सूरज सिंह राणा की रिपोर्ट
चित्रकूट। जनपद चित्रकूट की ग्राम पंचायत सिद्धपुर स्थित गोशाला की कथित बदहाल स्थिति ने एक बार फिर सरकारी गोशाला व्यवस्था और उसके जमीनी क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि गोशाला में साफ-सफाई की समुचित व्यवस्था नहीं होने से चारों ओर गंदगी का आलम है और वहां संरक्षित गौवंश को असुविधाओं के बीच रहना पड़ रहा है। ग्रामीणों के मुताबिक गोशाला में चारा-पानी, सफाई और रखरखाव से जुड़ी व्यवस्थाएं भी संतोषजनक नहीं हैं।
ग्रामीणों द्वारा सामने लाई गई शिकायतों के अनुसार सिद्धपुर की गोशाला में नियमित साफ-सफाई नहीं होने के कारण परिसर में गंदगी जमा रहती है। इससे न केवल गोशाला का वातावरण प्रभावित हो रहा है, बल्कि गौवंश के स्वास्थ्य और उनके संरक्षण को लेकर भी चिंता पैदा हो रही है। ग्रामीणों का कहना है कि जिस उद्देश्य से गोशालाओं का संचालन किया जाता है, उसके अनुरूप व्यवस्थाएं सुनिश्चित करना ग्राम पंचायत और संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
गोशाला में गंदगी से गौवंश परेशान होने का आरोप
ग्रामीणों का कहना है कि गोशाला में संरक्षित गौवंश के लिए स्वच्छ और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध होना चाहिए, लेकिन सिद्धपुर की स्थिति इसके विपरीत दिखाई दे रही है। परिसर में साफ-सफाई की कमी और कथित अव्यवस्थाओं के कारण गौवंश को परेशानी उठानी पड़ रही है।
गोशाला में गोवंश के रहने वाले स्थान की नियमित सफाई, गोबर का निस्तारण, जल निकासी और पर्याप्त पेयजल जैसी बुनियादी व्यवस्थाओं का होना आवश्यक है। ग्रामीणों का आरोप है कि इन व्यवस्थाओं पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यदि गोशाला में लंबे समय तक सफाई व्यवस्था कमजोर रहती है तो वहां संक्रमण, कीचड़, दुर्गंध और अन्य समस्याएं बढ़ सकती हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि गौवंश संरक्षण केवल संख्या दर्ज करने या गोशाला में पशुओं को रखने तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनके भोजन, पानी, स्वास्थ्य, आश्रय और स्वच्छ वातावरण की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
चारा-पानी की व्यवस्था पर भी उठे सवाल
सिद्धपुर गोशाला को लेकर ग्रामीणों ने चारा और पानी की उपलब्धता पर भी सवाल उठाए हैं। ग्रामीणों के मुताबिक गौवंश के लिए पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक चारा और स्वच्छ पानी उपलब्ध कराया जाना चाहिए, लेकिन मौके पर व्यवस्थाओं को लेकर संतोषजनक स्थिति नजर नहीं आती।
गौशाला में पर्याप्त चारे की उपलब्धता और उसका सुरक्षित भंडारण भी आवश्यक है। इसी तरह गर्मी, बारिश और सर्दी के मौसम में गौवंश के लिए परिस्थितियों के अनुरूप विशेष व्यवस्था की जरूरत होती है। ग्रामीणों का आरोप है कि इन पहलुओं पर जिम्मेदारों की ओर से गंभीरता नहीं दिखाई जा रही है।
हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है। ऐसे में प्रशासन के लिए जरूरी है कि वह मौके पर वास्तविक स्थिति का निरीक्षण कराए और यह पता लगाए कि गोशाला के संचालन के लिए निर्धारित मानकों का पालन किया जा रहा है या नहीं।
गोशाला की दीवारें क्षतिग्रस्त, सुरक्षा व्यवस्था पर भी चिंता
ग्रामीणों के अनुसार सिद्धपुर की गोशाला की कुछ दीवारें भी क्षतिग्रस्त हालत में हैं। यदि गोशाला की संरचनात्मक स्थिति कमजोर है तो यह वहां रहने वाले गौवंश की सुरक्षा के लिए गंभीर विषय बन सकता है।
गोशाला की चारदीवारी, शेड, फर्श, जल निकासी और अन्य आधारभूत संरचनाओं का नियमित निरीक्षण किया जाना जरूरी है। क्षतिग्रस्त हिस्सों की समय रहते मरम्मत नहीं होने पर बारिश अथवा अन्य मौसम में स्थिति और खराब हो सकती है।
ग्रामीणों का कहना है कि जब गोशाला के संचालन और रखरखाव के लिए सरकारी स्तर पर धनराशि खर्च की जाती है, तब बुनियादी ढांचे की ऐसी स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उनका आरोप है कि यदि समय रहते मरम्मत और रखरखाव कराया जाता तो गोशाला की स्थिति इतनी खराब नहीं होती।
सरकारी खर्च के बावजूद व्यवस्थाओं पर सवाल
उत्तर प्रदेश में निराश्रित और बेसहारा गौवंश के संरक्षण के लिए विभिन्न स्तरों पर गोशालाओं का संचालन किया जाता है। इनके माध्यम से गौवंश को आश्रय, चारा, पानी और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का उद्देश्य है। गोशालाओं के संचालन और रखरखाव पर सरकारी धन खर्च किया जाता है।
ऐसे में सिद्धपुर गोशाला से सामने आ रही शिकायतें केवल एक ग्राम पंचायत की समस्या तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह सवाल भी उठाती हैं कि सरकारी योजनाओं और उनके लिए उपलब्ध कराई जाने वाली धनराशि का वास्तविक लाभ जमीन पर गौवंश तक कितना पहुंच रहा है।
यदि गोशाला में वास्तव में नियमित सफाई नहीं हो रही, चारा-पानी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है और भवन या चारदीवारी क्षतिग्रस्त है, तो प्रशासन को इसकी गंभीरता से जांच करनी चाहिए। जांच के दौरान गोशाला में उपलब्ध गौवंश की संख्या, चारे की उपलब्धता, पानी की व्यवस्था, सफाई की स्थिति, निर्माण एवं मरम्मत कार्य तथा संबंधित अभिलेखों का भी परीक्षण किया जाना चाहिए।
ग्राम प्रधान और सचिव की भूमिका पर ग्रामीणों ने उठाए सवाल
ग्रामीणों ने ग्राम पंचायत की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं। उनका आरोप है कि ग्राम प्रधान और पंचायत सचिव की कथित लापरवाही के कारण गोशाला की व्यवस्थाएं लगातार कमजोर होती जा रही हैं।
हालांकि किसी भी जिम्मेदार व्यक्ति के विरुद्ध आरोपों को अंतिम सत्य मानने से पहले प्रशासनिक जांच जरूरी है। यदि जांच में यह सामने आता है कि निर्धारित जिम्मेदारियों का पालन नहीं किया गया या सरकारी धन का उचित उपयोग नहीं हुआ, तो नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
वहीं यदि जांच में ग्रामीणों की शिकायतें तथ्यहीन पाई जाती हैं तो प्रशासन को वास्तविक स्थिति भी सार्वजनिक करनी चाहिए, ताकि मामले को लेकर बनी भ्रम की स्थिति समाप्त हो सके।
सवाल यह नहीं कि गोशाला बनी, सवाल यह है कि व्यवस्था कैसी है?
गोशाला निर्माण और संचालन का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा माना जा सकता है जब वहां रहने वाले गौवंश को सुरक्षित, स्वच्छ और पर्याप्त सुविधाओं वाला वातावरण मिले। केवल भवन या चारदीवारी तैयार कर देना गोवंश संरक्षण की पूर्ण व्यवस्था नहीं कही जा सकती।
गोशाला में नियमित सफाई, गोबर का उचित निस्तारण, स्वच्छ पेयजल, पर्याप्त चारा, छायादार स्थान, बरसात से बचाव, बीमार पशुओं के लिए अलग व्यवस्था और समय-समय पर पशु चिकित्सा सुविधा जैसी व्यवस्थाएं आवश्यक हैं।
सिद्धपुर के ग्रामीणों की शिकायतों को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यदि शिकायत सही है तो प्रशासन को केवल औपचारिक निरीक्षण करने के बजाय स्थायी समाधान की दिशा में कदम उठाना होगा।
निष्पक्ष जांच की मांग, कार्रवाई की उम्मीद
ग्रामीणों ने प्रशासन से सिद्धपुर गोशाला का स्थलीय निरीक्षण कराने की मांग की है। उनका कहना है कि संबंधित विभाग के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचकर गोशाला की वास्तविक स्थिति देखें और वहां उपलब्ध सुविधाओं का भौतिक सत्यापन करें।
ग्रामीणों की मांग है कि गोशाला में उपलब्ध गौवंश की संख्या और उनके लिए उपलब्ध चारा-पानी का सत्यापन कराया जाए। साथ ही सफाई व्यवस्था, भवन की स्थिति, चारदीवारी, जल निकासी और पिछले समय में कराए गए कार्यों की भी जांच हो।
यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही, अनियमितता अथवा सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग की पुष्टि होती है तो संबंधित जिम्मेदारों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। इसके साथ ही गोशाला की कमियों को तत्काल दूर कर गौवंश के लिए बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।
प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी ग्रामीणों की नजर
सिद्धपुर गोशाला को लेकर उठी शिकायतों के बाद अब ग्रामीणों की निगाह प्रशासन की अगली कार्रवाई पर है। सवाल यह है कि क्या जिम्मेदार अधिकारी मामले को गंभीरता से लेते हुए मौके की जांच कराएंगे या फिर यह शिकायत भी कागजी कार्रवाई तक सीमित रह जाएगी।
गौवंश संरक्षण के नाम पर संचालित व्यवस्था में यदि कहीं कमी है तो उसे दूर करना केवल प्रशासनिक दायित्व नहीं, बल्कि मानवीय जिम्मेदारी भी है। सरकारी धन का उद्देश्य तभी सार्थक होगा जब उसका प्रभाव धरातल पर दिखाई दे।
सिद्धपुर गोशाला की कथित बदहाली की निष्पक्ष जांच से न केवल वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी, बल्कि यह भी पता चल सकेगा कि सरकारी व्यवस्था में कहीं लापरवाही या अनियमितता तो नहीं हो रही है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि प्रशासन शिकायत को गंभीरता से लेकर जल्द कार्रवाई करेगा और गोशाला में साफ-सफाई, चारा-पानी, सुरक्षा तथा रखरखाव की व्यवस्थाओं को दुरुस्त कराएगा।
अब देखना यह है कि सिद्धपुर गोशाला की शिकायत प्रशासनिक फाइलों में दबकर रह जाती है या फिर जांच के बाद जिम्मेदारी तय करते हुए धरातल पर व्यवस्था में वास्तविक सुधार दिखाई देता है।

























