संपादकीय | जनगणदूत
संपादक अनिल अनूप
बच्चे से कहा गया—पढ़ोगे तो आगे बढ़ोगे। उसने पढ़ाई की। कहा गया—डिग्री लोगे तो नौकरी मिलेगी। उसने डिग्री ली। कहा गया—प्रतियोगी परीक्षा पास कर लो, जिंदगी बदल जाएगी। उसने परीक्षा दी। एक बार नहीं, कई बार। फीस भरी। फॉर्म भरे। शहर बदले। कोचिंग की। रातें जागीं। उम्र बढ़ती गई। और फिर एक दिन वही बच्चा पूछ बैठा—“पापा, मैंने गलती कहां की?” यह सवाल सिर्फ उस बच्चे का नहीं है। यह सवाल उस पूरी व्यवस्था के सामने खड़ा है जिसने वर्षों से हमारे युवाओं को सफलता का एक सपना बेचा है—पढ़ो, डिग्री लो और नौकरी पाओ। लेकिन अब इस सपने की चमक फीकी पड़ रही है। डिग्रियां बढ़ रही हैं। कोचिंग सेंटर बढ़ रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के फार्म बढ़ रहे हैं। लेकिन क्या उसी अनुपात में सम्मानजनक और स्थायी रोजगार भी बढ़ रहा है? अगर नहीं, तो फिर असली समस्या कहां है?
युवा बेरोजगार है या व्यवस्था की प्राथमिकताएं बेरोजगार हो गई हैं?
हम अक्सर बेरोजगार युवा को देखकर कहते हैं—“आजकल के बच्चे मेहनत नहीं करते।” यह सबसे आसान जवाब है। लेकिन शायद सबसे गलत भी। जो युवा सुबह से रात तक किताबों में सिर खपाता है, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है, एक-एक परीक्षा के लिए महीनों इंतजार करता है और असफल होने के बाद फिर उसी कतार में खड़ा हो जाता है, उसे आलसी कहना उसके संघर्ष का अपमान है। हां, युवाओं को भी बदलती दुनिया के अनुसार कौशल विकसित करना होगा। लेकिन सवाल सरकारों और व्यवस्था से भी होना चाहिए—आपने जिन बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया, उनके लिए आगे के दरवाजे कितने खोले?
एक पद, हजारों दावेदार और वर्षों का इंतजार
कल्पना कीजिए एक युवा की। उसने स्नातक किया। फिर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी शुरू की। एक भर्ती निकली। उसने आवेदन किया। परीक्षा हुई। फिर परिणाम का इंतजार। कभी परीक्षा स्थगित। कभी विवाद। कभी परिणाम में देरी। कभी भर्ती प्रक्रिया पर सवाल। और इस बीच दो-तीन साल निकल गए। फिर नई भर्ती आती है। फिर वही प्रक्रिया। फिर वही इंतजार। लेकिन उम्र? उम्र किसी परिणाम का इंतजार नहीं करती। यह वह जगह है जहां बेरोजगारी सिर्फ नौकरी की कमी नहीं रह जाती। यह समय की चोरी बन जाती है। युवा की सबसे उत्पादक उम्र अगर लगातार अनिश्चितता में गुजर जाए तो इसकी भरपाई कौन करेगा?
कोचिंग का कारोबार फल-फूल रहा है, लेकिन रोजगार का बाजार?
एक तरफ हजारों-लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पैसे खर्च कर रहे हैं। कोचिंग उद्योग फलता-फूलता है। किताबें बिकती हैं। ऑनलाइन पाठ्यक्रम बिकते हैं। टेस्ट सीरीज बिकती हैं। होस्टल और किराये के कमरे चलते हैं। यानी बेरोजगारी के आसपास भी एक पूरा बाजार खड़ा हो गया है। युवा नौकरी खोज रहा है और उसके इंतजार से कई कारोबार चल रहे हैं। यह सवाल असुविधाजनक है, लेकिन पूछा जाना चाहिए—क्या बेरोजगारी अब केवल समस्या नहीं रही, बल्कि एक आर्थिक बाजार भी बन चुकी है? यदि लाखों युवा वर्षों तक तैयारी करते रहें और नौकरी कुछ हजार को ही मिले, तो बाकी युवाओं के समय, पैसे और भविष्य की कीमत कौन चुकाएगा?
डिग्री हाथ में है, अनुभव कहां से आएगा?
नौकरी देने वाला कहता है—अनुभव चाहिए। युवा कहता है—पहली नौकरी ही नहीं मिली, अनुभव कहां से लाऊं? नियोक्ता कहता है—कौशल चाहिए। युवा कहता है—कॉलेज ने कौशल के बजाय डिग्री दी। कॉलेज कहता है—हमने पाठ्यक्रम पढ़ाया। और व्यवस्था कहती है—युवा खुद को रोजगार योग्य बनाए। तो फिर सवाल यह है—जिम्मेदारी आखिर किसकी है? अगर शिक्षा और रोजगार के बीच इतनी बड़ी खाई है तो केवल युवा को दोष देने से समस्या हल नहीं होगी।
सरकारी नौकरी का मोह भी एक सामाजिक बीमारी है
यहां समाज को भी आईना देखने की जरूरत है। हमने सफलता को इतने सीमित दायरे में बांध दिया है कि सरकारी नौकरी न मिले तो कई परिवारों को लगता है कि बच्चा असफल हो गया। डॉक्टर बनो। इंजीनियर बनो। अधिकारी बनो। सरकारी नौकरी पाओ। लेकिन कोई यह नहीं कहता—एक अच्छा तकनीशियन बनो। कुशल कारीगर बनो। कृषि को कारोबार बनाओ। डिजिटल सेवा शुरू करो। छोटा उद्योग लगाओ। अपने हुनर को बाजार से जोड़ो। हमें अपने बच्चों को यह समझाना होगा कि सम्मान केवल कुर्सी से नहीं आता। लेकिन सरकारों को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि नौकरी के अलावा काम और कारोबार के रास्ते भी वास्तविक रूप से खुले हों।
“नौकरी नहीं है तो पकौड़े बेचो”—क्या यही समाधान है?
युवाओं से बार-बार कहा जाता है कि नौकरी के पीछे मत भागो, रोजगार पैदा करो। बात सुनने में अच्छी है। लेकिन रोजगार पैदा करने के लिए पूंजी चाहिए। प्रशिक्षण चाहिए। बाजार चाहिए। बिजली चाहिए। सड़क चाहिए। डिजिटल सुविधा चाहिए। कानूनी और प्रशासनिक सहयोग चाहिए। और सबसे ज्यादा चाहिए—असफल होने पर दोबारा खड़े होने की व्यवस्था। किसी युवा से यह कहना आसान है कि “व्यवसाय करो।” लेकिन उसके बाद बैंक ऋण, बाजार, प्रतिस्पर्धा, लाइसेंस, टैक्स, किराया और शुरुआती घाटे से निपटने की व्यवस्था कौन करेगा? सिर्फ नारा रोजगार नहीं बनाता। रोजगार के लिए आर्थिक पारिस्थितिकी बनानी पड़ती है।
शहरों की चमक और युवाओं की बेचैनी
हम स्मार्ट शहरों की बात करते हैं। नई सड़कें बनती हैं। बड़ी इमारतें बनती हैं। नए प्रोजेक्ट आते हैं। विकास के विज्ञापन दिखाई देते हैं। लेकिन उसी शहर में हजारों युवा कमरे में बैठकर अगली भर्ती का इंतजार कर रहे होते हैं। एक तरफ विकास का उत्सव है। दूसरी तरफ नौकरी की तलाश में घूमता युवा। हमें इन दोनों तस्वीरों को एक साथ देखने की जरूरत है। क्योंकि ऐसा विकास अधूरा है जिसमें इमारतें रोजगार से ज्यादा तेजी से बढ़ें।
गांव का पढ़ा-लिखा युवा गांव में क्यों नहीं टिकता?
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसके गांव हैं। लेकिन गांव का युवा पढ़ता है और फिर शहर की ओर निकल जाता है। क्यों? क्योंकि गांव में उसकी शिक्षा के अनुरूप अवसर नहीं हैं। अगर स्थानीय स्तर पर छोटे उद्योग, कृषि-प्रसंस्करण, डिजिटल सेवाएं, पर्यटन, हस्तशिल्प, डेयरी, खाद्य उद्योग और आधुनिक कृषि से जुड़े रोजगार विकसित किए जाएं तो लाखों युवाओं को अपने घर से दूर जाने की मजबूरी कम हो सकती है। रोजगार को गांव तक ले जाना होगा, केवल गांव के युवाओं को शहर भेजना समाधान नहीं है।
सबसे खतरनाक बेरोजगारी वह है जो उम्मीद को मार देती है
पैसे की कमी से बड़ा संकट कई बार उम्मीद की कमी होती है। एक युवा जब लगातार असफल होता है तो केवल उसका बैंक बैलेंस खाली नहीं होता। उसका आत्मविश्वास भी कमजोर होता है। उसे लगता है कि शायद उसमें ही कमी है। यहीं समाज को सावधान होना चाहिए। हमारी युवा आबादी को केवल रोजगार नहीं चाहिए। उसे यह विश्वास चाहिए कि मेहनत करने का कोई अर्थ है। कि व्यवस्था निष्पक्ष है। कि अवसर केवल सिफारिश, पैसे या पहुंच वालों के लिए नहीं हैं। कि परीक्षा प्रक्रिया भरोसेमंद होगी। कि भर्ती समय पर होगी। और अगर वह एक रास्ते में असफल हुआ तो उसके सामने दूसरा रास्ता भी मौजूद होगा।
सरकारों के लिए भी एक सीधा सवाल
हर सरकार रोजगार को अपनी उपलब्धियों में गिनाना चाहती है। लेकिन असली सवाल विज्ञापन नहीं, स्थायी अवसर हैं। कितनी नौकरियां? किस क्षेत्र में? कितने समय के लिए? किस वेतन पर? कितनी सामाजिक सुरक्षा के साथ? और कितने युवाओं को वास्तव में रोजगार मिला? रोजगार का मूल्य केवल नियुक्ति पत्रों की संख्या से नहीं तय होना चाहिए। रोजगार ऐसा होना चाहिए जिससे युवा सम्मान के साथ अपना जीवन चला सके।
अब डिग्री नहीं, दिशा चाहिए
आज हमारे सामने दो रास्ते हैं। पहला रास्ता यह कि हम हर साल कॉलेजों से लाखों डिग्री बांटते रहें और फिर उन्हीं युवाओं को नौकरी के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की अंतहीन कतार में खड़ा करते रहें। दूसरा रास्ता यह है कि शिक्षा को रोजगार, कौशल, उद्योग, उद्यमिता और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ा जाए। हमें दूसरे रास्ते पर जाना होगा। वरना आने वाले वर्षों में हमारे पास एक अजीब तस्वीर होगी—बहुत पढ़े-लिखे युवा और बहुत कम अवसर। यह अंतर जितना बढ़ेगा, सामाजिक बेचैनी उतनी बढ़ेगी।
माता-पिता भी अपने बच्चों से एक सवाल पूछें
“बेटा, कौन-सी नौकरी चाहिए?” पूछने से पहले शायद हमें पूछना चाहिए—“तुम्हें किस काम में आनंद आता है?” “तुम्हारे भीतर कौन-सा हुनर है?” “तुम क्या सीखना चाहते हो?” और सबसे जरूरी—“अगर एक रास्ता बंद हो जाए तो दूसरा रास्ता क्या होगा?” बच्चे को केवल परीक्षा मशीन मत बनाइए। उसे जीवन के लिए तैयार कीजिए।
और सरकारें भी एक सवाल खुद से पूछें
अगर देश का युवा पढ़ रहा है, मेहनत कर रहा है, टैक्स देने वाले परिवारों से आ रहा है, वर्षों तैयारी कर रहा है और फिर भी उसे अवसर नहीं मिल रहा तो सिर्फ युवा को बदलने की सलाह पर्याप्त नहीं है। व्यवस्था को भी बदलना होगा। भर्ती प्रक्रियाएं समयबद्ध करनी होंगी। शिक्षा को रोजगार से जोड़ना होगा। कौशल को बाजार से जोड़ना होगा। छोटे शहरों में उद्योग लाने होंगे। गांवों में स्थानीय रोजगार पैदा करना होगा। और सबसे जरूरी—युवा को यह भरोसा देना होगा कि उसका भविष्य किसी परीक्षा कैलेंडर का मोहताज नहीं है।
आखिर हम अपने बच्चों को किस भविष्य के लिए पढ़ा रहे हैं?
यह संपादकीय किसी सरकार के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। यह उस युवा के पक्ष में है जो आज भी उम्मीद लेकर पढ़ रहा है। यह उस पिता के पक्ष में है जो अपनी सामर्थ्य से ज्यादा खर्च करके बच्चे को पढ़ा रहा है। यह उस मां के पक्ष में है जो बेटे या बेटी के चयन की खबर सुनने के लिए वर्षों से इंतजार कर रही है। और यह उस सवाल के पक्ष में है जिसे अब दबाया नहीं जा सकता—अगर पढ़ाई के बाद भी रोजगार नहीं, कौशल के बाद भी अवसर नहीं और वर्षों की तैयारी के बाद भी निश्चितता नहीं, तो आखिर हमारे बच्चों को किस भविष्य के लिए तैयार किया जा रहा है?
देश की असली परीक्षा केवल बोर्ड परीक्षा, प्रतियोगी परीक्षा या चुनाव नहीं है। देश की असली परीक्षा यह है कि वह अपने युवाओं की मेहनत को अवसर में बदल पाता है या नहीं। क्योंकि युवा की उम्र लौटकर नहीं आती। उसकी जवानी कोई सरकारी फाइल नहीं है, जिसे वर्षों तक लंबित रखा जा सके। उसका सपना कोई चुनावी घोषणा नहीं है, जिसे अगली सरकार के घोषणापत्र में फिर लिख दिया जाए। उसकी जिंदगी आज है। और इसलिए सवाल भी आज ही पूछा जाना चाहिए—डिग्री कब रोजगार बनेगी? मेहनत कब अवसर बनेगी? और हमारे बच्चों को अपने भविष्य के लिए आखिर कब तक इंतजार करना पड़ेगा?

























