जब दर्द बोलना चाहता था, तब रास्ते बंद कर दिए गए! ; मदद की गुहार लगाने पहुंचे दुकानदारों को मुख्यमंत्री से मिलने नहीं दिया गया

चित्रकूट के रामघाट में बाढ़ से तबाह दुकानों, कीचड़ से भरी सड़कों और प्रभावित दुकानदारों के साथ रिपोर्टर संजय सिंह राणा की विशेष रिपोर्ट पर आधारित फीचर इमेज।

सुनने के लिए यहां क्लिक करें

संजय सिंह राणा की रिपोर्ट

चित्रकूट। मंदाकिनी नदी की विनाशकारी बाढ़ ने इस बार केवल दुकानों, सामान और कारोबार को ही नहीं बहाया, बल्कि सैकड़ों परिवारों के भविष्य और उम्मीदों को भी गहरे संकट में धकेल दिया है। रामघाट के किनारे वर्षों से प्रसाद, खिलौने, पूजन सामग्री, चाय-नाश्ता और श्रद्धालुओं की जरूरत का सामान बेचकर जीवनयापन करने वाले दर्जनों परिवार आज खुले आसमान के नीचे अपने उजड़े हुए संसार को देख रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब ये पीड़ित अपनी पीड़ा लेकर प्रदेश के मुख्यमंत्री के सामने पहुंचना चाहते थे, तब आखिर उन्हें रोका क्यों गया?

रविवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के रामघाट दौरे की सूचना मिलते ही बाढ़ पीड़ित दुकानदारों के मन में उम्मीद की एक किरण जगी थी। उन्हें लगा था कि प्रदेश का मुखिया स्वयं उनके बीच आएगा, उनकी बर्बादी देखेगा, उनकी बातें सुनेगा और शायद राहत का कोई रास्ता निकलेगा। लेकिन जो हुआ, उसने पीड़ितों के घावों पर मरहम लगाने के बजाय नमक छिड़कने का काम किया।

बाढ़ में बह गई वर्षों की मेहनत

रामघाट केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि सैकड़ों परिवारों की आजीविका का आधार भी है। यहां लगी छोटी-बड़ी दुकानें वर्षों से श्रद्धालुओं की सेवा के साथ-साथ स्थानीय लोगों के जीवन का सहारा बनी हुई थीं। लेकिन मंदाकिनी की उफनती धारा ने कुछ ही घंटों में सबकुछ तहस-नहस कर दिया।

दुकानदारों के अनुसार 80 से अधिक दुकानें पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं। कई दुकानें नदी में समा गईं तो कई में रखा लाखों रुपये का सामान बह गया। किसी का प्रसाद नष्ट हो गया, किसी की पूजन सामग्री, किसी के खिलौने और किसी की चाय-नाश्ते की पूरी व्यवस्था खत्म हो गई।

आज स्थिति यह है कि जिन दुकानों से परिवारों का चूल्हा जलता था, वहां केवल मलबा और बर्बादी के निशान दिखाई दे रहे हैं।

See also  ससुर की पैतृक भूमि पर कब्जे का आरोप, महिला ने मंडलायुक्त से लगाई न्याय की गुहार

मुख्यमंत्री से मिलने की उम्मीद भी टूट गई

शनिवार शाम से ही क्षेत्र में चर्चा थी कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ रविवार को रामघाट का निरीक्षण करने आने वाले हैं। यह खबर सुनते ही बाढ़ पीड़ित दुकानदारों में उम्मीद जागी।

रविवार सुबह से ही कई दुकानदार अपनी टूटी हुई दुकानों के सामने खड़े होकर मुख्यमंत्री का इंतजार करते रहे। उनका उद्देश्य केवल इतना था कि वह अपनी व्यथा सीधे मुख्यमंत्री तक पहुंचा सकें। उन्हें उम्मीद थी कि यदि मुख्यमंत्री उनकी हालत देखेंगे तो राहत और पुनर्वास की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ेगी।

लेकिन मुख्यमंत्री के पहुंचने से कुछ समय पहले ही सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था के नाम पर दुकानदारों को वहां से हटा दिया गया। आरोप है कि उन्हें अपनी दुकानों के पास रुकने तक नहीं दिया गया और मुख्यमंत्री से मिलने का अवसर भी नहीं मिला।

यहीं से सवाल उठता है कि आखिर प्रशासन किस बात से डर रहा था? क्या बाढ़ पीड़ितों की आवाज मुख्यमंत्री तक पहुंच जाती तो व्यवस्था की सच्चाई सामने आ जाती?

“सब कुछ बह गया, दुख भी नहीं बता सके”

रामघाट के दुकानदार देवी प्रसाद का दर्द किसी एक व्यक्ति का दर्द नहीं बल्कि पूरे इलाके की त्रासदी का बयान है। उनका कहना है कि बाढ़ में दुकान के साथ पूरा सामान बह गया। अब उनके पास कुछ भी नहीं बचा है।

उन्होंने बताया कि सुबह से मुख्यमंत्री के आने का इंतजार कर रहे थे। उम्मीद थी कि उनसे मिलकर अपनी स्थिति बताएंगे और सहायता की मांग करेंगे, लेकिन उन्हें वहां से हटा दिया गया। उनका कहना है कि जब पीड़ितों को ही अपनी बात कहने का मौका नहीं मिलेगा तो फिर निरीक्षण का वास्तविक उद्देश्य क्या रह जाता है?

See also  ऐसा है सुशासन! हाथ में जल लेकर पार्षदों ने ली ''भ्रष्टाचार की कमाई बांटने'' की शपथ?

इसी तरह घाट के पास नाश्ते की दुकान चलाने वाले अन्य दुकानदारों का कहना है कि बाढ़ ने उनकी आर्थिक रीढ़ तोड़ दी है। वर्षों की मेहनत एक झटके में खत्म हो गई। मुख्यमंत्री के दौरे से उन्हें आशा थी कि उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुना जाएगा, लेकिन उन्हें तो सामने आने तक नहीं दिया गया।

क्या केवल तस्वीरें देखना ही निरीक्षण है?

लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों और सरकारों का सबसे बड़ा दायित्व जनता की पीड़ा को सुनना होता है। विशेषकर आपदा जैसी परिस्थितियों में जब लोग सब कुछ खो चुके हों, तब उनका मनोबल बढ़ाना और उनकी समस्याओं को प्रत्यक्ष सुनना प्रशासनिक संवेदनशीलता का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

लेकिन रामघाट की घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है। यदि मुख्यमंत्री बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का निरीक्षण करने आए थे तो क्या प्रभावित लोगों से संवाद भी उस प्रक्रिया का हिस्सा नहीं होना चाहिए था? क्या केवल अधिकारियों की ब्रीफिंग और तैयार रिपोर्टों के आधार पर वास्तविक स्थिति का आकलन संभव है?

स्थानीय लोगों का कहना है कि आपदा का असली दर्द सरकारी फाइलों में नहीं, बल्कि उन लोगों के चेहरों पर दिखाई देता है जिनकी रोजी-रोटी छिन गई है।

रोजी-रोटी का संकट, भविष्य अंधकारमय

रामघाट की अधिकांश दुकानें छोटे व्यापारियों की थीं। इनमें से कई परिवार पूरी तरह इसी आय पर निर्भर थे। बाढ़ के बाद उनके सामने सबसे बड़ा संकट आजीविका का है।

दुकानों के नष्ट होने से न केवल वर्तमान आय बंद हो गई है बल्कि दोबारा कारोबार शुरू करने के लिए भी उनके पास पूंजी नहीं बची। कई दुकानदार कर्ज लेकर व्यवसाय चला रहे थे। अब कर्ज चुकाने और परिवार का पालन-पोषण करने दोनों की चुनौती उनके सामने खड़ी है।

See also  फाइलों से फील्ड तक : जब जनसंवाद बना विकास की सबसे बड़ी ताकत

विशेषज्ञों का मानना है कि आपदा के बाद केवल राहत सामग्री बांटना पर्याप्त नहीं होता। प्रभावित लोगों को आर्थिक पुनर्वास, ब्याज मुक्त ऋण, मुआवजा और व्यवसाय पुनर्स्थापना जैसी योजनाओं की आवश्यकता होती है।

प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल

रामघाट की बाढ़ ने केवल प्राकृतिक आपदा की भयावहता नहीं दिखाई, बल्कि आपदा प्रबंधन और पुनर्वास व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि 80 से अधिक दुकानें पूरी तरह नष्ट हो चुकी हैं तो अब तक उनके नुकसान का समुचित आकलन और पुनर्वास योजना क्यों नहीं दिखाई दे रही?

दूसरा बड़ा सवाल यह है कि जिन लोगों ने सब कुछ खो दिया, उन्हें अपनी बात मुख्यमंत्री तक पहुंचाने से आखिर क्यों रोका गया? क्या व्यवस्था को पीड़ितों की आवाज सुनने से परहेज है?

राहत नहीं, सम्मानजनक पुनर्वास चाहिए

रामघाट के दुकानदार भीख नहीं मांग रहे हैं। वे केवल इतना चाहते हैं कि उनकी वर्षों की मेहनत से खड़ी हुई जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाने में सरकार उनकी मदद करे। उन्हें राहत के कुछ पैकेटों से ज्यादा स्थायी पुनर्वास की जरूरत है।

आज रामघाट के उजड़े बाजार में खड़े लोग केवल आर्थिक सहायता की उम्मीद नहीं कर रहे, बल्कि यह भी उम्मीद कर रहे हैं कि उनकी आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुंचेगी। लेकिन जिस दिन वे अपनी पीड़ा सुनाने पहुंचे, उसी दिन उनके रास्ते बंद कर दिए गए।

अब सवाल यह है कि क्या बाढ़ पीड़ितों की आवाज कभी शासन तक पहुंचेगी, या फिर उनकी टूटी दुकानों की तरह उनकी उम्मीदें भी मलबे में दबकर रह जाएंगी?

यायावर
Author: यायावर

यायावर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Read More

Cricket Live Score

Rashifal

और पढ़ें