आलेख : राजेंद्र शर्मा
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का अमेरिका, कनाडा और इंग्लैंड का करीब दस दिन का दौरा खत्म हो गया है। दौरे का घोषित संदेश था—समावेश, संवाद, विविधता और भारतीय संस्कृति की उदार परंपरा। लेकिन राजनीति में संदेश केवल भाषण से नहीं बनता, उसकी विश्वसनीयता उस संगठन और सत्ता के व्यवहार से तय होती है, जिसके प्रतिनिधि के रूप में कोई व्यक्ति बोल रहा होता है। यही वह जगह है जहां भागवत के विदेश दौरे और भारत की राजनीतिक जमीन के बीच एक असहज सवाल खड़ा होता है—आखिर यह संदेश सुनेगा कौन?
भागवत ने अमेरिका में कहा कि भारत में मुसलमानों के रहने का विरोध करने वाला व्यक्ति हिंदू नहीं है। उन्होंने मनुष्य की समानता, गरिमा और विविधता में एकता की बात भी कही। सुनने में यह सब भारतीय संविधान और बहुलतावादी लोकतंत्र की भाषा के काफी करीब लगता है। समस्या यह नहीं कि ये बातें क्यों कही गईं। समस्या यह है कि इन बातों की विश्वसनीयता का परीक्षण उन घटनाओं से होता है जो उसी समय भारत में घट रही हों। राजनीति का सबसे कठिन इम्तिहान भाषण देना नहीं, अपने भाषण और अपने राजनीतिक-सामाजिक प्रभाव के बीच की दूरी को कम करना है।
विदेश में समावेश का संदेश, भारत में सवालों की वापसी
आरएसएस की छवि को लेकर पश्चिमी देशों में लंबे समय से बहस होती रही है। संघ स्वयं को सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी संगठन के रूप में प्रस्तुत करता है, जबकि उसके आलोचक उस पर हिंदुत्व की राजनीति और अल्पसंख्यकों के प्रति बहुसंख्यकवादी दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के आरोप लगाते रहे हैं। भागवत के विदेश दौरे ने इसी पुराने विवाद को फिर सामने ला दिया। उनके कार्यक्रमों में समर्थकों की मौजूदगी थी, लेकिन विरोध के स्वर भी सुनाई दिए।
यह अपने आप में महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत है। प्रवासी भारतीय समुदाय एकरूप नहीं है। उसमें भाजपा और आरएसएस समर्थक लोग हैं तो उनके आलोचक भी हैं। इसलिए किसी बड़े सभागार में समर्थकों की भीड़ देखकर यह मान लेना कि पूरी प्रवासी भारतीय बिरादरी संघ की विचारधारा के साथ खड़ी है, उतना ही अधूरा निष्कर्ष होगा जितना विरोध-प्रदर्शनों को देखकर यह मान लेना कि संघ के सारे समर्थक विदेशों में अप्रासंगिक हो चुके हैं। असली कहानी इन दोनों के बीच है।
और यहीं भागवत की विदेश यात्रा का सबसे दिलचस्प पक्ष सामने आता है। संघ यदि अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि को बदलने निकला था तो उसे केवल अपने समर्थकों से तालियां नहीं चाहिए थीं। उसे अपने आलोचकों के सवालों का भी जवाब देना था। क्योंकि अपने समर्थकों को समझाना आसान है; असहमत लोगों को आश्वस्त करना ही असली परीक्षा है।
विवेकानंद की विरासत और राजनीतिक पुनर्पाठ
अमेरिका में धर्मों के प्रतिनिधियों के बीच संवाद के मंच से भागवत ने समावेश और मानव गरिमा की बातें कहीं। इसे भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की उदार धारा से जोड़कर देखा गया। स्वामी विवेकानंद के शिकागो संबोधन की स्मृति भी स्वाभाविक रूप से सामने आई। लेकिन इतिहास की प्रतिष्ठित आवाजों का राजनीतिक पुनर्पाठ करते समय एक मुश्किल सवाल हमेशा सामने रहता है—क्या उस विरासत का अर्थ केवल मंच पर दोहराए जाने वाले सुंदर वाक्यों तक सीमित है, या उसे सामाजिक और राजनीतिक व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए?
कुछ प्रतिभागियों द्वारा बाद में इस प्रकार के आयोजन में शामिल होने को लेकर सार्वजनिक रूप से असहजता व्यक्त किए जाने की खबरों ने इस सवाल को और तीखा कर दिया। यदि किसी धार्मिक प्रतिनिधि को यह महसूस हो कि उसे आयोजन के स्वरूप या आयोजकों के राजनीतिक-संगठनात्मक संबंधों की पर्याप्त जानकारी नहीं थी, तो यह महज आयोजन-प्रबंधन का प्रश्न नहीं रह जाता। यह राजनीतिक संचार की विश्वसनीयता का प्रश्न बन जाता है।
किसी संगठन की छवि बदलने का सबसे कमजोर तरीका यह है कि उसके मंच पर अलग-अलग धर्मों के लोगों को बैठाकर तस्वीर खिंचवा ली जाए। छवि तब बदलती है जब उसके आलोचक भी कहें कि हां, व्यवहार में बदलाव दिखाई दे रहा है। वरना संवाद का मंच भी कभी-कभी केवल सजावटी पर्दा बन जाता है। पर्दा कितना ही रंगीन क्यों न हो, पीछे का मंच छिपता नहीं।
अमेरिकी राजनीति का पैसा और आरएसएस पर उठते सवाल
भागवत की यात्रा के बाद अमेरिकी राजनीति से जुड़े कुछ नेताओं द्वारा आरएसएस से जुड़े धन को चुनावी अभियान में स्वीकार न करने की घोषणा की खबरें भी सामने आईं। यदि यह राजनीतिक रुख व्यापक रूप लेता है तो यह केवल किसी संगठन के प्रति पसंद या नापसंद का मामला नहीं होगा। अमेरिका में चुनावी चंदा राजनीतिक संबंधों और नीतिगत प्राथमिकताओं का महत्वपूर्ण संकेतक होता है।
यहां एक विडंबना दिखाई देती है। एक तरफ आरएसएस की अंतरराष्ट्रीय छवि को सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक संगठन के रूप में स्थापित करने की कोशिश हो, दूसरी तरफ उसके राजनीतिक प्रभाव और भाजपा से उसके संबंधों को लेकर विदेशों में सवाल उठते रहें। तब समस्या केवल प्रचार की नहीं रहती। सवाल यह बन जाता है कि संगठन अपने बारे में जो कहानी दुनिया को सुनाना चाहता है, क्या दुनिया उस कहानी को उसी रूप में स्वीकार करने को तैयार है?
और शायद यही वह जगह है जहां राजनीतिक व्यंग्य खुद-ब-खुद पैदा होता है। यदि आईना खराब हो तो चेहरे पर नाराज होने से चेहरा नहीं बदलता। अंतरराष्ट्रीय जनमत भी किसी प्रेस विज्ञप्ति से नियंत्रित नहीं होता। वहां समर्थक भी सवाल करते हैं और विरोधी भी।
भागवत के शब्द बनाम भारत की जमीन
भागवत के भाषणों की सबसे बड़ी चुनौती अमेरिका या इंग्लैंड में नहीं, भारत में है। क्योंकि भारत में उनके शब्दों को उसी समय घट रही घटनाओं के संदर्भ में पढ़ा जाता है। यदि मंच से कहा जाता है कि सभी मनुष्य बराबर हैं, तो नागरिक समाज स्वाभाविक रूप से पूछेगा—क्या जमीन पर भी बराबरी दिखाई दे रही है? यदि कहा जाता है कि भारत की विविधता उसकी ताकत है, तो सवाल होगा—क्या धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को समान सम्मान मिल रहा है?
यही कारण है कि बंगाल में ईसाई समुदाय से जुड़ी घटनाओं की खबरें और छत्तीसगढ़ जैसे भाजपा शासित राज्यों में धर्म तथा धार्मिक स्थलों को लेकर विवादों की खबरें भागवत के समावेशी संदेश के साथ रखी जाने लगीं। किसी घटना की कानूनी और तथ्यात्मक जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन, पुलिस या संबंधित संगठनों की होती है; लेकिन राजनीति में धारणा भी एक वास्तविक शक्ति है। यदि किसी समुदाय को बार-बार यह महसूस हो कि उसके धार्मिक अधिकार दबाव में हैं, तो मंच से दिया गया समावेश का संदेश अपना असर खो सकता है।
मुद्दा यह नहीं कि हर विवाद के पीछे आरएसएस को सीधे जिम्मेदार ठहरा दिया जाए। मुद्दा यह है कि आरएसएस जैसी व्यापक सामाजिक पहुंच रखने वाली संस्था अपने प्रभाव क्षेत्र में बहुलतावाद और कानून के शासन के पक्ष में कितनी स्पष्ट और प्रभावी आवाज उठाती है। यही उसकी कही हुई बात की असली परीक्षा है।
बुलडोजर राजनीति और समावेशी भाषण का विरोधाभास
उत्तर प्रदेश में बुलडोजर की राजनीति इस बहस का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुकी है। सरकारें इसे अतिक्रमण हटाने और कानून का पालन कराने का प्रशासनिक औजार बताती हैं। आलोचक इसे चुनिंदा कार्रवाई और कमजोर तबकों पर शासन की कठोरता के प्रतीक के रूप में देखते हैं। विवाद का समाधान नारों से नहीं, पारदर्शी प्रक्रिया, समान मानदंड और न्यायिक परीक्षण से ही संभव है।
सहारनपुर में एक पुरानी मस्जिद को लेकर हुई कार्रवाई ने इसी बहस को फिर हवा दी। प्रशासनिक पक्ष यदि इसे सरकारी भूमि पर अतिक्रमण की कार्रवाई बताता है तो दूसरी ओर मस्जिद से जुड़े पक्ष पुराने भूमि अभिलेखों और ऐतिहासिक दावों का हवाला देते हैं। ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही होना चाहिए कि भूमि का कानूनी स्वामित्व क्या है, निर्माण की वैधानिक स्थिति क्या है और कार्रवाई से पहले संबंधित पक्ष को पर्याप्त कानूनी अवसर मिला या नहीं।
कानून का राज केवल इस बात से सिद्ध नहीं होता कि बुलडोजर कितनी तेजी से चला। वह इस बात से सिद्ध होता है कि कानून सब पर एक समान चला या नहीं। बुलडोजर की ताकत से इमारत गिराई जा सकती है, लेकिन न्यायिक सवाल नहीं।
1991 का कानून और धार्मिक स्थलों की राजनीति
भारत में धार्मिक स्थलों के स्वरूप से जुड़े विवादों के संदर्भ में 1991 का पूजा स्थल कानून लंबे समय से राजनीतिक और कानूनी बहस का विषय रहा है। कानून का मूल उद्देश्य स्वतंत्रता के समय धार्मिक स्थलों की स्थिति को लेकर नए विवादों को रोकना था। इसी कारण जब किसी पुराने धार्मिक स्थल को लेकर नया दावा उभरता है, तो सवाल केवल मंदिर-मस्जिद का नहीं रह जाता; वह संवैधानिक व्यवस्था, न्यायिक प्रक्रिया और सामाजिक शांति का सवाल बन जाता है।
यही कारण है कि किसी भी धार्मिक स्थल पर प्रशासनिक कार्रवाई को केवल राजनीतिक विजय के रूप में देखना खतरनाक हो सकता है। आज यदि किसी समुदाय का धार्मिक स्थल राजनीतिक शक्ति के प्रदर्शन का निशाना बनता है तो कल वही तर्क किसी दूसरे समुदाय के खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकता है। कानून की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह सत्ता के बदलने के बाद भी अपना अर्थ नहीं बदलता।
चुनाव आते हैं तो धार्मिक प्रतीकों की चमक क्यों बढ़ जाती है?
उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव की राजनीतिक तैयारियां शुरू होते ही धार्मिक मुद्दों की तीव्रता बढ़ने की संभावना स्वाभाविक है। भारतीय राजनीति में चुनाव और धार्मिक ध्रुवीकरण का रिश्ता नया नहीं है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या जनता अब भी उसी पुराने राजनीतिक फार्मूले से प्रभावित होगी?
शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, महंगाई, किसान की आय, मजदूर की मजदूरी, युवाओं का भविष्य और छोटे कारोबार की मुश्किलें रोजमर्रा के प्रश्न हैं। इनका कोई बुलडोजर नहीं होता, कोई धार्मिक जुलूस नहीं होता और इनकी तस्वीर सोशल मीडिया पर उतनी वायरल भी नहीं होती। लेकिन चुनाव के बाद सरकार को इन्हीं सवालों का जवाब देना पड़ता है।
यही लोकतंत्र की खूबसूरती और राजनीतिक दलों की परेशानी दोनों है। मंदिर-मस्जिद का सवाल भावनाओं को गर्म कर सकता है, मगर बेरोजगार युवा की जेब में रोजगार नहीं डाल सकता। धार्मिक नारा महंगाई की दर कम नहीं करता। सांप्रदायिक भाषण अस्पताल में डॉक्टर नहीं बढ़ाता। और बुलडोजर किसी परिवार की आय नहीं बढ़ाता।
हिंदुत्व की राजनीति और बदलती युवा चेतना
पिछले वर्षों में किसान आंदोलनों, मजदूर आंदोलनों और युवाओं की विभिन्न मांगों ने यह दिखाया है कि भारतीय समाज को केवल धार्मिक पहचान के चश्मे से नहीं पढ़ा जा सकता। युवा रोजगार चाहता है, छात्र बेहतर शिक्षा चाहता है, किसान उचित मूल्य चाहता है और आम परिवार स्वास्थ्य तथा महंगाई से राहत चाहता है। इन सवालों को धार्मिक पहचान की राजनीति से हमेशा के लिए ढका नहीं जा सकता।
यह कहना जल्दबाजी होगी कि सांप्रदायिक राजनीति समाप्त हो गई है। ऐसा बिल्कुल नहीं है। धार्मिक पहचान आज भी भारतीय राजनीति की शक्तिशाली धुरी है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि मतदाता एक साथ कई पहचान लेकर मतदान करता है। वह हिंदू या मुसलमान होने के साथ बेरोजगार भी है, किसान भी है, कर्मचारी भी है, व्यापारी भी है और अभिभावक भी। उसकी राजनीतिक स्मृति केवल भाषणों से नहीं बनती; वह अपने जीवन की परिस्थितियों से भी बनती है।
तो कौन सुनेगा?
यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल है—तो कौन सुनेगा?
क्या पश्चिमी देशों में रहने वाला भारतीय समुदाय केवल इस आधार पर भागवत की बात स्वीकार कर लेगा कि उन्होंने मंच से विविधता और समानता की बात कही? शायद नहीं। वह भारत की घटनाओं को भी देखेगा।
क्या भारत का मतदाता केवल इसलिए हर प्रशासनिक कार्रवाई को सही मान लेगा कि उसे हिंदुत्व या राष्ट्रवाद की भाषा में प्रस्तुत किया गया है? यह भी निश्चित नहीं।
और क्या संघ की आलोचना करने वाला हर व्यक्ति भागवत के हर वक्तव्य को खारिज कर देगा? लोकतांत्रिक समाज में इसका उत्तर भी जरूरी नहीं है। किसी नेता की बात सही हो सकती है, भले ही उसके संगठन की दूसरी गतिविधियों पर गंभीर सवाल हों। इसी तरह किसी संगठन के किसी अच्छे सामाजिक काम का उल्लेख करने से उसकी आलोचना के अधिकार का अंत नहीं हो जाता।
असल चुनौती यही है कि शब्द और व्यवहार के बीच की दूरी कितनी कम होती है। यदि भागवत सचमुच चाहते हैं कि दुनिया आरएसएस को एक समावेशी और मानवीय संगठन के रूप में देखे, तो सबसे प्रभावी अभियान अमेरिका, कनाडा या इंग्लैंड में भाषणों से नहीं चलेगा। वह भारत के गांवों, कस्बों और शहरों में चलेगा—जहां अल्पसंख्यक अपने अधिकारों को सुरक्षित महसूस करें, बहुसंख्यक को अपनी श्रेष्ठता साबित करने की जरूरत न पड़े, प्रशासन राजनीतिक पहचान देखकर कार्रवाई न करे और कानून का इस्तेमाल प्रतिशोध के बजाय न्याय के लिए हो।
क्योंकि अंततः किसी संगठन की असली पहचान उसके मंच पर बोले गए शब्दों से कम और उसके प्रभाव से पैदा होने वाले सामाजिक व्यवहार से ज्यादा तय होती है। समावेशिता की सबसे विश्वसनीय प्रेस विज्ञप्ति किसी नेता का भाषण नहीं, बल्कि कमजोर नागरिक का सुरक्षित जीवन है।
इसलिए मोहन भागवत के विदेशी दौरे का मूल्यांकन तालियों और विरोध-प्रदर्शनों की गिनती से नहीं होना चाहिए। असली कसौटी यह है कि उनके शब्द भारत की जमीन पर कितने दिखाई देते हैं। अगर मंच पर कहा जाए कि हर मनुष्य बराबर है और जमीन पर नागरिक को उसकी धार्मिक पहचान के कारण भय, भेदभाव या असुरक्षा महसूस हो, तो सवाल उठेगा ही। अगर विविधता को भारत के डीएनए की विशेषता कहा जाए और राजनीति लगातार समाज को पहचान की खांचों में बांटती दिखाई दे, तो विरोधाभास सामने आएगा ही।
और शायद इसीलिए आज सबसे जरूरी सवाल यह नहीं है कि भागवत ने विदेश में क्या कहा। सवाल यह है कि उनकी कही बात को भारत में कौन सुनेगा, कौन मानेगा और कौन उसे व्यवहार में उतारेगा?
क्योंकि लोकतंत्र में भाषण बहुत होते हैं, दावे उससे भी ज्यादा। मगर अंततः जनता वही सुनती है जो उसके जीवन में दिखाई देता है। बाकी सब—तालियां, नारों की गूंज और मंच की चमक—अगले चुनाव तक की राजनीतिक ध्वनि हो सकती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

























