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सिर पर पट्टियां, टूटे हाथ-पैर और आंखों में गुस्सा : ‘चलो संसद’ मार्च के बाद जंतर-मंतर पर युवाओं का दर्द

NEET विवाद, पुलिस कार्रवाई और घायल प्रदर्शनकारियों की जुबानी संघर्ष की कहानी

दुर्गा प्रसाद शुक्ला की ग्राउंड रिपोर्ट

नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर इन दिनों सिर्फ नारे नहीं गूंज रहे, बल्कि पट्टियों में लिपटी चोटें, टूटे सपने और न्याय की मांग भी दिखाई दे रही है। किसी के सिर पर सफेद पट्टी बंधी है, किसी का हाथ प्लास्टर में है तो किसी का पैर लाठीचार्ज की चोट का गवाह बना हुआ है। कई युवाओं के चेहरे पर दर्द साफ झलकता है, लेकिन उनकी आंखों में अब भी आंदोलन जारी रखने का संकल्प दिखाई देता है।

NEET परीक्षा से जुड़े विवाद और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग को लेकर “चलो संसद” मार्च में शामिल हुए सैकड़ों छात्रों और युवाओं का आरोप है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान उन पर पुलिस ने बल प्रयोग किया। कई प्रदर्शनकारियों का दावा है कि बैरिकेड पार करने से पहले ही लाठीचार्ज शुरू कर दिया गया। दर्जनों लोग घायल हुए, कुछ अस्पताल पहुंचाए गए और इलाज के बाद फिर आंदोलन स्थल पर लौट आए।

यह ग्राउंड रिपोर्ट जंतर-मंतर पर मौजूद उन युवाओं की है, जो अपने जख्मों के साथ भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।

जंतर-मंतर बना घायल युवाओं का संघर्ष स्थल

धरना स्थल पर चारों ओर बैनर, पोस्टर और तिरंगे नजर आते हैं। लेकिन सबसे ज्यादा ध्यान खींचते हैं वे युवा, जिनके सिर, हाथ और पैरों पर पट्टियां बंधी हैं। कोई व्हीलचेयर पर बैठा है तो कोई बैसाखी के सहारे चल रहा है। उनका कहना है कि चोटें उन्हें डरा नहीं सकतीं, बल्कि आंदोलन को और मजबूत बना रही हैं।

इन युवाओं की एक ही मांग है कि शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही तय हो और जिन मुद्दों को लेकर वे सड़क पर उतरे हैं, उनका समाधान किया जाए।

अहेली बोलीं—’हम फूल लेकर पहुंचे थे, जवाब में लाठियां मिलीं’

दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी ऑनर्स की छात्रा 20 वर्षीय अहेली आंदोलन का हिस्सा बनने के लिए कुछ दिन पहले जंतर-मंतर पहुंचीं। उनके अनुसार प्रदर्शन शुरू होने से पहले सभी को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि किसी भी उकसावे में नहीं आना है और यदि पुलिस सामने आए तो शांतिपूर्वक व्यवहार करना है।

अहेली का दावा है कि प्रदर्शनकारियों के हाथों में फूल थे, लेकिन हालात अचानक बदल गए। उनके मुताबिक एक एम्बुलेंस भीड़ के बीच पहुंची, जिससे अफरा-तफरी का माहौल बना। इसके बाद पुलिस ने बल प्रयोग शुरू कर दिया।

वे आरोप लगाती हैं कि लाठीचार्ज में महिलाओं और पुरुषों के बीच कोई अंतर नहीं किया गया। उनके अनुसार कई छात्र-छात्राएं गंभीर रूप से घायल हुए। अहेली कहती हैं कि वे देश में बेहतर शिक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता चाहती हैं, लेकिन मौजूदा हालात उन्हें निराश करते हैं।

झांसी से आए विशाल का टूटा पैर, लेकिन आंदोलन जारी

उत्तर प्रदेश के झांसी से आए 18 वर्षीय विशाल हाल ही में इंटरमीडिएट पास कर चुके हैं। वे अपने साथियों के साथ आंदोलन में शामिल होने दिल्ली पहुंचे थे।

विशाल बताते हैं कि पुलिस ने पहले उन्हें एक स्थान पर बैठने को कहा। उनका आरोप है कि जैसे ही सभी शांतिपूर्वक बैठे, तभी अचानक लाठीचार्ज शुरू हो गया।

घटना में उनका पैर गंभीर रूप से घायल हुआ। वे कहते हैं कि चोट के कारण भविष्य में शारीरिक परीक्षा देना भी मुश्किल हो सकता है। उनका सामान भी कथित तौर पर गायब हो गया।

इसके बावजूद विशाल आंदोलन छोड़ने के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि वे न्याय मिलने तक धरना स्थल पर डटे रहेंगे।

किसान अनिल सिंह बोले—’व्यवस्था बदलने तक संघर्ष जारी रहेगा’

मध्यप्रदेश से आए किसान अनिल सिंह के माथे और हाथ पर पट्टियां बंधी हैं। वे बताते हैं कि आंदोलन के दौरान उन्हें भी चोटें आईं, लेकिन उनका मनोबल नहीं टूटा।

अनिल का कहना है कि लोकतंत्र में जनता को अपनी बात रखने का अधिकार है। वे मानते हैं कि इतिहास के हर बड़े परिवर्तन के पीछे जनआंदोलन रहे हैं और यदि व्यवस्था में सुधार लाना है तो संघर्ष से पीछे नहीं हटना चाहिए।

उनके अनुसार यह आंदोलन केवल एक परीक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग का प्रतीक बन चुका है।

स्वरा खान का आरोप—हिरासत में भी हुई मारपीट

जामिया इलाके की रहने वाली 23 वर्षीय स्वरा खान के हाथों पर पट्टियां बंधी हैं और चेहरे पर चोट के निशान दिखाई देते हैं।

स्वरा का आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लेने के बाद भी उनके साथ मारपीट की गई। चोट और थकान के कारण उनकी आवाज बैठ चुकी है। वे ज्यादा देर बातचीत नहीं कर सकीं, लेकिन इतना जरूर कहती हैं कि आंदोलन से पीछे हटने का सवाल ही नहीं उठता।

हर्ष ने लगाए गंभीर आरोप

उत्तर प्रदेश के कानपुर से आए हर्ष प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। उनका दावा है कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज के साथ आंसू गैस का भी इस्तेमाल किया।

हर्ष ने पुलिस पर महिला प्रदर्शनकारियों के साथ दुर्व्यवहार के गंभीर आरोप लगाए। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। उन्होंने कहा कि यदि ऐसी घटनाओं की निष्पक्ष जांच होती है तो पूरी सच्चाई सामने आएगी।

हर्ष का कहना है कि आंदोलन का उद्देश्य किसी तरह की हिंसा नहीं, बल्कि छात्रों की आवाज सरकार तक पहुंचाना है।

दस साल का वैभव भी पहुंचा आंदोलन में

आगरा से अपनी मां के साथ आया दस वर्षीय वैभव भी धरना स्थल पर मौजूद मिला। उसकी मां फल बेचकर परिवार चलाती हैं।

वैभव शायद आंदोलन की पूरी राजनीतिक पृष्ठभूमि न समझता हो, लेकिन वह इतना जरूर कहता है कि जब तक छात्रों की मांगों पर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक वह अपनी मां के साथ यहीं रहेगा।

उसकी मौजूदगी यह दिखाती है कि आंदोलन अब केवल छात्रों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि परिवार भी इसमें शामिल हो रहे हैं।

UPSC अभ्यर्थी अभिषेक की आंखों देखी

प्रयागराज के रहने वाले और दिल्ली में UPSC की तैयारी कर रहे अभिषेक सिंह उस दिन मार्च में शामिल थे।

वे बताते हैं कि जुलूस आगे बढ़ रहा था, तभी बैरिकेड लगाए गए। उनका कहना है कि भीड़ अधिक होने के कारण स्थिति तनावपूर्ण हुई और इसके बाद पुलिस ने आंसू गैस तथा लाठीचार्ज किया।

अभिषेक का दावा है कि उन्हें मंच से नीचे धक्का दिया गया, जिससे उनके पैरों में गंभीर चोट आई। वे बताते हैं कि साथियों की मदद से किसी तरह सुरक्षित स्थान तक पहुंच सके।

उनका आरोप है कि कई छात्र-छात्राओं को गंभीर चोटें आईं और महिला प्रदर्शनकारियों के साथ भी अनुचित व्यवहार किया गया। इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि फिलहाल उपलब्ध नहीं है।

आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगें

धरना स्थल पर मौजूद अधिकांश प्रदर्शनकारियों की मांगें लगभग एक जैसी हैं। उनका कहना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए, पेपर लीक जैसी घटनाओं पर सख्त कार्रवाई हो, दोषियों को कड़ी सजा मिले और शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही तय की जाए। कई प्रदर्शनकारी केंद्रीय शिक्षा मंत्री से नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे की भी मांग कर रहे हैं।

पुलिस का पक्ष भी महत्वपूर्ण

प्रदर्शनकारियों ने पुलिस कार्रवाई पर गंभीर आरोप लगाए हैं। हालांकि किसी भी घटना की निष्पक्ष तस्वीर सामने लाने के लिए पुलिस और प्रशासन का पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आमतौर पर ऐसी परिस्थितियों में पुलिस कानून-व्यवस्था बनाए रखने और प्रतिबंधित क्षेत्रों की सुरक्षा का हवाला देती है। यदि इस मामले में किसी न्यायिक या स्वतंत्र जांच के आदेश दिए जाते हैं तो घटनाक्रम की वास्तविक स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।

घाव केवल शरीर पर नहीं, भरोसे पर भी

जंतर-मंतर पर बैठे इन युवाओं के शरीर पर लगी चोटें समय के साथ भर जाएंगी, लेकिन उनके मन में उठे सवाल अभी भी कायम हैं। वे पूछ रहे हैं कि यदि शांतिपूर्ण विरोध भी सुरक्षित नहीं है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी बात कैसे रखी जाए।

दूसरी ओर प्रशासन का दायित्व कानून-व्यवस्था बनाए रखना है। ऐसे में सबसे बड़ी जरूरत निष्पक्ष जांच, पारदर्शी संवाद और संवैधानिक तरीकों से समाधान तलाशने की है।

फिलहाल जंतर-मंतर पर पट्टियों में लिपटे ये युवा सिर्फ अपने जख्म नहीं दिखा रहे, बल्कि उस व्यवस्था से जवाब भी मांग रहे हैं, जिस पर उन्हें भविष्य का भरोसा होना चाहिए। आने वाले दिनों में यह आंदोलन किस दिशा में जाएगा, यह तो समय बताएगा, लेकिन इतना तय है कि इन घायल चेहरों की तस्वीरें देश की शिक्षा व्यवस्था और लोकतांत्रिक संवाद पर कई गंभीर सवाल छोड़ गई हैं।

दुर्गा प्रसाद शुक्ला की विशेष रिपोर्ट के लिए तैयार फीचर इमेज, जिसमें NEET पेपर लीक विरोध प्रदर्शन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और NTA पर सरकार की सख्त कार्रवाई दर्शाई गई है।
NEET पेपर लीक मामले में सरकार ने NTA में 47 अधिकारियों को हटाते हुए परीक्षा प्रणाली में बड़े सुधारों और दोषियों के खिलाफ कड़े कानून की दिशा में कदम बढ़ाए। — दुर्गा प्रसाद शुक्ला की खास रिपोर्ट

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