लखनऊ में फर्जी कॉल सेंटर का भंडाफोड़, अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाकर चल रहा था अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी नेटवर्क
ठाकुर बख्श सिंह की रिपोर्ट
लखनऊ। उत्तर प्रदेश पुलिस की क्राइम ब्रांच और साइबर सेल ने राजधानी लखनऊ में संचालित एक बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी गिरोह का पर्दाफाश करते हुए सात आरोपियों को गिरफ्तार किया है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि यह गिरोह एक फर्जी कॉल सेंटर के जरिए अमेरिका के नागरिकों को डिजिटल अरेस्ट, सिस्टम हैकिंग और सरकारी कार्रवाई का भय दिखाकर करोड़ों रुपये की ठगी कर रहा था। पुलिस का दावा है कि पिछले कुछ महीनों में इस नेटवर्क के माध्यम से दो अरब रुपये से अधिक के संदिग्ध वित्तीय लेनदेन और साइबर धोखाधड़ी के संकेत मिले हैं। बरामद डिजिटल साक्ष्यों की गहन जांच की जा रही है।
पॉश अपार्टमेंट के फ्लैट से संचालित हो रहा था फर्जी कॉल सेंटर
पुलिस के अनुसार यह पूरा नेटवर्क लखनऊ के गोमतीनगर विस्तार क्षेत्र में शहीद पथ के निकट स्थित एक रिहायशी अपार्टमेंट के फ्लैट से संचालित किया जा रहा था। बाहरी तौर पर यह फ्लैट सामान्य आवास जैसा दिखाई देता था, लेकिन अंदर अत्याधुनिक उपकरणों के साथ एक संगठित कॉल सेंटर बनाया गया था।
क्राइम ब्रांच और साइबर सेल की संयुक्त कार्रवाई के दौरान फ्लैट पर छापा मारकर सात लोगों को हिरासत में लिया गया। मौके से कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, लैपटॉप, मोबाइल फोन, इंटरनेट राउटर और अन्य डिजिटल सामग्री बरामद की गई, जिन्हें फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है।
अमेरिकी नागरिकों को बनाया जाता था निशाना
जांच एजेंसियों के अनुसार गिरोह का पूरा फोकस अमेरिकी नागरिकों को ठगी का शिकार बनाना था। इसके लिए पहले विदेशी नागरिकों के मोबाइल नंबर, ईमेल आईडी और अन्य संपर्क विवरण जुटाए जाते थे। इसके बाद उन्हें ऐसे ईमेल और पॉप-अप संदेश भेजे जाते थे जिनमें कंप्यूटर में वायरस आने, सिस्टम हैक होने या सरकारी एजेंसियों द्वारा कार्रवाई किए जाने जैसी बातें लिखी होती थीं।
इन संदेशों का उद्देश्य लोगों में डर पैदा करना था ताकि वे दिए गए हेल्पलाइन नंबर पर संपर्क करें। जैसे ही पीड़ित कॉल करता, गिरोह के सदस्य खुद को अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों या सरकारी विभागों का अधिकारी बताकर बातचीत शुरू कर देते थे।
डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाकर होती थी करोड़ों की ठगी
पुलिस के मुताबिक आरोपी पीड़ितों को विश्वास दिलाते थे कि उनका बैंक खाता, पहचान या नागरिकता खतरे में है और यदि तुरंत कार्रवाई नहीं की गई तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है। इसी मनोवैज्ञानिक दबाव का फायदा उठाकर उनसे मोटी रकम वसूली जाती थी।
गिरोह भुगतान के लिए गिफ्ट कार्ड, क्रिप्टोकरेंसी और हवाला नेटवर्क जैसे माध्यमों का इस्तेमाल करता था, जिससे रकम का वास्तविक स्रोत और गंतव्य आसानी से पकड़ में न आए। जांच एजेंसियां अब इस पूरे वित्तीय नेटवर्क की भी पड़ताल कर रही हैं।
कम पढ़े-लिखे युवक, लेकिन ठगी का तरीका बेहद संगठित
इस मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि गिरफ्तार अधिकांश आरोपी अधिक शिक्षित नहीं हैं। पुलिस के अनुसार कुछ आरोपी केवल सातवीं से दसवीं कक्षा तक पढ़े हैं।
अंग्रेजी भाषा पर पकड़ कमजोर होने के बावजूद उन्हें विदेशी नागरिकों से बातचीत कराने के लिए विशेष तैयारी कराई जाती थी। अंग्रेजी में बोले जाने वाले पूरे संवाद हिंदी लिपि में लिखकर दिए जाते थे, जिन्हें आरोपी याद कर लेते थे। कॉल के दौरान वे उसी स्क्रिप्ट के आधार पर बातचीत करते थे ताकि सामने वाले व्यक्ति को किसी प्रकार का संदेह न हो।
अमेरिकी समय के अनुसार चलता था पूरा ऑपरेशन
जांच में यह भी सामने आया कि कॉल सेंटर भारत के दिन के समय लगभग निष्क्रिय रहता था, जबकि रात होते ही यहां गतिविधियां तेज हो जाती थीं। इसका कारण यह था कि पूरी टीम अमेरिकी समय के अनुसार काम करती थी।
रातभर विदेशी नागरिकों से संपर्क कर उन्हें झांसे में लेने का प्रयास किया जाता था। इससे स्पष्ट होता है कि गिरोह ने अपनी कार्यप्रणाली पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय समय और परिस्थितियों के अनुरूप तैयार कर रखी थी।
लैपटॉप की जांच में मिले बड़े सुराग
छापेमारी के दौरान बरामद मुख्य लैपटॉप और अन्य डिजिटल उपकरणों की प्रारंभिक फॉरेंसिक जांच में कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आई हैं।
पुलिस के अनुसार हाल के दिनों में एक अमेरिकी नागरिक से लगभग 70 हजार डॉलर की ठगी किए जाने के डिजिटल प्रमाण मिले हैं। इसके अलावा शुरुआती विश्लेषण में पिछले छह महीनों के दौरान दो अरब रुपये से अधिक के संदिग्ध वित्तीय लेनदेन के संकेत भी मिले हैं।
हालांकि पुलिस ने स्पष्ट किया है कि अंतिम आंकड़ा विस्तृत जांच और डिजिटल ऑडिट के बाद ही सामने आएगा।
गुजरात और अमेरिका तक जुड़े मिले नेटवर्क के तार
पुलिस जांच में इस गिरोह का नेटवर्क केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं मिला। मुख्य आरोपी पुनीत कुमार वर्मा गुजरात के अहमदाबाद का निवासी बताया गया है।
प्रारंभिक जांच के अनुसार उसका बड़ा भाई अहमदाबाद से पूरे नेटवर्क के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था। पुलिस को यह भी जानकारी मिली है कि गिरोह के संपर्क अमेरिका तक फैले हुए थे और वहां भी कुछ एजेंट सक्रिय थे, जो संभावित पीड़ितों की जानकारी उपलब्ध कराते थे।
इन्हीं सूचनाओं के आधार पर भारत में बैठा गिरोह विदेशी नागरिकों को निशाना बनाता था।
फर्जी दस्तावेजों के आधार पर किराए पर लिया गया फ्लैट
जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि कॉल सेंटर चलाने के लिए जिस फ्लैट का इस्तेमाल किया जा रहा था, उसे किराए पर लेने में भी कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया गया।
रेंट एग्रीमेंट, पहचान संबंधी दस्तावेज और पुलिस सत्यापन फॉर्म में दर्ज कई जानकारियां संदिग्ध पाई गई हैं। पुलिस अब इस पहलू की अलग से जांच कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि फर्जी दस्तावेज तैयार करने में और कौन-कौन लोग शामिल थे।
अलग-अलग राज्यों के सात आरोपी गिरफ्तार
पुलिस ने इस कार्रवाई में कुल सात लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें गुजरात के अहमदाबाद निवासी पुनीत कुमार वर्मा और दीपेन चंद्रकांत पटेल शामिल हैं। वहीं पश्चिम बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों से मोहम्मद सोहेल, मोहम्मद शाहनवाज आलम, मोहम्मद इमरान, मोहम्मद रियाज तथा सज्जाद हुसैन उर्फ सरफराज को गिरफ्तार किया गया है।
पुलिस सभी आरोपियों से पूछताछ कर रही है और यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि इस नेटवर्क से जुड़े अन्य सदस्य देश के किन-किन राज्यों और विदेशों में सक्रिय हैं।
भारी मात्रा में हाईटेक उपकरण बरामद
छापेमारी के दौरान पुलिस ने कॉल सेंटर से बड़ी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त किए हैं। इनमें आठ लैपटॉप, नौ स्मार्टफोन, चार हाई-स्पीड इंटरनेट राउटर, नौ हेडफोन, पांच लैपटॉप चार्जर, दो कंप्यूटर माउस तथा अन्य डेटा केबल और डिजिटल सामग्री शामिल हैं।
इन सभी उपकरणों की फॉरेंसिक जांच के जरिए ईमेल रिकॉर्ड, कॉल लॉग, डिजिटल भुगतान, क्रिप्टो ट्रांजैक्शन और विदेशी संपर्कों की जानकारी जुटाई जा रही है।
साइबर अपराध के खिलाफ बड़ी सफलता
क्राइम ब्रांच और साइबर सेल की यह कार्रवाई उत्तर प्रदेश में साइबर अपराध के खिलाफ बड़ी सफलता मानी जा रही है। पुलिस का मानना है कि इस गिरोह के पर्दाफाश से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संचालित एक बड़े साइबर नेटवर्क की परतें खुल सकती हैं।
जांच एजेंसियां अब गिरफ्तार आरोपियों के बैंक खातों, डिजिटल वॉलेट, क्रिप्टो लेनदेन, हवाला कनेक्शन और विदेशी संपर्कों की विस्तृत जांच कर रही हैं। साथ ही यह भी पता लगाया जा रहा है कि इस गिरोह ने अब तक कितने लोगों को अपना शिकार बनाया और ठगी की कुल राशि कितनी है।
यदि जांच में और साक्ष्य सामने आते हैं तो इस मामले में अन्य राज्यों और विदेशों में सक्रिय आरोपियों के खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है।








