20 अक्टूबर 2026 3:08 पूर्वाह्न

पनगोत्रा साहब चले बुजुर्गियत आंकने ; कदम सड़क पर, नजर पीढ़ियों पर—शाम की सैर का अपना ही व्यंग्य है!

पनगोत्रा साहब चले बुजुर्गियत आंकने, कृष्ण पनगोत्रा और अनिल अनूप की तस्वीर के साथ व्यंग्यात्मक फीचर इमेज

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लेख:- अनिल अनूप

कभी-कभी जिंदगी में कुछ लोग ऐसे मिल जाते हैं, जिनके साथ रिश्ते की परिभाषा किसी एक खाने में फिट नहीं बैठती। वे मित्र भी होते हैं, भाई भी, सलाहकार भी और जरूरत पड़ने पर ऐसे दर्पण भी, जिसमें आदमी अपना चेहरा देखने के बजाय अपनी उम्र, अपनी आदतें और अपनी अक्ल तक नापने लगता है। पनगोत्रा साहब मेरे लिए ऐसे ही प्रियतम लोगों में हैं।

रिटायर्ड शिक्षक हैं। यानी सरकारी नौकरी से तो निवृत्त हो चुके हैं, लेकिन शिक्षक होने से नहीं। शिक्षक का असली रिटायरमेंट शायद होता ही नहीं। वह कक्षा से बाहर आ सकता है, ब्लैकबोर्ड छोड़ सकता है, हाजिरी रजिस्टर बंद कर सकता है, लेकिन दूसरों को समझाने की आदत से छुट्टी लेना उसके लिए उतना ही मुश्किल है, जितना किसी नेता के लिए भाषण से।

पनगोत्रा साहब विचारक भी हैं और यह बीमारी उन्हें रिटायरमेंट के बाद नहीं लगी। विचारक वे काफी पहले से थे। फर्क इतना है कि नौकरी में रहते हुए विचारों को घंटी, पीरियड और पाठ्यक्रम की सीमाओं में रखना पड़ता था। अब घंटी नहीं बजती, पाठ्यक्रम नहीं है और पीरियड की कोई सीमा नहीं। लिहाजा विचार स्वतंत्र हैं और श्रोता बेचारा भी।

एक शाम मैंने उन्हें फोन कर दिया। उधर से आवाज आई—“शाम की सैर पर निकला हूँ।” बस, यहीं से मेरे मन में चुलबुलाहट शुरू हो गई। मैंने सोचा, आदमी शाम की सैर पर निकला है या उम्र की गिनती करने?

शाम की सैर भी बड़ी रहस्यमयी चीज है। जवान आदमी कहे तो समझ में आता है कि स्वास्थ्य बना रहे, वजन न बढ़े, डॉक्टर से बचा रहे। लेकिन बुजुर्ग आदमी शाम की सैर पर निकले तो मामला थोड़ा गंभीर हो जाता है। वह केवल सड़क पर नहीं चलता, अपने बीते हुए वर्षों के बीच भी टहलता है।

हर कदम के साथ एक सवाल चलता है—“अब कितनी उम्र हुई?” और उससे बड़ा सवाल—“दिखती कितनी है?” यहीं से हमारी सामाजिक बुजुर्गियत की असली परीक्षा शुरू होती है। हमारे समाज में उम्र बढ़ना कोई समस्या नहीं है, समस्या यह है कि उम्र बढ़ी हुई दिखे क्यों? बाल सफेद हो जाएं तो लोग कहेंगे—“अब तो अनुभव झलक रहा है।” दो दिन बाद वही लोग पूछेंगे—“डाई क्यों नहीं लगाते?” चेहरे पर झुर्रियां आ जाएं तो कहेंगे—“समय का अनुभव है।” और अगर कोई क्रीम लगाकर झुर्रियां कम कर ले तो फौरन टिप्पणी—“उम्र छिपाने की कोशिश कर रहे हैं!”

अर्थात बुजुर्ग होने की भी सामाजिक आचार संहिता है, जिसका कोई लिखित संविधान नहीं है, लेकिन हर मोहल्ले में उसका पालन करवाने वाले स्वयंभू विशेषज्ञ मौजूद हैं। पनगोत्रा साहब इसी समाज में रहते हैं और शायद इसी कारण उन्हें बुजुर्गियत आंकने का विशेषाधिकार प्राप्त हो गया है।

उनसे बात कीजिए तो लगेगा कि सामने केवल व्यक्ति नहीं, पूरा अनुभव-संसार बैठा है। आप किसी विषय पर दो वाक्य बोलेंगे, वे उसमें तीसरा वाक्य जोड़ देंगे। आप कहेंगे कि आजकल लोग मोबाइल में ज्यादा समय बिताते हैं, वे कहेंग —“हमारे जमाने में लोग किताब पढ़ते थे।”

आप कहेंगे कि आजकल स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ी है, वे तुरंत कहेंगे—“पहले लोग खेत में काम करते थे, अलग से जिम नहीं जाना पड़ता था।”

आप कहेंगे कि मौसम बदल रहा है तो उनका अपना मौसम विज्ञान खुल जाएगा। और यदि आपने गलती से पूछ लिया—“आपकी तबीयत कैसी है?” तो समझिए, आपने कम से कम बीस मिनट का इंटरव्यू स्वयं आमंत्रित कर लिया। लेकिन यही तो उनकी खूबी है। उनके भीतर का शिक्षक अभी जीवित है।

दरअसल रिटायर शिक्षक को समझना भी अपने आप में एक कला है। वह रिटायर होने के बाद भी दुनिया को कक्षा समझता है और आसपास के लोगों को संभावित विद्यार्थी। फर्क केवल इतना है कि अब उसके हाथ में डंडा नहीं होता, लेकिन अनुभव की छड़ी पहले से मजबूत होती है।

पनगोत्रा साहब भी इसी श्रेणी के हैं। उनकी शाम की सैर मुझे इसलिए भी दिलचस्प लगती है कि शायद वह केवल स्वास्थ्य-यात्रा नहीं, बल्कि समाज का दैनिक निरीक्षण भी है। सड़क पर कौन कितनी तेजी से चल रहा है? कौन मोबाइल में गर्दन झुकाए जा रहा है? किसके बाल कितने सफेद हैं? कौन उम्र से कम दिखने की कोशिश कर रहा है? कौन उम्र से ज्यादा गंभीर दिख रहा है? कौन पचास का होकर तीस का व्यवहार कर रहा है और कौन तीस का होकर साठ का चेहरा लेकर घूम रहा है? ये सब प्रश्न शायद उनकी सैर के अदृश्य साथी होंगे। और यही वह जगह है जहां “बुजुर्गियत आंकने” का मजा शुरू होता है।

हमारे समाज में उम्र को लेकर भी एक विचित्र प्रतिस्पर्धा है। कोई अपनी उम्र कम बताना चाहता है, कोई अपनी उपलब्धियां ज्यादा। कोई कहता है—“अभी तो मैं जवान हूं।” और सामने वाला मन ही मन हिसाब लगाने लगता है—“जवान? किस कैलेंडर के हिसाब से?” उम्र का सबसे बड़ा मजाक यही है कि आदमी अपने जन्म प्रमाणपत्र को तो स्वीकार कर लेता है, लेकिन आईने के प्रमाणपत्र को मानने से इनकार कर देता है।

जन्म प्रमाणपत्र कहता है—“साहब, आपकी उम्र इतनी है।” आईना कहता है—“नहीं, उससे थोड़ी ज्यादा लग रही है।” और मोबाइल का फ्रंट कैमरा तो कभी-कभी ऐसा फैसला सुनाता है कि आदमी फोन को ही दोष देने लगता है। “कैमरा खराब है।” कैमरा बेचारा सोचता होगा—“साहब, मैंने क्या किया?”

पनगोत्रा साहब जैसे विचारशील व्यक्ति के सामने यह प्रश्न और भी दिलचस्प हो जाता है कि आखिर बुजुर्गियत है क्या? क्या सफेद बाल बुजुर्गियत हैं? क्या धीमी चाल बुजुर्गियत है? क्या चश्मा बुजुर्गियत है? क्या रिटायरमेंट बुजुर्गियत है? या फिर बुजुर्गियत वह अवस्था है जब आदमी हर नए जमाने की चीज को देखकर कहने लगे—“हमारे समय में ऐसा नहीं होता था”?

अगर आखिरी परिभाषा मान लें तो हमारे आसपास आधी आबादी पहले ही बुजुर्ग हो चुकी है। और मजेदार बात यह है कि यह बीमारी उम्र देखकर नहीं आती। कई नौजवान भी ऐसे मिलते हैं जो हर आधुनिक चीज पर इतिहास की किताब खोल देते हैं।

मोबाइल देखकर कहते हैं—“हमारे समय में चिट्ठियां लिखा करते थे।” अरे भाई, आपका समय अभी गया कहां है? आप तो कल ही इंस्टाग्राम पर थे!

लेकिन बुजुर्गियत का एक सकारात्मक पक्ष भी है। उम्र बढ़ने के साथ आदमी में देखने की क्षमता बढ़ती है। वह केवल घटना नहीं देखता, उसके पीछे की वजह भी खोजता है। वह शब्दों के पीछे का मौन पढ़ता है और चेहरे के पीछे की थकान पहचानता है।

शायद इसी वजह से पनगोत्रा साहब की बातचीत में व्यंग्य भी है और अपनापन भी। वे जब किसी बात पर टिप्पणी करते हैं तो लगता है कि टिप्पणी व्यक्ति पर नहीं, परिस्थिति पर है। और यही सच्चे विचारक की पहचान है। विचारक वह नहीं जो हर बात पर भारी-भरकम शब्द बोल दे। विचारक वह है जो साधारण-सी घटना में भी असाधारण सवाल खोज ले।

जैसे शाम की सैर। साधारण आदमी के लिए यह केवल टहलना है। पनगोत्रा साहब के लिए शायद यह जीवन का चलता-फिरता संपादकीय है।

सड़क पर चलते हुए आदमी बदलते समाज को देख सकता है। पार्क में बैठे बुजुर्ग बदलती पीढ़ी को। मोबाइल में झुके युवा बदलती प्राथमिकताओं को। तेज दौड़ते बच्चे भविष्य को। और खुद के कदमों की रफ्तार अतीत को।

इसलिए मुझे उनका यह कहना कि “शाम की सैर पर निकला हूँ” अब केवल सूचना नहीं लगता। मुझे लगता है, साहब जीवन की शाम में भी थोड़ा टहल रहे हैं और रास्ते में मिलती पीढ़ियों का हिसाब लगा रहे हैं। वैसे बुजुर्गियत आंकना भी कम जिम्मेदारी का काम नहीं है।

इसके लिए अनुभव चाहिए। किसी के चेहरे की दो झुर्रियों को देखकर उम्र बताना आसान है, लेकिन उसके अनुभव की गहराई नापना मुश्किल। किसी की धीमी चाल देखकर उसे बूढ़ा कहना आसान है, लेकिन यह समझना कठिन कि उसने जीवन में कितनी दूरियां तय की हैं। किसी के सफेद बाल गिनना आसान है, लेकिन उन बालों में छिपे संघर्ष गिनना असंभव।

यही वह जगह है जहां पनगोत्रा साहब जैसे लोग हमें चुपचाप सिखाते हैं कि उम्र केवल संख्या नहीं, जमा हुआ समय है। और समय का सबसे सुंदर ब्याज अनुभव होता है।

हालांकि अनुभव भी बड़ा शरारती निवेश है। जब तक जरूरत न हो, कोई पूछता नहीं। जरूरत पड़ते ही सबको वही बुजुर्ग याद आते हैं जिन्हें कल तक लोग “पुराने विचारों वाला” कह रहे थे।

जब परिवार में कोई फैसला अटक जाए—“पापा से पूछ लो।” जब बच्चे को करियर चुनना हो—“दादाजी क्या कहते हैं?” जब घर में पुरानी जमीन का मामला निकले—“उन्हें सब पता होगा।” जब कोई पारिवारिक इतिहास पूछे—“उनसे पूछो, उन्हें याद होगा।”

यानी बुजुर्ग की उपयोगिता तब समझ आती है जब गूगल भी जवाब देने से पहले विज्ञापन दिखाने लगे। पनगोत्रा साहब इसी अनुभव की चलती-फिरती लाइब्रेरी हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि उनकी लाइब्रेरी में किताबें नहीं, किस्से हैं। और किस्सों में जिंदगी है।

कभी-कभी मन करता है कि उनसे पूछूं—“साहब, आप शाम की सैर पर जाते हैं या शाम आपको घुमाने ले जाती है?” शायद वे मुस्कुराकर कहेंगे—“तुम्हें अभी समझने में समय लगेगा।”

और यही उनकी सबसे बड़ी खूबी है। वह जवाब देकर बात खत्म नहीं करते, सवाल छोड़ जाते हैं। शायद इसलिए उनके साथ बातचीत हमेशा थोड़ी देर बाद शुरू होती है। फोन कट जाता है, लेकिन विचार चलता रहता है। उस शाम भी फोन कट गया था, मगर मेरे भीतर एक अजीब सवाल रह गया—हम आखिर किसकी बुजुर्गियत आंक रहे हैं?

पनगोत्रा साहब की? अपनी? या उस समाज की जो उम्र को चेहरे, चाल और बालों से मापता है? शायद हम सब किसी न किसी शाम की सैर पर निकले हुए हैं। कोई शरीर को फिट रखने के लिए चल रहा है, कोई मन को हल्का करने के लिए, कोई डॉक्टर की सलाह पर और कोई अकेलेपन से बचने के लिए।

लेकिन पनगोत्रा साहब की सैर में मुझे एक और अर्थ दिखाई देता है—वह समय के साथ संवाद करने की सैर है। रिटायरमेंट के बाद जीवन समाप्त नहीं होता। बल्कि कई बार नौकरी की भागदौड़ से मुक्त होकर जीवन पहली बार दिखाई देने लगता है।

अब न स्कूल की घंटी है, न पीरियड का दबाव, न छुट्टी की प्रतीक्षा। अब समय है। और समय, यदि विचारशील आदमी के हाथ लग जाए, तो वह अनुभव में बदलता है। पनगोत्रा साहब शायद उसी अनुभव को अपने कदमों में लेकर चलते हैं।

इसलिए जब अगली बार मैं उन्हें फोन करूंगा और उधर से आवाज आएगी—“शाम की सैर पर निकला हूँ।” तो मैं यह नहीं पूछूंगा कि “कितनी दूर चल लिए?” मैं शायद पूछूंगा—“साहब, आज कितनी बुजुर्गियत नापी?”

और अगर वे हंस पड़े तो समझूंगा कि आंकड़ा सही आया है। क्योंकि असली बुजुर्गियत उम्र में नहीं, नजरिए में होती है। जो आदमी नई पीढ़ी को समझने की कोशिश करता रहे, वह उम्रदराज होकर भी बूढ़ा नहीं होता। और जो आदमी हर नई बात को देखकर अपनी पुरानी दुनिया की दुहाई देने लगे, वह कम उम्र में भी बुजुर्ग हो चुका होता है।

पनगोत्रा साहब की खूबसूरती यही है कि वे उम्र के साथ चल रहे हैं, उम्र से भाग नहीं रहे। उनकी शाम की सैर शायद इसी स्वीकार का उत्सव है। और लेखक के लिए वे केवल रिटायर्ड शिक्षक नहीं। वे भाई जैसे हैं। ऐसे भाई, जिनसे कभी-कभी फोन पर दो मिनट बात करने का इरादा होता है और बातचीत खत्म होने के बाद पता चलता है कि जिंदगी पर एक पूरा व्याख्यान सुन लिया।

लेकिन शिकायत किस बात की? कुछ लोग समय देते हैं। कुछ लोग अनुभव देते हैं। और कुछ लोग समय और अनुभव दोनों को हंसी में लपेटकर दे देते हैं। पनगोत्रा साहब उन्हीं लोगों में हैं।

इसलिए साहब चले हैं शाम की सैर पर। शायद सड़क पर कुछ कदम और चलेंगे। शायद किसी पेड़ की छाया में रुकेंगे। शायद किसी परिचित को देखकर मुस्कुराएंगे। शायद किसी नौजवान को मोबाइल में सिर झुकाए देखकर मन ही मन टिप्पणी करेंगे। और शायद कहीं भीतर यह भी सोचेंगे कि दुनिया कितनी बदल गई।

लेकिन मुझे भरोसा है, उनकी सैर का सबसे लंबा रास्ता सड़क पर नहीं, विचारों में है। और उस रास्ते पर चलते हुए वे बुजुर्गियत नहीं आंकते होंगे। वे शायद जिंदगी की उम्र आंकते होंगे। क्योंकि उम्र तो जन्म के साथ तय हो जाती है, मगर बुजुर्गियत आदमी अपने व्यवहार से कमाता है। इसीलिए पनगोत्रा साहब को देखकर मन में यही बात आती है— साहब रिटायर जरूर हुए हैं, लेकिन विचारों से अभी भी ड्यूटी पर हैं।

और हम जैसे लोगों की शाम की सैर शायद तब शुरू होगी, जब हम यह समझ पाएंगे कि उम्र बढ़ने से डरने की जरूरत नहीं; डरना तो उस दिन चाहिए जब उम्र बढ़े और समझ न बढ़े। पनगोत्रा साहब चले बुजुर्गियत आंकने हैं। लेकिन संभव है, लौटते-लौटते वे हमारी बुजुर्गियत का पैमाना ही बदल आएं।

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