रिपोर्ट: चुन्नीलाल प्रधान
कानपुर। उत्तर प्रदेश में मानसून अब पूरी तरह सक्रिय हो चुका है। प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में लगातार हो रही बारिश ने न केवल खेतों में नई उम्मीद जगाई है, बल्कि नदियों के स्वभाव में भी बड़ा बदलाव दिखाई देने लगा है। गंगा की मुख्य धारा में जलस्तर लगातार बढ़ रहा है, लेकिन इस बार दिलचस्प और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि गंगा को सबसे अधिक बल उसकी सहायक और बरसाती नदियों से मिल रहा है। हरिद्वार और नरौरा बैराज से छोड़े जा रहे पानी की तुलना में प्रदेश की सहायक नदियां गंगा की धारा को कहीं अधिक मजबूती दे रही हैं।
सोमवार को हरिद्वार से गंगा में लगभग 66 हजार क्यूसेक तथा नरौरा बैराज से लगभग 53 हजार क्यूसेक पानी छोड़ा गया। इसके बावजूद कानपुर गंगा बैराज से एक लाख छह हजार क्यूसेक से अधिक पानी प्रयागराज की ओर बहता दर्ज किया गया। यह अंतर स्पष्ट संकेत देता है कि गंगा की सहायक नदियां मानसून के दौरान अपनी पूरी क्षमता से सक्रिय हो चुकी हैं और मुख्य धारा को लगातार अतिरिक्त जल उपलब्ध करा रही हैं।
यही कारण है कि सिंचाई विभाग, जल संसाधन विशेषज्ञ और जिला प्रशासन अब केवल गंगा के ऊपरी हिस्से से छोड़े जाने वाले पानी पर ही नजर नहीं रख रहे, बल्कि उन छोटी-बड़ी नदियों की गतिविधियों पर भी लगातार निगरानी रख रहे हैं, जो उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों से होकर गंगा में मिलती हैं।
सहायक नदियां बनीं गंगा की असली ताकत
गंगा नदी की कुल लंबाई लगभग 2500 किलोमीटर से अधिक मानी जाती है। इतनी लंबी यात्रा के दौरान सैकड़ों छोटी-बड़ी नदियां इसमें अपना जल समर्पित करती हैं। मानसून के दौरान यही सहायक नदियां गंगा के जलस्तर को तेजी से बढ़ाने का सबसे बड़ा कारण बनती हैं।
इस वर्ष भी हरदोई की गर्रा नदी, शाहजहांपुर क्षेत्र की बरसाती धाराएं, कन्नौज की काली नदी, गौला नदी, कानपुर के निकट नून नदी और ईशन नदी समेत अनेक जलधाराएं पूरे वेग से बह रही हैं। इन नदियों के माध्यम से लगातार बड़ी मात्रा में पानी गंगा तक पहुंच रहा है।
जल विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आगामी दिनों में वर्षा का यही क्रम जारी रहा तो गंगा की मुख्य धारा में जलस्तर और तेजी से बढ़ सकता है। इसका सीधा असर गंगा किनारे बसे कानपुर, उन्नाव, फतेहपुर, प्रयागराज, वाराणसी, गाजीपुर और बलिया जैसे जिलों पर दिखाई देगा।
पिछले वर्षों का अनुभव क्यों बढ़ा रहा चिंता
उत्तर प्रदेश में मानसून के दौरान केवल गंगा का जलस्तर ही खतरा नहीं बनता, बल्कि उसकी सहायक नदियों का अचानक उफान कई बार अप्रत्याशित स्थिति पैदा कर देता है।
सिंचाई विभाग के अधिकारियों के अनुसार वर्ष 2025 में हरदोई की गर्रा नदी ने अकेले लगभग डेढ़ लाख क्यूसेक पानी गंगा में पहुंचाकर विशेषज्ञों को भी चौंका दिया था। उस समय गंगा का जलस्तर अपेक्षा से कहीं अधिक तेजी से बढ़ा था।
इसी प्रकार वर्ष 2018 में उन्नाव क्षेत्र की कल्याणी नदी में आए उफान के कारण गंगा का पानी सामान्य सीमा से काफी आगे तक फैल गया था। कई गांवों के खेत जलमग्न हो गए थे और तटीय इलाकों में लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा था। यही अनुभव प्रशासन को इस बार अधिक सतर्क रहने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
रामगंगा से लेकर ईशन नदी तक बढ़ रहा प्रवाह
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्थित रामगंगा नदी इस समय पर्याप्त जल लेकर बह रही है। बिजनौर क्षेत्र के बैराजों में लगातार बढ़ रहे जलस्तर का प्रभाव नीचे के जिलों तक दिखाई देने लगा है। आगे चलकर यही नदी कन्नौज क्षेत्र में गंगा में मिलती है और मुख्य धारा का जलस्तर बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
हरदोई की गर्रा नदी भी मानसूनी वर्षा के कारण पूरी तरह सक्रिय हो चुकी है। वहीं कन्नौज क्षेत्र की काली नदी और गौला नदी भी लगातार जल प्रवाह बढ़ा रही हैं। कानपुर के निकट नून नदी तथा ईशन नदी का प्रवाह भी पिछले दिनों की तुलना में काफी तेज हो गया है।
इन सभी नदियों का संयुक्त प्रभाव गंगा के जलस्तर में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। यही कारण है कि कानपुर बैराज से आगे प्रयागराज की दिशा में पानी की मात्रा लगातार बढ़ रही है।
केवल गंगा नहीं, पूरे उत्तर प्रदेश का नदी तंत्र हुआ सक्रिय
मानसून का प्रभाव इस बार केवल गंगा तक सीमित नहीं है। प्रदेश की अधिकांश प्रमुख नदियां धीरे-धीरे अपने मानसूनी स्वरूप में लौट रही हैं।
पूर्वांचल में घाघरा, राप्ती, शारदा और सरयू के जलग्रहण क्षेत्रों में लगातार वर्षा हो रही है। वहीं मध्य उत्तर प्रदेश में गोमती, सई और तमसा जैसी नदियों में भी जलस्तर बढ़ने लगा है। बुंदेलखंड क्षेत्र में केन, बेतवा, धसान और पयस्विनी जैसी नदियां भी वर्षा का पानी समेटने लगी हैं।
यद्यपि अधिकांश नदियां अभी खतरे के निशान से नीचे बह रही हैं, लेकिन लगातार बारिश जारी रहने पर इनकी स्थिति तेजी से बदल सकती है। यही कारण है कि सिंचाई विभाग और जिला प्रशासन चौबीसों घंटे जलस्तर की निगरानी कर रहे हैं।
किसानों के लिए राहत, तटीय गांवों के लिए सतर्कता
नदियों में बढ़ता जल प्रवाह किसानों के लिए राहत लेकर आया है। धान, मक्का, गन्ना, दलहन और अन्य खरीफ फसलों को पर्याप्त नमी मिलने लगी है। तालाब, झीलें और भूजल स्रोत भी धीरे-धीरे भरने लगे हैं, जिससे आने वाले महीनों में सिंचाई की स्थिति बेहतर रहने की उम्मीद है।
दूसरी ओर नदी किनारे बसे गांवों में चिंता भी बढ़ने लगी है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि अगले एक सप्ताह तक लगातार तेज बारिश होती रही तो निचले इलाकों में जलभराव और कटान की समस्या फिर सामने आ सकती है। इसलिए लोग अभी से सतर्क रहने लगे हैं और प्रशासन भी संवेदनशील क्षेत्रों पर विशेष नजर बनाए हुए है।
पूर्वांचल की नदियों पर भी बढ़ रही नजर
गंगा की सहायक नदियों की चर्चा हो और घाघरा का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं है। नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों से निकलने वाली घाघरा नदी हर वर्ष मानसून के दौरान अपना रौद्र रूप दिखाती है। बहराइच, सीतापुर, अयोध्या, बाराबंकी, गोंडा, बलिया और आसपास के कई जिलों में इस नदी का जलस्तर प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। इस वर्ष भी नेपाल के जलग्रहण क्षेत्रों में हो रही बारिश के कारण घाघरा के जलस्तर पर लगातार नजर रखी जा रही है।
इसी प्रकार शारदा नदी का जलस्तर भी हर वर्ष मानसून के दौरान तेजी से बदलता है। लखीमपुर खीरी और पीलीभीत के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग जानते हैं कि शारदा का मिजाज कब बदल जाए, इसका अनुमान लगाना आसान नहीं होता। यदि नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों में लगातार वर्षा होती रही तो शारदा का अतिरिक्त पानी तराई के मैदानी इलाकों पर दबाव बढ़ा सकता है।
राप्ती नदी भी पूर्वांचल की उन नदियों में शामिल है, जो बारिश के मौसम में कई बार बाढ़ का कारण बनती हैं। सिद्धार्थनगर, बलरामपुर, श्रावस्ती, बस्ती और गोरखपुर के लोगों की निगाहें हर मानसून में इस नदी के जलस्तर पर टिकी रहती हैं।
गोमती, सई और तमसा भी लौटीं अपने स्वाभाविक प्रवाह में
मध्य उत्तर प्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली गोमती नदी में भी मानसून का असर साफ दिखाई देने लगा है। राजधानी लखनऊ से लेकर सुल्तानपुर, जौनपुर और गाजीपुर तक नदी का प्रवाह पहले की तुलना में मजबूत हुआ है। गोमती केवल जल का स्रोत ही नहीं, बल्कि लाखों लोगों की पेयजल और सिंचाई व्यवस्था की आधारशिला भी है।
सई नदी और तमसा नदी में भी लगातार बढ़ता प्रवाह इस बात का संकेत है कि मानसून अब प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में प्रभावी हो चुका है। इन नदियों के किनारे बसे किसानों को इससे लाभ मिलेगा, हालांकि लगातार बारिश की स्थिति में कटान और जलभराव की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
बुंदेलखंड की नदियों में लौटी नई उम्मीद
जिस बुंदेलखंड को अक्सर सूखे और जल संकट के लिए जाना जाता है, वहां भी इस बार मानसून राहत लेकर आया है। केन, बेतवा, धसान और पयस्विनी जैसी नदियों में जलस्तर धीरे-धीरे बढ़ रहा है। लंबे समय से पानी की कमी झेल रहे बांदा, चित्रकूट, महोबा, हमीरपुर और झांसी के किसानों को उम्मीद है कि यदि वर्षा का क्रम बना रहा तो खरीफ की फसल बेहतर होगी और जलाशयों में भी पर्याप्त पानी जमा हो सकेगा।
हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि बुंदेलखंड की नदियों में अचानक आने वाला तेज बहाव कई बार छोटे पुलों और संपर्क मार्गों को भी प्रभावित कर देता है। इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों में सतर्कता बनाए रखना आवश्यक है।
यमुना और चंबल की स्थिति भी महत्वपूर्ण
यमुना नदी का जलस्तर फिलहाल सामान्य सीमा में है, लेकिन इसके जलग्रहण क्षेत्रों में यदि लगातार वर्षा हुई तो आगरा, इटावा, औरैया, हमीरपुर और प्रयागराज तक इसका प्रभाव दिखाई दे सकता है। चंबल, सिंध और क्वारी जैसी नदियां भी यमुना के जलस्तर को प्रभावित करती हैं। इन नदियों का संयुक्त प्रवाह कई बार यमुना में अचानक जलवृद्धि का कारण बनता है।
सिर्फ बाढ़ नहीं, खेती और भूजल के लिए भी वरदान
नदियों में बढ़ता जलस्तर केवल बाढ़ की आशंका नहीं बढ़ाता, बल्कि इसके कई सकारात्मक पहलू भी हैं। मानसून के दौरान नदियों में आने वाला अतिरिक्त पानी भूजल स्तर को सुधारता है। गांवों के तालाब, पोखर और कुएं भरने लगते हैं। सिंचाई परियोजनियों को पर्याप्त पानी मिलता है और खरीफ फसलों की पैदावार की संभावनाएं मजबूत होती हैं।
धान की रोपाई कर चुके किसानों के चेहरों पर संतोष दिखाई देने लगा है। गन्ना, मक्का, उड़द, मूंग और तिल जैसी फसलों के लिए भी यह पानी लाभकारी माना जा रहा है। जलाशयों के भरने से आने वाले रबी सीजन की सिंचाई व्यवस्था पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
प्रशासन ने बढ़ाई निगरानी
जलस्तर में हो रहे बदलाव को देखते हुए सिंचाई विभाग, राजस्व विभाग और जिला प्रशासन ने संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी तेज कर दी है। नदी किनारे बसे गांवों में लगातार स्थिति का आकलन किया जा रहा है। जहां कटान की आशंका है, वहां स्थानीय प्रशासन आवश्यक तैयारियां कर रहा है। नावों, राहत सामग्री और आपदा प्रबंधन टीमों को भी जरूरत पड़ने पर सक्रिय करने की योजना बनाई गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून अभी अपने चरम पर नहीं पहुंचा है। अगस्त का महीना सामान्यतः सबसे अधिक वर्षा वाला माना जाता है। यदि अगले कुछ दिनों में भारी बारिश का दौर जारी रहता है तो सहायक नदियों का डिस्चार्ज और बढ़ेगा, जिसका सीधा असर गंगा सहित प्रदेश की अन्य बड़ी नदियों पर भी दिखाई देगा।
उत्तर प्रदेश की नदियां इस समय मानसून की नई ऊर्जा से भर उठी हैं। गंगा का बढ़ता जलस्तर केवल हरिद्वार और नरौरा से छोड़े गए पानी का परिणाम नहीं है, बल्कि प्रदेश की दर्जनों सहायक और बरसाती नदियां मिलकर उसकी धारा को नया विस्तार दे रही हैं। गर्रा, रामगंगा, काली, गौला, नून, ईशन, घाघरा, शारदा, राप्ती, गोमती, केन, बेतवा और यमुना जैसी नदियां अपने-अपने क्षेत्रों में मानसून की तस्वीर बदल रही हैं।
एक ओर यह पानी किसानों के लिए समृद्धि और बेहतर फसल की उम्मीद लेकर आया है, वहीं दूसरी ओर नदी किनारे बसे गांवों के लिए सतर्क रहने का संदेश भी दे रहा है। फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन मौसम विभाग के पूर्वानुमान और लगातार हो रही वर्षा को देखते हुए आने वाले दिनों में जलस्तर में और वृद्धि की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
मानसून के इस दौर ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उत्तर प्रदेश की नदियां केवल जलधाराएं नहीं हैं, बल्कि प्रदेश की कृषि, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और करोड़ों लोगों के जीवन की धड़कन हैं। इनकी हर हलचल आने वाले दिनों की तस्वीर तय करती है और यही कारण है कि इस समय पूरे प्रदेश की निगाहें अपनी नदियों के बदलते मिजाज पर टिकी हुई हैं।

























