मंदाकिनी की बाढ़ के बाद रामघाट में निर्माण पर ब्रेक, डूब क्षेत्र में अब नहीं बनेंगे मकान-दुकान

मंदाकिनी नदी की बाढ़ के बाद रामघाट में डूब क्षेत्र में नए मकान-दुकान निर्माण पर रोक को दर्शाती फीचर इमेज, रिपोर्टर सूरज सिंह राणा के साथ

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सूरज सिंह राणा 

चित्रकूट। मंदाकिनी नदी में करीब 23 साल बाद 29 अगस्त को आई रिकॉर्ड बाढ़ ने रामघाट और उसके आसपास के इलाकों में जिस तरह तबाही मचाई, उसने प्रशासन के सामने भविष्य की बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। बाढ़ का पानी उतरने के बाद अब प्रशासन ने नदी के डूब क्षेत्र को लेकर सख्त रुख अपनाया है। रामघाट में बाढ़ की जद में आए इलाकों में अब मकान और दुकानों का नया निर्माण नहीं होने दिया जाएगा। जिलाधिकारी पुलकित गर्ग ने नगर पालिका को इस संबंध में स्पष्ट निर्देश दिए हैं।

प्रशासन का तर्क है कि जिस क्षेत्र में बाढ़ का पानी बार-बार पहुंचता है, वहां दोबारा निर्माण की अनुमति देना भविष्य में बड़े खतरे को न्योता देना होगा। इससे न केवल लोगों की जान जोखिम में पड़ सकती है, बल्कि मकान, दुकान और अन्य संपत्तियां भी दोबारा तबाह हो सकती हैं। इसी वजह से अब नदी के पुराने प्रवाह क्षेत्र और डूब क्षेत्र को चिह्नित करने की प्रक्रिया को भी गति दी जा रही है।

29 अगस्त की बाढ़ ने खोली व्यवस्थाओं की पोल

मंदाकिनी नदी में अचानक बढ़े जलस्तर ने रामघाट सहित आसपास के गांवों को बुरी तरह प्रभावित किया। बाढ़ के दौरान रामघाट की करीब 20 दुकानों को नुकसान पहुंचा, जबकि जिलेभर में कुल 1016 मकान और दुकानें क्षतिग्रस्त होने की जानकारी सामने आई है। रामघाट के अलावा 16 गांव भी बाढ़ से प्रभावित हुए।

बाढ़ का पानी उतरने के बाद तबाही के निशान अब भी कई स्थानों पर दिखाई दे रहे हैं। मंदाकिनी के साथ सरयू और पयस्वनी नदी के तटवर्ती क्षेत्रों में बने कई भवनों की दीवारों में दरारें आई हैं। कुछ भवनों की संरचना को भी नुकसान पहुंचा है। ऐसे में प्रशासन के सामने तत्काल राहत के साथ-साथ भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा उत्पन्न होने पर नुकसान कम करने की चुनौती है।

प्रभावित परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट करने की तैयारी भी की जा रही है। प्रशासन का मानना है कि नदी के डूब क्षेत्र में रहने वाले परिवारों को सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराना जरूरी है, ताकि भविष्य में जलस्तर बढ़ने की स्थिति में जान-माल का खतरा कम किया जा सके।

जर्जर भवनों पर नगर पालिका की नजर

बाढ़ के बाद नगर पालिका ने रामघाट और आसपास के प्रभावित क्षेत्रों में भवनों की स्थिति का सर्वे कराया। सर्वे में जर्जर पाए गए 25 मकानों के मालिकों को नोटिस जारी किया गया है। नगर पालिका ने संबंधित भवन स्वामियों से तीन दिन के भीतर क्षतिग्रस्त भवनों की मरम्मत कराने को कहा है।

नोटिस में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि भवन स्वामी निर्धारित अवधि में आवश्यक मरम्मत नहीं कराते हैं तो नगर पालिका द्वारा भवन को ध्वस्त कराया जा सकता है। इसके बाद मलबा हटाने का खर्च भी संबंधित भवन स्वामी से भू-राजस्व की तरह वसूल किए जाने की बात कही गई है।

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इस कार्रवाई ने बाढ़ पीड़ित परिवारों की चिंता बढ़ा दी है। जिन लोगों के घर और दुकानें बाढ़ में क्षतिग्रस्त हुईं, उनके सामने एक ओर आर्थिक संकट है तो दूसरी ओर अब प्रशासनिक कार्रवाई की चिंता भी खड़ी हो गई है।

राहत के बीच कार्रवाई से नाराज बाढ़ पीड़ित

बाढ़ पीड़ितों का कहना है कि प्राकृतिक आपदा ने पहले ही उनकी कमर तोड़ दी है। ऐसे समय में उन्हें राहत और पुनर्वास की जरूरत है। प्रभावित लोगों में कुछ का आरोप है कि आपदा के बाद मदद और संवेदना के बजाय उन्हें नोटिस थमाए जा रहे हैं।

लोग यह सवाल भी उठा रहे हैं कि जिन स्थानों पर वर्षों से मकान और दुकानें बनी हुई थीं, वहां निर्माण के समय प्रशासन और नगर पालिका ने प्रभावी निगरानी क्यों नहीं की। उनका कहना है कि यदि डूब क्षेत्र में निर्माण नियमों के विपरीत था तो उसे पहले ही रोका जाना चाहिए था। अब बाढ़ आने के बाद कार्रवाई होने से प्रभावित परिवारों के सामने भविष्य को लेकर असमंजस पैदा हो गया है।

पीड़ितों का यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि यदि किसी भवन का निर्माण लंबे समय से मौजूद था और संबंधित विभागों की जानकारी में था, तो उसकी वैधानिक स्थिति और सुरक्षा का आकलन पहले क्यों नहीं किया गया। हालांकि प्रशासन का कहना है कि मौजूदा कार्रवाई का उद्देश्य किसी को परेशान करना या उजाड़ना नहीं, बल्कि भविष्य में होने वाली दुर्घटनाओं से लोगों को बचाना है।

डीएम के निर्देश पर डूब क्षेत्र में सर्वे

नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी राजकिशोर प्रसाद ने बताया कि जिलाधिकारी पुलकित गर्ग के निर्देश पर मंदाकिनी के डूब क्षेत्र में सर्वे कराया गया था। सर्वे में जो भवन जर्जर स्थिति में पाए गए, उनके मालिकों को नोटिस दिया गया है।

उनका कहना है कि नोटिस का उद्देश्य किसी परिवार को उजाड़ना नहीं है। प्रशासन चाहता है कि कमजोर और खतरनाक भवनों की मरम्मत कराई जाए, ताकि भविष्य में बाढ़ या किसी अन्य आपदा की स्थिति में जनहानि का खतरा कम हो सके।

यह रुख इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि रामघाट धार्मिक और पर्यटन की दृष्टि से चित्रकूट का प्रमुख क्षेत्र है। यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं। ऐसे में नदी के किनारे कमजोर भवनों और अनियोजित निर्माण से स्थानीय लोगों के साथ-साथ बाहर से आने वाले लोगों की सुरक्षा भी जुड़ी हुई है।

बाढ़ पीड़ितों के लिए आर्थिक सहायता

एसडीएम अजय कुमार यादव के अनुसार जिन घरों में बाढ़ का पानी भर गया था, उनके प्रभावित परिवारों को 5000 रुपये की सहायता दी जा रही है। इसके अलावा भवन क्षतिग्रस्त होने पर 4000 रुपये अतिरिक्त सहायता का प्रावधान बताया गया है।

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हालांकि बाढ़ से हुए नुकसान को देखते हुए प्रभावित परिवारों के लिए यह सहायता कितनी पर्याप्त होगी, यह अलग सवाल है। कई परिवारों के मकान और दुकानों में पानी घुसने से घरेलू सामान, व्यापारिक सामग्री और निर्माण ढांचे को नुकसान हुआ है। ऐसे में राहत राशि के साथ पुनर्वास और सुरक्षित आवास की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

तीनों नदियों के पुराने प्रवाह क्षेत्र का होगा सीमांकन

मंदाकिनी के साथ अब सरयू और पयस्वनी नदी के पुराने प्रवाह क्षेत्र का भी सीमांकन कराया जाएगा। प्रशासन की योजना है कि नदी के वास्तविक और पुराने प्रवाह क्षेत्र को चिह्नित कर वहां पिलर लगाए जाएं। इससे भविष्य में डूब क्षेत्र की सीमा को लेकर भ्रम की स्थिति कम होगी और नए निर्माण पर निगरानी आसान होगी।

यह कदम चित्रकूट के लिए लंबे समय में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। नदी के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र पर यदि निर्माण बढ़ता रहा तो सामान्य से अधिक बारिश या अचानक जलस्तर बढ़ने की स्थिति में बाढ़ का असर और गंभीर हो सकता है।

प्रशासन अब केवल बाढ़ के बाद राहत देने के बजाय बाढ़ के संभावित कारणों और संवेदनशील क्षेत्रों पर भी ध्यान देने की कोशिश कर रहा है। यही वजह है कि डूब क्षेत्र, अवैध निर्माण और नदी के पुराने प्रवाह मार्ग को लेकर कार्रवाई की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं।

बूढ़े हनुमान मंदिर घाट के पास बैराज की तैयारी

बाढ़ नियंत्रण की दिशा में एक और महत्वपूर्ण प्रस्ताव बूढ़े हनुमान मंदिर घाट के पास बैराज निर्माण से जुड़ा है। जिलाधिकारी ने सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता को बैराज के लिए विस्तृत लेआउट तैयार करने के निर्देश दिए हैं।

बैराज का प्रस्ताव किस तरह तैयार होता है और उससे नदी के जलप्रवाह तथा आसपास के क्षेत्रों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह विस्तृत तकनीकी अध्ययन के बाद ही स्पष्ट होगा। फिलहाल प्रशासन इस दिशा में प्रारंभिक प्रक्रिया आगे बढ़ा रहा है।

चित्रकूट जैसे धार्मिक और पर्यटन क्षेत्र में नदी प्रबंधन का सवाल केवल बाढ़ तक सीमित नहीं है। नदी का प्राकृतिक प्रवाह, घाटों की सुरक्षा, तटवर्ती निर्माण और श्रद्धालुओं की आवाजाही—इन सभी पहलुओं को एक साथ देखकर स्थायी व्यवस्था तैयार करना जरूरी होगा।

मध्यप्रदेश के चित्रकूट क्षेत्र में भी अवैध निर्माण पर निगरानी

मंदाकिनी नदी का प्रभाव केवल उत्तर प्रदेश के चित्रकूट तक सीमित नहीं है। मध्यप्रदेश के सतना जिले के चित्रकूट क्षेत्र में भी नदी और उसके आसपास के क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों को लेकर निगरानी बढ़ाई जा रही है।

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सतना कलेक्टर डा. सतीश कुमार एस के स्तर से वहां अवैध निर्माणों को चिह्नित कराने की कार्रवाई किए जाने की जानकारी है। दोनों राज्यों में स्थित चित्रकूट क्षेत्र की भौगोलिक और धार्मिक एकरूपता को देखते हुए नदी और उसके तटवर्ती क्षेत्र के संरक्षण के लिए समन्वित नीति की जरूरत लंबे समय से महसूस की जाती रही है।

अवैध कब्जे और डूब क्षेत्र का सवाल फिर सामने

मंदाकिनी की इस बाढ़ ने नदी के आसपास हुए निर्माण और कथित अवैध कब्जों को लेकर पुराने सवाल फिर सामने ला दिए हैं। पूर्व में प्रकाशित समाचार शृंखला में भी डूब क्षेत्र में निर्माण और नदी क्षेत्र पर कब्जों को बाढ़ के संभावित कारणों में शामिल किए जाने की बात उठाई गई थी। इसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी अवैध कब्जे हटाने और अवैध निर्माण रोकने के निर्देश दिए थे।

अब बाढ़ के बाद प्रशासन की कार्रवाई उसी दिशा में आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। लेकिन असली परीक्षा यह होगी कि कार्रवाई केवल बाढ़ के बाद नोटिस जारी करने तक सीमित रहती है या फिर नदी के पूरे डूब क्षेत्र का वैज्ञानिक सर्वे, सीमांकन और स्थायी संरक्षण भी किया जाता है।

सवाल सिर्फ मकान तोड़ने का नहीं, भविष्य बचाने का है

रामघाट में अब नया निर्माण रोकने का फैसला प्रशासनिक दृष्टि से सुरक्षा की जरूरत से जुड़ा कदम है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रभावित लोगों के पुनर्वास और राहत की व्यवस्था कितनी संवेदनशीलता से की जाती है।

एक तरफ जर्जर और असुरक्षित भवनों को हटाना जरूरी हो सकता है, तो दूसरी तरफ उन परिवारों की चिंता भी समझनी होगी जिनके पास रहने या कारोबार करने के लिए दूसरा सुरक्षित विकल्प नहीं है। इसलिए कार्रवाई और मानवीय संवेदना के बीच संतुलन जरूरी है।

29 अगस्त की बाढ़ ने चित्रकूट को यह संदेश साफ तौर पर दिया है कि नदी के प्राकृतिक रास्ते को नजरअंदाज करके किया गया विकास लंबे समय में भारी पड़ सकता है। अब प्रशासन के सामने चुनौती केवल क्षतिग्रस्त मकानों और दुकानों का सर्वे पूरा करने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें मंदाकिनी, सरयू और पयस्वनी के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र सुरक्षित रहें और लोगों की जान-माल भी सुरक्षित हो।

रामघाट में नया निर्माण रोकने का फैसला इसी बड़ी नीति की शुरुआत माना जा सकता है। लेकिन यह शुरुआत तभी सार्थक होगी, जब सीमांकन, पुनर्वास, राहत, अवैध कब्जों पर कार्रवाई और नदी संरक्षण को एक समग्र योजना के रूप में लागू किया जाए। वरना हर बड़ी बाढ़ के बाद वही सवाल दोहराया जाएगा—नदी का रास्ता किसने रोका और उसकी कीमत आखिर कौन चुका रहा है?

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Author: यायावर

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