हिमांशु मोदी की रिपोर्ट
राजस्थान के जयपुर जिले के रामपुरा-कंवरपुरा गांव का सरकारी प्राथमिक स्कूल इन दिनों शिक्षा व्यवस्था, सरकारी जवाबदेही और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति को लेकर चर्चा में है। 21 अगस्त को सीजेपी की एक टीम अपने ‘स्कूल ठीक करो अभियान’ के तहत गांव के सरकारी स्कूल की स्थिति देखने पहुंची थी। टीम के पहुंचने के बाद वहां विवाद हुआ और संगठन ने अपने कार्यकर्ताओं के साथ धक्का-मुक्की तथा मारपीट के आरोप लगाए। दूसरी ओर ग्रामीणों ने टीम को बाहरी बताते हुए कहा कि गांव की समस्या को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है। लेकिन इस पूरे विवाद के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल स्कूल की वास्तविक स्थिति है, क्योंकि जर्जर भवन के कारण बच्चों को नियमित कक्षाओं के बजाय एक अस्थायी व्यवस्था में पढ़ाया जा रहा था।
रामपुरा-कंवरपुरा का मामला केवल एक गांव या एक संगठन के दौरे तक सीमित नहीं है। यह देश के उन हजारों सरकारी स्कूलों से जुड़ा बड़ा सवाल है, जहां भवनों की जर्जर हालत, शिक्षकों की कमी, संसाधनों का अभाव और स्कूलों तक बच्चों की पहुंच जैसी समस्याएं लगातार बनी हुई हैं। जयपुर जिले के इस गांव में सामने आई तस्वीर इसलिए गंभीर है क्योंकि जिस स्थान पर बच्चों को सुरक्षित कक्षा में पढ़ना चाहिए था, वहां स्कूल भवन को असुरक्षित मानते हुए बच्चों के लिए दूसरी जगह व्यवस्था करनी पड़ी। इससे सरकारी शिक्षा की गुणवत्ता और बुनियादी ढांचे को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं।
21 अगस्त को सीजेपी टीम के साथ क्या हुआ?
21 अगस्त की सुबह सीजेपी की टीम अपने ‘स्कूल ठीक करो अभियान’ के तहत रामपुरा-कंवरपुरा गांव पहुंची थी। संगठन का कहना था कि टीम सरकारी स्कूल की वास्तविक स्थिति का निरीक्षण करने और यह देखने पहुंची है कि बच्चों को किन परिस्थितियों में पढ़ना पड़ रहा है। संगठन के अनुसार गांव की ओर जाने वाले रास्ते पर ट्रैक्टर-ट्रॉली के माध्यम से बैरिकेडिंग की गई थी और बाहर से आने वाले वाहनों की जांच की जा रही थी।
सीजेपी कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सुबह करीब आठ बजे टीम के गांव पहुंचने के बाद स्थानीय लोगों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया। संगठन का दावा है कि इसके बाद धक्का-मुक्की, गाली-गलौज और मारपीट की स्थिति बन गई। सीजेपी प्रवक्ता आशुतोष रांका ने स्वयं एक वीडियो जारी कर दावा किया कि उनकी शर्ट फाड़ दी गई, मोबाइल फोन को नुकसान पहुंचाया गया और टीम के वाहनों के शीशे भी तोड़ दिए गए।
संगठन की ओर से यह आरोप भी लगाया गया कि एक कार्यकर्ता पीछे रह गया, जिसके बाद उसे पकड़कर मारपीट की गई। घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद मामला तेजी से चर्चा में आ गया। हालांकि स्थानीय ग्रामीणों का पक्ष इससे अलग था। ग्रामीणों ने कथित रूप से कहा कि गांव की समस्या को बाहरी लोग राजनीतिक रंग दे रहे हैं और वे स्वयं स्कूल की मरम्मत और अन्य समस्याओं को ठीक कराने की दिशा में प्रयास कर सकते हैं।
यहीं से इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है। यदि ग्रामीण स्वयं स्कूल की समस्या का समाधान कराने की बात कर रहे थे तो जर्जर भवन की स्थिति लंबे समय तक क्यों बनी रही? यदि स्कूल की मरम्मत के लिए धनराशि स्वीकृत हो चुकी थी, जैसा कि स्थानीय स्तर पर दावा किया गया, तो काम शुरू होने में देरी क्यों हुई? किसी सामाजिक संगठन या राजनीतिक विवाद से अलग यह सवाल सीधे बच्चों के भविष्य से जुड़ा हुआ है।
जर्जर स्कूल भवन और अस्थायी व्यवस्था में पढ़ते बच्चे
रामपुरा-कंवरपुरा के सरकारी प्राथमिक विद्यालय की स्थिति ने इस मामले को राष्ट्रीय स्तर की चर्चा का विषय बनाया। सामने आई जानकारी के अनुसार स्कूल भवन की छत की कई पट्टियां टूट चुकी थीं और भवन की संरचना कमजोर हो गई थी। छत को सहारा देने के लिए नीचे लोहे के एंगल लगाए गए थे। भवन की हालत को असुरक्षित मानते हुए वहां बच्चों की नियमित पढ़ाई कराना संभव नहीं माना गया।
इसके बाद बच्चों के लिए स्कूल भवन से लगभग 50 मीटर दूर अस्थायी व्यवस्था की गई। बच्चों को टीन शेड के नीचे बैठाकर पढ़ाया जा रहा था और आसपास पशुपालन तथा चारे से जुड़ी गतिविधियां भी थीं। शिक्षा के लिए आवश्यक सुरक्षित और व्यवस्थित वातावरण के बजाय इस तरह की अस्थायी व्यवस्था ग्रामीण सरकारी स्कूलों की बुनियादी समस्याओं की ओर संकेत करती है।
प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर स्कूल भवन केवल चार दीवारों का ढांचा नहीं होता। छोटे बच्चों के लिए सुरक्षित कक्षा, पर्याप्त रोशनी, हवा, बैठने की सुविधा, साफ पानी और शौचालय जैसी बुनियादी आवश्यकताएं सीधे उनके सीखने की क्षमता से जुड़ी होती हैं। यदि किसी गांव के बच्चों को जर्जर भवन के कारण अस्थायी टीन शेड में पढ़ना पड़े तो यह केवल निर्माण कार्य में देरी का मामला नहीं रह जाता, बल्कि शिक्षा के अधिकार और सरकारी जिम्मेदारी से जुड़ा प्रश्न बन जाता है।
12 लाख 50 हजार के बजट पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
स्थानीय स्तर पर यह दावा सामने आया कि स्कूल की मरम्मत या निर्माण के लिए 12 लाख 50 हजार रुपये की राशि स्वीकृत हो चुकी थी। यदि यह दावा सही है तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि स्वीकृत धनराशि के बावजूद काम शुरू होने में देरी क्यों हुई। सरकारी परियोजनाओं में बजट स्वीकृत होना पहला कदम है, लेकिन वास्तविक सफलता तभी मानी जाती है जब उसका लाभ समय पर जमीन पर दिखाई दे।
ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर योजनाओं की घोषणा और उनके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच लंबा अंतर दिखाई देता है। किसी भवन को असुरक्षित घोषित करने के बाद बच्चों के लिए अस्थायी व्यवस्था करना तत्काल आवश्यकता हो सकती है, लेकिन स्थायी समाधान में देरी बच्चों की पढ़ाई को प्रभावित करती है। रामपुरा-कंवरपुरा के मामले में भी यही सबसे बड़ा सवाल रहा कि आखिर बच्चों को सुरक्षित स्कूल भवन मिलने में इतना समय क्यों लगा।
बाद में जर्जर भवन को हटाकर नए स्कूल भवन के निर्माण की प्रक्रिया शुरू करने की जानकारी सामने आई। यह निश्चित रूप से सकारात्मक कदम है, लेकिन इससे यह सवाल समाप्त नहीं होता कि यदि भवन की हालत पहले से खराब थी तो कार्रवाई के लिए सार्वजनिक विवाद और व्यापक चर्चा की आवश्यकता क्यों पड़ी। किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा यही होती है कि वह समस्या को पहले पहचानकर हल करती है या फिर विवाद के बाद कार्रवाई करती है।
धार्मिक आयोजन और शिक्षा की प्राथमिकता पर बहस
रामपुरा-कंवरपुरा गांव में धार्मिक आयोजन और मंदिर निर्माण की गतिविधियों का उल्लेख भी इस मामले की चर्चा के दौरान सामने आया। गांव में भागवत कथा, प्राण प्रतिष्ठा और कलश यात्रा जैसे धार्मिक कार्यक्रमों की बात कही गई। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि धार्मिक आयोजन, मंदिर निर्माण या आस्था का सार्वजनिक प्रदर्शन अपने आप में शिक्षा विरोधी नहीं है। भारत में धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
लेकिन बहस तब शुरू होती है जब उसी गांव में बच्चों के लिए सुरक्षित स्कूल भवन उपलब्ध नहीं हो और जर्जर इमारत के कारण उन्हें अस्थायी व्यवस्था में पढ़ना पड़े। सवाल मंदिर और स्कूल को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करने का नहीं है। असली प्रश्न यह है कि क्या समाज अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के साथ-साथ बच्चों की शिक्षा को भी समान प्राथमिकता दे रहा है?
यदि किसी गांव में बड़े धार्मिक आयोजनों के लिए सामूहिक संसाधन और जनसहयोग जुटाया जा सकता है तो बच्चों के लिए सुरक्षित स्कूल, बेहतर बैठने की व्यवस्था, पुस्तकालय, शौचालय और अन्य सुविधाओं की मांग के लिए भी उतनी ही सामूहिक आवाज उठनी चाहिए। शिक्षा को केवल सरकार की जिम्मेदारी मानकर समाज की भूमिका समाप्त नहीं हो जाती। गांव के अभिभावक, स्थानीय जनप्रतिनिधि और सामाजिक संगठन भी बच्चों की शिक्षा के लिए जवाबदेही तय कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
सरकारी स्कूलों की स्थिति और घटते नामांकन की चुनौती
रामपुरा-कंवरपुरा की घटना ऐसे समय सामने आई है जब देश में सरकारी स्कूलों की संख्या, स्कूलों के विलय और बच्चों के नामांकन को लेकर व्यापक बहस चल रही है। कम नामांकन वाले स्कूलों को बड़े विद्यालयों में मिलाने की नीति को सरकारें संसाधनों के बेहतर उपयोग के रूप में प्रस्तुत करती हैं। तर्क दिया जाता है कि कम बच्चों वाले कई छोटे विद्यालयों के बजाय बेहतर संसाधनों वाले बड़े स्कूल बनाए जा सकते हैं।
लेकिन इस नीति के सामाजिक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक विद्यालय की दूरी बढ़ने का सीधा असर छोटे बच्चों पर पड़ता है। यदि किसी छह या सात वर्ष के बच्चे को रोजाना कई किलोमीटर दूर जाना पड़े तो परिवहन, सुरक्षा और आर्थिक स्थिति बड़ी बाधा बन सकती है। जिन परिवारों के पास निजी वाहन नहीं हैं, उनके लिए बच्चों को दूर के स्कूल भेजना आसान नहीं होता।
इस समस्या का असर लड़कियों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों पर अधिक पड़ सकता है। कई ग्रामीण परिवारों में स्कूल की दूरी बढ़ने के बाद बच्चों की नियमित उपस्थिति प्रभावित होती है। इसलिए स्कूलों के विलय या बंद करने का निर्णय केवल नामांकन की संख्या के आधार पर नहीं होना चाहिए। स्थानीय भौगोलिक स्थिति, परिवहन, सामाजिक संरचना और बच्चों की पहुंच जैसे कारकों को भी गंभीरता से देखना आवश्यक है।
कम नामांकन के पीछे असली कारण क्या हैं?
सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या कम होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। कहीं शिक्षकों की कमी है, कहीं स्कूल भवन जर्जर हैं, कहीं संसाधनों की कमी है और कहीं निजी स्कूलों के प्रति बढ़ते आकर्षण ने सरकारी शिक्षा के सामने चुनौती पैदा की है। अंग्रेजी माध्यम और निजी स्कूलों की मार्केटिंग ने भी अभिभावकों की प्राथमिकताओं को प्रभावित किया है।
लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि कम नामांकन और खराब व्यवस्था का संबंध एक चक्र की तरह काम कर सकता है। जब किसी स्कूल में शिक्षक कम होते हैं या भवन की हालत खराब होती है तो अभिभावक बच्चों को दूसरे स्कूल में भेजना शुरू कर सकते हैं। इससे नामांकन घटता है। नामांकन कम होने के बाद स्कूल को विलय या बंद करने के योग्य मान लिया जाता है। इसके बाद गांव से स्कूल और दूर चला जाता है।
यही कारण है कि सरकारी स्कूलों की समस्या का समाधान केवल विलय की नीति नहीं हो सकती। पहले यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक, सुरक्षित भवन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध हो। यदि सुविधाओं में सुधार के बाद भी नामांकन कम रहता है तो स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर आगे की नीति बनाई जा सकती है।
निजी स्कूलों की बढ़ती भूमिका और सरकारी शिक्षा का संकट
सरकारी स्कूलों की सबसे बड़ी भूमिका यह है कि वे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को भी शिक्षा का अवसर प्रदान करते हैं। यदि सरकारी शिक्षा की गुणवत्ता कमजोर होती है तो परिवार निजी स्कूलों की ओर जाने का प्रयास करते हैं। लेकिन निजी शिक्षा का खर्च सभी परिवारों के लिए संभव नहीं होता।
निजी स्कूल की फीस के अलावा किताबें, यूनिफॉर्म, परिवहन और अन्य खर्च भी होते हैं। दैनिक मजदूरी करने वाले या सीमित आय वाले परिवारों के लिए यह खर्च लगातार उठाना कठिन हो सकता है। ऐसे परिवारों के सामने कई बार बच्चों की शिक्षा जारी रखने और घरेलू आर्थिक जरूरतों के बीच कठिन विकल्प पैदा हो जाता है।
मजबूत सरकारी स्कूल सामाजिक समानता के लिए आवश्यक हैं। यदि गरीब परिवार का बच्चा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करेगा तो वह उच्च शिक्षा, रोजगार और सामाजिक प्रगति के अवसरों तक पहुंच सकता है। लेकिन यदि सरकारी स्कूल कमजोर होंगे और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल महंगे निजी संस्थानों तक सीमित होती जाएगी तो आर्थिक असमानता का असर अगली पीढ़ी तक पहुंच सकता है।
वंचित वर्गों के बच्चों पर पड़ने वाला प्रभाव
सरकारी स्कूलों तक पहुंच कम होने का असर सामान्यतः आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर परिवारों पर अधिक पड़ने की आशंका रहती है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक समुदाय और गरीब परिवारों के बड़ी संख्या में बच्चे सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर रहते हैं।
यदि स्कूलों का विलय करते समय गांव से दूरी बढ़ती है और परिवहन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती तो सबसे पहले कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाले बच्चों की नियमित शिक्षा प्रभावित हो सकती है। इसलिए यह जरूरी है कि शिक्षा नीति बनाते समय केवल प्रशासनिक सुविधा और छात्र संख्या को आधार न बनाया जाए।
हर बच्चे की शिक्षा तक पहुंच सुनिश्चित करना सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी है। विशेष रूप से प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर स्कूल घर के नजदीक होना चाहिए, ताकि कोई बच्चा केवल दूरी या आर्थिक मजबूरी के कारण पढ़ाई से बाहर न हो जाए।
सरकारी स्कूलों में धार्मिक गतिविधियों पर उठते सवाल
सरकारी स्कूलों में समय-समय पर धार्मिक गतिविधियों के आयोजन को लेकर भी बहस होती रही है। अलग-अलग क्षेत्रों से पूजा-पाठ, धार्मिक कार्यक्रम, भजन या अन्य गतिविधियों के आयोजन की खबरें सामने आती रही हैं। भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में सरकारी स्कूलों की जिम्मेदारी है कि वे सभी समुदायों के बच्चों के लिए समान और समावेशी वातावरण उपलब्ध कराएं।
सरकारी विद्यालयों का प्राथमिक उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संविधान की समझ और सामाजिक समानता का विकास होना चाहिए। बच्चों को भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता के बारे में जानकारी देना शिक्षा का हिस्सा हो सकता है, लेकिन सरकारी शिक्षा व्यवस्था की मूल पहचान किसी एक धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
आज सरकारी स्कूलों के सामने सबसे बड़ी जरूरत बेहतर कक्षाओं, पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं, डिजिटल संसाधनों और पर्याप्त शिक्षकों की है। यदि इन बुनियादी सुविधाओं की जगह विवादित या गैर-शैक्षणिक गतिविधियां अधिक प्राथमिकता पाने लगें तो इसका असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ सकता है।
शिक्षा मजबूत होगी तो समाज भी मजबूत होगा
शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं है। एक पढ़ा-लिखा नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों को बेहतर ढंग से समझता है। वह अपने गांव की सड़क, अस्पताल, पानी, रोजगार, मजदूरी और सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकता है और प्रशासन से जवाब मांग सकता है।
इसीलिए गुणवत्तापूर्ण सरकारी शिक्षा लोकतंत्र की मजबूती से भी जुड़ी हुई है। बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलने का अर्थ केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना नहीं है। शिक्षा उन्हें तर्क करने, तथ्यों को समझने, वैज्ञानिक सोच विकसित करने और जिम्मेदार नागरिक बनने की क्षमता देती है।

रामपुरा-कंवरपुरा जैसे मामलों को इसी व्यापक संदर्भ में देखने की आवश्यकता है। किसी गांव के बच्चों को सुरक्षित स्कूल भवन नहीं मिलना केवल स्थानीय समस्या नहीं है। यह उस समाज के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है, जिसमें आज के बच्चे कल नागरिक, शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, किसान, पत्रकार और प्रशासनिक अधिकारी बनेंगे।
रामपुरा-कंवरपुरा की घटना से सरकार और समाज के लिए सबक
रामपुरा-कंवरपुरा की घटना ने यह स्पष्ट किया कि किसी भी जर्जर स्कूल भवन को केवल प्रशासनिक फाइल का विषय मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। स्कूल भवन की बदहाली का सीधा असर बच्चों की पढ़ाई और सुरक्षा पर पड़ता है। इसलिए जर्जर सरकारी स्कूलों की पहचान, समयबद्ध मरम्मत और निर्माण कार्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इस मामले में नए भवन के निर्माण की प्रक्रिया शुरू होना सकारात्मक कदम है, लेकिन इससे देश और राजस्थान के अन्य जर्जर स्कूलों की समस्या समाप्त नहीं हो जाती। जरूरत इस बात की है कि प्रशासन व्यापक स्तर पर स्कूल भवनों का सर्वे कराए और जहां भवन असुरक्षित हैं वहां बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए समयबद्ध समाधान किया जाए।
साथ ही समाज को भी यह समझना होगा कि बच्चों की शिक्षा केवल सरकार का विषय नहीं है। स्थानीय समुदाय को स्कूल की व्यवस्था, शिक्षकों की उपस्थिति और बच्चों की सुविधाओं के लिए सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। किसी गांव की वास्तविक प्रगति का आकलन केवल धार्मिक आयोजनों, बड़े निर्माण कार्यों या राजनीतिक दावों से नहीं किया जा सकता। असली विकास का एक महत्वपूर्ण पैमाना यह है कि उस गांव का बच्चा किस तरह के स्कूल में पढ़ रहा है।
बच्चों का भविष्य सबसे बड़ी प्राथमिकता होना चाहिए
रामपुरा-कंवरपुरा सरकारी स्कूल का मामला एक महत्वपूर्ण सवाल छोड़ता है कि आखिर बच्चों को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए किसी विवाद, आंदोलन या सार्वजनिक दबाव की आवश्यकता क्यों पड़नी चाहिए। यदि किसी स्कूल का भवन जर्जर है तो प्रशासन को समय रहते कार्रवाई करनी चाहिए। यदि बजट स्वीकृत है तो निर्माण कार्य समय पर शुरू होना चाहिए और यदि किसी गांव में बच्चों को अस्थायी व्यवस्था में पढ़ना पड़ रहा है तो उसे सामान्य स्थिति नहीं माना जाना चाहिए।
21 अगस्त को सीजेपी टीम और ग्रामीणों के बीच हुआ विवाद अपनी जगह जांच और अलग-अलग दावों का विषय है। लेकिन इस विवाद से अलग जो तथ्य सबसे महत्वपूर्ण है, वह बच्चों की शिक्षा और उनकी सुरक्षा है। किसी भी संगठन, राजनीतिक दल या स्थानीय समूह से ऊपर बच्चों का अधिकार होना चाहिए कि उन्हें सुरक्षित भवन, पर्याप्त शिक्षक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले।
रामपुरा-कंवरपुरा का मामला राजस्थान के जयपुर जिले के एक गांव की कहानी भर नहीं है। यह देश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़े उस बड़े प्रश्न का प्रतीक है कि क्या हम बच्चों की शिक्षा को वास्तव में अपनी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रख रहे हैं। मंदिर, धार्मिक आयोजन, सामाजिक परंपराएं और सांस्कृतिक गतिविधियां समाज का हिस्सा हो सकती हैं, लेकिन बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा की कीमत पर किसी भी प्राथमिकता को आगे नहीं रखा जा सकता। एक मजबूत समाज का निर्माण मजबूत स्कूलों से होता है और किसी भी देश का भविष्य उसके बच्चों को मिलने वाली शिक्षा की गुणवत्ता से तय होता है। इसलिए रामपुरा-कंवरपुरा की घटना से निकलने वाला सबसे बड़ा संदेश यही है कि सरकारी स्कूलों को सुरक्षित, संसाधनयुक्त और बच्चों के लिए आकर्षक बनाना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक प्राथमिकता बननी चाहिए।

























