दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट
लखनऊ। कभी आईएएस बनने का सपना देखने वाला एक पढ़ाकू युवक आगे चलकर अपराध की दुनिया का ऐसा नाम बन गया, जिसकी कहानी में बदला, अपहरण, फिरौती, अंडरवर्ल्ड, विदेशों में फैले नेटवर्क और खूंखार गैंगवार के कई अध्याय जुड़ते चले गए। नाम था ओमप्रकाश श्रीवास्तव उर्फ बबलू श्रीवास्तव। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर से निकला यह नाम बाद में मुंबई के अंडरवर्ल्ड से लेकर नेपाल, दुबई और सिंगापुर तक चर्चा में रहा। बबलू को कई मामलों में किडनैपिंग नेटवर्क का प्रमुख चेहरा बताया गया और 1995 में सिंगापुर से गिरफ्तारी के बाद उसे भारत लाया गया।
आज कहानी का सबसे बड़ा उलटफेर यह है कि जिस शख्स का नाम कभी अपराध जगत की सनसनी हुआ करता था, वह लंबे समय से बरेली सेंट्रल जेल में उम्रकैद की सजा काट रहा है। 1993 के कस्टम अधिकारी एलडी अरोड़ा हत्याकांड में विशेष अदालत ने 2008 में उसे उम्रकैद की सजा सुनाई थी और बाद में उसकी सजा के खिलाफ अपील भी खारिज हो गई।
लेकिन बबलू की कहानी सिर्फ एक अपराधी के जेल पहुंचने की कहानी नहीं है। इसके भीतर एक ऐसा अतीत भी है जिसमें एक महत्वाकांक्षी छात्र, कॉलेज की राजनीति, दुश्मनी, कथित बदला, दाऊद इब्राहिम से नजदीकी और फिर दुश्मनी तक के किस्से जुड़े हैं। इसी कहानी में एक महिला का किरदार भी सामने आता है—अर्चना बालमुकुंद शर्मा, जिसे पुलिस और मीडिया के पुराने रिकॉर्ड में ‘लेडी डॉन’ तथा ‘किडनैपिंग क्वीन’ जैसे नामों से संबोधित किया गया।
आईएएस और फौजी बनने का सपना था, अपराध की दुनिया में कैसे पहुंचा बबलू?
बबलू श्रीवास्तव का बचपन किसी फिल्मी गैंगस्टर की पटकथा जैसा नहीं था। उपलब्ध पुराने विवरणों के मुताबिक वह पढ़ाई में अच्छा था और उसके भीतर सरकारी अधिकारी बनने की महत्वाकांक्षा थी। बाद में बड़े भाई के सेना में अधिकारी बनने के बाद उसके मन में भी फौज में जाने का सपना पैदा हुआ।
आगे की पढ़ाई के लिए वह लखनऊ पहुंचा। यहीं उसकी जिंदगी ने वह मोड़ लिया, जिसने आगे चलकर उसे अपराध की दुनिया तक पहुंचा दिया।
साल 1982 के आसपास लॉ कॉलेज की छात्र राजनीति के दौरान उसके दोस्त नीरज जैन ने चुनाव में महामंत्री पद के लिए नामांकन किया। बबलू उसके प्रचार में जुट गया। इसी दौरान कॉलेज में विरोधी गुटों के बीच झड़प हुई और एक छात्र चाकू लगने से घायल हो गया।
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। घायल छात्र के कथित तौर पर लखनऊ के प्रभावशाली अपराधी अरुण शंकर शुक्ला उर्फ अन्ना से जुड़े होने की बात सामने आई। बबलू को इस मामले में फंसाया गया और जेल जाना पड़ा—यह विवरण उसकी अपराध यात्रा के शुरुआती मोड़ के रूप में अक्सर सामने आता है।
यहीं से बबलू के भीतर बदले की भावना पैदा होने की बात कही जाती है।
अन्ना से दुश्मनी ने पहुंचाया दूसरे गैंग तक
लखनऊ की उस दौर की अपराध दुनिया में अन्ना का प्रभाव था। बबलू की मुलाकात अन्ना के विरोधी खेमे से जुड़े माफिया रामगोपाल मिश्र से हुई। इसके बाद धीरे-धीरे उसका झुकाव अपराध की तरफ बढ़ता गया।
बाद में अन्ना और रामगोपाल मिश्र के बीच समझौता हुआ तो बबलू ने अपना अलग रास्ता चुन लिया। यहीं से उसने अपना नेटवर्क खड़ा करना शुरू किया।
अपहरण और फिरौती उसके अपराध साम्राज्य का प्रमुख हिस्सा बन गए। यूपी से लेकर बिहार और महाराष्ट्र तक उसके नाम की चर्चा होने लगी। मीडिया और पुलिस रिकॉर्ड में उसे किडनैपिंग नेटवर्क के बड़े संचालकों में गिना जाने लगा।
बाद के वर्षों में उसके खिलाफ हत्या, अपहरण और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े अनेक मामले दर्ज हुए। सुप्रीम कोर्ट में दर्ज रिकॉर्ड के अनुसार वह 42 मामलों में वांछित था, जिनमें हत्या और अपहरण के मामले भी शामिल थे।
नेपाल से दुबई और फिर दाऊद इब्राहिम तक पहुंच
पुलिस की पकड़ मजबूत होने लगी तो बबलू भारत से बाहर निकल गया। नेपाल में उसका संपर्क माफिया नेटवर्क से हुआ और फिर वह दुबई पहुंचा।
दुबई में उसकी मुलाकात मिर्जा दिलशाद बेग के माध्यम से दाऊद इब्राहिम के नेटवर्क से होने की बात पुराने पुलिस एवं मीडिया रिकॉर्ड में मिलती है। एक समय बबलू को दाऊद के करीबियों में गिना गया, हालांकि बाद में दोनों के रिश्ते खराब होने की कहानी भी सामने आई।
दाऊद के नेटवर्क से जुड़ने के बाद बबलू का अपराध संसार और बड़ा हो गया। अपहरण के साथ तस्करी और हवाला जैसे अपराधों से उसके नाम को जोड़ा जाने लगा।
फिर आया 1993 का मुंबई धमाका कांड। दाऊद इब्राहिम का नाम इस मामले में सामने आने के बाद बबलू और दाऊद के रिश्तों में दरार की बातें सामने आईं। बबलू धीरे-धीरे दाऊद विरोधी धड़े से जुड़ गया। उसके साथ छोटा राजन के दाऊद से अलग होने की कहानी भी इसी दौर से जुड़ी बताई जाती है।
हालांकि अंडरवर्ल्ड के इन संबंधों के बारे में अलग-अलग समय में अलग-अलग दावे सामने आते रहे हैं। इसलिए हर दावे को निर्विवाद तथ्य मानना उचित नहीं है।
1995 में सिंगापुर एयरपोर्ट पर गिरफ्तारी ने बदल दी पूरी कहानी
अपराध की दुनिया में बबलू का नाम बढ़ता गया, लेकिन कानून से बच निकलने की उसकी कहानी ज्यादा लंबी नहीं चली।
21 अप्रैल 1995 को सिंगापुर एयरपोर्ट पर बबलू श्रीवास्तव को गिरफ्तार किया गया। भारत ने उसके प्रत्यर्पण की प्रक्रिया शुरू की और सिंगापुर से उसे भारत लाया गया। अदालत के रिकॉर्ड में भी उसकी सिंगापुर गिरफ्तारी और प्रत्यर्पण की तारीख दर्ज है।
भारत आने के बाद उसके खिलाफ कई गंभीर मामलों में मुकदमे चले। इनमें 1993 में कस्टम अधिकारी एलडी अरोड़ा की हत्या का मामला सबसे महत्वपूर्ण साबित हुआ।
30 सितंबर 2008 को विशेष टीएडीए अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उसकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा।
इसके बाद बबलू श्रीवास्तव की दुनिया बदल गई। बाहर कभी उसके नाम से खौफ पैदा होता था, लेकिन अब उसकी दुनिया जेल की ऊंची दीवारों और सुरक्षा घेरे तक सीमित हो गई।
जेल में भी खत्म नहीं हुई बबलू की चर्चा
बबलू के जेल पहुंचने के बाद भी उसके नाम से जुड़े विवाद खत्म नहीं हुए। 2015 में टाइम्स ऑफ इंडिया ने पुलिस के हवाले से रिपोर्ट किया था कि जेल में उससे मिलने वाले कुछ सहयोगियों के जरिए कथित तौर पर अपहरण की साजिश रची गई थी। हालांकि इस तरह के आरोपों को उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए और इन्हें उसकी अंतिम न्यायिक दोषसिद्धि के बराबर नहीं माना जा सकता।
अपराध की दुनिया में उसकी पुरानी पहुंच का अंदाजा इस बात से लगाया जाता रहा कि जेल में रहते हुए भी पुलिस और खुफिया एजेंसियां उसके नेटवर्क पर नजर रखती थीं।
पाकिस्तान ने हाफिज सईद पर हमले में लिया था बबलू का नाम
बबलू की कहानी का एक और बेहद विवादित अध्याय 2021 में सामने आया।
जून 2021 में लाहौर के जोहर टाउन इलाके में हाफिज सईद के घर के पास विस्फोट हुआ था। इसमें तीन लोगों की मौत हुई और 20 से ज्यादा लोग घायल हुए। बाद में पाकिस्तान के तत्कालीन गृह मंत्री राणा सनाउल्लाह ने इस हमले के पीछे भारत और बबलू श्रीवास्तव का नाम जोड़ते हुए आरोप लगाए।
लेकिन यहां एक बेहद महत्वपूर्ण बात है—यह पाकिस्तान सरकार का आरोप था, सिद्ध न्यायिक तथ्य नहीं। भारत ने पाकिस्तान के इस दावे को ‘बेबुनियाद प्रचार’ बताया था।
इसलिए बबलू को हाफिज सईद पर हमले का जिम्मेदार बताना तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि पाकिस्तान द्वारा लगाए गए आरोप के रूप में ही लिखा जाना चाहिए।
और फिर कहानी में आती है ‘लेडी डॉन’ अर्चना शर्मा
बबलू श्रीवास्तव की अपराध कथा का सबसे रहस्यमय महिला किरदार है अर्चना बालमुकुंद शर्मा।
उज्जैन के एक पुलिस परिवार में जन्मी अर्चना के बारे में पुराने पुलिस और मीडिया रिकॉर्ड बताते हैं कि उसके पिता बालमुकुंद शर्मा पुलिस विभाग में हेड कांस्टेबल थे। परिवार चाहता था कि वह पढ़-लिखकर अपना भविष्य बनाए। लेकिन अर्चना के सपने अलग थे।
उसे फिल्मों और ग्लैमर की दुनिया आकर्षित करती थी। वह मुंबई पहुंची और अभिनय तथा गायन की दुनिया में किस्मत आजमाने लगी। कुछ समय तक मंचीय कार्यक्रमों से जुड़ी रहने के बाद उसका संपर्क दुबई के अपराध नेटवर्क से हुआ।
पुराने रिकॉर्ड में यह भी मिलता है कि अर्चना ने फिल्मों में काम करने की कोशिश की और एक फिल्म में छोटा किरदार भी किया था। बाद में उसका नाम अपराध की दुनिया से जुड़ गया।
दुबई में मुलाकात, फिर अपराध का रास्ता
दुबई में अर्चना की मुलाकात इरफान गोगा जैसे अपराधियों से हुई। इसके बाद वह अपहरण और फिरौती के नेटवर्क में शामिल होती चली गई।
पुराने पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार इंदौर के कारोबारी जगदीश मोतीरमानी के अपहरण में भी अर्चना का नाम सामने आया। बाद में मुंबई के बिल्डर आरडी व्यास और अन्य लोगों के अपहरण से जुड़े मामलों में भी उसका नाम पुलिस जांच में आया।
यहीं से अर्चना को ‘किडनैपिंग क्वीन’ और ‘लेडी डॉन’ जैसे नाम मिलने लगे।
बबलू और अर्चना का रिश्ता: प्यार, भरोसा या अपराध का गठजोड़?
बबलू और अर्चना के रिश्ते को लेकर कई तरह की कहानियां सामने आती रही हैं। कुछ पुराने मीडिया रिकॉर्ड उन्हें प्रेम संबंध में बताते हैं, जबकि पुलिस से जुड़े विवरणों में दोनों को अपराध नेटवर्क के सहयोगी के रूप में पेश किया गया है।
2006 की एक रिपोर्ट में अर्चना को बबलू की करीबी और अपराध नेटवर्क की महत्वपूर्ण कड़ी बताया गया था। रिपोर्ट के अनुसार बबलू ने अपनी आत्मकथा ‘अधूरा ख्वाब’ में प्रेम और विश्वासघात से जुड़े अनुभव भी लिखे थे।
हालांकि सोशल मीडिया और हालिया लेखों में इस रिश्ते को लेकर कई सनसनीखेज दावे किए जाते हैं। इसलिए प्रेम संबंध से जुड़ी हर कहानी को प्रमाणित तथ्य मानना सही नहीं होगा।
अर्चना के नाम से जुड़े कई नाम और कई रहस्य
अर्चना के बारे में पुराने पुलिस और मीडिया रिकॉर्ड में मनीषा जैसे उपनामों का भी उल्लेख मिलता है। उसके अपराध नेटवर्क से जुड़े होने और फरार रहने की कहानी वर्षों पुरानी है।
उसकी गिरफ्तारी दिल्ली पुलिस द्वारा 1997 में किए जाने और बाद में जमानत पर बाहर आने का उल्लेख पुराने समाचारों में मिलता है। इसके बाद उसके फिर से फरार होने की बात सामने आई।
नेपाल में उसके मारे जाने की अटकलें भी समय-समय पर सामने आईं, लेकिन उसका शव कभी बरामद नहीं हुआ और उसकी मौत की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई। 2013 की टाइम्स ऑफ इंडिया रिपोर्ट के अनुसार उस समय भी खुफिया एजेंसियां उसे लापता मान रही थीं और रेड कॉर्नर नोटिस के बारे में रिपोर्ट किया गया था।
यानी अर्चना की कहानी आज भी सवाल बनकर खड़ी है—क्या वह मर चुकी है या किसी नए नाम के साथ कहीं छिपकर जिंदगी जी रही है?
बबलू की रिहाई का मुद्दा फिर क्यों उठा?
बबलू श्रीवास्तव की कहानी का सबसे नया महत्वपूर्ण अध्याय उसकी समयपूर्व रिहाई की कोशिश है।
वह वर्षों से जेल में है। 2016 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष भी उसकी रिहाई और रिमिशन का मुद्दा उठा था। अदालत ने उस समय यह स्पष्ट किया था कि दोषसिद्ध कैदी को रिहाई देना सामान्य नियम नहीं है और समाज की सुरक्षा जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना होगा।
इसके बाद भी समय-समय पर उसकी ओर से समयपूर्व रिहाई के लिए आवेदन किए गए।
नवंबर 2024 में यूपी सरकार ने उसकी एक समयपूर्व रिहाई की मांग खारिज कर दी थी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को उसकी रिहाई की मांग पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत विचार करने का निर्देश दिया। अदालत के सामने यह तथ्य भी रखा गया कि वह करीब 28 साल जेल में रह चुका है।
इसका अर्थ यह नहीं था कि सुप्रीम कोर्ट ने बबलू को रिहा करने का आदेश दे दिया था। अदालत ने रिहाई पर विचार करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने को कहा था।
यही अंतर इस कहानी को समझने में बेहद जरूरी है।
गाजीपुर के पढ़ाकू युवक से जेल की सलाखों तक
बबलू श्रीवास्तव की कहानी इसलिए भी विचलित करती है क्योंकि इसकी शुरुआत किसी खूंखार अपराधी के रूप में नहीं हुई थी।
एक ऐसा युवक जो पढ़ाई में तेज था, अधिकारी बनने का सपना देखता था, फिर परिस्थितियों, दोस्ती, दुश्मनी और अपराध के रास्ते पर बढ़ता गया—और अंततः वही व्यक्ति हत्या के मामले में उम्रकैद का कैदी बन गया।
अर्चना की कहानी भी इससे कम रहस्यमय नहीं है। उज्जैन की एक महत्वाकांक्षी युवती से लेकर मुंबई के ग्लैमर और फिर दुबई के अंडरवर्ल्ड तक उसका सफर अपराध की दुनिया में प्रवेश की एक अलग तस्वीर पेश करता है।
बबलू जेल में है। अर्चना का पता वर्षों से रहस्य बना हुआ है। दाऊद के साथ पुराने रिश्ते और बाद की दुश्मनी अंडरवर्ल्ड के इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं। हाफिज सईद मामले में पाकिस्तान के आरोपों ने उसके नाम को अंतरराष्ट्रीय विवादों तक पहुंचाया, हालांकि उन आरोपों को भारत ने खारिज किया था।
एक तरफ सलाखों के पीछे बंद डॉन बबलू श्रीवास्तव है, दूसरी तरफ रहस्यमय तरीके से गायब ‘लेडी डॉन’ अर्चना शर्मा। दोनों की कहानी यह बताती है कि अपराध की दुनिया में प्रवेश भले ही रोमांच और ताकत का भ्रम पैदा करे, लेकिन उसका अंत अक्सर जेल, मौत, फरारी या जिंदगी भर पीछा करते कानून में होता है।
और शायद यही इस पूरी दास्तान का सबसे बड़ा सबक है—जिस जिंदगी को कभी ताकत समझा गया, वही जिंदगी अंततः सलाखों के पीछे एक लंबी सजा बन गई।
संपादकीय नोट: बबलू की सिंगापुर गिरफ्तारी, प्रत्यर्पण, उम्रकैद और समयपूर्व रिहाई से जुड़े न्यायिक रिकॉर्ड अपेक्षाकृत स्पष्ट हैं। वहीं अर्चना शर्मा की कथित मौत, बबलू-अर्चना के निजी संबंध और कुछ हाई-प्रोफाइल अपहरणों से जुड़े विवरणों में अलग-अलग स्रोतों में अंतर है; इसलिए उन्हें लेख में आरोप/पुलिस दावे/पुराने मीडिया रिकॉर्ड के रूप में ही रखा गया है।

























