दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट
अयोध्या। सावन आया तो जैसे रामनगरी के कण-कण में हरियाली उतर आई और मंदिरों की चौखट से लेकर गलियों तक भक्ति का संगीत बहने लगा। कहीं फूलों से सजे हिंडोले पर राम-जानकी विराजमान हैं, कहीं ठाकुर जी के सामने संत-महंत झूलन पद गा रहे हैं, तो कहीं कजरी की मीठी तान पर श्रोता बरबस झूम उठते हैं। सरयू की लहरों से लेकर मंदिरों के प्रांगण तक सावन की मस्ती और भक्ति का ऐसा रंग चढ़ा है कि अयोध्या इन दिनों एक विशाल सांस्कृतिक उत्सव में तब्दील हो गई है।
रामनगरी का विख्यात सावन झूला मेला इन दिनों अपने पूरे शबाब पर है। मणिपर्वत से आरंभ हुई झूलनोत्सव की परंपरा अब करीब पांच हजार मंदिरों तक पहुंच चुकी है। इन मंदिरों में ठाकुर जी को आकर्षक ढंग से सजाए गए झूलों पर विराजमान कराया गया है। शाम ढलते ही मंदिरों की घंटियां, घड़ियाल, मंजीरे और भजन-कजरी की आवाजें वातावरण में घुल जाती हैं। इसके साथ शुरू होता है झूलन का वह सिलसिला, जो देर रात तक श्रद्धालुओं को अपने साथ बांधे रखता है।
सावन के अंतिम सोमवार पर सोमवार, 24 अगस्त को भी रामनगरी में आस्था का सैलाब दिखाई दिया। सरयू स्नान और मंदिरों में दर्शन-पूजन के साथ श्रद्धालु झूलनोत्सव का आनंद लेने विभिन्न मंदिरों तक पहुंचते रहे। कोई परिवार के साथ आया है तो कोई दूर-दराज से टोली बनाकर। मंदिरों की ओर जाती भीड़ के चेहरों पर थकान कम और उत्साह अधिक दिखाई देता है।
मणिपर्वत से उठी झूलन की लहर
अयोध्या के सावन झूलनोत्सव में मणिपर्वत को परंपरा का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहीं से झूलन की वह लहर उठती है, जो धीरे-धीरे पूरी रामनगरी को अपने रंग में रंग देती है।
मणिपर्वत पर भगवान के विग्रहों को आकर्षक ढंग से सजाए गए झूलों पर विराजमान कराया गया। संतों और श्रद्धालुओं ने भजन-कीर्तन तथा झूलन के पारंपरिक पदों के साथ भगवान की आराधना की। ढोल-मंजीरों की थाप और भक्ति गीतों के बीच वातावरण ऐसा बना कि हर कोई सावन की इस धार्मिक मस्ती में डूबता चला गया।
झूलनोत्सव की परंपरा का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है। यही वजह है कि अयोध्या में यह आयोजन केवल उत्सव नहीं, बल्कि मंदिर संस्कृति और भक्ति परंपरा की निरंतरता का प्रतीक माना जाता है।
रामलला ने भी किया झूला विहार
सावन झूला मेले का आकर्षण श्रीराम जन्मभूमि मंदिर परिसर में भी दिखाई दिया। रामलला के चल विग्रह को पालकी में विराजमान कर परिसर में भ्रमण कराया गया। रामलला अपने तीनों भाइयों के साथ कुबेर टीला पहुंचे, जहां झूलनोत्सव का आयोजन हुआ।
भक्तों के लिए यह दृश्य विशेष भावुक करने वाला रहा। जिन रामलला के भव्य मंदिर के निर्माण को देश-दुनिया ने देखा, उन्हीं रामलला का सावन में झूला विहार श्रद्धालुओं के लिए आस्था और आनंद का विशेष क्षण बन गया।
पांच हजार मंदिरों में झूलों की छटा
अयोध्या के लगभग पांच हजार मंदिरों में इन दिनों अलग-अलग तरह के हिंडोले सजाए गए हैं। कहीं फूलों की लड़ियों से झूला सजा है, कहीं विद्युत झालरों से मंदिर जगमगा रहा है और कहीं पारंपरिक ढंग से सजाए गए हिंडोले पर ठाकुर जी भक्तों को दर्शन दे रहे हैं।
रंग महल, कनक भवन, दशरथ महल, राम वल्लभाकुंज, लक्ष्मण किला, विअहुति भवन, जानकी महल, लालजी मंदिर और गोकुल भवन जैसे प्रमुख मंदिरों में विशेष आयोजन श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रहे हैं।
दिन में दर्शन और पूजा का क्रम चलता है, जबकि शाम होते ही मंदिरों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत हो जाती है। जैसे-जैसे रात गहराती है, वैसे-वैसे भक्ति का रंग और गाढ़ा होता जाता है।
‘झूला पड़ा कदम की डाली…’ पर थिरकते कदम
सावन की पहचान कजरी और झूला गीतों के बिना अधूरी मानी जाती है। अयोध्या के मंदिरों में भी इन दिनों सावन के पारंपरिक गीतों की मिठास खूब सुनाई दे रही है।
‘झूला पड़ा कदम की डाली, झूले जनक दुलारी ना…’ जैसे झूलन पद जब मंदिरों में गूंजते हैं तो श्रद्धालु कुछ पल के लिए जैसे उसी भावलोक में पहुंच जाते हैं, जहां राम और जानकी के प्रेम, वात्सल्य और भक्ति का संसार दिखाई देता है।
संत-महंत स्वयं को भगवान राम-जानकी का दास मानकर मर्यादा की सीमा में रहकर गायन और नृत्य के माध्यम से आराध्य को रिझाते हैं। कई मंदिरों में कथक कलाकार भगवान के समक्ष नृत्य की प्रस्तुति दे रहे हैं। घुंघरुओं की रुनझुन और मंजीरों की छनक जब भजन के सुरों से मिलती है तो वातावरण में एक अलग ही सम्मोहन पैदा हो जाता है।
एक मंदिर से दूसरे मंदिर तक श्रद्धालुओं की यात्रा
झूलनोत्सव की सबसे खास बात यह है कि श्रद्धालु किसी एक मंदिर तक सीमित नहीं रहते। वे एक मंदिर में दर्शन करने के बाद दूसरे मंदिर की ओर निकल पड़ते हैं। कहीं झूले की सजावट आकर्षित करती है तो कहीं भजन मंडली की आवाज लोगों को अपनी ओर खींच लेती है।
रात में अयोध्या के मंदिरों का दृश्य और भी मनोहारी हो जाता है। रोशनी से जगमगाते मंदिर, फूलों से सजे हिंडोले, सामने बैठे श्रद्धालु और बीच-बीच में उठती ‘जय श्रीराम’ की गूंज—पूरी रामनगरी को एक जीवंत आध्यात्मिक मंच में बदल देती है।
मणि महोत्सव में गूंजी कजरी
सावन की इस सांस्कृतिक लय को मणि महोत्सव ने भी अपने अंदाज में आगे बढ़ाया। रविवार को आयोजित सांस्कृतिक संध्या में भजन, राष्ट्रगीत और कजरी की शानदार प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को देर शाम तक बांधे रखा।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि मेयर महंत गिरीशपति त्रिपाठी और विशिष्ट अतिथि नगर आयुक्त जयेन्द्र कुमार ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। सांस्कृतिक संध्या की शुरुआत शास्त्रीय गायक पंडित सत्यप्रकाश मिश्र की प्रस्तुति से हुई। उन्होंने राष्ट्रगीत से कार्यक्रम का वातावरण देशभक्ति के भाव से भर दिया। इसके बाद भक्ति गीतों का सिलसिला शुरू हुआ।
गायक दीपक शुक्ल ने ‘शंकर तेरी जटा से बहती है गंगधारा’ भजन प्रस्तुत कर शिवभक्ति की धारा बहा दी। बृजमोहन तिवारी ने अपनी सुमधुर आवाज में ‘कैसे खेले जयबू सावन मां कजरिया’ प्रस्तुत की तो श्रोताओं की तालियां देर तक गूंजती रहीं। चंद्रशेखर तिवारी ने राम भजनों की प्रस्तुति से श्रद्धालुओं को भक्ति में डुबो दिया।
कजरी की तान ने जैसे सावन की पूरी कहानी कह दी—बादलों की उमंग, झूले की पींग, विरह की कसक और मिलन की आस। श्रोता भी इस लोकधुन के साथ भावनाओं में बहते नजर आए।
भक्ति के साथ लोक संस्कृति का उत्सव
अयोध्या का सावन झूला मेला इसलिए भी विशिष्ट है कि यहां धर्म और लोक संस्कृति एक-दूसरे से अलग नहीं दिखाई देते। झूले पर विराजमान ठाकुर जी के सामने गाया जाने वाला झूलन पद हो या सावन की कजरी, हर सुर में अयोध्या की पुरानी सांस्कृतिक स्मृतियां जीवित दिखाई देती हैं।
यहां आने वाला श्रद्धालु केवल दर्शन करके लौटता नहीं, बल्कि मंदिरों में होने वाले संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से रामनगरी की परंपरा को भी महसूस करता है।
भीड़ को देखते हुए सुरक्षा के व्यापक इंतजाम
सावन मेले में देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालुओं के पहुंचने के कारण प्रशासन भी पूरी तरह सतर्क है। मेला क्षेत्र को जोन और सेक्टर में बांटकर सुरक्षा व्यवस्था की गई है। भीड़ नियंत्रण और यातायात प्रबंधन के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं।
प्रमुख मार्गों पर यातायात डायवर्जन लागू किया गया है। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी भीड़ की स्थिति पर लगातार नजर रख रहे हैं, ताकि श्रद्धालुओं को दर्शन और मेला क्षेत्र में आवागमन के दौरान परेशानी न हो।
28 अगस्त तक झूमेगी रामनगरी
सावन झूला मेला 28 अगस्त तक चलेगा। यानी आने वाले दिनों में भी अयोध्या के मंदिरों में झूलों की पींगें बढ़ती रहेंगी, भजनों के स्वर गूंजते रहेंगे और कजरी की तान सावन की फुहारों के साथ रामनगरी की फिजाओं में घुलती रहेगी।
सावन के अंतिम पड़ाव पर पहुंची अयोध्या में सरयू की लहरों के साथ आस्था भी हिलोरें ले रही है। मंदिरों में विराजमान ठाकुर जी के हिंडोले, संतों के झूलन पद, कथक की थिरकन और कजरी की मिठास मिलकर ऐसा वातावरण रच रहे हैं, जिसे शब्दों में बांधना आसान नहीं।
‘कैसे खेले जयबू सावन मां कजरिया’ की तान जब मंदिरों के बीच से उठती है तो लगता है जैसे पूरी रामनगरी सावन की एक ही पींग पर झूल रही हो। यही अयोध्या के सावन झूला मेले की असली खूबसूरती है—जहां भक्ति केवल मंदिरों में नहीं रहती, बल्कि गीत बनकर गलियों में उतरती है, संगीत बनकर हवाओं में घुलती है और झूले की हर पींग के साथ भक्तों के मन में आनंद की नई लहर पैदा करती है।

























