खास बात

महाराजा “कंस पासी” का किला या मस्जिद-कब्रिस्तान? मलिहाबाद में ऐतिहासिक दावे को लेकर बढ़ा विवाद

कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश की राजधानी Lucknow के मलिहाबाद क्षेत्र में एक पुराना ऐतिहासिक स्थल इन दिनों बड़े विवाद का केंद्र बन गया है। कांसमंडी इलाके में स्थित एक मस्जिद और कब्रिस्तान को लेकर पासी समाज तथा मुस्लिम समुदाय आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं। पासी समाज का दावा है कि यह स्थान दरअसल महाराजा कंस पासी के प्राचीन किले का हिस्सा है, जहां कभी पूजा-अर्चना होती थी, जबकि वर्तमान समय में वहां नमाज अदा की जा रही है। दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष इसे सरकारी अभिलेखों में दर्ज मस्जिद और मकबरा बता रहा है।

मामले ने राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर तूल पकड़ लिया है। पासी समाज के नेताओं ने इस विवाद को अपनी आस्था और इतिहास से जोड़ते हुए मुख्यमंत्री Yogi Adityanath से हस्तक्षेप की मांग की है। वहीं मुस्लिम पक्ष इसे धार्मिक स्थलों को लेकर चल रही नई विवादित प्रवृत्ति का हिस्सा बता रहा है।

कांसमंडी में इतिहास बनाम वर्तमान का संघर्ष

मलिहाबाद के कांसमंडी क्षेत्र में स्थित विवादित स्थल को लेकर लंबे समय से स्थानीय स्तर पर चर्चाएं होती रही हैं, लेकिन हाल के दिनों में यह मामला अचानक सुर्खियों में आ गया। पासी समाज का कहना है कि यह स्थल महाराजा कंस पासी के ऐतिहासिक किले का अवशेष है। समाज के लोगों का आरोप है कि समय के साथ यहां की मूल संरचना बदल दी गई और अब इसे मस्जिद तथा कब्रिस्तान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

पासी समाज के नेता सूरज पासवान ने मुख्यमंत्री को भेजे गए प्रार्थना पत्र में कहा है कि यह स्थान उनकी आस्था और गौरव का प्रतीक है। उनका आरोप है कि किले के भीतर बने प्राचीन शिव मंदिर पर भी कब्जा कर लिया गया है। उन्होंने इस ऐतिहासिक धरोहर को पुनर्जीवित करने और इसकी पुरातात्विक जांच कराने की मांग उठाई है।

अंग्रेजी गजेटियर के हवाले से किया जा रहा दावा

पासी समाज अपने दावे के समर्थन में अंग्रेजी गजेटियर और स्थानीय ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला दे रहा है। समाज के लोगों का कहना है कि कासमंडी का नाम ही राजा कंस से जुड़ा हुआ है। स्थानीय परंपराओं में उन्हें राजपासी शासक माना जाता है, जिन्होंने अवध क्षेत्र में लंबे समय तक शासन किया था।

बताया जा रहा है कि पुराने लखनऊ गजेटियर में भी उल्लेख मिलता है कि 11वीं शताब्दी के अंतिम दौर में काकोरी और आसपास के क्षेत्रों पर राजा कंस का प्रभाव था। इतिहासकारों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार, जब सालार मसूद गाजी अवध क्षेत्र की ओर बढ़ा, तब राजा कंस ने उसका मुकाबला किया था।

पासी समाज यह भी दावा करता है कि कांसमंडी क्षेत्र में सालार मसूद के दो सेनापतियों सैय्यद हातिम और खातिम को युद्ध में पराजित किया गया था। इस कारण राजा कंस पासी को विदेशी आक्रमणकारियों के खिलाफ संघर्ष करने वाले योद्धा के रूप में देखा जाता है।

शिव मंदिर और अवैध कब्जे का आरोप

विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू वह दावा है जिसमें पासी समाज ने कहा है कि किले के भीतर स्थित प्राचीन शिव मंदिर पर अवैध कब्जा कर लिया गया है। समाज के लोगों का आरोप है कि अब वहां नियमित रूप से नमाज अदा की जाती है और परिसर में नई कब्रें भी बना दी गई हैं।

उनका यह भी कहना है कि किले के बाहर उर्दू में शिलापट्ट लगा दिया गया है, जिससे स्थल की मूल पहचान बदलने की कोशिश की जा रही है। पासी समाज के संगठनों ने इस मुद्दे को लेकर प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं और प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं।

समाज के नेताओं का कहना है कि यदि समय रहते इस मामले पर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह विवाद और अधिक गंभीर रूप ले सकता है। कई संगठनों ने पुरातत्व विभाग से भी जांच कराने की मांग उठाई है।

मुस्लिम पक्ष ने दावों को बताया निराधार

दूसरी ओर स्थानीय मुस्लिम समुदाय इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर रहा है। मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह स्थल वर्षों से मस्जिद और मकबरे के रूप में जाना जाता है तथा सरकारी दस्तावेजों में भी इसकी यही पहचान दर्ज है।

मौलाना सूफियान सहित कई स्थानीय लोगों का कहना है कि हाल के वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में धार्मिक स्थलों को लेकर नए-नए दावे किए जा रहे हैं। उनका आरोप है कि पहले संभल और भोजशाला जैसे मुद्दे उठाए गए और अब मलिहाबाद को विवाद में लाया जा रहा है।

मुस्लिम समाज का कहना है कि इस प्रकार के दावों से सामाजिक सौहार्द प्रभावित होता है और इलाके का माहौल खराब होता है। स्थानीय लोगों ने प्रशासन से शांति व्यवस्था बनाए रखने की मांग की है।

कौन थे महाराजा कंस पासी?

महाराजा कंस पासी को अवध क्षेत्र के शक्तिशाली राजाओं में गिना जाता है। स्थानीय इतिहास और जनश्रुतियों के अनुसार, उनका शासन लगभग वर्ष 980 से 1031 के बीच माना जाता है। कहा जाता है कि उनका प्रभाव वर्तमान लखनऊ, उन्नाव, हरदोई और संडीला तक फैला हुआ था।

पासी समाज उन्हें वीरता, स्वाभिमान और प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में देखता है। समाज के लोग दावा करते हैं कि उन्होंने विदेशी आक्रमणकारियों के खिलाफ संघर्ष किया और अवध की सांस्कृतिक पहचान की रक्षा की।

हाल के वर्षों में पासी समाज ने महाराजा कंस पासी की विरासत को संरक्षित करने के लिए कई आंदोलन भी किए हैं। कांसमंडी में स्थित कथित किले को लेकर भी समाज लगातार सक्रिय रहा है।

प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती

मलिहाबाद में बढ़ते इस विवाद ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। धार्मिक और ऐतिहासिक दावों के कारण मामला बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। प्रशासनिक अधिकारियों की नजर पूरे घटनाक्रम पर बनी हुई है और क्षेत्र में शांति बनाए रखने के प्रयास किए जा रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में ऐतिहासिक तथ्यों, पुरातात्विक साक्ष्यों और सरकारी अभिलेखों की निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी होती है। बिना प्रमाण के किसी निष्कर्ष पर पहुंचना सामाजिक तनाव को बढ़ा सकता है।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि आने वाले समय में यह विवाद प्रदेश की राजनीति में भी बड़ा मुद्दा बन सकता है, क्योंकि इसमें इतिहास, धर्म और सामाजिक पहचान तीनों पहलू जुड़े हुए हैं।

इतिहास की परतों में उलझा विवाद

मलिहाबाद का यह विवाद केवल जमीन या धार्मिक स्थल का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह इतिहास, पहचान और आस्था की जंग के रूप में सामने आ रहा है। एक ओर पासी समाज अपने गौरवशाली अतीत को पुनर्जीवित करने की मांग कर रहा है, तो दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय अपने धार्मिक अधिकारों और ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला दे रहा है।

अब सबकी नजर राज्य सरकार और प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच और साक्ष्यों के आधार पर इस विवाद का समाधान किस दिशा में आगे बढ़ता है।

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