हो गया, मन गया हिंदी दिवस? 14 सितंबर के बाद हिंदी कहां रहती है!

हो गया मन गया हिंदी दिवस के वास्तविक अर्थ पर आधारित फीचर इमेज में प्रधानाचार्य मोहन द्विवेदी, प्रोफेसर डॉ. अनिल दीक्षित और संपादक अनिल अनूप

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अनिल अनूप

मन गया जी। हिंदी दिवस 2026, विश्वविद्यालय में मन गया। विद्यालय में मन गया। कहीं-कहीं समाहरणालय में भी मन गया। मंच सजा, माइक लगा, बच्चे तैयार हुए, शिक्षक बोले, अतिथियों ने हिंदी की महिमा गिनाई और तालियां भी बजीं।

लेकिन किसी अस्पताल में नहीं। म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के दफ्तर में नहीं। किसी रेलवे स्टेशन पर नहीं। किसी सरकारी काउंटर पर नहीं। और कितना गिनाएं? आपको भी पता है।

14 सितंबर को हिंदी के लिए माहौल बन जाता है। बैनर लग जाते हैं। भाषण शुरू हो जाते हैं। कविताएं पढ़ी जाती हैं। प्रतियोगिताएं होती हैं। हिंदी के सम्मान की बातें होती हैं। सोशल मीडिया पर हिंदी दिवस की शुभकामनाएं तैरने लगती हैं।

फिर 15 सितंबर की सुबह आती है। बैनर उतर जाता है। माइक बंद हो जाता है। कार्यक्रम की तस्वीरें फाइलों में चली जाती हैं और हिंदी फिर उसी सवाल के सामने खड़ी हो जाती है—क्या हिंदी दिवस केवल मनाने की चीज है या जीने की भी?

एक छोटी-सी फोन बातचीत और उससे निकला बड़ा सवाल

इसी सवाल के बीच एक दिन फोन पर प्रोफेसर डॉ. अनिल दीक्षित से बातचीत हुई। सवाल सीधा था—“हो गया, मन गया हिंदी दिवस?”

डॉ. अनिल दीक्षित की ओर से जवाब भी उतना ही सारगर्भित था। उनका कहना था कि हिंदी दिवस केवल एक दिन का उत्सव नहीं है। यह अवसर है कि हम पूरे साल हिंदी के प्रति अपनी जिम्मेदारी को देखें। अगर शिक्षा, प्रशासन, विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, साहित्य और रोजमर्रा के सार्वजनिक जीवन में हिंदी की स्थिति 14 सितंबर के बाद भी वैसी ही रहती है जैसी पहले थी, तो केवल एक दिन का आयोजन हिंदी दिवस की पूरी सार्थकता नहीं बन सकता।

फोन पर बातचीत समाप्त हुई। बात वहीं खत्म भी हो सकती थी। लेकिन कुछ सवाल ऐसे होते हैं जो फोन कटने के बाद भी दिमाग में चलते रहते हैं।

अभी इसी विषय पर सोच ही रहा था कि फोन फिर बजा। दूसरी तरफ जीएम एकेडमी, देवरिया के प्रधानाचार्य मोहन द्विवेदी जी थे। अपनी सहज चंचलता में सवाल निकल गया—“कैसा रहा हिंदी दिवस?”

उधर से आवाज आई—“बहुत बढ़िया सर। बच्चों ने खूब बढ़िया तैयारी की थी। खबर भी आपको प्रकाशनार्थ भेजा है सर।”

बात फिर छोटी थी। लेकिन सवाल फिर बड़ा था। बच्चों ने तैयारी की। कार्यक्रम हुआ। खबर बनी। खबर प्रकाशन के लिए भेजी गई। यानी हिंदी दिवस का एक जरूरी हिस्सा पूरा हुआ। लेकिन क्या कहानी यहीं पूरी हो जाती है?

हिंदी दिवस का वास्तविक अर्थ आखिर है क्या?

हिंदी दिवस का वास्तविक अर्थ केवल इतना नहीं कि 14 सितंबर को हिंदी के पक्ष में दो-चार भाषण कर दिए जाएं। इसका वास्तविक अर्थ तब सामने आता है जब हिंदी उस मंच से उतरकर जीवन में दिखाई देती है।

किसी बच्चे को अपनी बात हिंदी में कहने में संकोच न हो। किसी शिक्षक को हिंदी में पढ़ाने में हीनभावना न हो। किसी अभिभावक को यह न लगे कि अच्छी शिक्षा का मतलब केवल अंग्रेजी है। किसी मरीज को अस्पताल में मिलने वाली सूचना ऐसी भाषा में मिले जिसे वह आसानी से समझ सके। किसी यात्री को रेलवे स्टेशन पर जरूरी निर्देश समझने के लिए किसी दूसरी भाषा का सहारा न लेना पड़े।

किसी सरकारी कार्यालय में पहुंचा आम आदमी अपने काम की प्रक्रिया समझ सके। किसी किसान को कृषि संबंधी जानकारी उसकी समझ की भाषा में मिले। किसी मजदूर को सरकारी योजना की जानकारी ऐसे शब्दों में मिले जो उसके लिए पहेली न बन जाएं। तभी हिंदी दिवस मंच से निकलकर समाज तक पहुंचेगा। वरना एक दिन कार्यक्रम होगा और अगले दिन वही पुरानी व्यवस्था।

स्कूल में हिंदी दिवस, लेकिन स्कूल के बाहर हिंदी कितनी?

प्रधानाचार्य मोहन द्विवेदी जी का यह कहना कि बच्चों ने खूब तैयारी की थी, अपने आप में महत्वपूर्ण है। बच्चों का उत्साह हिंदी दिवस की सबसे अच्छी तस्वीर हो सकता है। क्योंकि भाषा का भविष्य केवल भाषणों से नहीं, बच्चों की आदतों से भी तय होता है।

बच्चा हिंदी में कहानी पढ़ता है या नहीं? वह हिंदी में सवाल पूछने में सहज है या नहीं? वह अपनी कल्पना हिंदी में लिख सकता है या नहीं? वह हिंदी में विज्ञान समझ सकता है या नहीं? वह मोबाइल और इंटरनेट पर हिंदी सामग्री खोजता है या नहीं? वह अपने आसपास की दुनिया को हिंदी में समझने की कोशिश करता है या नहीं?

इन सवालों का जवाब किसी मंच पर नहीं, बच्चे के रोजमर्रा के व्यवहार में मिलता है। हिंदी दिवस के कार्यक्रम में बच्चे कविता सुना दें, भाषण दे दें, नाटक कर दें, हिंदी गीत गा दें—यह अच्छी बात है। लेकिन उससे भी अच्छी बात तब होगी जब 15 सितंबर को वही बच्चा किताब उठाकर हिंदी में कुछ पढ़े, 16 सितंबर को अपनी डायरी हिंदी में लिखे और पूरे साल हिंदी को केवल परीक्षा का विषय नहीं, अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम समझे।

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यहीं हिंदी दिवस की असली परीक्षा है।

हिंदी और अंग्रेजी की लड़ाई बनाना भी गलत है

हिंदी की बात करते हुए एक गलती बार-बार होती है। हम हिंदी के सम्मान को अंग्रेजी के विरोध में खड़ा कर देते हैं। यह रास्ता न तो हिंदी के लिए उपयोगी है और न समाज के लिए।

आज के बच्चे को अंग्रेजी भी सीखनी है। दूसरी भारतीय भाषाओं से भी परिचित होना है। विज्ञान और तकनीक की दुनिया से भी जुड़ना है। दुनिया के बदलते ज्ञान से भी संवाद करना है। लेकिन इसका अर्थ यह कैसे हो गया कि अपनी भाषा में सोचने वाला व्यक्ति पिछड़ा हुआ है?

भाषा ज्ञान की दुश्मन नहीं होती। भाषा ज्ञान तक पहुंचने का रास्ता होती है। एक बच्चा यदि अंग्रेजी सीखता है तो यह अच्छी बात है। लेकिन वह हिंदी में सोचता है तो इसे कमतर क्यों माना जाए?

वह भोजपुरी, अवधी, मैथिली, पंजाबी, मराठी, बंगाली या किसी दूसरी भारतीय भाषा में घर की दुनिया समझता है तो उसे हिंदी या अंग्रेजी सीखने से रोकना भी गलत है। भारत की भाषाई विविधता कोई समस्या नहीं, हमारी बड़ी सांस्कृतिक पूंजी है। हिंदी को इस विविधता के बीच संवाद की मजबूत भाषा बनना चाहिए, किसी दूसरी भाषा को हटाने वाली भाषा नहीं।

असली सवाल अस्पताल में पूछा जाना चाहिए

कल्पना कीजिए कि कोई व्यक्ति अस्पताल पहुंचता है। वह परेशान है। उसे डॉक्टर से मिलना है, पर्ची बनानी है, जांच करानी है, रिपोर्ट समझनी है, दवा लेनी है और कभी बीमा या सरकारी योजना की जानकारी भी लेनी है। ऐसे समय में यदि उसे कठिन शब्दों और ऐसी भाषा के बीच खड़ा कर दिया जाए जिसे वह समझ ही न पाए, तो भाषा केवल भाषा नहीं रहती—वह सुविधा और असुविधा के बीच दीवार बन जाती है।

यहीं हिंदी दिवस की सार्थकता का बड़ा सवाल खड़ा होता है। क्या अस्पताल की जरूरी सूचनाएं आम आदमी की समझ की भाषा में हैं? क्या मरीज को उसकी बीमारी और उपचार से जुड़ी बुनियादी बातें समझ में आती हैं? क्या सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं की जानकारी सरल हिंदी में उपलब्ध है?

यह जरूरी नहीं कि हर चिकित्सकीय शब्द का हिंदी अनुवाद कर दिया जाए। जरूरी यह है कि मरीज को उसकी स्थिति समझ में आए। भाषा का उद्देश्य शब्दों का प्रदर्शन नहीं, अर्थ की पहुंच है।

सरकारी दफ्तर में हिंदी की परीक्षा

सरकारी कार्यालयों में हिंदी का इस्तेमाल होना अच्छी बात है। लेकिन सरकारी भाषा और जनता की भाषा में अनावश्यक दूरी नहीं होनी चाहिए। कई बार ऐसे शब्द सरकारी दस्तावेजों में दिखाई देते हैं जिन्हें पढ़कर आम आदमी को लगता है कि शायद यह कागज उसी के लिए नहीं है।

अगर किसी सरकारी योजना की जानकारी इतनी कठिन भाषा में लिखी है कि लाभार्थी उसे समझने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति की मदद लेने को मजबूर हो जाए, तो भाषा का उद्देश्य अधूरा रह गया। सरकारी भाषा जितनी सरल होगी, शासन और जनता के बीच दूरी उतनी कम होगी।

हिंदी दिवस पर केवल यह गिनना पर्याप्त नहीं कि कितने पत्र हिंदी में जारी हुए। यह भी देखना होगा कि उन पत्रों को पढ़कर जनता को कितना समझ आया। यहीं हिंदी दिवस का वास्तविक अर्थ प्रशासनिक आंकड़ों से निकलकर जनसरोकार से जुड़ता है।

रेलवे स्टेशन से लेकर बाजार तक हिंदी

रेलवे स्टेशन पर खड़ा व्यक्ति समय देखता है, ट्रेन पूछता है, प्लेटफॉर्म खोजता है, टिकट और आरक्षण की जानकारी लेता है। कभी ट्रेन छूटने की घोषणा सुनता है और कभी किसी आपात स्थिति में निर्देश समझता है। ऐसे स्थानों पर भाषा जितनी स्पष्ट होगी, व्यवस्था उतनी ही मानवीय लगेगी।

इसी तरह बाजार में, बैंक में, नगर निकाय में, डाकघर में, बिजली कार्यालय में, बस अड्डे पर और सरकारी सेवा केंद्रों पर भाषा का इस्तेमाल जनता की सुविधा के हिसाब से होना चाहिए। यहीं वह अंतर दिखाई देता है जो 14 सितंबर के मंच और 15 सितंबर की जिंदगी के बीच है।

मंच पर हिंदी का सम्मान करना आसान है। व्यवस्था में हिंदी को उपयोगी बनाना कठिन है। और शायद हिंदी दिवस की असली चुनौती भी यही है।

हिंदी पत्रकारिता के लिए भी हिंदी दिवस एक आईना है

पत्रकारिता में हिंदी दिवस का अर्थ और भी गंभीर हो जाता है। समाचार लिखना केवल हिंदी में शब्द भर देना नहीं है। समाचार की भाषा ऐसी होनी चाहिए जिसे पाठक समझ सके। अगर खबर पढ़ने के बाद पाठक को शब्दकोश खोजना पड़े कि आखिर खबर कहना क्या चाहती है, तो भाषा कहीं न कहीं अपने उद्देश्य से दूर चली गई।

पत्रकारिता की भाषा में सरलता कमजोरी नहीं है। स्पष्टता उसकी ताकत है। एक अच्छी खबर वह है जिसमें तथ्य साफ हों, वाक्य समझ में आएं और पाठक बिना उलझे घटना को समझ सके।

आज डिजिटल पत्रकारिता ने हिंदी के सामने एक नया अवसर भी पैदा किया है। मोबाइल पर हिंदी पढ़ने वाले करोड़ों पाठक हैं। वे खबर चाहते हैं। वे विश्लेषण चाहते हैं। वे रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती, राजनीति, कानून, तकनीक और मनोरंजन की जानकारी अपनी सुविधा की भाषा में चाहते हैं। लेकिन डिजिटल दुनिया में केवल हिंदी में लिखना काफी नहीं। हिंदी को डिजिटल दुनिया की उपयोगी भाषा बनाना होगा।

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हिंदी और तकनीक का रिश्ता

कभी यह कहा जाता था कि विज्ञान और तकनीक की भाषा अंग्रेजी है, इसलिए हिंदी में इन विषयों को समझाना कठिन है। आज तकनीक ने इस धारणा को काफी हद तक बदल दिया है। मोबाइल फोन हिंदी में चल सकते हैं। वॉयस टाइपिंग हिंदी में हो सकती है। अनुवाद के साधन उपलब्ध हैं। हिंदी में वीडियो, पॉडकास्ट, ब्लॉग, समाचार और शैक्षिक सामग्री बड़ी संख्या में तैयार हो रही है।

लेकिन अभी भी बहुत काम बाकी है। हिंदी में उच्च गुणवत्ता वाली वैज्ञानिक सामग्री कितनी है? हिंदी में तकनीकी शिक्षा की सामग्री कितनी सहज है? चिकित्सा संबंधी भरोसेमंद जानकारी कितनी आसानी से उपलब्ध है? कानूनी जानकारी कितनी सरल हिंदी में है? किसान और छोटे कारोबारियों के लिए डिजिटल हिंदी सामग्री कितनी उपयोगी है?

इन सवालों का जवाब आने वाले वर्षों में हिंदी की दिशा तय करेगा।

हिंदी दिवस भाषणों से नहीं, उपयोग से मजबूत होगा

किसी भाषा का सम्मान इस बात से नहीं तय होता कि उसके लिए कितने बड़े-बड़े शब्द बोले गए। भाषा का सम्मान तब होता है जब लोग उसे उपयोगी पाते हैं। जब मां अपने बच्चे से हिंदी में बात करती है। जब बच्चा अपनी कहानी हिंदी में लिखता है। जब शिक्षक कठिन विषय सरल हिंदी में समझाता है। जब पत्रकार खबर को पाठक की भाषा में लिखता है। जब अधिकारी जनता से उसकी समझ की भाषा में बात करता है। जब डॉक्टर मरीज को उसकी स्थिति स्पष्ट शब्दों में समझाता है। जब तकनीक हिंदी को केवल विकल्प नहीं, सुविधा का माध्यम बनाती है।

तब हिंदी दिवस कैलेंडर से निकलकर जीवन में आ जाता है।

एक दिन की तस्वीर और पूरे साल की सच्चाई

14 सितंबर की तस्वीर बहुत सुंदर हो सकती है। बच्चे मंच पर हों। हाथ में पोस्टर हो। पीछे हिंदी दिवस का बैनर हो। शिक्षक मुस्कुरा रहे हों। अतिथि भाषण दे रहे हों। तालियां बज रही हों। खबर प्रकाशित हो। फोटो सोशल मीडिया पर जाए। सब कुछ अच्छा लगे।

लेकिन उस तस्वीर का सबसे जरूरी हिस्सा तस्वीर के बाहर है। 15 सितंबर को क्या हुआ? 16 सितंबर को क्या हुआ? अक्टूबर में हिंदी का क्या हुआ? नवंबर में? दिसंबर में? अगले वर्ष सितंबर आने तक?

यही सवाल हिंदी दिवस को औपचारिकता से बचा सकता है। क्योंकि किसी भाषा का जीवन उसके उत्सव में नहीं, उसके निरंतर उपयोग में होता है।

हिंदी दिवस और हमारी जिम्मेदारी

हिंदी को लेकर सरकार की जिम्मेदारी है। शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी है। मीडिया की जिम्मेदारी है। प्रशासन की जिम्मेदारी है। तकनीकी संस्थानों की जिम्मेदारी है। लेखकों और पत्रकारों की जिम्मेदारी है। लेकिन सबसे बड़ी जिम्मेदारी उस समाज की है जो भाषा को रोज इस्तेमाल करता है।

हम अगर हिंदी बोलते हैं लेकिन हिंदी पढ़ना छोड़ देते हैं, तो समस्या है। हम हिंदी पढ़ते हैं लेकिन लिखना छोड़ देते हैं, तो भी समस्या है। हम हिंदी लिखते हैं लेकिन उसे कठिन और कृत्रिम बना देते हैं, तब भी समस्या है।

हिंदी को जीवित रखने का अर्थ केवल हिंदी के पक्ष में खड़ा होना नहीं है। उसमें अच्छा लिखना भी है। सरल लिखना भी है। सही लिखना भी है। नए विषयों पर लिखना भी है। विज्ञान, तकनीक, अर्थव्यवस्था, चिकित्सा, कानून और डिजिटल दुनिया में हिंदी की नई शब्दावली को सहज बनाना भी है।

बच्चों का हिंदी दिवस सबसे महत्वपूर्ण क्यों है?

मोहन द्विवेदी जी ने फोन पर कहा था—“बहुत बढ़िया सर। बच्चों ने खूब बढ़िया तैयारी की थी।” इस एक वाक्य में हिंदी दिवस की एक सुंदर तस्वीर छिपी है। बच्चों ने तैयारी की। उन्होंने कुछ सीखा। उन्होंने मंच पर अपनी बात रखी। यह छोटी बात नहीं है।

लेकिन बच्चों को केवल हिंदी दिवस के लिए तैयार करना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें पूरे साल पढ़ने की आदत देनी होगी। उन्हें अच्छी हिंदी किताबों तक पहुंचाना होगा। उन्हें अपनी भाषा में सवाल पूछने देना होगा। उनकी भाषा की गलतियों पर उन्हें शर्मिंदा करने के बजाय सुधारने का अवसर देना होगा। और सबसे जरूरी—हिंदी को उनके लिए केवल परीक्षा का विषय नहीं बनाना होगा।

भाषा तब जीवित रहती है जब उससे बच्चे का रिश्ता आनंद का हो, डर का नहीं।

हिंदी को कठिन बनाकर उसका सम्मान नहीं बढ़ेगा

एक और बात पर ध्यान देना जरूरी है। हिंदी का सम्मान कठिन शब्दों से नहीं बढ़ता। कभी-कभी हम भाषा को इतना संस्कृतनिष्ठ, इतना सरकारी और इतना जटिल बना देते हैं कि पाठक उससे दूर होने लगता है। भाषा का सौंदर्य उसकी सहजता में भी होता है।

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गांव का आदमी समझ सके। शहर का पाठक समझ सके। बच्चा समझ सके। बुजुर्ग समझ सके। नौकरी करने वाला समझ सके। किसान समझ सके। व्यापारी समझ सके। और शिक्षित व्यक्ति भी उसमें विचार की गहराई महसूस कर सके। यही वह हिंदी है जिसकी जरूरत है। ऐसी हिंदी जो किसी को बाहर न करे।

फिर वही सवाल—हो गया, मन गया हिंदी दिवस?

डॉ. अनिल दीक्षित से हुई बातचीत में सवाल था—“हो गया, मन गया हिंदी दिवस?” प्रधानाचार्य मोहन द्विवेदी जी का जवाब था—“बहुत बढ़िया सर। बच्चों ने खूब बढ़िया तैयारी की थी।”

दोनों बातें अपनी जगह सही हैं। कार्यक्रम हुआ तो वह अच्छी बात है। बच्चों ने तैयारी की तो उससे भी अच्छी बात है। खबर बनी और पाठकों तक पहुंची तो यह भी जरूरी है। लेकिन हिंदी दिवस का वास्तविक अर्थ इन सबके आगे है।

हिंदी दिवस का वास्तविक अर्थ यह पूछना है कि उस कार्यक्रम से बाहर क्या बदला? क्या बच्चे हिंदी को लेकर थोड़ा और सहज हुए? क्या शिक्षक हिंदी में कुछ नया पढ़ाने के लिए प्रेरित हुए? क्या स्कूल में हिंदी पढ़ने की संस्कृति मजबूत हुई? क्या प्रशासन ने जनता की भाषा को थोड़ा और महत्व दिया? क्या पत्रकारिता ने भाषा को थोड़ा और सरल बनाया? क्या तकनीक में हिंदी का उपयोग थोड़ा और बढ़ा? क्या किसी आम आदमी को अपनी भाषा में कोई जरूरी जानकारी आसानी से मिल सकी?

अगर इन सवालों का जवाब हां में है, तो हिंदी दिवस का उत्सव मंच से बाहर निकल चुका है। अगर जवाब नहीं है, तो शायद हमें फिर पूछना पड़ेगा—“हो गया, मन गया हिंदी दिवस?”

हिंदी दिवस की असली मान्यता कब होगी?

हिंदी दिवस की असली मान्यता तब नहीं होगी जब सबसे लंबा भाषण दिया जाएगा। न ही तब जब सबसे बड़ा मंच बनाया जाएगा। न तब जब सबसे ज्यादा तस्वीरें खिंचेंगी। न तब जब सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा शुभकामनाएं दिखाई देंगी।

असली मान्यता तब होगी जब हिंदी हमारे काम को आसान करेगी। जब कोई बच्चा बिना झिझक हिंदी में सवाल पूछेगा। जब कोई शिक्षक बिना हीनभावना के हिंदी में ज्ञान बांटेगा। जब कोई डॉक्टर मरीज को कठिन शब्दों के पीछे नहीं छिपाएगा। जब सरकारी कार्यालय की सूचना जनता के लिए समझने योग्य होगी। जब पत्रकारिता में भाषा दिखावे की नहीं, संवाद की होगी। जब विज्ञान और तकनीक हिंदी से दूर नहीं, हिंदी के साथ चलेंगे। जब हिंदी बोलने वाले को अपनी भाषा बोलने पर यह महसूस नहीं होगा कि वह किसी मायने में कमतर है।

तब हिंदी दिवस की जरूरत शायद और भी कम होगी। क्योंकि तब हिंदी केवल एक तारीख नहीं रहेगी। वह जीवन का हिस्सा होगी।

और आखिर में…

फिर कभी 14 सितंबर आएगा। किसी विद्यालय में बच्चे तैयार होंगे। किसी विश्वविद्यालय में संगोष्ठी होगी। किसी कार्यालय में कार्यक्रम होगा। किसी मंच पर हिंदी की महिमा गाई जाएगी। किसी खबर में लिखा जाएगा—“हर्षोल्लास से मनाया गया हिंदी दिवस।”

खबर पढ़कर अच्छा लगेगा। बच्चों की तस्वीर देखकर भी अच्छा लगेगा। तालियों की कल्पना करके भी अच्छा लगेगा। लेकिन उसी रात या अगली सुबह एक छोटा-सा सवाल फिर सामने खड़ा होगा—“अब आगे क्या?”

क्योंकि हिंदी दिवस की कहानी 14 सितंबर की रात खत्म नहीं होनी चाहिए। उसका अगला पन्ना 15 सितंबर की सुबह खुलना चाहिए। उस पन्ने पर कोई बच्चा हिंदी की किताब खोले। कोई शिक्षक हिंदी में कठिन बात को आसान करे। कोई पत्रकार खबर को साफ भाषा में लिखे। कोई अधिकारी जनता की भाषा में उसकी समस्या सुने। कोई अस्पताल मरीज को समझ आने वाली भाषा में जरूरी सूचना दे। कोई रेलवे स्टेशन यात्री को स्पष्ट निर्देश दे। कोई तकनीकी मंच हिंदी को सुविधा की भाषा बनाए।

और कोई आम आदमी यह महसूस करे कि उसकी भाषा उसके साथ खड़ी है।

तब शायद फोन पर फिर वही सवाल पूछने की जरूरत नहीं पड़ेगी—“हो गया, मन गया हिंदी दिवस?”

क्योंकि जवाब किसी मंच से नहीं आएगा। जवाब हमारे व्यवहार में दिखाई देगा।

और अगर कभी फिर कोई पूछ ही दे—“कैसा रहा हिंदी दिवस?” तो सिर्फ इतना कहना काफी नहीं होगा—“बहुत बढ़िया सर, बच्चों ने खूब तैयारी की थी।”

इस बार जवाब थोड़ा आगे जाना चाहिए—“कार्यक्रम तो उस दिन हुआ था… लेकिन हिंदी उसके बाद भी हमारे साथ रही।”

बस, यहीं से हिंदी दिवस की असली शुरुआत होगी। क्योंकि हिंदी दिवस मनाने की सबसे ईमानदार तारीख 14 सितंबर नहीं, वह हर दिन है जब हम हिंदी को केवल बोलते नहीं, बल्कि उसे सम्मान, ज्ञान, काम और संवाद की भाषा बनाते हैं।

और तब शायद पहली बार इस सवाल का जवाब सचमुच पूरा होगा—“हो गया, मन गया हिंदी दिवस?”

हां जी… इस बार केवल मनाया नहीं गया। कुछ हद तक जिया भी गया।

यायावर
Author: यायावर

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One Response

  1. हिन्दी उस नदी के नीर की अनवरत बहती हुई धारा है जो शांत रह कर बहती जाती है बहती जा रही है यही है विश्व की सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक भाषा हिन्दी की सच्चाई ज़ी हमारे मन मस्तिष्क औऱ जुबां पर बनी रहती है भले ही थोड़े समय के लिये ही सही…. वो हिन्दी जिसकी बिंदी भी बोलती है 🇮🇳 जय हिन्द

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