कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में सरकारी विद्यालयों की भूमिका जितनी महत्वपूर्ण है, उतने ही गंभीर सवाल समय-समय पर इन विद्यालयों की व्यवस्थाओं को लेकर भी उठते रहे हैं। खासकर कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों में पढ़ने वाली गरीब, वंचित और जरूरतमंद छात्राओं के लिए शिक्षा के साथ सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण उपलब्ध कराना बेहद जरूरी है। लेकिन लखनऊ जिले के मलिहाबाद तहसील क्षेत्र के ढेढ़ेमऊ स्थित कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय का एक मामला इन दिनों चर्चा में है। यहां पढ़ने वाली दो अनाथ सगी बहनों के अचानक विद्यालय छोड़ने के बाद परिजनों के आरोप और विद्यालय प्रशासन की सफाई आमने-सामने आ गई है।
रहीमाबाद थाना क्षेत्र के सभाखेड़ा गांव की रहने वाली दोनों छात्राओं के परिजनों ने विद्यालय की शिक्षिकाओं पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि बच्चियों को पढ़ाई कराने के बजाय उनसे झाड़ू-पोंछा और साफ-सफाई का काम कराया जाता था। आरोप है कि बच्चियों ने जब इसका विरोध किया तो उनके साथ कथित रूप से मारपीट और मानसिक प्रताड़ना की गई। मामला तब और चर्चा में आ गया, जब दोनों छात्राओं से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ।
वीडियो सामने आने के बाद जहां लोगों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग शुरू कर दी, वहीं विद्यालय प्रशासन की ओर से भी अपना पक्ष रखा गया। विद्यालय की वार्डन नीलिमा सिंह ने छात्राओं और उनके परिजनों द्वारा लगाए गए आरोपों को पूरी तरह निराधार और मनगढ़ंत बताया है। वार्डन का कहना है कि छात्राओं से सफाई का काम कराने का कोई सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि विद्यालय परिसर की सफाई के लिए बाकायदा सफाई कर्मचारियों की व्यवस्था है।
इस तरह इस पूरे मामले में फिलहाल दो अलग-अलग दावे सामने हैं। एक तरफ छात्राओं के परिजन विद्यालय में कथित प्रताड़ना और पढ़ाई के बजाय काम कराने का आरोप लगा रहे हैं, तो दूसरी तरफ विद्यालय प्रशासन का दावा है कि बच्चियों ने विद्यालय इसलिए छोड़ा क्योंकि उनके परिजन उनकी शादी कराना चाहते हैं।
दादा का आरोप- पढ़ाई की जगह कराया जाता था काम
दोनों छात्राओं के पिता की मृत्यु हो चुकी है। पिता के निधन के बाद उनके बुजुर्ग दादा ही बच्चियों का पालन-पोषण कर रहे हैं। दादा का आरोप है कि उन्होंने अपनी पोतियों को बेहतर भविष्य की उम्मीद में आवासीय विद्यालय में पढ़ने के लिए भेजा था, लेकिन वहां उनकी पढ़ाई पर पर्याप्त ध्यान देने के बजाय उनसे झाड़ू-पोंछा और साफ-सफाई का काम कराया जाता था।
दादा के मुताबिक, बच्चियां इस बात को लेकर परेशान थीं। जब उन्होंने कथित तौर पर काम करने से मना किया तो उनके साथ मारपीट की गई और उन्हें मानसिक रूप से परेशान किया गया। उनका कहना है कि लगातार कथित प्रताड़ना से परेशान होकर दोनों बच्चियों ने विद्यालय छोड़ दिया।
परिजनों के इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हुई है। यही वजह है कि मामले में जांच की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि छात्राओं से पढ़ाई के बजाय नियमित रूप से घरेलू या सफाई संबंधी काम कराया जाता था, तो यह गंभीर प्रशासनिक सवाल खड़ा करेगा। वहीं यदि विद्यालय प्रशासन के दावे सही हैं और छात्राओं को किसी प्रकार की प्रताड़ना नहीं दी गई, तो वायरल वीडियो और लगाए गए आरोपों के पीछे की वास्तविक स्थिति भी सामने आनी चाहिए।
टीसी और मार्कशीट को लेकर भी उठे सवाल
दादा ने विद्यालय प्रशासन पर एक और गंभीर आरोप लगाया है। उनका कहना है कि जब वे दोनों छात्राओं की टीसी और मार्कशीट लेने विद्यालय पहुंचे तो उन्हें दस्तावेज देने से मना कर दिया गया। दादा का दावा है कि उन्हें इस दौरान कथित रूप से धमकाया भी गया।
शिक्षा से जुड़े दस्तावेज किसी भी विद्यार्थी के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए यदि दस्तावेज रोके गए हैं, तो इसके पीछे का कारण भी स्पष्ट होना चाहिए। दूसरी ओर विद्यालय प्रशासन की ओर से इस आरोप पर क्या औपचारिक प्रक्रिया अपनाई गई, यह भी जांच के दौरान सामने आना जरूरी है।
मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों बच्चियां नाबालिग हैं और उनके भविष्य का सवाल सीधे तौर पर शिक्षा से जुड़ा है। ऐसे में आरोपों की राजनीतिक या भावनात्मक व्याख्या से अधिक जरूरी यह पता लगाना है कि वास्तव में विद्यालय में क्या हुआ और बच्चियों ने पढ़ाई क्यों छोड़ी।
वार्डन का जवाब- विद्यालय में सफाई कर्मचारी तैनात
परिजनों के आरोपों पर विद्यालय की वार्डन नीलिमा सिंह ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि छात्राओं से झाड़ू-पोंछा कराने का आरोप पूरी तरह गलत है। उनका कहना है कि विद्यालय परिसर में सफाई व्यवस्था के लिए सफाई कर्मचारियों की तैनाती है और कर्मचारी प्रतिदिन अपना काम करते हैं।
वार्डन के अनुसार जब विद्यालय में सफाई कर्मचारियों की व्यवस्था है, तो छात्राओं से सफाई कराने की जरूरत ही नहीं है। उन्होंने छात्राओं के परिजनों द्वारा लगाए गए अन्य आरोपों को भी निराधार बताया।
यानी इस मामले में एक ओर दादा का दावा है कि बच्चियों से काम कराया जाता था, जबकि दूसरी ओर वार्डन कह रही हैं कि सफाई के लिए कर्मचारी पहले से मौजूद हैं। अब सच क्या है, यह केवल आरोप-प्रत्यारोप से तय नहीं हो सकता। इसके लिए विद्यालय के रिकॉर्ड, छात्राओं के बयान, अन्य छात्राओं और कर्मचारियों के बयान तथा उपलब्ध साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच आवश्यक होगी।
वार्डन ने बताया- रक्षाबंधन की छुट्टी के बाद नहीं लौटीं बच्चियां
वार्डन नीलिमा सिंह ने छात्राओं के विद्यालय छोड़ने की एक अलग तस्वीर पेश की है। उनका कहना है कि दोनों बहनें रक्षाबंधन की छुट्टी के दौरान घर गई थीं। दोनों छात्राएं अलग-अलग दिनों के अंतराल पर विद्यालय से घर गई थीं।
वार्डन के मुताबिक, 30 अगस्त को विद्यालय खुलने के बाद दोनों छात्राएं वापस नहीं आईं। इसके बाद उनकी क्लास टीचर सुनीता मौर्या ने परिजनों से फोन पर संपर्क किया। वार्डन का दावा है कि फोन पर छात्राओं के बाबा ने बच्चियों को विद्यालय भेजने से मना कर दिया।
वार्डन के अनुसार फोन पर यह भी बताया गया कि घर में शादी के लिए लड़के वाले आने वाले हैं, इसलिए छात्राएं विद्यालय नहीं आ सकतीं। इसके बाद 5 सितंबर को भी विद्यालय की ओर से संपर्क किया गया, लेकिन वार्डन का दावा है कि उस समय भी परिजनों ने बच्चियों को आगे पढ़ाने से इनकार कर दिया।
यदि वार्डन का यह दावा सही है, तो मामला विद्यालय में कथित प्रताड़ना से आगे बढ़कर बालिकाओं की शिक्षा और उनके भविष्य से जुड़ा महत्वपूर्ण सामाजिक सवाल बन जाता है। वहीं यदि परिजनों के आरोप सही हैं, तो बच्चियों के विद्यालय छोड़ने का कारण विद्यालय का वातावरण भी हो सकता है। इसलिए दोनों पक्षों के दावों की जांच जरूरी है।
फुटबॉल में स्टेट लेवल चयन का भी दावा
विद्यालय की वार्डन नीलिमा सिंह ने दोनों छात्राओं की पढ़ाई के साथ-साथ खेल प्रतिभा का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार दोनों बहनें कक्षा सात में पढ़ती हैं और उनमें से छोटी बहन खेलकूद में बेहद होनहार थी।
वार्डन का दावा है कि छोटी बहन का फुटबॉल में स्टेट लेवल पर चयन हुआ था। वह प्रतियोगिता में भाग लेना चाहती थी, लेकिन उसके दादा ने आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए, जिसके कारण वह प्रतियोगिता में शामिल नहीं हो सकी।
वार्डन ने यह भी बताया कि रक्षाबंधन के अवसर पर आयोजित मुख्यमंत्री के विशेष कार्यक्रम में भी बच्चियों को शामिल होने की अनुमति परिजनों की ओर से नहीं दी गई।
विद्यालय प्रशासन के इस दावे की भी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। यदि बच्ची वास्तव में राज्य स्तरीय फुटबॉल प्रतियोगिता के लिए चयनित हुई थी, तो इससे यह सवाल भी उठता है कि उसकी खेल प्रतिभा और शिक्षा को आगे बढ़ाने में परिवार की क्या भूमिका रही। वहीं यदि परिवार विद्यालय की व्यवस्था से संतुष्ट नहीं था, तो बच्चियों को वहां से हटाने के पीछे उसके अपने कारण भी हो सकते हैं।
दो दावे, एक सवाल- आखिर बच्चियों ने स्कूल क्यों छोड़ा?
पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है कि दोनों बच्चियों ने आखिर विद्यालय क्यों छोड़ा?
परिजन कहते हैं कि कथित प्रताड़ना और पढ़ाई के बजाय झाड़ू-पोंछा कराने से परेशान होकर बच्चियों ने विद्यालय छोड़ा। दूसरी तरफ वार्डन का कहना है कि बच्चियों को विद्यालय भेजने से परिजनों ने इसलिए मना किया क्योंकि घर में शादी की तैयारी चल रही थी।
इन दोनों दावों में जमीन-आसमान का अंतर है। एक आरोप विद्यालय की कार्यप्रणाली और शिक्षिकाओं के व्यवहार पर सवाल उठाता है, जबकि दूसरा दावा परिवार की ओर से बालिकाओं की पढ़ाई छुड़ाने की ओर इशारा करता है।
ऐसे में केवल वायरल वीडियो के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। बच्चों से जुड़े मामलों में तथ्य, दस्तावेज और प्रत्यक्ष बयान सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। दोनों छात्राओं से स्वतंत्र और संवेदनशील वातावरण में बातचीत कराई जाए तो उनके विद्यालय छोड़ने की वास्तविक वजह सामने आने की संभावना बढ़ सकती है।
जांच हुई तो कई सवालों के जवाब मिल सकते हैं
इस मामले की निष्पक्ष जांच इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आरोप दो नाबालिग छात्राओं से जुड़े हैं। जांच में यह देखा जाना चाहिए कि विद्यालय में छात्राओं से किसी प्रकार का सफाई संबंधी काम कराया जाता था या नहीं, शिक्षिकाओं और छात्राओं के बीच व्यवहार कैसा था, बच्चियों की उपस्थिति का रिकॉर्ड क्या कहता है और विद्यालय छोड़ने से पहले उनकी ओर से कोई शिकायत दर्ज की गई थी या नहीं।
इसके अलावा यह भी देखा जाना चाहिए कि दोनों छात्राओं की टीसी और मार्कशीट के संबंध में विद्यालय ने क्या प्रक्रिया अपनाई। वार्डन द्वारा बताए गए फोन कॉल और परिजनों द्वारा लगाए गए आरोपों के बीच भी तथ्यों की पुष्टि की जा सकती है।
यदि छात्राओं ने वास्तव में किसी शिक्षक या कर्मचारी के खिलाफ शिकायत की थी तो उसका रिकॉर्ड सामने आना चाहिए। वहीं यदि परिवार ने खुद बच्चियों को विद्यालय भेजने से इनकार किया है तो उसका कारण भी स्पष्ट होना चाहिए।
बच्चियों की पढ़ाई और सुरक्षा सबसे ऊपर
कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों का उद्देश्य उन बालिकाओं को शिक्षा का अवसर उपलब्ध कराना है, जो सामाजिक या आर्थिक कारणों से शिक्षा से दूर रह सकती हैं। इसलिए ऐसे किसी भी विवाद को महज एक स्थानीय विवाद मानकर छोड़ देना उचित नहीं होगा।
यहां दो अनाथ बहनों का भविष्य दांव पर है। आरोप सही हों तो उन्हें न्याय और सुरक्षित शैक्षणिक वातावरण मिलना चाहिए। आरोप गलत हों तो विद्यालय प्रशासन पर लगे गंभीर आरोपों की सच्चाई भी स्पष्ट होनी चाहिए। और यदि परिवार वास्तव में बच्चियों की कम उम्र में शादी कराने की तैयारी कर रहा है, तो यह भी बालिकाओं के शिक्षा अधिकार और उनके भविष्य से जुड़ा गंभीर विषय है।
फिलहाल इस मामले में आरोप और जवाब दोनों सामने आ चुके हैं, लेकिन अंतिम सच जांच के बाद ही स्पष्ट होगा। सबसे जरूरी यह है कि जांच निष्पक्ष हो, बच्चियों पर किसी प्रकार का दबाव न हो और उनके बयान को प्राथमिकता दी जाए।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि झाड़ू-पोंछा किसने कराया या किसने नहीं कराया। असली सवाल यह है कि जिन बच्चियों के हाथों में किताबें और फुटबॉल होनी चाहिए, उनके भविष्य का फैसला आखिर कौन करेगा—विद्यालय, परिवार या खुद वे बच्चियां?

























