रिपोर्ट: संजय सिंह राणा
चित्रकूट। मानिकपुर विकासखंड में संचालित ग्राम पंचायतों की गौशालाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। ग्राम पंचायतों में गौवंशों के रखरखाव, भरण-पोषण और संरक्षण के लिए शासन से मिलने वाली धनराशि में कथित कटौती, निरीक्षण एवं टैगिंग रिपोर्ट में कथित हेरफेर तथा गौशाला संचालकों पर दबाव बनाकर वसूली किए जाने के आरोप लगाते हुए जिलाधिकारी चित्रकूट से पूरे मामले की जांच कराने की मांग की गई है। यह शिकायत सामाजिक संगठन ‘चलो गांव की ओर जागरूकता अभियान चित्रकूट’ के संस्थापक एवं अध्यक्ष संजय सिंह राणा ने की है।
शिकायत में कहा गया है कि मानिकपुर विकासखंड में 54 से अधिक गौशालाएं संचालित हैं। इनमें कई गौशालाओं का संचालन ग्राम प्रधानों अथवा प्रशासकों के माध्यम से किया जा रहा है, जबकि कुछ गौशालाएं स्वयंसेवी संगठनों यानी एनजीओ द्वारा संचालित किए जाने की बात कही गई है। शिकायतकर्ता के अनुसार गौशालाओं में मौजूद गौवंशों के रखरखाव, टैगिंग तथा अन्य व्यवस्थाओं के संबंध में पशु चिकित्सा अधिकारी और संबंधित नोडल अधिकारी निरीक्षण के बाद रिपोर्ट तैयार कर मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी कार्यालय को भेजते हैं। आरोप है कि इसी रिपोर्ट के आधार पर गौशालाओं को मिलने वाली धनराशि में कटौती किए जाने की प्रक्रिया में कथित तौर पर अनियमितताएं हो रही हैं।
निरीक्षण रिपोर्ट और धनराशि में कटौती पर सवाल
शिकायत में सबसे गंभीर आरोप गौशालाओं के लिए निर्धारित धनराशि में कथित तौर पर मनमाने ढंग से कटौती किए जाने को लेकर लगाया गया है। संजय सिंह राणा का कहना है कि यदि किसी गौशाला के संबंध में पशु चिकित्सा अधिकारी की ओर से 30 प्रतिशत की कटौती दर्शाई जाती है, तो मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी कार्यालय में कथित तौर पर उससे अधिक कटौती कर दी जाती है। इससे गौशाला संचालकों के सामने गौवंशों के चारे, पानी, उपचार और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं को बनाए रखने में आर्थिक कठिनाई उत्पन्न होने की आशंका जताई गई है।
शिकायतकर्ता ने मांग की है कि गौशालाओं में वास्तविक रूप से मौजूद गौवंशों की संख्या, उनके टैग, निरीक्षण के समय की स्थिति, ब्लॉक स्तर से भेजी गई रिपोर्ट और मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी कार्यालय द्वारा स्वीकृत धनराशि का मिलान कराया जाए। यदि इन अलग-अलग स्तरों के अभिलेखों में अंतर मिलता है तो उसके आधार पर जिम्मेदारी तय करने की मांग की गई है।
एनजीओ संचालित गौशालाओं को लेकर भी उठे सवाल
शिकायत में मानिकपुर विकासखंड की उन गौशालाओं का भी उल्लेख किया गया है, जिनका संचालन स्वयंसेवी संगठनों द्वारा किए जाने की बात कही गई है। आरोप है कि इन गौशालाओं में उसी प्रकार की कटौती नहीं की जाती, जैसी अन्य गौशालाओं के मामले में कथित तौर पर की जा रही है। शिकायतकर्ता ने इस अंतर की भी निष्पक्ष जांच की मांग की है।
इसके अलावा ग्राम पंचायत गढ़चपा, ग्राम पंचायत ऊंचाडीह और ग्राम पंचायत अगरहुंडा की गौशालाओं का उदाहरण देते हुए शिकायत में कहा गया है कि इन गौशालाओं की धनराशि में कथित तौर पर उसी रिपोर्ट के आधार पर भुगतान किया जाता है, जो ब्लॉक स्तर से भेजी जाती है। शिकायतकर्ता ने सवाल उठाया है कि यदि अलग-अलग गौशालाओं के लिए रिपोर्ट और भुगतान की प्रक्रिया अलग तरीके से अपनाई जा रही है तो उसके पीछे निर्धारित नियम और प्रशासनिक आधार क्या है।
पशु चिकित्सा अधिकारी पर लगाए गंभीर आरोप
शिकायत में मानिकपुर ब्लॉक के पशु चिकित्सा अधिकारी बृजेन्द्र लोधी के खिलाफ भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। संजय सिंह राणा का आरोप है कि संबंधित अधिकारी कई गौशालाओं की डिमांड आगे नहीं बढ़ा रहे हैं और गौशाला संचालकों पर कथित रूप से दबाव बनाया जाता है। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि यदि कोई गौशाला संचालक उनकी कथित मांगों को स्वीकार नहीं करता, तो गौवंशों की टैगिंग, रखरखाव और भरण-पोषण संबंधी कमियां निकालकर धनराशि में कटौती कराने का प्रयास किया जाता है।
हालांकि ये आरोप शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए हैं। इनकी स्वतंत्र प्रशासनिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। ऐसे में मामले की वास्तविक स्थिति जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी। संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आने पर तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।
जांच में किन बिंदुओं का हो सकता है सत्यापन?
मामले की निष्पक्ष जांच होती है तो प्रत्येक गौशाला में मौजूद गौवंशों की संख्या और उनके टैग का भौतिक सत्यापन महत्वपूर्ण होगा। इसके साथ ही पिछले कई महीनों की निरीक्षण रिपोर्ट, नोडल अधिकारी की रिपोर्ट, पशु चिकित्सा अधिकारी की रिपोर्ट, ब्लॉक स्तर से भेजी गई डिमांड और मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी कार्यालय से जारी भुगतान का तुलनात्मक परीक्षण किया जा सकता है।
इसके अलावा यह भी जांच का विषय हो सकता है कि किसी गौशाला की रिपोर्ट में जितने गौवंश दर्ज किए गए, वास्तव में निरीक्षण के समय उतने गौवंश मौजूद थे या नहीं। यदि संख्या में अंतर पाया जाता है तो उसके कारणों का रिकॉर्ड से सत्यापन आवश्यक होगा। टैगिंग की स्थिति, बीमार अथवा मृत गौवंशों का विवरण, चारा-पानी की उपलब्धता और उपचार संबंधी अभिलेख भी जांच के दायरे में रखे जा सकते हैं।
गौशालाओं के लिए जारी धनराशि में कटौती यदि नियमों के अनुरूप की गई है तो उसके आधार, आदेश और अभिलेख भी सामने आने चाहिए। वहीं यदि कहीं नियमों से हटकर कटौती हुई है तो संबंधित अधिकारी या कर्मचारी की जिम्मेदारी निर्धारित की जा सकती है।
जिलाधिकारी से निष्पक्ष जांच की मांग
संजय सिंह राणा ने जिलाधिकारी चित्रकूट से पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी तथा संबंधित पशु चिकित्सा अधिकारियों की भूमिका की जांच कराने की मांग की है। उन्होंने कहा है कि गौशालाएं सीधे तौर पर गौवंश संरक्षण और ग्रामीण प्रशासन से जुड़ी महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं हैं। इसलिए इनके संचालन में पारदर्शिता और जवाबदेही बेहद आवश्यक है।
शिकायत की प्रतिलिपि चित्रकूटधाम मंडल बांदा के आयुक्त तथा चित्रकूट के मुख्य विकास अधिकारी को भी भेजी गई है। इससे मामले में उच्च स्तर पर संज्ञान लिए जाने की मांग की गई है।
गौशालाओं को मिलने वाली सरकारी धनराशि सार्वजनिक संसाधन है और उसका उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए होना चाहिए। इसलिए यदि निरीक्षण रिपोर्ट, टैगिंग, डिमांड अथवा भुगतान प्रक्रिया में किसी प्रकार की अनियमितता की शिकायत सामने आती है तो रिकॉर्ड आधारित जांच से स्थिति स्पष्ट की जा सकती है। विशेष रूप से अलग-अलग गौशालाओं के भुगतान में अंतर के कारणों का दस्तावेजी परीक्षण इस जांच को निर्णायक बना सकता है।
अब देखना यह है कि जिलाधिकारी स्तर से इस शिकायत पर क्या कार्रवाई होती है और क्या मानिकपुर विकासखंड की गौशालाओं का भौतिक सत्यापन कराकर निरीक्षण रिपोर्ट तथा भुगतान अभिलेखों का मिलान कराया जाता है। जांच होने पर ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि शिकायत में लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है और कहीं नियमों के विपरीत धनराशि की कटौती अथवा अन्य अनियमितता तो नहीं हुई।













