कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट
दिल्ली के सत्य निकेतन में रविवार को पांच मंज़िला इमारत के अचानक भरभराकर गिरने से छह लोगों की मौत ने राजधानी में भवन सुरक्षा, अनधिकृत निर्माण और छात्रों के लिए चल रहे पीजी आवासों की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे के बाद मलबे से निकली मौत की खबर ने पूरे इलाके को स्तब्ध कर दिया, लेकिन राहत और बचाव अभियान समाप्त होने के साथ ही एक बड़ा सवाल सामने आ खड़ा हुआ है—आखिर वह इमारत गिरी क्यों?
यह केवल एक पुरानी या कमजोर इमारत के ढहने का मामला है या इसके पीछे निर्माण में हुई कथित अनियमितताओं, बेसमेंट में चल रहे काम, संरचनात्मक बदलाव और निगरानी की कमी का पूरा सिलसिला छिपा है? हादसे की जांच अभी जारी है, इसलिए अंतिम कारण जांच रिपोर्ट के बाद ही स्पष्ट होंगे। लेकिन घटनास्थल से सामने आई शुरुआती जानकारियां और स्थानीय लोगों के दावे कई ऐसे सवाल छोड़ रहे हैं जिनका जवाब प्रशासन, नगर निगम और संबंधित जिम्मेदार लोगों को देना होगा।
सत्य निकेतन दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के आसपास का वह इलाका है जहां पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में छात्र रहने लगे हैं। छोटे-छोटे प्लॉटों पर बने मकानों का पीजी में बदलना यहां आम होता गया है। बढ़ती छात्र आबादी के साथ भवनों पर दबाव भी बढ़ा है। सवाल यह है कि क्या भवनों की क्षमता, संरचनात्मक मजबूती और सुरक्षा व्यवस्था में भी उसी अनुपात में बदलाव किया गया?
हादसे के बाद मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की ओर से सामने आई शुरुआती जानकारी में बेसमेंट में खुदाई के दौरान एक पिलर खिसकने और उसके बाद इमारत के गिरने की बात कही गई। हालांकि यह जांच का विषय है कि वास्तव में संरचना के ध्वस्त होने की मूल वजह क्या थी और बेसमेंट में चल रहे काम का उससे कितना सीधा संबंध था।
स्थानीय लोगों ने भी बेसमेंट में पानी जमा होने और वहां निर्माण अथवा मरम्मत संबंधी गतिविधियां चलने की बात कही है। अगर ये दावे जांच में सही पाए जाते हैं तो मामला सिर्फ इमारत गिरने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भी जांचना होगा कि काम शुरू करने से पहले भवन की संरचनात्मक क्षमता का आकलन कराया गया था या नहीं।
बेसमेंट में काम था तो सुरक्षा जांच क्यों नहीं?
किसी भी बहुमंज़िला इमारत में बेसमेंट का निर्माण अथवा उसमें बड़े स्तर पर खुदाई सामान्य मरम्मत जैसा काम नहीं माना जा सकता। भवन की नींव, कॉलम, बीम और भार-वितरण की पूरी संरचना इससे प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि हादसे के बाद सबसे पहला सवाल बेसमेंट में चल रहे काम को लेकर उठ रहा है।
स्थानीय लोगों के अनुसार बेसमेंट में पानी जमा होने की समस्या थी और वहां काम भी किया जा रहा था। यदि किसी इमारत की नींव के आसपास पानी जमा हो रहा हो और उसी स्थान पर खुदाई या अन्य निर्माण गतिविधि चल रही हो तो स्वाभाविक रूप से यह जानना जरूरी है कि काम किस तकनीकी सलाह के आधार पर किया जा रहा था।
पुलिस की जांच में यह भी देखा जा रहा है कि मरम्मत शुरू करने से पहले इमारत की संरचनात्मक स्थिति का परीक्षण कराया गया था या नहीं। यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है। क्योंकि यदि इमारत पहले से ही कमजोर थी, उसमें दरारें थीं, सीलन या पानी की समस्या थी या उसके मूल डिजाइन में बाद में बदलाव किए गए थे, तो किसी भी तरह की खुदाई से पहले विशेषज्ञ इंजीनियर की राय लेना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
यहां सवाल किसी एक व्यक्ति पर आरोप लगाने का नहीं, बल्कि उस पूरी प्रक्रिया को समझने का है जिसके तहत एक बहुमंज़िला भवन में निर्माण अथवा बदलाव का काम शुरू हुआ।
क्या किसी योग्य स्ट्रक्चरल इंजीनियर ने भवन का निरीक्षण किया था? क्या नींव और कॉलम की क्षमता का परीक्षण हुआ था? क्या बेसमेंट में खुदाई के लिए तकनीकी अनुमति ली गई थी? क्या काम के दौरान भार उठाने वाले हिस्सों को सुरक्षित रखने के उपाय किए गए थे?
इन सवालों के जवाब जांच में सामने आने जरूरी हैं।
क्या मंजूर नक्शे के अनुसार बनी थी इमारत?
हादसे के बाद दिल्ली नगर निगम की शुरुआती जांच से जुड़ी जो जानकारी सामने आई है, उसने मामले को और गंभीर बना दिया है। बताया गया है कि करीब 55 वर्ग गज के प्लॉट पर बनी इस इमारत का कोई मंजूर बिल्डिंग प्लान रिकॉर्ड में नहीं मिला। साथ ही बेसमेंट में किया गया निर्माण कथित तौर पर अनधिकृत बताया गया है।
अगर जांच में यह बात प्रमाणित होती है कि भवन का निर्माण स्वीकृत नक्शे के अनुरूप नहीं था, तो यह हादसे की जिम्मेदारी तय करने में महत्वपूर्ण तथ्य होगा।
किसी भवन का नक्शा केवल कागज की औपचारिकता नहीं होता। स्वीकृत नक्शे में यह तय होता है कि प्लॉट पर कितना निर्माण किया जा सकता है, कितनी मंज़िलें बनाई जा सकती हैं, भवन का भार किस तरह वितरित होगा और किन सुरक्षा मानकों का पालन करना होगा।
छोटे प्लॉट पर लगातार अतिरिक्त निर्माण करने से भवन का मूल डिजाइन प्रभावित हो सकता है। स्थानीय लोगों के हवाले से यह भी कहा गया है कि इमारत में लगभग दो वर्ष पहले अतिरिक्त मंज़िलें बनाई गई थीं। इन दावों की सत्यता और निर्माण की अनुमति जांच का विषय है।
यही वह बिंदु है जहां सवाल सिर्फ इमारत बनाने वाले तक नहीं रुकता। यदि कोई अतिरिक्त मंज़िल बिना अनुमति के बनती है तो वह निर्माण पूरा होने तक कैसे पहुंचती है? क्या संबंधित विभाग को इसकी जानकारी नहीं होती? यदि जानकारी होती है तो कार्रवाई क्यों नहीं होती?
राजधानी के घनी आबादी वाले इलाकों में यह समस्या केवल एक भवन तक सीमित नहीं मानी जा सकती। पुराने मकानों में अतिरिक्त कमरे, मंज़िलें, बेसमेंट और व्यावसायिक उपयोग बढ़ता जा रहा है। ऐसे में भवन की मूल संरचनात्मक क्षमता और वास्तविक उपयोग के बीच अंतर पैदा होना अपने आप में जोखिम का कारण बन सकता है।
घर से पीजी बना, लेकिन क्या सुरक्षा भी बदली?
सत्य निकेतन की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यह है कि यह दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के निकट होने के कारण छात्रों के लिए लोकप्रिय आवासीय क्षेत्र बन चुका है। यहां बड़ी संख्या में मकान छात्रों के रहने के लिए पीजी के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं।
यह बदलाव केवल नाम बदलने तक सीमित नहीं है। जिस मकान में कभी सीमित संख्या में परिवार रहता था, उसी भवन में पीजी बनने के बाद कई गुना अधिक लोग रह सकते हैं। इससे सीढ़ियों, निकासी मार्ग, बिजली व्यवस्था, अग्निशमन उपकरण, पानी, स्वच्छता और आपातकालीन निकास पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
हादसे वाली इमारत भी छात्रों के रहने के लिए पीजी के रूप में इस्तेमाल हो रही थी। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इमारत पिछले वर्ष एक संस्था को लीज पर दी गई थी और छात्रों के रहने के लिए इस्तेमाल की जा रही थी।
अब जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी है कि क्या भवन को इस प्रकार पीजी के रूप में संचालित करने की अनुमति थी।
क्या पीजी के लिए जरूरी पंजीकरण या अनुमति ली गई थी? क्या भवन का उपयोग उसी उद्देश्य के लिए स्वीकृत था जिसके लिए उसका वास्तविक इस्तेमाल हो रहा था? क्या रहने वाले छात्रों की संख्या भवन की क्षमता के अनुरूप थी?
इन सवालों को इसलिए भी गंभीरता से देखना होगा क्योंकि आवासीय भवन को बड़ी संख्या में छात्रों के लिए इस्तेमाल करना सामान्य घरेलू उपयोग से अलग परिस्थितियां पैदा करता है।
यदि एक छोटे प्लॉट पर बनी बहुमंज़िला इमारत में बड़ी संख्या में छात्र रह रहे हों, तो केवल कमरे उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है। उनके लिए सुरक्षित सीढ़ियां, पर्याप्त निकासी मार्ग, अग्निशमन व्यवस्था, बिजली सुरक्षा और आपात स्थिति में बाहर निकलने की व्यवस्था भी जरूरी होती है।
फायर एनओसी और आपात निकास का सवाल
हादसे के बाद इमारत में आपातकालीन सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे हैं। स्थानीय लोगों के हवाले से यह जानकारी सामने आई कि इमारत में दूसरा निकास नहीं था। यदि यह तथ्य जांच में प्रमाणित होता है तो यह बेहद गंभीर सुरक्षा प्रश्न होगा।
आपात स्थिति में किसी भवन से बाहर निकलने के लिए केवल मुख्य दरवाजा पर्याप्त नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब भवन में बड़ी संख्या में लोग रहते हों। आग, गैस रिसाव, संरचनात्मक क्षति या किसी अन्य आपदा के समय मुख्य रास्ता बंद होने पर वैकल्पिक निकास जीवन बचाने में निर्णायक हो सकता है।
एमसीडी अधिकारियों के हवाले से यह भी बताया गया है कि कुछ परिस्थितियों में पीजी के लिए फायर एनओसी जरूरी होती है और हादसे वाली इमारत के पास ऐसी एनओसी नहीं थी।
अब जांच एजेंसियों के सामने यह सवाल है कि यदि फायर एनओसी आवश्यक थी तो उसके बिना पीजी संचालन कैसे हो रहा था।
क्या भवन का फायर सेफ्टी निरीक्षण हुआ था? क्या अग्निशमन विभाग को भवन की वास्तविक उपयोग स्थिति की जानकारी थी? क्या भवन में आपातकालीन निकास, अग्निशमन उपकरण और सुरक्षित विद्युत व्यवस्था मौजूद थी?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हादसे में छह लोगों की मौत हुई है। हर मौत के पीछे एक परिवार है और हर परिवार यह जानना चाहेगा कि क्या इस त्रासदी को रोका जा सकता था।
स्थानीय शिकायतें थीं तो कार्रवाई कहां थी?
सत्य निकेतन हादसे के बाद पांचवां और शायद सबसे बड़ा सवाल निगरानी व्यवस्था पर है।
स्थानीय लोगों ने इलाके में पानी भरने, इमारतों की स्थिति और निर्माण गतिविधियों को लेकर पहले से शिकायतों का दावा किया है। सोशल मीडिया पर सामने आए कुछ वीडियो में भी स्थानीय लोग क्षेत्र की भवन सुरक्षा और पुराने मकानों को लेकर सवाल उठाते दिखाई दे रहे हैं।
हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि जांच के माध्यम से होना आवश्यक है, लेकिन यदि किसी क्षेत्र में लंबे समय से भवनों में बदलाव, अतिरिक्त निर्माण या पीजी संचालन की समस्या मौजूद थी, तो नगर निगम की निगरानी व्यवस्था की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सबसे अहम सवाल यही है—क्या सत्य निकेतन जैसे छात्र बहुल इलाकों में भवनों का व्यवस्थित सुरक्षा सर्वे होता है?
यदि होता है तो कितने भवनों की जांच हुई? कितने भवनों में अनियमितताएं मिलीं? कितनों को नोटिस दिया गया? कितने मामलों में कार्रवाई हुई? और कितने मामलों में कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रह गई?
दिल्ली के मेयर प्रवेश माही की ओर से आगे मकानों को पीजी में बदलने के दौरान निर्धारित प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करने की बात कही गई है। यह बयान बताता है कि हादसे के बाद प्रशासन स्वयं भी पीजी व्यवस्था की निगरानी को एक बड़े मुद्दे के रूप में देख रहा है।
लेकिन सवाल केवल भविष्य की कार्रवाई का नहीं है। सवाल यह है कि जिस इमारत में हादसा हुआ, उसके मामले में पहले क्या किया गया था?
जिम्मेदारी तय होगी तो किसकी?
किसी भवन हादसे के बाद अक्सर जिम्मेदारी तय करने की चर्चा शुरू होती है। लेकिन जिम्मेदारी केवल उस व्यक्ति की नहीं हो सकती जिसने आखिरी बार भवन में काम कराया। पूरी प्रक्रिया की जांच आवश्यक होती है।
सबसे पहले यह पता लगाना होगा कि भवन का मूल निर्माण कब हुआ। उसका स्वीकृत नक्शा क्या था। वास्तविक निर्माण कितना था। बाद में कितनी मंज़िलें जोड़ी गईं। बेसमेंट का निर्माण कब हुआ। उसका उपयोग क्या था। भवन को पीजी में कब बदला गया। उसमें कितने लोग रहते थे। मरम्मत का काम कब शुरू हुआ और किसकी अनुमति से हुआ।
इसके साथ यह भी पता लगाना होगा कि क्या किसी इंजीनियर या वास्तु विशेषज्ञ ने भवन की संरचनात्मक स्थिति का परीक्षण किया था।
यदि बिना अनुमति निर्माण हुआ तो संबंधित विभागों की निगरानी व्यवस्था की जांच होनी चाहिए। यदि पीजी बिना जरूरी अनुमति के संचालित हो रहा था तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। यदि फायर सेफ्टी मानकों का पालन नहीं हुआ तो संबंधित स्तर पर जवाबदेही तय होनी चाहिए।
और यदि जांच में यह सामने आता है कि बेसमेंट में चल रहे काम ने भवन की संरचना को प्रभावित किया, तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि काम किसके निर्देश पर हुआ और क्या आवश्यक तकनीकी सावधानियां बरती गई थीं।
छोटे प्लॉट, बड़ी इमारतें और बढ़ता जोखिम
सत्य निकेतन हादसा दिल्ली के तेजी से बदलते शहरी चरित्र पर भी सवाल उठाता है।
जहां कभी परिवारों के लिए बनाए गए मकान थे, वहां अब छात्र आवास, पीजी और अन्य व्यावसायिक उपयोग बढ़ रहे हैं। जमीन सीमित है, किराये की मांग अधिक है और छात्र आबादी लगातार आवास तलाशती है। इस दबाव में कई बार भवन की मूल क्षमता और वास्तविक उपयोग के बीच संतुलन बिगड़ सकता है।
55 वर्ग गज जैसे छोटे प्लॉट पर बहुमंज़िला भवन और उसमें बड़ी संख्या में लोगों का रहना अपने आप में भवन सुरक्षा के सवाल पैदा करता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि छोटे प्लॉट पर बना हर भवन असुरक्षित है। असली सवाल डिजाइन, निर्माण गुणवत्ता, संरचनात्मक क्षमता, स्वीकृत उपयोग और समय-समय पर होने वाले बदलावों का है।
यही वजह है कि इस हादसे को केवल एक इमारत की कमजोरी कहकर समाप्त करना पर्याप्त नहीं होगा।
जांच को पांच सवालों का जवाब देना होगा
सत्य निकेतन हादसे की जांच का दायरा व्यापक होना चाहिए। कम से कम पांच सवालों के स्पष्ट जवाब जरूरी हैं।
पहला—क्या बेसमेंट में खुदाई या मरम्मत शुरू करने से पहले भवन की संरचनात्मक सुरक्षा जांच कराई गई थी?
दूसरा—क्या भवन का निर्माण स्वीकृत नक्शे के अनुसार हुआ था और बाद में जोड़े गए हिस्सों की अनुमति थी?
तीसरा—क्या भवन को छात्रों के लिए पीजी के रूप में संचालित करने की वैध अनुमति थी?
चौथा—क्या फायर सेफ्टी, निकासी मार्ग और अन्य आपातकालीन सुरक्षा मानकों का पालन किया गया था?
पांचवां—यदि भवन या इलाके को लेकर पहले से शिकायतें अथवा अनियमितताएं थीं, तो संबंधित विभागों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की?
इन सवालों के जवाब केवल इस हादसे की जिम्मेदारी तय करने के लिए जरूरी नहीं हैं। ये जवाब यह भी बताएंगे कि दिल्ली के छात्र बहुल इलाकों में आने वाले समय में ऐसी घटनाओं को कैसे रोका जा सकता है।
हादसे के मलबे से निकलता बड़ा सबक
सत्य निकेतन की गिरी हुई इमारत का मलबा सिर्फ ईंट, सीमेंट और लोहे का ढेर नहीं है। वह उन सवालों का मलबा भी है जिन्हें अक्सर तब तक नजरअंदाज किया जाता है जब तक कोई बड़ी दुर्घटना सामने नहीं आ जाती।
अगर भवन का निर्माण नियमों के विपरीत हुआ था तो नियम लागू कराने की व्यवस्था पर सवाल है। अगर अतिरिक्त निर्माण हुआ था तो निगरानी पर सवाल है। अगर पीजी बिना जरूरी सुरक्षा मानकों के चल रहा था तो अनुमति और निरीक्षण की प्रक्रिया पर सवाल है। अगर बेसमेंट में बिना पर्याप्त तकनीकी जांच के काम शुरू हुआ था तो निर्माण सुरक्षा की प्रक्रिया पर सवाल है।
और अगर स्थानीय स्तर पर किसी समस्या की जानकारी पहले से थी, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई, तो यह सबसे गंभीर प्रशासनिक सवाल है।
छह लोगों की मौत के बाद अब केवल यह जानना पर्याप्त नहीं होगा कि इमारत क्यों गिरी। यह भी जानना होगा कि इमारत को गिरने से पहले बचाने की कितनी संभावनाएं थीं और वे संभावनाएं किस स्तर पर खत्म हुईं।
जांच एजेंसियों को निष्पक्ष तकनीकी जांच, दस्तावेजों की पड़ताल, स्वीकृत नक्शे और वास्तविक निर्माण का मिलान, पीजी संचालन की अनुमति, फायर सेफ्टी रिकॉर्ड और बेसमेंट में हुए निर्माण कार्य की पूरी श्रृंखला सामने लानी होगी।
सत्य निकेतन हादसे की असली जवाबदेही तभी तय होगी जब जांच केवल मलबे तक सीमित न रहे, बल्कि उस पूरी व्यवस्था तक पहुंचे जिसने इस इमारत को वहां तक पहुंचने दिया।
छह मौतों का दर्द यही मांग करता है कि जांच किसी एक दोषी की तलाश भर न बने, बल्कि उन कमियों को भी सामने लाए जिनके कारण एक ऐसी इमारत में लोग रह रहे थे जिसकी सुरक्षा को लेकर आज इतने गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
यह हादसा चेतावनी है—दिल्ली के हर छात्र पीजी, हर पुराने मकान और हर उस भवन के लिए जिसमें मूल निर्माण से अलग उपयोग या अतिरिक्त निर्माण किया जा चुका है। सवाल अब सिर्फ सत्य निकेतन का नहीं है। सवाल यह है कि अगली इमारत गिरने से पहले व्यवस्था जागेगी या फिर किसी और मलबे से वही सवाल उठेंगे।

























