गुनाहों का देवता : जिसके ‘आशीर्वाद’ से बनते थे सांसद-विधायक, उसी की मूर्ति पर मचा था विवाद

गुनाहों का देवता ददुआ की तस्वीर, बुंदेलखंड के बीहड़, एसटीएफ और राजनीतिक प्रभाव के साथ संजय सिंह राणा की विशेष रिपोर्ट

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संजय सिंह राणा की विशेष रिपोर्ट

चंबल और बुंदेलखंड के बीहड़ों की अपनी एक अलग दुनिया रही है। यहां कभी कानून की किताबों से ज्यादा असर बंदूक की नली का दिखाई देता था। पाठा के जंगलों में जब शाम ढलती थी तो सन्नाटे के बीच दूर से आती किसी गोली की आवाज पूरे इलाके को सहमा देती थी। इसी भयावह दौर में एक नाम ऐसा उभरा जिसने लगभग तीन दशक तक बुंदेलखंड की अपराध, सामाजिक व्यवस्था और राजनीति—तीनों को प्रभावित किया। वह नाम था शिवकुमार पटेल उर्फ ददुआ

किसी के लिए वह निर्दयी डकैत था, जिसके नाम से गांवों में दहशत फैल जाती थी। किसी के लिए वह गरीबों की मदद करने वाला ‘मसीहा’ था। कोई उसे शोषित और वंचित वर्ग की आवाज बताता था तो कोई उसकी पूरी कहानी को बंदूक, हत्या, अपहरण, वसूली और भय के साम्राज्य के रूप में देखता था।

ददुआ की कहानी का सबसे विचित्र अध्याय तब सामने आया जब उसके मारे जाने के वर्षों बाद फतेहपुर के एक मंदिर में उसकी और उसकी पत्नी की मूर्तियां स्थापित कर दी गईं। मूर्ति स्थापना ने सवाल खड़ा किया कि क्या किसी अपराधी की सामाजिक मदद उसके अपराधों को छोटा कर सकती है? क्या गरीबों की सहायता करने वाला डकैत समाज का नायक बन सकता है? और सबसे बड़ा सवाल—जिस व्यक्ति के नाम से कभी लोग कांपते थे, उसकी प्रतिमा मंदिर में कैसे पहुंच गई?

फतेहपुर के नरसिंहपुर कबरहा स्थित शिवहरे रामजानकी मंदिर में ददुआ और उसकी पत्नी की मूर्तियां स्थापित किए जाने की खबर सामने आने के बाद इस पर विवाद भी हुआ था। रिपोर्टों के अनुसार मंदिर का निर्माण ददुआ से जुड़ा बताया गया और मूर्ति स्थापना के समय पुलिस की निगरानी भी रही।

यही विरोधाभास ददुआ की पूरी कहानी का सार है—एक चेहरा अपराध का, दूसरा लोक-छवि का और तीसरा राजनीति पर प्रभाव का।

रैपुरा के देवकली से बीहड़ के बादशाह तक

चित्रकूट के रैपुरा क्षेत्र के देवकली गांव में जन्मे शिवकुमार पटेल के शुरुआती जीवन को लेकर कई किस्से प्रचलित हैं। उसके पिता राम प्यारे पटेल की हत्या के बाद बदले की भावना ने उसके जीवन की दिशा बदल दी—ऐसा स्थानीय और मीडिया रिपोर्टों में बार-बार वर्णित हुआ है।

यहीं से एक साधारण ग्रामीण युवक के भीतर प्रतिशोध की आग भड़कने की कहानी सामने आती है। धीरे-धीरे उसने हथियार उठाए और जंगलों को अपना ठिकाना बना लिया।

ददुआ का आपराधिक उभार अचानक नहीं हुआ। उसने पाठा के दुर्गम जंगलों और उत्तर प्रदेश-मध्य प्रदेश की सीमा से लगे इलाकों को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया। बीहड़, पहाड़, घने जंगल और सीमावर्ती क्षेत्र उसके लिए सुरक्षा कवच बन गए।

1980 के दशक के मध्य तक उसका नाम पुलिस रिकॉर्ड में गंभीर अपराधों के साथ सामने आने लगा और 1986 की रामू का पुरवा की घटना के बाद उसकी दहशत बहुत तेजी से बढ़ी। उपलब्ध रिपोर्टों में इस घटना में नौ लोगों की हत्या का उल्लेख मिलता है।

इसके बाद ददुआ का गिरोह सिर्फ जंगल में छिपने वाला गिरोह नहीं रहा। वह स्थानीय स्तर पर समानांतर प्रभाव कायम करने लगा।

‘बुंदेलखंड का वीरप्पन’ क्यों कहा गया?

ददुआ की तुलना अक्सर दक्षिण भारत के कुख्यात चंदन तस्कर और अपराधी वीरप्पन से की गई। वजह सिर्फ उसका लंबा आपराधिक जीवन नहीं था, बल्कि उसका भूगोल पर नियंत्रण, जंगलों में मजबूत नेटवर्क और स्थानीय स्तर पर तैयार किया गया सूचना तंत्र भी था।

उसके पास आधुनिक हथियार थे और गिरोह की गतिविधियां उत्तर प्रदेश से लेकर मध्य प्रदेश तक फैली हुई थीं। 2007 के मुठभेड़ अभियान के बाद घटनास्थल से .375 मैग्नम राइफल, एके सीरीज के कारतूस और कई अन्य हथियार बरामद होने की रिपोर्ट सामने आई थी।

उसके सिर पर पांच लाख रुपये का इनाम था। वह हत्या, अपहरण, फिरौती, डकैती और वसूली जैसे गंभीर मामलों में वांछित था। 2007 की समकालीन रिपोर्टों ने उसे उत्तर भारत का ‘वीरप्पन’ तक कहा।

खौफ की कई परतें

ददुआ के अपराधों की सूची लंबी थी। रामू का पुरवा की नौ हत्याओं के अलावा 1992 में मड़ैयन गांव में तीन लोगों की हत्या और उसके बाद गांव में आग लगाए जाने की घटनाओं का भी उल्लेख मिलता है। पुलिस मुखबिरी के शक में लोगों के साथ बर्बरता करने की कहानियां भी उसके आतंक की पहचान बन गई थीं।

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मुखबिरों के प्रति उसकी कथित बेरहमी ने पुलिस के लिए उसके खिलाफ अभियान को और कठिन बनाया। जंगल में पुलिस की गतिविधियों की जानकारी गिरोह तक पहुंचने की वजह से कई बार पुलिस अभियान विफल हुए।

यही कारण था कि पाठा क्षेत्र में पुलिस और ददुआ गिरोह के बीच संघर्ष सिर्फ अपराधी को पकड़ने का अभियान नहीं रह गया था। यह एक ऐसे नेटवर्क को तोड़ने की कोशिश थी, जिसने जंगलों में वर्षों से अपना प्रभाव जमा रखा था।

गरीबों की मदद और ‘रॉबिनहुड’ की छवि

ददुआ की कहानी का सबसे विवादित पहलू उसकी तथाकथित ‘रॉबिनहुड’ छवि है।

स्थानीय चर्चाओं और विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में कहा गया कि वह गरीब परिवारों की आर्थिक मदद करता था, बेटियों की शादी में सहायता देता था और गांवों के विवादों में मध्यस्थता करता था। विशेषकर पटेल-कुर्मी समाज के कुछ हिस्सों में उसके प्रति सहानुभूति की चर्चा मिलती है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण फर्क समझना जरूरी है। गरीबों की मदद करना किसी व्यक्ति के हत्या, अपहरण, डकैती या हिंसा के आरोपों को समाप्त नहीं कर देता। ददुआ की सामाजिक छवि और उसके अपराधों—दोनों को अलग-अलग कसौटी पर देखना होगा।

यही वजह है कि एक ही व्यक्ति के बारे में दो बिल्कुल विपरीत कहानियां आज भी सुनाई देती हैं। एक कहानी कहती है—‘ददुआ गरीबों के काम आता था।’ दूसरी कहानी कहती है—‘ददुआ के नाम से लोग डरते थे।’ दोनों कथाओं का साथ-साथ मौजूद होना ही ददुआ की सामाजिक विरासत को इतना जटिल बनाता है।

जब बीहड़ की बंदूक राजनीति की दिशा तय करने लगी

ददुआ का प्रभाव अपराध की दुनिया तक सीमित नहीं रहा। समय के साथ उसने चुनावी राजनीति में भी हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया।

बुंदेलखंड के कई इलाकों में उसके समर्थन को चुनावी ताकत माना जाता था। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार प्रधान से लेकर विधायक और सांसद तक के चुनाव में उसके प्रभाव की चर्चा होती थी। नेताओं का उसके संपर्क में जाना और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों में उसका हस्तक्षेप एक स्थापित धारणा बन गई थी। यहां तक कहा गया कि ददुआ का ‘फरमान’ कई इलाकों में चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता था।

हालांकि यह दावा हर चुनाव और हर सीट पर समान रूप से लागू हुआ, ऐसा कहना अतिशयोक्ति होगा। लेकिन इतना जरूर है कि ददुआ ने अपराध की ताकत को सामाजिक नेटवर्क और चुनावी प्रभाव में बदलने की कोशिश की थी।

बसपा से सपा तक—बदलते राजनीतिक रिश्ते

ददुआ के राजनीतिक संबंधों को लेकर भी अनेक दावे और राजनीतिक चर्चाएं सामने आती रही हैं। रिपोर्टों के अनुसार शुरुआती दौर में उसके प्रभाव क्षेत्र में बहुजन समाज पार्टी से जुड़े राजनीतिक समीकरणों की चर्चा हुई। बाद में 2004 के आसपास उसका झुकाव समाजवादी पार्टी की ओर बताया गया। इस राजनीतिक बदलाव का असर उसके परिवार के भविष्य पर भी पड़ा।

ददुआ स्वयं कभी खादी पहनकर विधानसभा या संसद नहीं पहुंचा, लेकिन उसके परिवार के सदस्यों ने बाद में चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की।

उसका छोटा भाई बालकुमार पटेल 2009 में मिर्जापुर लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी के टिकट पर सांसद चुना गया। उसका बेटा वीर सिंह पटेल 2012 में चित्रकूट की कर्वी विधानसभा सीट से विधायक बना। परिवार से जुड़े राम सिंह पटेल भी प्रतापगढ़ की पट्टी विधानसभा सीट से विधायक बने।

यही वह तथ्य है जिसके कारण ददुआ को लेकर यह कहावत लोकप्रिय हुई कि बीहड़ में बैठा व्यक्ति चुनावी राजनीति के समीकरण बदल देता था।

2007: सत्ता बदली और शुरू हुआ अंतिम अभियान

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2007 का वर्ष महत्वपूर्ण था। मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी की सरकार बनी और कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार ने कड़ा रुख अपनाया। ददुआ के खिलाफ कार्रवाई तेज हुई।

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उत्तर प्रदेश एसटीएफ को उसके पीछे लगाया गया। कई दिनों तक जंगलों में सूचनाएं जुटाई गईं। मुखबिर तंत्र और सर्विलांस के जरिए उसकी लोकेशन का पता लगाने की कोशिश की गई।

समकालीन रिपोर्टों के अनुसार एसटीएफ ने जुलाई 2007 में चंबल-पाठा क्षेत्र के जंगलों में व्यापक अभियान चलाया। अभियान का अंतिम चरण 21-22 जुलाई की रात से जुड़ा था।

22 जुलाई 2007: बीहड़ का आखिरी दिन

22 जुलाई 2007 की सुबह उत्तर प्रदेश पुलिस के इतिहास की चर्चित मुठभेड़ों में से एक हुई। एसटीएफ ने चित्रकूट के जंगलों में ददुआ को घेर लिया। मुठभेड़ के दौरान ददुआ और उसके कई साथी मारे गए। समकालीन रिपोर्टों में ददुआ के साथ उसके कई सहयोगियों के मारे जाने की पुष्टि की गई।

एसटीएफ के अभियान में तत्कालीन अधिकारियों अमिताभ यश और अनंत देव की भूमिका विशेष रूप से सामने आई। सरकार ने अभियान में शामिल अधिकारियों को सम्मानित करने और बहादुरी पदकों की सिफारिश करने की घोषणा भी की थी।

ददुआ के मारे जाने के साथ लगभग तीन दशक से बुंदेलखंड के जंगलों में कायम उसके साम्राज्य का अंत हुआ। उसके सिर पर पांच लाख रुपये का इनाम था और वह लंबे समय से पुलिस के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल था।

ददुआ के खिलाफ अभियान में खर्च हुए करोड़ों

ददुआ के खिलाफ पुलिस अभियान कितना बड़ा था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि तत्कालीन रिपोर्टों में उसके गिरोह पर नियंत्रण के लिए करीब 100 करोड़ रुपये खर्च होने का उल्लेख आया था।

यह आंकड़ा सिर्फ एक अपराधी को पकड़ने की कीमत नहीं बताता, बल्कि उस दौर में बुंदेलखंड के जंगलों में कानून-व्यवस्था की चुनौती की गंभीरता भी दिखाता है। दुर्गम भूगोल, सीमावर्ती क्षेत्र, हथियारबंद गिरोह और स्थानीय नेटवर्क—इन सबने ददुआ के खिलाफ अभियान को लंबा खींचा।

ददुआ के बाद भी खत्म नहीं हुई राजनीतिक कहानी

ददुआ की मृत्यु के बाद उसकी राजनीतिक कहानी खत्म नहीं हुई। बल्कि उसका परिवार चुनावी राजनीति में सक्रिय हुआ।

बालकुमार पटेल 2009 में सांसद बने और वीर सिंह पटेल 2012 में विधायक चुने गए। वीर सिंह बाद में 2022 के विधानसभा चुनाव में मानिकपुर सीट से समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी रहे, लेकिन उन्हें अपना दल (सोनेलाल) के अविनाश चंद्र द्विवेदी ने 1,048 वोटों से हरा दिया।

इस चुनाव परिणाम ने यह संकेत दिया कि ददुआ की पुरानी राजनीतिक विरासत अपने आप चुनावी जीत की गारंटी नहीं रह गई थी।

यानी जिस प्रभाव को कभी बीहड़ की बंदूक से जोड़ा जाता था, लोकतांत्रिक राजनीति में उसकी शक्ति धीरे-धीरे मतदाताओं के स्वतंत्र निर्णय के सामने सीमित होती गई।

2024 के लोकसभा चुनाव के समय भी रिपोर्टों में ददुआ परिवार की सक्रियता पहले की तुलना में कम दिखाई देने की चर्चा हुई।

मंदिर में मूर्ति और उठे सवाल

ददुआ की मृत्यु के करीब एक दशक बाद फतेहपुर के मंदिर में उसकी मूर्ति लगाए जाने की खबर ने पूरे प्रदेश का ध्यान खींचा।

मंदिर में ददुआ और उसकी पत्नी की मूर्तियां स्थापित किए जाने की रिपोर्ट के बाद इस पर सवाल उठे कि आखिर एक कुख्यात डकैत को मंदिर परिसर में स्थान क्यों दिया गया?

मूर्ति स्थापना के समय मंदिर का मुख्य द्वार बंद रखा गया था और पुलिस की निगरानी की खबरें भी सामने आई थीं। विरोध की आवाजें भी उठीं। यह घटना ददुआ की विरासत के दो बिल्कुल विपरीत पहलुओं को सामने लाती है।

एक तरफ कानून की नजर में वह गंभीर अपराधों का आरोपी और पुलिस का वांछित दस्यु था। दूसरी तरफ उसके समर्थकों और कुछ स्थानीय लोगों की नजर में वह ऐसा व्यक्ति था जिसने जरूरतमंदों की मदद की।

लेकिन किसी अपराधी की मूर्ति को मंदिर में स्थापित करने का प्रश्न केवल आस्था का प्रश्न नहीं है। यह सामाजिक स्मृति और नैतिकता का भी प्रश्न है।

‘गुनाहों का देवता’—यह उपाधि क्यों?

ददुआ को ‘गुनाहों का देवता’ कहना अपने आप में एक विरोधाभास है। ‘गुनाह’ उसके आपराधिक जीवन को दर्शाता है और ‘देवता’ उस लोकछवि को, जो कुछ लोगों के बीच उसके प्रति बनी।

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यही विरोधाभास बुंदेलखंड के कई पुराने दस्यु चरित्रों में दिखाई देता है। जब राज्य की संस्थाएं कमजोर दिखाई देती हैं, तब बंदूक वाला व्यक्ति कभी-कभी स्थानीय विवादों का निर्णायक बन जाता है। वह किसी गरीब की मदद करता है, किसी परिवार को पैसा देता है या किसी विवाद का फैसला सुनाता है और धीरे-धीरे कुछ लोगों के बीच उसकी छवि ‘रक्षक’ की बन जाती है।

लेकिन यह व्यवस्था कानून का विकल्प नहीं हो सकती। ददुआ की कहानी इसी खतरे का सबसे बड़ा उदाहरण है।

क्या ददुआ सचमुच ‘किंगमेकर’ था?

यह सवाल आज भी बहस का विषय है। उसके प्रभाव के किस्से इतने व्यापक हैं कि उसे बुंदेलखंड की राजनीति का ‘किंगमेकर’ तक कहा गया। कई रिपोर्टों में यह दावा किया गया कि वह उम्मीदवारों के समर्थन और विरोध का फैसला करता था।

लेकिन लोकतांत्रिक राजनीति के विश्लेषण में केवल किसी डकैत की व्यक्तिगत ताकत को चुनावी जीत का कारण मानना उचित नहीं होगा। जातीय समीकरण, स्थानीय नेतृत्व, दलों का संगठन, उम्मीदवार की स्वीकार्यता और मतदाताओं की पसंद भी चुनाव परिणाम तय करती है।

ददुआ की असली ताकत शायद इन सभी तत्वों के बीच पैदा हुए उस भय और प्रभाव में थी, जिसने लंबे समय तक लोगों को यह विश्वास दिलाया कि बीहड़ से आने वाला आदेश चुनावी मैदान में भी असर डाल सकता है।

बीहड़ बदल गया, कहानी बाकी रह गई

आज पाठा के जंगलों की तस्वीर पहले जैसी नहीं है। सड़कें बढ़ी हैं, संचार के साधन बढ़े हैं, पुलिस की पहुंच बढ़ी है और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मौजूदगी पहले से मजबूत हुई है। लेकिन ददुआ की कहानी अब भी बुंदेलखंड के सामाजिक इतिहास का हिस्सा है।

गांवों के बुजुर्ग उसके किस्से सुनाते हैं। राजनीति के जानकार उसके प्रभाव की चर्चा करते हैं। पुलिस अधिकारी उसके खिलाफ चलाए गए अभियानों को याद करते हैं और नई पीढ़ी के लिए वह एक ऐसी कहानी बन चुका है जिसमें अपराध, राजनीति, जातीय समीकरण, गरीबी, जंगल और सत्ता—सब एक साथ दिखाई देते हैं।

ददुआ की कहानी को रोमांचक डकैत कथा के रूप में पढ़ना आसान है, लेकिन इसके भीतर छिपा सामाजिक संदेश ज्यादा महत्वपूर्ण है।

जब कानून का भय कमजोर होता है, जब विकास की रोशनी किसी इलाके तक देर से पहुंचती है और जब सामाजिक असमानता गहरी होती है, तब कोई हथियारबंद व्यक्ति खुद को ‘न्याय’ का प्रतीक बनाने की कोशिश कर सकता है। ददुआ ने इसी खाली जगह को भरने की कोशिश की।

बंदूक से बनी सत्ता आखिर लोकतंत्र के सामने क्यों हारी?

22 जुलाई 2007 को ददुआ मारा गया। उसके साथ एक लंबे आपराधिक अध्याय का अंत हुआ। लेकिन उसकी मृत्यु के बाद भी उसका परिवार राजनीति में पहुंचा और उसका नाम लंबे समय तक चुनावी चर्चाओं में बना रहा।

यह कहानी बताती है कि बंदूक से पैदा हुआ प्रभाव खत्म होने में समय लग सकता है, लेकिन लोकतंत्र अंततः मतदाता के हाथ में लौटता है।

ददुआ के जीवन को इसलिए केवल ‘डकैत की कहानी’ कह देना अधूरा होगा। वह एक ऐसे दौर का प्रतीक था जब बुंदेलखंड के बीहड़ों में अपराध और राजनीति की सीमाएं कई जगह धुंधली दिखाई देती थीं।

किसी के लिए वह मददगार था, किसी के लिए आतंकवादी चेहरा, किसी के लिए राजनीतिक ताकत और किसी के लिए कानून का सबसे बड़ा दुश्मन।

लेकिन इतिहास का अंतिम फैसला यही है कि गरीब की मदद करने वाला होना और कानून से ऊपर उठ जाना—दो अलग बातें हैं।

फतेहपुर के मंदिर में लगी उसकी मूर्ति इसी विरोधाभास की सबसे बड़ी तस्वीर बन गई—एक ऐसा व्यक्ति जिसकी बंदूक से लोग डरते थे, उसी की प्रतिमा के सामने कुछ लोग सिर झुकाते दिखे और कुछ ने इसका खुलकर विरोध किया। ददुआ मर गया, लेकिन ‘गुनाहों के देवता’ की कहानी आज भी बुंदेलखंड के बीहड़ों की हवा में तैरती है।

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Author: यायावर

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