यह संदेश गया कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच संबंध केवल आधुनिक कूटनीति से नहीं बने हैं, बल्कि उनका एक साझा ऐतिहासिक अतीत भी है। भारत-ऑस्ट्रेलिया के आधिकारिक द्विपक्षीय संवाद में भी उस समय दोनों देशों के बढ़ते रणनीतिक संबंधों को नई दिशा दी जा रही थी।
लेकिन इस सम्मान के बाद क्या हुआ? यही प्रश्न आज सबसे महत्वपूर्ण है।
सार्वजनिक रूप से ऐसा कोई व्यापक राष्ट्रीय कार्यक्रम स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता जिसमें जॉन लैंग और रानी लक्ष्मीबाई के कानूनी संघर्ष को भारत-ऑस्ट्रेलिया साझा विरासत परियोजना के रूप में विकसित किया गया हो। क्या इस विषय पर दोनों देशों के विश्वविद्यालयों के बीच संयुक्त शोध हुआ? क्या जॉन लैंग के उपलब्ध दस्तावेजों का डिजिटल संग्रह तैयार किया गया? क्या मसूरी स्थित उनकी कब्र को अंतरराष्ट्रीय विरासत स्थल के रूप में विकसित करने की कोई ठोस परियोजना बनी? क्या झांसी और मसूरी को जोड़ते हुए कोई ऐतिहासिक विरासत मार्ग बनाया गया?
इन प्रश्नों का सार्वजनिक उत्तर उतना स्पष्ट नहीं है, जितना 2014 की घटना का स्मरण।
यहां यह कहना उचित नहीं होगा कि किसी ने जानबूझकर इस विषय को दबा दिया या “ठंडे बस्ते में डाल दिया”, जब तक उसके समर्थन में स्पष्ट दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध न हों। लेकिन यह प्रश्न अवश्य उठाया जा सकता है कि यदि इतिहास को इतनी प्रमुखता से अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया गया था, तो उसके बाद उसकी संस्थागत निरंतरता सार्वजनिक रूप से क्यों दिखाई नहीं देती?
स्मरण और संरक्षण में यही अंतर है। स्मरण एक क्षण हो सकता है, लेकिन संरक्षण एक प्रक्रिया है। उपहार एक प्रतीक हो सकता है, लेकिन शोध संस्थान इतिहास को भविष्य तक पहुंचाता है। भाषण प्रेरणा दे सकता है, लेकिन अभिलेखागार प्रमाण बचाता है।
मसूरी में जॉन लैंग की कब्र और इतिहास की दूसरी लड़ाई
जॉन लैंग की कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उनकी कब्र से जुड़ा है। मसूरी के कैमल्स बैक रोड क्षेत्र में स्थित पुराने कब्रिस्तान में उनकी कब्र लंबे समय तक सामान्य सार्वजनिक चेतना से लगभग बाहर रही। बाद में इस कब्र की पहचान और उसके ऐतिहासिक महत्व ने जॉन लैंग को फिर से चर्चा में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उपलब्ध प्रकाशित विवरणों के अनुसार प्रसिद्ध लेखक रस्किन बॉन्ड ने 1960 के दशक में जॉन लैंग की कब्र की खोज और पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पुराने कब्रिस्तान में झाड़ियों और समय की परतों के बीच दबे इतिहास को खोजने की यह कहानी स्वयं इस बात का उदाहरण है कि यदि शोध और स्मृति का काम न किया जाए तो कितने महत्वपूर्ण व्यक्ति सार्वजनिक चेतना से गायब हो सकते हैं।
इसलिए इतिहास लेखन में तथ्यात्मक श्रेय का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। जॉन लैंग की कब्र की मूल खोज और पहचान के संदर्भ में उपलब्ध सार्वजनिक विवरणों में रस्किन बॉन्ड की भूमिका प्रमुख रूप से सामने आती है। वहीं यदि डॉ. अनिल दीक्षित ने जॉन लैंग के जीवन, उनकी कब्र, रानी लक्ष्मीबाई के मुकदमे या संबंधित दस्तावेजों पर स्वतंत्र और गहन शोध किया है, तो उस शोध का महत्व अलग से समझा और प्रमाणित किया जाना चाहिए।
यहां असली प्रश्न किसी एक व्यक्ति को श्रेय देने भर का नहीं है। असली प्रश्न यह है कि इतिहास की खोज करने वाले लोग आखिर किस व्यवस्था से जुड़ते हैं? कोई लेखक कब्र खोजता है, कोई शोधकर्ता दस्तावेज ढूंढता है, कोई स्थानीय इतिहासकार भूले हुए स्थानों को चिन्हित करता है और कोई पत्रकार उन तथ्यों को जनता तक पहुंचाता है। लेकिन यदि इन सभी प्रयासों को जोड़कर कोई संस्थागत संरचना नहीं बनती, तो इतिहास हर पीढ़ी में फिर से खो जाता है और हर पीढ़ी को उसे दोबारा खोजने के लिए मेहनत करनी पड़ती है।
डॉ. अनिल दीक्षित का शोध आज किस काम का हो सकता है?
यही वह प्रश्न है जिसे सबसे गंभीरता से पूछा जाना चाहिए। यदि डॉ. अनिल दीक्षित ने जॉन लैंग और रानी लक्ष्मीबाई के कानूनी संघर्ष से जुड़े इतिहास पर शोध किया है, दस्तावेज खोजे हैं, कब्र और स्मृति-स्थलों के संबंध में महत्वपूर्ण तथ्य जुटाए हैं अथवा इस भूले हुए अध्याय को नए सिरे से सामने लाने का कार्य किया है, तो उस शोध का उपयोग केवल समाचार लेख, समारोह या व्यक्तिगत सम्मान तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
ऐसा शोध सबसे पहले रानी लक्ष्मीबाई के इतिहास के पुनर्पाठ में उपयोगी हो सकता है। भारतीय समाज ने रानी को उनकी वीरता के कारण अमर स्मृति दी है, लेकिन उनके कानूनी और राजनीतिक संघर्ष को भी उतनी ही गंभीरता से समझने की आवश्यकता है। स्कूलों और विश्वविद्यालयों में रानी लक्ष्मीबाई की कहानी केवल 1857 की युद्धभूमि से शुरू नहीं होनी चाहिए। उसमें यह भी शामिल होना चाहिए कि उन्होंने औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध पहले न्यायिक और कानूनी उपायों का सहारा लिया था।
डॉ. अनिल दीक्षित जैसे शोधकर्ताओं द्वारा संकलित सामग्री भारत के औपनिवेशिक न्यायिक इतिहास के अध्ययन में भी उपयोगी हो सकती है। सामान्यतः औपनिवेशिक कानून की चर्चा इस रूप में होती है कि अंग्रेजों ने भारत में कौन-कौन से कानून लागू किए। लेकिन यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि भारतीय समाज, शासकों और आम लोगों ने उसी औपनिवेशिक न्याय व्यवस्था का उपयोग ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने के लिए कैसे किया। रानी लक्ष्मीबाई और जॉन लैंग का प्रसंग इसी प्रकार के अध्ययन का महत्वपूर्ण उदाहरण हो सकता है।
यह शोध भारत और ऑस्ट्रेलिया के साझा सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने में भी उपयोगी हो सकता है। आज दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी है, लेकिन सांस्कृतिक कूटनीति में जॉन लैंग जैसा चरित्र असाधारण संभावना रखता है। मसूरी, झांसी और ऑस्ट्रेलिया के ऐतिहासिक स्थलों को जोड़कर एक साझा विरासत परियोजना बनाई जा सकती है। विश्वविद्यालयों के बीच शोध कार्यक्रम, छात्रों के लिए इतिहास आदान-प्रदान कार्यक्रम और डिजिटल प्रदर्शनी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
क्या जॉन लैंग की कब्र केवल एक कब्र है या एक अंतरराष्ट्रीय विरासत स्थल?
मसूरी में जॉन लैंग की कब्र को केवल स्थानीय कब्रिस्तान का एक पुराना पत्थर मानना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। वह स्थान भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के एक कम चर्चित अध्याय, औपनिवेशिक न्याय व्यवस्था और भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंधों के इतिहास का संगम है।
कल्पना कीजिए कि मसूरी में एक छोटा लेकिन आधुनिक विरासत एवं व्याख्या केंद्र स्थापित हो, जिसमें जॉन लैंग का जीवन, उनका साहित्य, पत्रकारिता, भारत में उनका समय, रानी लक्ष्मीबाई के कानूनी संघर्ष और 1857 से पहले की राजनीतिक परिस्थितियों को दस्तावेजों, प्रतिकृतियों और डिजिटल माध्यमों के जरिए प्रस्तुत किया जाए। ऐसा केंद्र केवल पर्यटन स्थल नहीं होगा, बल्कि सार्वजनिक इतिहास का एक जीवंत केंद्र बन सकता है।
मसूरी के पुराने कब्रिस्तानों में औपनिवेशिक काल के अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तियों की स्मृतियां मौजूद हैं और इनके संरक्षण को लेकर समय-समय पर चिंता भी व्यक्त की जाती रही है। जॉन लैंग का मामला इसलिए अलग महत्व रखता है क्योंकि उनकी स्मृति सीधे भारतीय स्वतंत्रता इतिहास के एक महत्वपूर्ण पात्र से जुड़ती है।
रानी लक्ष्मीबाई की याचिका और डिजिटल इतिहास की आवश्यकता
21वीं सदी में किसी ऐतिहासिक दस्तावेज का महत्व केवल उसके किसी अभिलेखागार में सुरक्षित होने तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसे डिजिटल रूप में भी सुरक्षित और सुलभ होना चाहिए। भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार में औपनिवेशिक काल से जुड़े विशाल रिकॉर्ड मौजूद हैं और शोधकर्ताओं के लिए अनेक ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध हैं।
ऐसे में रानी लक्ष्मीबाई के उत्तराधिकार विवाद, झांसी के विलय, उनके ज्ञापनों, जॉन लैंग के पत्राचार और ब्रिटिश प्रशासन की प्रतिक्रियाओं से जुड़े उपलब्ध दस्तावेजों का एक व्यवस्थित डिजिटल संग्रह बनाया जा सकता है। इस परियोजना का लाभ केवल इतिहासकारों को नहीं होगा। कानून के विद्यार्थी, शोधकर्ता, पत्रकार और आम नागरिक भी भारत के उस दौर को प्रमाणों के आधार पर समझ सकेंगे।
डिजिटल संग्रह की आवश्यकता इसलिए भी है क्योंकि इतिहास से जुड़े लोकप्रिय दावे अक्सर समय के साथ बदल जाते हैं। किसी घटना के बारे में अखबारों में अलग विवरण मिलता है, राजनीतिक भाषणों में अलग संदर्भ आता है और सोशल मीडिया पर तथ्य और कल्पना का मिश्रण हो जाता है। ऐसे में मूल दस्तावेजों की उपलब्धता ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।
शोधकर्ताओं की मेहनत का सम्मान आखिर किसे कहते हैं?
भारत में इतिहास पर शोध करने वालों के सामने अक्सर सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि उनका काम पुस्तकालयों, व्यक्तिगत संग्रहों और छोटे अकादमिक दायरों से बाहर नहीं निकल पाता। किसी शोधकर्ता ने यदि वर्षों तक किसी भूले हुए व्यक्ति पर काम किया, दस्तावेज खोजे, स्थलों का अध्ययन किया और नई जानकारी सामने लाई, तो उस शोध को सार्वजनिक उपयोग में लाना भी उतना ही जरूरी है जितना उसका प्रकाशन।
डॉ. अनिल दीक्षित के शोध से जुड़ा प्रश्न भी इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यदि उनके पास जॉन लैंग और रानी लक्ष्मीबाई की कानूनी लड़ाई से संबंधित महत्वपूर्ण शोध सामग्री है, तो उसका व्यवस्थित दस्तावेजीकरण, सहकर्मी समीक्षा, प्रकाशन और डिजिटल संरक्षण होना चाहिए। इससे एक शोधकर्ता का काम व्यक्तिगत दायरे से निकलकर राष्ट्रीय ज्ञान-संपदा का हिस्सा बन सकता है।
इतिहास के शोध का असली सम्मान केवल पुरस्कार देना नहीं है। असली सम्मान तब होता है जब उस शोध के आधार पर नई पीढ़ी पढ़ती है, नए शोध शुरू होते हैं, संग्रहालय बनते हैं, दस्तावेज संरक्षित होते हैं और समाज अपने अतीत को अधिक प्रमाणिक ढंग से समझता है।
भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंधों में जॉन लैंग एक अनदेखी सांस्कृतिक कड़ी
भारत और ऑस्ट्रेलिया आज जिन मुद्दों पर साथ खड़े हैं, वे मुख्यतः वर्तमान और भविष्य से जुड़े हैं। लेकिन मजबूत संबंधों की जड़ें अक्सर साझा अतीत में होती हैं। जॉन लैंग की कहानी दोनों देशों के लिए ऐसी ही एक सांस्कृतिक कड़ी है।
ऑस्ट्रेलिया के लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि उसका एक प्रारंभिक साहित्यकार और बैरिस्टर भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण भूमिका से जुड़ा था। भारत के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि स्वतंत्रता संघर्ष का इतिहास केवल भारतीय और ब्रिटिश पात्रों तक सीमित नहीं था। उसमें ऐसे विदेशी भी थे, जिन्होंने औपनिवेशिक सत्ता के बावजूद न्याय और अधिकार के पक्ष में भूमिका निभाई।
2014 में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा जॉन लैंग को याद करना इसी साझा विरासत की संभावना का संकेत था। लेकिन अब आवश्यकता उस संकेत को स्थायी परियोजना में बदलने की है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच संयुक्त रूप से जॉन लैंग पर शोध छात्रवृत्ति, वार्षिक व्याख्यान श्रृंखला, दस्तावेजी प्रदर्शनी और विरासत परियोजना शुरू की जा सकती है।
इतिहास को याद करना और इतिहास को बचाना दो अलग बातें हैं
यहीं इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आता है। इतिहास को याद करना आसान है। किसी महत्वपूर्ण तिथि पर भाषण दिया जा सकता है, किसी विदेशी अतिथि को स्मृति-चिह्न दिया जा सकता है और किसी ऐतिहासिक व्यक्ति का उल्लेख किया जा सकता है। लेकिन इतिहास को बचाना कठिन है।
इतिहास को बचाने के लिए दस्तावेज चाहिए। दस्तावेजों के लिए अभिलेखागार चाहिए। अभिलेखागार के लिए संरक्षण चाहिए। संरक्षण के लिए संस्थागत इच्छाशक्ति चाहिए। और संस्थागत इच्छाशक्ति के लिए यह स्वीकार करना पड़ता है कि इतिहास केवल अतीत की वस्तु नहीं, बल्कि भविष्य की बौद्धिक संपत्ति है।
जॉन लैंग की कहानी इसी परीक्षा पर खड़ी है। 2014 में उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच पर सम्मान मिला। लेकिन क्या उनके बारे में भारत के विद्यार्थी पहले से अधिक जानते हैं? क्या रानी लक्ष्मीबाई की कानूनी लड़ाई अब पाठ्यक्रमों का प्रमुख हिस्सा है? क्या उनकी कब्र राष्ट्रीय विरासत विमर्श में प्रमुख स्थान रखती है? क्या जॉन लैंग से संबंधित दस्तावेज आम शोधकर्ताओं की पहुंच में हैं?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर अभी भी संतोषजनक नहीं है, तो हमें केवल अतीत पर गर्व करने के बजाय अपनी वर्तमान जिम्मेदारी पर विचार करना होगा।
अब सवाल यह नहीं कि जॉन लैंग को किसने खोजा, सवाल यह है कि भारत उन्हें कहां ले जाएगा
जॉन लैंग की लगभग भुला दी गई कब्र की खोज और पहचान से लेकर 2014 में प्रधानमंत्री स्तर पर उनके ऐतिहासिक योगदान के स्मरण तक की यात्रा बताती है कि इतिहास बार-बार हमारे सामने लौटकर आता है। लेकिन हर बार इतिहास को पहचान लेने के बाद हम उसके साथ क्या करते हैं, यही हमारी सभ्यता की स्मृति को तय करता है।
डॉ. अनिल दीक्षित जैसे शोधकर्ताओं के काम का महत्व भी इसी प्रश्न में निहित है। यदि शोध केवल शोधकर्ता की फाइलों, व्यक्तिगत संग्रह या सीमित प्रकाशनों में बंद रह जाए तो उसका सामाजिक प्रभाव सीमित रहेगा। लेकिन यदि वही शोध दस्तावेजी प्रमाणों के साथ सार्वजनिक ज्ञान का हिस्सा बन जाए, तो वह इतिहास को बदल सकता है।
आज जरूरत है कि जॉन लैंग की कहानी को एक बार फिर गंभीरता से उठाया जाए। रानी लक्ष्मीबाई की कानूनी लड़ाई पर उपलब्ध सभी प्रमाणों का व्यवस्थित अध्ययन हो। जॉन लैंग से संबंधित दस्तावेजों का पता लगाया जाए। मसूरी स्थित उनकी कब्र के संरक्षण और व्याख्या की व्यवस्था हो। झांसी और मसूरी के ऐतिहासिक संबंधों को नए सिरे से समझा जाए। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच साझा विरासत परियोजना विकसित हो।
2014 में उठाया गया इतिहास का प्रश्न 2026 में जवाब मांग रहा है
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 में ऑस्ट्रेलिया की धरती पर जॉन लैंग और रानी लक्ष्मीबाई के ऐतिहासिक संबंध को याद करके एक महत्वपूर्ण संदेश दिया था। उस संदेश में भारत के गौरव, इतिहास की स्मृति और दो देशों के साझा अतीत—तीनों की संभावना मौजूद थी। लेकिन इतिहास का सम्मान तभी पूरा माना जाएगा जब उस स्मृति को शोध, दस्तावेजीकरण, संरक्षण और शिक्षा से जोड़ा जाए।
आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि 2014 में जिस इतिहास को अंतरराष्ट्रीय मंच पर सम्मान मिला, वह उसके बाद संस्थागत रूप से कितना आगे बढ़ा? यदि जॉन लैंग की कहानी और रानी लक्ष्मीबाई की कानूनी लड़ाई फिर से केवल पुरानी खबरों और कुछ शोधकर्ताओं की मेहनत तक सीमित रह गई, तो यह केवल इतिहास की उपेक्षा नहीं होगी, बल्कि उस ज्ञान-संपदा का नुकसान होगा जिसे खोजने में पीढ़ियों ने समय लगाया है।
डॉ. अनिल दीक्षित का शोध भी इसी कसौटी पर देखा जाना चाहिए। यदि उनका शोध प्रमाणों और दस्तावेजों के आधार पर इस भूले हुए इतिहास को नई रोशनी देता है, तो उसे व्यापक राष्ट्रीय विमर्श, अकादमिक अध्ययन और सार्वजनिक अभिलेखों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। शोध की उपयोगिता तभी सिद्ध होती है जब वह समाज की स्मृति को समृद्ध करे।
रानी लक्ष्मीबाई ने पहले कानून का दरवाजा खटखटाया था और फिर इतिहास ने उन्हें रणभूमि तक पहुंचाया। जॉन लैंग उस कानूनी संघर्ष के महत्वपूर्ण पात्र थे। उनकी कब्र हमें याद दिलाती है कि इतिहास के बड़े पात्र भी कभी-कभी झाड़ियों और विस्मृति के नीचे दब जाते हैं। 2014 की घटना ने उन्हें फिर एक बार दुनिया के सामने ला दिया था। अब प्रश्न यह है कि क्या हम उन्हें फिर से भूलने देंगे या उस स्मृति को एक स्थायी ऐतिहासिक विरासत में बदलेंगे?
सवाल किसी पुराने उपहार का नहीं है। सवाल उस इतिहास का है जिसे एक प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर सम्मान दिया, शोधकर्ताओं ने वर्षों की मेहनत से खोजा और फिर भी जिसे हमारी राष्ट्रीय स्मृति में वह स्थान नहीं मिला, जिसका वह अधिकारी है।
Author: यायावर
यायावर

























