संजय सिंह राणा की रिपोर्ट
चित्रकूट। बुंदेलखंड और विंध्य क्षेत्र की दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बीच रहने वाला कोल आदिवासी समाज आज भी विकास की मुख्यधारा से जुड़ने के लिए संघर्ष करता दिखाई दे रहा है। जिले के पठारी क्षेत्र मानिकपुर और बरगढ़ में कोल आदिवासी समाज की बड़ी आबादी निवास करती है। सरकार की ओर से आदिवासी और गरीब परिवारों के उत्थान के लिए तमाम योजनाएं संचालित किए जाने के बावजूद जमीनी स्तर पर इन योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक पहुंचने को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।
मानिकपुर विकासखंड की कई ग्राम पंचायतों में कोल समाज के लोग मूलभूत सुविधाओं, रोजगार, आवास, पेंशन, सड़क और सुरक्षित आवागमन जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत स्तर पर योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता की कमी के कारण पात्र लोगों को सरकारी योजनाओं का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है। ग्राम पंचायत ऊंचाडीह के मजरे चमरौंहा में स्थिति इन समस्याओं की गंभीरता को सामने लाती है।
पंचायत व्यवस्था पर ग्रामीणों ने उठाए सवाल
ग्रामीणों के मुताबिक कुछ ग्राम पंचायतों में कोल आदिवासी समाज के लोग ग्राम प्रधान निर्वाचित तो होते हैं, लेकिन पंचायत के वास्तविक कामकाज में प्रधान प्रतिनिधियों या अन्य प्रभावशाली लोगों की भूमिका अधिक रहती है। ग्रामीणों का आरोप है कि विकास कार्यों और सरकारी योजनाओं से संबंधित निर्णयों में निर्वाचित प्रतिनिधियों की स्वतंत्र भूमिका सीमित हो जाती है।
कुछ ग्रामीणों का यह भी कहना है कि यदि कोई प्रधान पंचायत के कामकाज या कथित अनियमितताओं का विरोध करता है तो उसे कार्रवाई का भय दिखाकर चुप कराने का प्रयास किया जाता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। ऐसे मामलों में संबंधित विभागीय अधिकारियों द्वारा निष्पक्ष जांच और अभिलेखों की पड़ताल से ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
ऊंचाडीह पंचायत में विकास योजनाओं को लेकर शिकायतें
मानिकपुर ब्लॉक की ग्राम पंचायत ऊंचाडीह के मजरे चमरौंहा में ग्रामीणों ने पंचायत स्तर पर विकास योजनाओं को लेकर कई शिकायतें सामने रखी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सरकार की ओर से गरीब और वंचित परिवारों के लिए आवास, पेंशन तथा अन्य कल्याणकारी योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन पात्र परिवारों तक इनका लाभ पहुंचने में कठिनाई हो रही है।
ग्रामीणों का आरोप है कि ग्राम प्रधान प्रतिनिधि और सचिव की कथित मनमानी के कारण जरूरतमंद परिवारों को योजनाओं का लाभ पाने के लिए बार-बार पंचायत कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत में पात्रता रखने वाले लोगों की समस्याओं का समय पर समाधान नहीं किया जाता।
इन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए पंचायत से जुड़े सरकारी अभिलेखों, लाभार्थी सूची, भुगतान विवरण और कार्यों के अभिलेखों की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि शिकायतें सही पाई जाती हैं तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए और यदि आरोप तथ्यहीन हों तो प्रशासन को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
बरदहा नदी का रपटा बना ग्रामीणों की सबसे बड़ी परेशानी
चमरौंहा मजरे में बरदहा नदी पर बना रपटा ग्रामीणों के लिए लंबे समय से परेशानी का कारण बना हुआ है। बरसात के दिनों में नदी का जलस्तर बढ़ने के बाद यह मार्ग प्रभावित हो जाता है। ग्रामीणों के अनुसार बाढ़ की स्थिति में कई गांवों का संपर्क बाधित हो जाता है और लोगों को आवागमन के लिए काफी परेशानी उठानी पड़ती है।
बरदहा नदी का यह रास्ता उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच आवागमन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बताया जाता है। ऐसे में यहां स्थायी पुल का निर्माण स्थानीय ग्रामीणों के लिए केवल सुविधा का विषय नहीं बल्कि संपर्क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और व्यापार से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल है।
ग्रामीण बताते हैं कि बरसात के दौरान नदी में पानी बढ़ जाने पर लोगों को कई दिनों तक आवागमन सामान्य होने का इंतजार करना पड़ता है। सबसे अधिक परेशानी बुजुर्गों, महिलाओं, बच्चों, बीमार लोगों और दैनिक मजदूरी पर निर्भर परिवारों को होती है।
कई बार पुल निर्माण की मांग की गई
स्थानीय लोगों का कहना है कि बरदाहा नदी पर स्थाई पुल निर्माण की मांग लंबे समय से चल रही है। रिवाल्वर ने अपनी समस्या को शासन-प्रशासन और राजनिति तक का प्रयास किया है। उनका कहना है कि कई बार अधिकारियों और कर्मचारियों से पुल निर्माण की मांग की गई, लेकिन समस्या का समाधान अब तक नहीं हो सका।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि बरदहा नदी पर पुल बन जाए तो बरसात के मौसम में संपर्क टूटने की समस्या काफी हद तक समाप्त हो सकती है। इससे आसपास के गांवों के लोगों को बाजार, विद्यालय, स्वास्थ्य केंद्र और अन्य आवश्यक सेवाओं तक पहुंचने में भी सुविधा होगी।
यह मामला केवल सड़क और पुल निर्माण तक सीमित नहीं है। किसी भी ग्रामीण क्षेत्र में बेहतर संपर्क मार्ग विकास की बुनियादी शर्त माना जाता है। जब बरसात के दौरान किसी गांव का संपर्क बाधित होता है तो इसका सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और दैनिक जीवन पर पड़ता है।
आवास योजना में पैसे मांगने का आरोप
चमरौंहा के एक ग्रामीण ने ग्राम प्रधान प्रतिनिधि पर गंभीर आरोप लगाए हैं। ग्रामीण का दावा है कि प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ दिलाने के नाम पर कथित तौर पर पांच हजार रुपये की मांग की गई। ग्रामीण के अनुसार उसे कहा गया कि यदि निर्धारित रकम नहीं दी गई तो आवास योजना का लाभ नहीं मिल सकेगा।
ग्रामीण ने यह भी आरोप लगाया कि आवास के नाम पर पैसे दिए जाने के बावजूद मजदूरी से संबंधित भुगतान को लेकर भी परेशानी हुई। उसका कहना है कि जब पंचायत प्रतिनिधियों और सचिव से भुगतान के संबंध में जानकारी मांगी गई तो कथित रूप से डांट-डपट कर वहां से जाने के लिए कहा गया।
यह आरोप बेहद गंभीर प्रकृति का है। हालांकि इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। यदि किसी सरकारी आवास योजना के लाभार्थी से अवैध रूप से धन की मांग की गई है तो यह जांच का विषय है। प्रशासन को ऐसे मामलों में शिकायतकर्ता के बयान, लाभार्थी सूची, आवास की स्वीकृति, किस्तों के भुगतान और संबंधित पंचायत अभिलेखों की जांच करनी चाहिए।
दिव्यांग और बुजुर्ग महिला को पेंशन की प्रतीक्षा
ग्राम पंचायत क्षेत्र की एक गरीब दिव्यांग बुजुर्ग महिला ने भी पेंशन योजना का लाभ नहीं मिलने की शिकायत की है। महिला के अनुसार उसने ग्राम प्रधान प्रतिनिधि और सचिव से कई बार पेंशन दिलाए जाने की मांग की, लेकिन उसकी समस्या का समाधान नहीं हुआ।
पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का उद्देश्य ही उन लोगों को आर्थिक सहारा देना है जो उम्र, दिव्यांगता या आर्थिक कमजोरी के कारण नियमित आय अर्जित करने में सक्षम नहीं हैं। ऐसे में पात्र व्यक्ति यदि किसी कारण से योजना से बाहर रह जाता है तो उसकी स्थिति की जांच करना प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है।
महिला की शिकायत के मामले में पात्रता, आवेदन की स्थिति और बैंक खाते से जुड़े विवरणों की जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाई जा सकती है। यदि वह पात्र है तो नियमानुसार उसे योजना का लाभ दिलाना आवश्यक है।
योजनाओं की सफलता का पैमाना जमीन पर दिखने वाला बदलाव
सरकारी योजनाओं की घोषणाएं और बजट तभी सार्थक माने जा सकते हैं जब उनका लाभ अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुंचे। कोल आदिवासी समाज जैसे वंचित समुदायों के लिए यह आवश्यकता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
आवास, पेंशन, सड़क, पुल, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा जैसी सुविधाएं किसी भी नागरिक के लिए बुनियादी जरूरत हैं। यदि किसी दूरस्थ गांव में रहने वाला व्यक्ति इन सुविधाओं से लगातार वंचित रहता है तो विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर दिखाई देने लगता है।
मानिकपुर और बरगढ़ के पठारी क्षेत्रों में भौगोलिक कठिनाइयां पहले से ही विकास के रास्ते में चुनौती हैं। ऐसे में पंचायत स्तर पर पारदर्शी व्यवस्था, नियमित निरीक्षण और योजनाओं की सामाजिक निगरानी की आवश्यकता और बढ़ जाती है।
प्रशासनिक जांच से सामने आ सकती है वास्तविक स्थिति
ग्राम पंचायत ऊंचाडीह और चमरौंहा के ग्रामीणों द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट के स्तर पर नहीं हुई है। इसलिए इन शिकायतों को आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए। संबंधित विभाग यदि शिकायतों की जांच कर पंचायत के विकास कार्यों, आवास योजना के लाभार्थियों, पेंशन प्रकरणों और भुगतान संबंधी अभिलेखों का परीक्षण करे तो वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
जरूरत इस बात की है कि शिकायतों को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय प्रशासनिक और तथ्यात्मक जांच के माध्यम से देखा जाए। यदि किसी स्तर पर अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई हो और यदि शिकायतों में तथ्य नहीं पाए जाते हैं तो प्रशासन ग्रामीणों को इसकी स्पष्ट जानकारी दे।
विकास की मुख्यधारा में शामिल होने का इंतजार
आजादी के दशकों बाद भी यदि किसी आदिवासी बहुल क्षेत्र के ग्रामीणों को बरसात में नदी पार करने, आवास पाने, पेंशन हासिल करने और पंचायत की योजनाओं का लाभ लेने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है तो यह स्थिति निश्चित रूप से गंभीर सवाल खड़े करती है।
कोल आदिवासी समाज की समस्याओं का समाधान केवल घोषणाओं से नहीं बल्कि गांव तक पहुंचने वाली योजनाओं, मजबूत आधारभूत ढांचे और जवाबदेह पंचायत व्यवस्था से संभव है। बरदहा नदी पर स्थायी पुल, बेहतर सड़क संपर्क, पारदर्शी आवास वितरण और पात्र बुजुर्ग-दिव्यांग लोगों को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
ग्रामीणों की अपेक्षा है कि शासन-प्रशासन उनकी समस्याओं को गंभीरता से ले और मौके पर जांच कर आवश्यक कार्रवाई करे। अब देखने वाली बात यह होगी कि वर्षों से बरदहा नदी पर पुल की प्रतीक्षा कर रहे ग्रामीणों और सरकारी योजनाओं का लाभ पाने के लिए संघर्ष कर रहे कोल आदिवासी परिवारों की आवाज जिम्मेदार अधिकारियों तक कब प्रभावी ढंग से पहुंचती है।













