दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट
गोंडा। उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के परसपुर थाना क्षेत्र में बर्तन व्यापारी विनोद कुमार साहनी की हत्या के बाद स्थानीय घटना ने राजनीतिक रंग ले लिया है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह के प्रभाव वाले इलाके में हुई इस वारदात ने कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए हैं। मामला तब और ज्यादा चर्चा में आ गया, जब उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री और निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय निषाद ने पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर सार्वजनिक रूप से नाराजगी जाहिर की।
विनोद कुमार साहनी की हत्या के बाद उनके परिवार और समुदाय में आक्रोश का माहौल बना। घटना को लेकर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं। समाजवादी पार्टी ने इसे कानून-व्यवस्था से जोड़ते हुए सरकार पर हमला बोला और निष्पक्ष जांच की मांग उठाई। दूसरी तरफ एनडीए सरकार में सहयोगी दल के नेता संजय निषाद ने भी मामले में पुलिस की भूमिका और स्थानीय स्तर पर हुई कथित लापरवाही को लेकर कड़ा रुख अपनाया।
संजय निषाद का अपनी ही सरकार के पुलिस प्रशासन पर इस तरह खुलकर सवाल उठाना इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारी के बीच अति-पिछड़े और निषाद समुदाय के वोटों को लेकर राजनीतिक सक्रियता लगातार बढ़ रही है।
केजीएमयू से गोंडा तक दिखा संजय निषाद का आक्रोश
विनोद साहनी की हालत और उपचार से जुड़े घटनाक्रम के बाद लखनऊ के केजीएमयू परिसर में भी संजय निषाद की सक्रियता सामने आई। इसके बाद वह गोंडा पहुंचे। गोंडा के सर्किट हाउस में पुलिस बल की मौजूदगी को लेकर उन्होंने अधिकारियों के सामने नाराजगी जाहिर की।
संजय निषाद ने पुलिस अधीक्षक से सवाल करते हुए यह जानना चाहा कि इतनी बड़ी संख्या में पुलिस बल लगाने का क्या उद्देश्य है। उनका सवाल था कि क्या इस तरह की पुलिस व्यवस्था से सरकार की छवि प्रभावित नहीं होगी।
उनकी नाराजगी मुख्य रूप से परसपुर थाना क्षेत्र की पुलिस व्यवस्था और स्थानीय पुलिसकर्मियों की कथित भूमिका को लेकर बताई गई। इसके बाद पुलिस प्रशासन ने तत्कालीन थाना प्रभारी सहित तीन पुलिसकर्मियों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की।
यह कार्रवाई केवल एक स्थानीय प्रशासनिक फैसला नहीं रही, बल्कि इसने प्रदेश की सियासत में भी सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर सत्ता में शामिल एक मंत्री को अपनी ही सरकार के प्रशासनिक तंत्र के खिलाफ इतना मुखर क्यों होना पड़ा?
क्या संजय निषाद का विरोध राजनीतिक मजबूरी भी है?
संजय निषाद के इस रुख को केवल कानून-व्यवस्था का मामला मानना अधूरा विश्लेषण होगा। इसके पीछे राजनीतिक परिस्थितियों को भी समझना जरूरी है।
निषाद पार्टी की राजनीति का सबसे बड़ा आधार निषाद और उससे जुड़ी विभिन्न अति-पिछड़ी जातियों के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखना है। संजय निषाद लंबे समय से निषाद समाज से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक मंच पर उठाते रहे हैं। ऐसे में यदि उनके प्रभाव वाले किसी इलाके में निषाद या साहनी समुदाय से जुड़े व्यक्ति की हत्या होती है और पार्टी नेतृत्व उस मामले में सक्रिय नहीं दिखाई देता, तो इसका सीधा असर कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच पड़ सकता है।
यही कारण है कि सरकार में मंत्री होने के बावजूद संजय निषाद ने इस मामले में प्रशासन से जवाबदेही की मांग को प्राथमिकता दी।
राजनीति में गठबंधन का अर्थ यह नहीं होता कि सहयोगी दल अपनी राजनीतिक पहचान पूरी तरह छोड़ दें। बल्कि गठबंधन के भीतर रहते हुए प्रत्येक दल को अपने सामाजिक आधार और समर्थकों के बीच अपनी स्वतंत्र भूमिका बनाए रखनी पड़ती है। गोंडा की घटना इसी राजनीतिक समीकरण की ओर संकेत करती दिखाई देती है।
अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया ने बढ़ाई राजनीतिक गर्मी
घटना के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी मामले पर प्रतिक्रिया व्यक्त की। सपा ने मृतक को अपने राजनीतिक संपर्क से जोड़ते हुए सरकार की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए।
यही वह बिंदु है जहां गोंडा की एक आपराधिक घटना व्यापक राजनीतिक मुकाबले का हिस्सा बनती दिखाई देती है। यदि विपक्ष किसी घटना को सरकार की विफलता के रूप में पेश करता है, तो सत्तारूढ़ गठबंधन के सहयोगी दलों के सामने अपने सामाजिक आधार को लेकर जवाब देने की चुनौती बढ़ जाती है।
निषाद पार्टी के लिए यह चुनौती और बड़ी है, क्योंकि उसका दावा लंबे समय से निषाद समाज की राजनीतिक आवाज बनने का रहा है। इसलिए संजय निषाद का प्रशासन के खिलाफ कड़ा रुख एक तरफ पीड़ित परिवार के प्रति राजनीतिक और सामाजिक जवाबदेही का संदेश है, तो दूसरी तरफ इसे संगठन के आधार को मजबूत रखने की रणनीति के रूप में भी देखा जा सकता है।
निषाद-मल्लाह वोट बैंक क्यों है महत्वपूर्ण?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में निषाद, मल्लाह, बिंद, साहनी, केवट, कश्यप और तुरैहा जैसी विभिन्न जातियों को अति-पिछड़े सामाजिक समूहों के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखा जाता है। इनके वास्तविक जनसंख्या आंकड़ों को लेकर अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक दावे मिलते हैं, लेकिन यह तथ्य व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि पूर्वांचल और मध्य उत्तर प्रदेश के कई विधानसभा क्षेत्रों में इन समुदायों का चुनावी प्रभाव महत्वपूर्ण है।
कई चुनावी क्षेत्रों में मुकाबला बेहद करीबी होने की स्थिति में स्थानीय सामाजिक समीकरण परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं। यही वजह है कि भाजपा, सपा और अन्य राजनीतिक दल अति-पिछड़ी जातियों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की लगातार कोशिश करते हैं।
निषाद पार्टी इसी सामाजिक आधार को राजनीतिक शक्ति में बदलने का प्रयास करती रही है। पार्टी के लिए चुनौती यह है कि वह सत्ता में भागीदार रहते हुए भी अपने समर्थक समुदाय के बीच स्वतंत्र राजनीतिक आवाज के रूप में अपनी पहचान बनाए रखे।
गोंडा में निषाद समाज का सामाजिक समीकरण
गोंडा का भूगोल भी इस राजनीतिक समीकरण को महत्वपूर्ण बनाता है। घाघरा और सरयू नदी के आसपास के इलाकों में लंबे समय से मछुआरा, निषाद और नदी आधारित आजीविका से जुड़े समुदायों की मौजूदगी रही है।
परसपुर, कटरा बाजार और करनैलगंज क्षेत्र में नदी और कछार से जुड़े सामाजिक-आर्थिक समूहों का प्रभाव दिखाई देता है। ऐसे इलाकों में किसी बड़े आपराधिक मामले का राजनीतिक असर सामान्य शहरी क्षेत्र की तुलना में अलग हो सकता है।
तरबगंज और गोंडा सदर जैसे विधानसभा क्षेत्रों में भी विभिन्न पिछड़े और अति-पिछड़े सामाजिक समूह चुनावी समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। हालांकि किसी विशेष समुदाय के मतदाताओं की संख्या के सटीक आंकड़े अलग-अलग स्रोतों में अलग हो सकते हैं, लेकिन राजनीतिक दल इन क्षेत्रों में सामाजिक समीकरण को गंभीरता से लेते हैं।
2027 के चुनाव से पहले क्यों बढ़ रही है राजनीतिक सक्रियता?
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक दलों ने सामाजिक समीकरणों पर काम शुरू कर दिया है। भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए गठबंधन अपने सहयोगी दलों के माध्यम से विभिन्न पिछड़े और अति-पिछड़े समुदायों तक अपनी पहुंच मजबूत करना चाहता है।
दूसरी ओर समाजवादी पार्टी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी PDA सामाजिक समीकरण को अपनी राजनीति का महत्वपूर्ण आधार बनाए हुए है। ऐसे में निषाद, बिंद, मल्लाह और अन्य अति-पिछड़ी जातियां दोनों प्रमुख राजनीतिक खेमों के लिए महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
गोंडा की घटना इसलिए भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील है क्योंकि यहां कानून-व्यवस्था का सवाल सीधे सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक संरक्षण की बहस से जुड़ गया है।
निषाद पार्टी के सामने दोहरी चुनौती
संजय निषाद के सामने मौजूदा समय में दोहरी राजनीतिक चुनौती दिखाई देती है।
पहली चुनौती है सरकार में सहयोगी बने रहना और दूसरी चुनौती है अपने सामाजिक आधार के बीच यह संदेश बनाए रखना कि पार्टी उनके अधिकारों और समस्याओं पर समझौता नहीं करेगी।
यदि वह सरकार के प्रशासनिक तंत्र पर सवाल नहीं उठाते, तो विपक्ष को यह कहने का अवसर मिल सकता था कि निषाद पार्टी सत्ता में हिस्सेदारी के कारण अपने समुदाय की समस्याओं पर चुप है।
लेकिन यदि वह लगातार सरकार के खिलाफ मुखर होते हैं, तो गठबंधन की राजनीति में असहजता पैदा होने की संभावना रहती है। इसलिए संजय निषाद के लिए संतुलन साधना आसान नहीं है।
गोंडा की घटना में उनका पुलिस प्रशासन के खिलाफ खुलकर नाराजगी जताना इसी संतुलन की राजनीति का हिस्सा माना जा सकता है।
17 अति-पिछड़ी जातियों का मुद्दा भी अहम
निषाद समाज से जुड़े संगठनों और राजनीतिक नेतृत्व की ओर से लंबे समय से विभिन्न अति-पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति की श्रेणी में शामिल करने की मांग उठती रही है। यह मुद्दा निषाद पार्टी की राजनीति में भी महत्वपूर्ण रहा है।
संजय निषाद समय-समय पर इस मांग को लेकर अपनी आवाज उठाते रहे हैं। सत्ता में रहते हुए इस मुद्दे पर सरकार के साथ रहते हुए दबाव बनाए रखना उनके लिए राजनीतिक रूप से जरूरी है, क्योंकि यही मांग उनके सामाजिक आधार के एक हिस्से को पार्टी से जोड़े रखने में भूमिका निभाती है।
इसके साथ ही केंद्र और राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को भी निषाद समाज तक पहुंचाने की कोशिश राजनीतिक समीकरण का हिस्सा है। मत्स्य क्षेत्र से जुड़ी योजनाएं, आवास, राशन, रोजगार और नदी-तालाबों से संबंधित नीतियां इस समुदाय के लिए सीधे आर्थिक महत्व रखती हैं।
बृजभूषण के गढ़ में बदला राजनीतिक संदेश
गोंडा को लंबे समय से बृजभूषण शरण सिंह के प्रभाव वाले राजनीतिक क्षेत्र के रूप में देखा जाता है। ऐसे इलाके में निषाद समाज से जुड़े व्यक्ति की हत्या और उसके बाद निषाद पार्टी के नेता का पुलिस प्रशासन के खिलाफ मुखर होना अपने आप में राजनीतिक संदेश रखता है।
हालांकि किसी एक घटना से पूरे चुनावी समीकरण का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, लेकिन यह जरूर स्पष्ट है कि कानून-व्यवस्था का सवाल अब केवल प्रशासनिक विषय नहीं रह गया है। यह सामाजिक सम्मान, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और वोट बैंक की राजनीति से भी जुड़ रहा है।
संजय निषाद का रुख यह बताता है कि सत्ता के भीतर रहते हुए भी सहयोगी दल अपने सामाजिक आधार के सवालों पर स्वतंत्र राजनीतिक भूमिका बनाए रखना चाहते हैं।
असली सवाल कानून-व्यवस्था और जवाबदेही का
गोंडा की घटना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू राजनीतिक बयानबाजी से आगे जाकर कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही का है। किसी नागरिक की हत्या के मामले में सबसे पहली प्राथमिकता निष्पक्ष जांच, दोषियों की पहचान और पीड़ित परिवार को न्याय मिलना होना चाहिए।
पुलिसकर्मियों के निलंबन से प्रशासनिक जवाबदेही की प्रक्रिया शुरू हो सकती है, लेकिन अंतिम सवाल जांच की निष्पक्षता और न्यायिक प्रक्रिया के परिणाम से जुड़ा रहेगा।
राजनीतिक दल इस घटना को अपने-अपने नजरिए से देख रहे हैं। विपक्ष इसे सरकार की कानून-व्यवस्था पर हमला करने के अवसर के रूप में देख रहा है, जबकि सरकार के सहयोगी दल अपने सामाजिक आधार के बीच अपनी भूमिका साबित करने की कोशिश कर रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में संजय निषाद का अपनी ही सरकार के पुलिस प्रशासन पर सवाल उठाना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सत्ता और सामाजिक प्रतिनिधित्व के बीच चल रहे तनाव को सामने लाता है।
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में अति-पिछड़े समुदायों की राजनीतिक अहमियत और बढ़ सकती है। गोंडा की यह घटना इसी बड़े सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष की एक झलक मानी जा सकती है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन इस मामले में निष्पक्ष जांच और प्रभावी कार्रवाई के जरिए जनता का भरोसा कायम कर पाएगा, या यह घटना आने वाले दिनों में एक बड़े राजनीतिक मुद्दे का रूप लेगी।
कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही और बदलते राजनीतिक समीकरण पर नजर

























