संपादकीय टिप्पणी
पिछले सप्ताह जनगणदूत ने “गर्मी से राहत नहीं, सुकून की तलाश में पटनीटॉप पहुँचे केवल कृष्ण पनगोत्रा” शीर्षक से हमारी जम्मू-कश्मीर ब्यूरो प्रमुख रजनी वर्मा का एक आत्मीय यात्रा-लेख प्रकाशित किया था। उसमें उन्होंने वरिष्ठ लेखक, विचारक और स्वतंत्र पत्रकार केवल कृष्ण पनगोत्रा की पटनीटॉप यात्रा को अपनी संवेदनशील दृष्टि से शब्द दिए थे।
उस लेख को पाठकों का भरपूर स्नेह मिला। अब उसी यात्रा के अनुभवों को स्वयं पनगोत्रा जी अपने विशिष्ट अंदाज़ में पाठकों के सामने रख रहे हैं। यह केवल यात्रा-वृत्तांत नहीं, बल्कि शब्दों, संवेदनाओं, प्रकृति, समाज और व्यवस्था के बीच संवाद स्थापित करने वाली एक आत्मीय चिट्ठी है। आइए, इस सप्ताह की “पनगोत्रा की चिट्ठी” का आनंद लें।
प्रिय पाठकों,
एक गीत की ये सुंदर पंक्तियाँ मुझे बार-बार क्यों याद आने लगीं? क्योंकि जब शब्द आत्मीय संबंधों का साधन बन जाते हैं, तब उनकी सुंदरता समुद्र से भी अधिक गहरी हो जाती है। जब किसी के शब्द आत्मा को तृप्त कर देते हैं तो रचनात्मकता केवल साहित्य नहीं रहती, वह अनुभूति बन जाती है। शायद इसी भाव ने गीतकार इंदीवर से कहलवाया था—
“तुझे देख कर जग वाले पर यकीं नहीं क्यों कर होगा,
जिसकी रचना इतनी सुंदर, वो कितना सुंदर होगा।”
रजनी वर्मा जी… आफ़रीं! मैंने आपकी काया तो नहीं देखी, लेकिन आपकी माया देख ली है। दुनिया वाले अक्सर सामने खड़े व्यक्ति को भी पूरी तरह नहीं पहचान पाते, लेकिन आपने एक अधूरे-से शब्द साधक को जिस आत्मीयता से देखा, वह मेरे लिए किसी मायालोक से कम नहीं था। ऐसा मायालोक, जहाँ सवाल भी हैं और उनके उत्तर पाने की सच्ची लालसा भी।
क्या किसी की कल्पना इतनी जीवंत हो सकती है? रजनी जी ने अपने लेख में एक काल्पनिक संवाद रचते हुए लिखा था— “मैंने मुस्कराकर उनसे पूछा, ‘पटनीटॉप कैसा लग रहा है?’ उन्होंने सहज भाव से उत्तर दिया, ‘गर्मी को तो यहीं छोड़ जाना चाहता हूँ।’”
फिर आपने लिखा— “मेरा विश्वास है कि पनगोत्रा जी भी यहाँ से केवल सुकून ही नहीं, बल्कि अनेक नई अनुभूतियाँ साथ लेकर जाएँगे। यही अनुभूतियाँ किसी दिन किसी लेख, संस्मरण या साहित्यिक रचना का रूप लेकर पाठकों तक अवश्य पहुँचेंगी।”
वाह! रजनी जी, वाह! कैसे इनकार करता? मैं तो एक नई, लेकिन बेहद मनोहारी उलझन में पड़ गया।
उलझन से मिली नई ऊर्जा
पंजाब से सटे कठुआ की तपती धूप और उमस से राहत पाने के लिए मैं परिवार सहित जम्मू-कश्मीर के पटनीटॉप, नत्था टॉप और सनासर झील की ओर निकल पड़ा था। उद्देश्य केवल मौसम से राहत पाना नहीं था, बल्कि रोजमर्रा की भागदौड़ और उलझनों से भी कुछ पल दूर होना था।
लेकिन इस यात्रा के दौरान रजनी वर्मा जी की रचना ने मुझे ऐसी मनोहारी उलझन में डाल दिया, जिसने मेरे भीतर नई ऊर्जा का संचार कर दिया।
एक लेखक को ऊर्जा आखिर मिलती कहाँ से है?
जब पाठक भी लेखक को नई दृष्टि दे
इस आत्मीय उलझन को और गहरा किया अलीगढ़, उत्तर प्रदेश के श्याम किशोर वर्मा जी ने। उन्होंने अपनी टिप्पणी में लिखा— “रजनी वर्मा जी का यह लेख पढ़ते समय लगा ही नहीं कि मैं कोई यात्रा-वृत्तांत पढ़ रहा हूँ, बल्कि ऐसा महसूस हुआ जैसे स्वयं पटनीटॉप की वादियों में घूम रहा हूँ। लेख में समाचार भी है, साहित्य भी है और प्रकृति का सौंदर्य भी। सबसे अच्छी बात यह लगी कि लेखिका ने पनगोत्रा जी की यात्रा को महज पर्यटन नहीं बनने दिया, बल्कि उसे संवेदनाओं और आत्मीय रिश्तों का दस्तावेज़ बना दिया। हाँ, एक बात जरूर कहूँगा—अब पटनीटॉप वालों को भी सावधान हो जाना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि पनगोत्रा जी वहाँ से लौटकर ऐसी शानदार रचना लिख दें कि लोग पहले उनकी कलम पढ़ने जाएँ और बाद में पटनीटॉप घूमने!”
अब मेरी स्थिति कुछ यूँ हो गई है—
“ज़िंदगी अब कुछ इस कदर चल रही है,
हर उलझन किसी दूसरी से उलझ रही है।”
पत्रकार की नज़र और साहित्य की आत्मा
रजनी जी ने अपने लेख में लिखा— “पत्रकार होने के नाते मैं प्रतिदिन अनेक लोगों के आने-जाने की खबरें लिखती हूँ। कोई नेता आता है, कोई अधिकारी, कोई कलाकार। लेकिन किसी साहित्य साधक का आगमन अलग होता है। वह केवल किसी स्थान तक नहीं पहुँचता, बल्कि उस स्थान की आत्मा से जुड़ जाता है।”
यकीन मानिए, पटनीटॉप, नत्था टॉप और सनासर की यात्रा के दौरान मैंने प्रकृति के असंख्य चमत्कार देखे। लेकिन रजनी वर्मा जी केवल दिल से सुंदर ही नहीं, बेहद चतुर भी हैं।
वे जानती हैं कि किसी भी पर्यटन स्थल की आत्मा की आवाज़ नेताओं, शासकों और प्रशासनिक अधिकारियों तक अक्सर नहीं पहुँचती। इसलिए उन्होंने किसी और के मुंह से वह बात कह दी, जिसे सीधे कहना शायद आसान नहीं होता। आप भी प्रकृति की एक सुंदर और दुर्लभ रचना हैं।
पहाड़ों की खूबसूरती के पीछे छिपा दर्द
प्रकृति की गोद में बैठकर उसकी सुंदरता की प्रशंसा करना सहज है। पहाड़, देवदार, बादल और ठंडी हवाएँ हर किसी को आकर्षित करती हैं।
लेकिन किसी स्थान की वास्तविक आत्मा उसके वहाँ रहने वाले लोग होते हैं। मैंने केवल प्राकृतिक दृश्य नहीं देखे, बल्कि इंसानी मजबूरियाँ भी देखीं। मैंने विकास के नारों के बीच गरीबी का मौन रुदन देखा। मैंने एयरकंडीशन कारों के आगे हाथ फैलाते बच्चे देखे।
मैंने उन युवा घोड़ेवालों से बहस करते सम्पन्न पर्यटक देखे, जिनकी एक दिन की कमाई शायद उन घोड़ेवालों की कई महीनों की आमदनी से अधिक होगी।
मैंने पहाड़ों की तलहटी से अपनी जान जोखिम में डालकर एक-दो किलो कसरोड़ (एक पहाड़ी सब्जी) लाकर सड़क किनारे बेचते मासूम लोगों को देखा।

“एम.ए. चाय वाला”—एक बोर्ड नहीं, व्यवस्था से सवाल
इस यात्रा की सबसे मार्मिक तस्वीर नत्था टॉप पर देखने को मिली। वहाँ चाय की एक छोटी-सी झोपड़ीनुमा दुकान थी, जिसके बाहर लिखा था— “M.A. CHAI WALA” दुकान चलाने वाला युवक परास्नातक यानी एम.ए. पास था।
यह केवल एक बोर्ड नहीं था। यह हमारी व्यवस्था पर एक तीखा प्रश्न था। यह उस विकास मॉडल पर एक करारा व्यंग्य था, जहाँ डिग्रियाँ तो हैं, लेकिन अवसर नहीं। सोचता हूँ, इस मार्ग से न जाने कितने नेता, मंत्री, अधिकारी और प्रभावशाली लोग गुजरे होंगे। दिल तो शायद सबके पास है। लेकिन दिल की गहराई हर किसी के पास नहीं होती।
विकास का वास्तविक अर्थ
हमारा देश अभी तक विकासशील कहलाता है। और शायद तब तक विकासशील ही कहलाता रहेगा, जब तक विकास केवल इमारतों, सड़कों और पर्यटन परियोजनाओं तक सीमित रहेगा। सच्चा विकास तब होगा, जब हमारे दिल भी उतने ही विकसित होंगे, जितनी हमारी योजनाएँ।
रजनी वर्मा जी ने पटनीटॉप की ओर से केवल एक आत्मीय स्वागत-पत्र नहीं लिखा, बल्कि एक साधक को सच्ची साधना की ओर प्रेरित किया है।
उन्होंने मुझे एक बार फिर यह एहसास कराया कि— देह की सुंदरता क्षणिक हो सकती है, लेकिन मन, वचन और कर्म की सुंदरता ही किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान होती है।
रजनी वर्मा जी को एक बार फिर— आफ़रीं!
चिट्ठी कैसी लगी?
अगले सप्ताह फिर मुलाकात होगी। तब तक—
राम-राम, नमस्कार, सत श्री अकाल, अल्लाह हाफ़िज़।
— केवल कृष्ण पनगोत्रा
स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार, जम्मू-कश्मीर


























9 Responses
पनगोत्रा साहब ने पटनीटॉप की सैर तो की, लेकिन लौटकर जो सवाल रख दिया, उसने हमारी सैर ही बिगाड़ दी! 😄 पहाड़ों पर जाकर ठंडी हवा, धुंध, हरियाली और खूबसूरत वादियों को देखना आसान है, मगर उसी खूबसूरती के बीच “एम.ए. चाय वाला” दिखाई दे जाए तो सेल्फी का फ्रेम अचानक समाजशास्त्र की किताब बन जाता है।
मुझे पनगोत्रा साहब की चिट्ठी की सबसे चटपटी बात यही लगी कि उन्होंने पहाड़ों को सिर्फ पहाड़ नहीं माना। उन्होंने वहाँ खड़े आदमी को भी पढ़ा। पर्यटक अक्सर पूछता है—“यहाँ क्या देखने लायक है?” पनगोत्रा साहब ने उल्टा पूछ लिया—“यहाँ रहने वालों की जिंदगी देखने लायक क्यों नहीं है?”
और रजनी वर्मा जी की तारीफ भी खूब की—इतनी कि बेचारे पनगोत्रा साहब पटनीटॉप की ठंड से निकलकर रजनी जी की कलम की गर्माहट में फँस गए! 😂
लेकिन मजाक अपनी जगह, “एम.ए. चाय वाला” सचमुच पूरी चिट्ठी का सबसे बड़ा किरदार है। डिग्री हाथ में हो और रोजगार की जगह चाय की दुकान—इसे केवल उस युवक की कहानी कहकर आगे बढ़ जाना आसान है, लेकिन पनगोत्रा साहब ने इसे व्यवस्था के सामने आईना बनाकर रख दिया।
मेरी नजर में इस चिट्ठी की असली खूबसूरती यही है कि लेखक ने पटनीटॉप से सिर्फ ठंड नहीं, एक सवाल लेकर वापसी की है। अब पाठक तय करे—विकास की चमक बड़ी है या उस चमक के पीछे खड़े इंसान की जिंदगी?
आदरयोग जगदीप कौर जी,
सतश्री अकाल!
आपने मेरी चिट्ठी पढ़ी और उसका हर पहलू खंगाला। टिप्पणी का अंतिम पैरा इसका जीता जागता उदाहरण है।
“मेरी नजर में इस चिट्ठी की असली खूबसूरती यही है कि लेखक ने पटनीटॉप से सिर्फ ठंड नहीं, एक सवाल लेकर वापसी की है। अब पाठक तय करे—विकास की चमक बड़ी है या उस चमक के पीछे खड़े इंसान की जिंदगी?”
वैसे जगदीप जी, आप बहुमुखी प्रतिभा की स्वामिनी हैं। जीवन के हर रंग-ढंग से वाकिफ हैं। आप संजीदा हैं, बौद्धिक क्षमता संपन्न हैं और समझदार शरारती भी हैं। जहां आपने एम ए चायवाला का सामाजिक मर्म समझा, वहीं आपने यह भी समझा कि मैं रजनी वर्मा जी की कलम की गर्माहट में फंस गया!
बहुत खूब!
हार्दिक आभार
केवल कृष्ण पनगोत्रा जम्मू-कश्मीर से
“पनगोत्रा जी ने मेरी चिट्ठी पढ़ी नहीं, उसे एक नई चिट्ठी में बदल दिया”
पनगोत्रा जी की चिट्ठी पढ़ी तो पहले खूब मुस्कुराई और फिर कुछ देर चुप रही। मुस्कुराहट इसलिए कि मैंने जो कुछ सहज भाव से लिखा था, उसे उन्होंने इतनी गंभीरता से पढ़ लिया कि अब लगता है—पटनीटॉप की ठंड से ज्यादा मेरी कलम ने उन्हें उलझा दिया! 😊
मैंने पिछले सप्ताह पनगोत्रा जी की पटनीटॉप यात्रा को अपनी दृष्टि से शब्द देने की कोशिश की थी। मुझे लगा था कि एक साहित्य साधक पहाड़ों के बीच कुछ पल सुकून के बिताकर लौटेगा। लेकिन पनगोत्रा जी ने मेरी उस छोटी-सी रचना को ही पकड़कर ऐसी बड़ी चिट्ठी लिख दी कि अब मुझे लग रहा है—कभी-कभी पत्रकार की लिखी दो पंक्तियाँ लेखक के भीतर कई पन्ने जगा देती हैं।
उन्होंने मेरी तारीफ में शायद जरूरत से ज्यादा उदारता दिखाई है। “आपकी काया तो नहीं देखी, लेकिन आपकी माया देख ली है” पढ़कर सचमुच हँसी भी आई और संकोच भी हुआ। लेकिन उनके शब्दों के पीछे जो आत्मीयता है, उसे केवल प्रशंसा कहकर टाला नहीं जा सकता।
पनगोत्रा जी ने मेरी रचना को जिस तरह पढ़ा, उससे मुझे भी अपनी ही लिखी हुई बातों का एक नया अर्थ दिखाई दिया। पटनीटॉप केवल पहाड़ नहीं, लोगों की जिंदगी भी है।
पनगोत्रा जी ने बिल्कुल सही कहा कि किसी पर्यटन स्थल की असली आत्मा केवल पहाड़, पेड़, झील, बादल और ठंडी हवाएँ नहीं होतीं। उसकी असली आत्मा वहाँ रहने वाले लोग होते हैं।
पर्यटक अक्सर किसी जगह की खूबसूरती देखने जाता है। पत्रकार को उस खूबसूरती के पीछे छिपी जिंदगी भी देखनी चाहिए। पटनीटॉप और उसके आसपास मैंने भी बहुत कुछ देखा है—प्रकृति का वैभव, पर्यटन की रौनक और साथ-साथ रोजी-रोटी के लिए संघर्ष करते लोग।
लेकिन पनगोत्रा जी ने जिस “एम.ए. चाय वाला” को अपनी चिट्ठी का बड़ा सवाल बना दिया, उसने मुझे भी भीतर तक छुआ है।
एक तरफ हम शिक्षा, विकास, रोजगार और पर्यटन की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और दूसरी तरफ एक परास्नातक युवक अपनी डिग्री के साथ चाय बेचता दिखाई देता है। इसमें केवल चाय की दुकान नहीं है, बल्कि हमारे विकास के दावों के सामने खड़ा एक प्रश्नचिह्न है।
पनगोत्रा जी ने पत्रकार को भी आईना दिखाया
एक पत्रकार के लिए इससे बड़ी उपलब्धि क्या होगी कि उसका लिखा हुआ किसी लेखक को सोचने पर मजबूर कर दे और वह लेखक वापस अपनी कलम से पत्रकार को ही सोचने के लिए मजबूर कर दे?
पनगोत्रा जी ने यही किया।
उन्होंने मेरी रचना की तारीफ जरूर की, लेकिन उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने उसमें छूट गई कई चीजें अपने अनुभव से जोड़ दीं। उन्होंने पटनीटॉप को देखा नहीं, पढ़ा है। यही साहित्य और पत्रकारिता का फर्क भी है और रिश्ता भी।
पत्रकार घटना को दर्ज करता है, लेखक उसके भीतर उतरकर सवाल खोजता है। जब दोनों संवेदनशील हों तो खबर केवल खबर नहीं रहती, वह समाज का आईना बन जाती है।
और इस चिट्ठी के पीछे एक नाम और है—अनिल अनूप
इस अवसर पर मैं अपने आदरणीय संपादक अनिल अनूप जी का उल्लेख न करूँ तो मेरी बात अधूरी रह जाएगी। मैं उन्हें केवल संपादक नहीं, अपना गुरु मानती रही हूँ।
उन्होंने मुझे केवल खबर लिखना नहीं सिखाया; उन्होंने यह समझाया कि शब्दों की जिम्मेदारी शब्दों से कहीं बड़ी होती है। खबर में तथ्य जरूरी हैं, लेकिन पत्रकारिता में संवेदना उससे भी जरूरी है। किसी घटना को लिख देना आसान है, मगर उसके पीछे खड़े इंसान को पहचानना कठिन।
अनिल अनूप जी ने मुझे यही दृष्टि देने की कोशिश की।
आज जब पनगोत्रा जी मेरी एक छोटी-सी रचना को इतना महत्व देते हैं तो उसके पीछे मेरी अपनी कलम से ज्यादा मेरे गुरु का दिया हुआ संस्कार है। यदि मेरे शब्दों में कभी आत्मीयता दिखाई देती है, यदि किसी खबर में मनुष्य दिखाई देता है और यदि किसी यात्रा-वृत्तांत में केवल दृश्य नहीं बल्कि सवाल भी दिखाई देते हैं, तो उसमें अनिल अनूप जी के मार्गदर्शन की छाप अवश्य है।
गुरु का आशीर्वाद शायद यही होता है कि शिष्य को हर बार यह याद नहीं दिलाना पड़ता कि उसने क्या सीखा है—उसकी लेखनी खुद बता देती है कि वह किस पाठशाला से निकला है।
अनिल जी, आपके प्रति मेरा सम्मान शब्दों में पूरा नहीं उतर सकता। आपने मुझे पत्रकारिता में केवल लिखने का अवसर नहीं दिया, बल्कि अपनी दृष्टि विकसित करने का भरोसा भी दिया। आज पनगोत्रा जी की चिट्ठी के बहाने मैं अपने उस गुरु को भी प्रणाम करना चाहती हूँ, जिसकी सीख मेरी कलम के पीछे कहीं न कहीं हमेशा खड़ी रहती है।
अब पनगोत्रा जी से एक शिकायत भी है…
इतनी तारीफ करके आपने मेरी मुश्किल बढ़ा दी है। 😊
अब पाठक मेरी अगली रचना पढ़कर कहेंगे—“देखें, पनगोत्रा जी ने इतना लिख दिया था, अब रजनी वर्मा क्या लिखती हैं!”
और पनगोत्रा जी, अगली बार पटनीटॉप आइए तो केवल ठंड और सुकून लेने मत आइएगा… अपनी कलम जरूर साथ लाइएगा।
क्योंकि अब डर लगने लगा है कि कहीं आपकी अगली चिट्ठी में पटनीटॉप के बाद हमारी भी कोई खबर न निकल आए! 😄
आपकी चिट्ठी ने मुझे यह भी याद दिलाया कि पत्रकारिता में सबसे बड़ी उपलब्धि खबर का छपना नहीं, बल्कि किसी पाठक के मन में सवाल पैदा करना है।
आपने मेरी चिट्ठी पढ़कर सवाल पैदा किए और मैंने आपकी चिट्ठी पढ़कर अपने गुरु की सीख फिर से याद की।
इससे खूबसूरत संवाद और क्या हो सकता है?
पनगोत्रा जी, दिल से धन्यवाद।
अनिल अनूप जी, गुरु के रूप में सादर प्रणाम।
रजनी वर्मा जी,
ज्यादा दूर से नहीं, कठुआ से हार्दिक नमस्ते!
आप कहती हैं-
“मैंने पिछले सप्ताह पनगोत्रा जी की पटनीटॉप यात्रा को अपनी दृष्टि से शब्द देने की कोशिश की थी…”।
भला आपकी दृष्टि इतनी दिव्य कैसे हो गई? और आपका कल्पना लोक इतना जिवंत कैसे हो गया?
आपकी यही दिव्यता मेरे लिए उलझन का सबब बनी। जहां लोग सामने होते हुए भी किसी की मानसिक प्रवृत्ति को जानने की दृष्टि नहीं रखते, वहीं आपने अपनी अद्भुत कल्पना शक्ति से मेरा वृत्त चित्र खींच लिया। आपने मेरी तफरीह को ऐसे बयां किया जैसे मैं पत्नीटॉप की सैर नहीं कर रहा बल्कि मुझे सैर करवाई जा रही है।
अब इसे आपकी ‘माया’ न कहूं तो क्या कहूं!
… और हां, ‘माया’ काया से ज्यादा कीमती होती है, ज्यादा आकर्षिक होती है।
आप अनिल अनूप जी को गुरु मानती हैं। यह माया और दिव्यता का खज़ाना यक़ीनन उनके सानिध्य का परिणाम है।
आप लिखती हैं कि पटनीटॉप केवल पहाड़ नहीं, लोगों की जिंदगी भी है।
रजनी जी, लेखन एक कला है और कला उद्देश्य विहीन नहीं होती। एक सच्चा कलाकार सिर्फ रंगों और औजारों से नहीं खेलता अपितु रंगों-औजारों से निर्मित कृतियों को उद्देश्यपूर्ण मायने देता है। कलम भी कला का साधन है, और मैंने यही कोशिश की है कि इसका प्रयोग समाज की भलाई के लिए हो।
इस आशा के साथ कि अनूप जी के सानिध्य में आपकी लेखन कला में निखार आएगा और हमारे बीच सार्थक संवाद बना रहेगा।
… तो फिर इजाजत!
केवल कृष्ण पनगोत्रा
कठुआ (जम्मू-कश्मीर)
“पनगोत्रा साहब, आपने मेरी छोटी-सी टिप्पणी को भी चिट्ठी का हिस्सा बना दिया!”
पनगोत्रा साहब की “पनगोत्रा की चिट्ठी–5” पढ़ी तो सबसे पहले यह देखकर प्रसन्नता हुई कि मेरी छोटी-सी पाठकीय टिप्पणी को उन्होंने अपनी चिट्ठी में स्थान दिया। पाठक के लिए इससे बड़ा सुख और क्या होगा कि उसकी दो-चार पंक्तियाँ लेखक के मन में कहीं ठहर जाएँ और फिर उसी लेखक की कलम से वापस उसके पास लौटें।
मैंने रजनी वर्मा जी के पटनीटॉप यात्रा-वृत्तांत पर अपनी टिप्पणी में जो लिखा था, वह तत्काल उपजी पाठकीय अनुभूति थी। सचमुच वह लेख पढ़ते हुए ऐसा लगा था जैसे पटनीटॉप की वादियों में स्वयं घूम रहा हूँ। लेकिन पनगोत्रा साहब ने मेरी उस टिप्पणी को जिस आत्मीयता और विनोद के साथ याद किया, उससे मेरी अपनी ही पंक्तियाँ मुझे कुछ अधिक गंभीर लगने लगीं। 😊
और साहब, मैंने तो मजाक में लिखा था कि “पटनीटॉप वालों को सावधान हो जाना चाहिए।” अब आपकी चिट्ठी पढ़कर लगता है कि सावधान तो हमें भी हो जाना चाहिए—कहीं अगली बार आप हमारी टिप्पणी के भीतर से भी कोई नई चिट्ठी न निकाल दें! 😄
लेकिन मजाक से अलग, आपकी चिट्ठी ने मेरी मूल टिप्पणी को एक नया अर्थ दिया है। रजनी वर्मा जी ने पटनीटॉप को संवेदना के साथ देखा और आपने उसी यात्रा में “एम.ए. चाय वाला” को खोजकर पूरे पर्यटन विमर्श को रोजगार और सामाजिक विषमता के प्रश्न से जोड़ दिया। यही आपकी लेखनी की खासियत है।
पर्यटन स्थल पर जाकर पहाड़ों की ऊँचाई नापना आसान है, लेकिन वहाँ रहने वाले व्यक्ति की जिंदगी की गहराई नापना कठिन। आपने यह कठिन काम किया है।
“एम.ए. चाय वाला” मेरे लिए भी आपकी चिट्ठी का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। यह एक युवक की व्यक्तिगत स्थिति भर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर प्रश्न है जहाँ शिक्षा बढ़ती है, डिग्रियाँ बढ़ती हैं, लेकिन रोजगार के अवसर उसी अनुपात में नहीं बढ़ते। चाय बेचना कोई छोटा काम नहीं है, लेकिन यदि कोई परास्नातक युवक अपनी योग्यता के अनुरूप अवसर न मिलने के कारण वहाँ पहुँचा है, तो सवाल उसके काम की गरिमा का नहीं, व्यवस्था द्वारा उपलब्ध कराए गए अवसरों का है।
आपने विकास को भी बहुत सही जगह पर पकड़ा है। सड़क, होटल, पर्यटन और सुविधाएँ विकास के जरूरी हिस्से हैं, लेकिन मानवीय गरिमा, रोजगार और स्थानीय लोगों की बेहतर जिंदगी के बिना विकास अधूरा ही रहेगा।
और संपादक अनिल अनूप जी को साधुवाद
इस चिट्ठी के प्रकाशन के लिए संपादक अनिल अनूप जी को विशेष साधुवाद देना चाहूँगा।
मेरी दृष्टि में संपादन का अर्थ लेखक के शब्दों को काटना-छाँटना भर नहीं है। असली संपादन वह है जिसमें लेखक की मूल भावना सुरक्षित रहते हुए रचना अधिक स्पष्ट, पठनीय और प्रभावशाली बन जाए। इस चिट्ठी में वही संतुलन दिखाई देता है।
पनगोत्रा साहब की अपनी आवाज़, उनकी आत्मीयता, उनका व्यंग्य, उनका सवाल और उनकी सामाजिक चिंता—सब कुछ बरकरार रखते हुए संपादक ने रचना को ऐसा रूप दिया है कि पाठक सहजता से उसके साथ चलता जाता है।
यह संतुलित संपादन ही किसी अच्छे संपादक की पहचान है।
पनगोत्रा साहब, आपने मेरी टिप्पणी को याद करके मुझे भी अपनी चिट्ठी का छोटा-सा हिस्सा बना दिया। इसके लिए आभार।
अब अगली बार पटनीटॉप जाइए तो मेरी एक सलाह मानिए—दृश्य खूब देखिए, लोगों को ध्यान से देखिए और लौटकर लिखिए जरूर; लेकिन इस बार वहाँ के किसी चाय वाले को यह मत बताइएगा कि आप लेखक हैं। 😄
कहीं वह भी अपनी कहानी सुना बैठा तो आपकी अगली चिट्ठी और लंबी हो जाएगी!
आपकी कलम सवाल पूछती रहे और पाठक उन सवालों पर सोचते रहें—यही लेखन की सार्थकता है।
आदरणीय श्याम किशोर वर्मा जी,
मैं पिछले पच्चीस वर्ष से लेखन-पत्रकारिता से जुड़ा हूं। पच्चीस वर्ष की यह यात्रा पाठकों के प्रेम के साथ करता रहा। इस बीच कई मिडिया संस्थानों के स्वामियों और संपादकों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जान पहचान हुई। लेकिन अनिल अनूप जी एक ऐसा व्यक्तित्व हैं जो संपादक तो हैं ही मगर उससे बढ़कर एक सखा और एक भाई हैं। पता नहीं अनूप जी ने क्या सोचकर मुझे जनगनदूत के लिए एक साप्ताहिक चिट्ठी लिखने को कहा। यह अनूप जी की दिव्य दृष्टि और दूरदर्शी सोच का ही परिणाम है कि मुझे आप जैसे बौद्धिक क्षमता से परिपूर्ण पाठक मिल गए।
भाई वर्मा जी, आप पाठक मात्र नहीं है बल्कि दिशा निर्देशक हैं। आपकी टिप्पणियां चौसठ साल की उम्र में भी मुझे लेखन हेतु प्रेरित करती हैं।
हार्दिक आभार!
“पनगोत्रा की चिट्ठी–5: पहाड़ों के बहाने भीतर तक उतरती हुई रचना”
पनगोत्रा की चिट्ठी–5 पढ़कर सबसे पहले एक बात कहने का मन हुआ—यह चिट्ठी पटनीटॉप से शुरू होकर बहुत दूर तक जाती है और अंततः हमारे अपने समाज के बीच आकर खड़ी हो जाती है।
पनगोत्रा साहब ने यात्रा की है, लेकिन केवल पहाड़ नहीं देखे। उन्होंने पहाड़ों के बीच खड़े मनुष्य को देखा है। पटनीटॉप, नत्था टॉप और सनासर की प्राकृतिक सुंदरता के बीच “एम.ए. चाय वाला” का प्रसंग पूरी चिट्ठी को एक अलग अर्थ दे देता है। एक परास्नातक युवक चाय की दुकान चला रहा है—चाय बेचने में कोई हीनता नहीं, श्रम अपने आप में सम्मान है; लेकिन सवाल यह है कि शिक्षा हासिल करने के बाद भी उसकी योग्यता को अवसर क्यों नहीं मिला? पनगोत्रा साहब ने इसी बिंदु को पकड़कर पर्यटन-वृत्तांत को सामाजिक विमर्श में बदल दिया है।
मुझे इस चिट्ठी में सबसे अच्छी बात यह लगी कि लेखक ने प्रकृति और मनुष्य के बीच कोई दीवार नहीं खड़ी की। आम तौर पर हम पहाड़ों पर जाते हैं तो पहाड़ देखते हैं, तस्वीरें लेते हैं और लौट आते हैं। पनगोत्रा साहब ने पहाड़ों के सौंदर्य के साथ वहाँ के बच्चों, घोड़ेवालों, छोटे दुकानदारों और रोजी-रोटी के लिए संघर्ष कर रहे लोगों को भी देखा। यही संवेदनशील दृष्टि किसी यात्रा को महज पर्यटन से उठाकर साहित्यिक अनुभव बना देती है।
रजनी वर्मा जी के लेख का उल्लेख और उसके बाद पनगोत्रा साहब का प्रत्युत्तर इस चिट्ठी को एक और सुंदर आयाम देता है। एक पत्रकार ने लेखक को देखा, लेखक ने पत्रकार के शब्दों को देखा और फिर पाठकों ने दोनों को पढ़कर अपनी दृष्टि बनाई। यही तो शब्दों का जीवंत संवाद है।
संपादक की छुअन—जो दिखाई कम देती है, महसूस ज्यादा होती है
मैं यहाँ जनगणदूत के संपादक अनिल अनूप जी की चर्चा विशेष रूप से करना चाहूँगा।
किसी रचना पर संपादक की छुअन कैसी होती है, इसे शब्दों में समझाना आसान नहीं। लेकिन किसी अच्छे संगीतज्ञ की तरह कुशल संपादक भी रचना में उपस्थित उन सूक्ष्म सुरों को सुन लेता है, जो सामान्य पाठक की नजर से छूट जाते हैं।
समाचार हो, स्तंभ हो, राजनीतिक चर्चा हो, यात्रा-वृत्तांत हो या कोई विचारपरक लेख—संपादक जी का वह स्पर्श हर रचना में महसूस होता है।
बारीकियाँ देखना, अनावश्यक को हटाना, आवश्यक को उभारना, भाषा की स्वाभाविकता बचाए रखना और लेखक की मूल आवाज़ को दबाए बिना रचना को अधिक धारदार बनाना—यही कुशल संपादन की पहचान है।
और यह कोई एक-दो दिन की बात नहीं है। एक दशक से हमें यह संपादकीय छुअन शत-प्रतिशत दिखाई और महसूस होती आ रही है। यही कारण है कि जनगणदूत की रचनाओं में केवल सामग्री नहीं होती, एक संपादकीय अनुशासन भी दिखाई देता है।
मुझे लगता है कि अच्छे संपादक की सबसे बड़ी सफलता तब होती है जब पाठक संपादन को अलग से पहचान न पाए, लेकिन पूरी रचना पढ़ने के बाद यह जरूर महसूस करे कि “इसे किसी कुशल हाथ ने सँवारा है।” अनिल अनूप जी की संपादकीय दृष्टि में मुझे यही गुण दिखाई देता है।
और पनगोत्रा साहब की इस चिट्ठी में तो वह छुअन विशेष रूप से महसूस होती है—लेखक की आत्मीयता भी बची है, व्यंग्य भी, साहित्यिक मिठास भी और सामाजिक सवाल की धार भी।
मेरी नजर में पनगोत्रा की चिट्ठी–5 का सबसे बड़ा सवाल यही है कि हम विकास को आखिर किसकी आँखों से देखते हैं? पर्यटक की आँखों से या उस स्थानीय युवक की आँखों से, जो उसी पर्यटन स्थल पर अपने भविष्य की तलाश कर रहा है?
पटनीटॉप की ठंडी हवा कुछ देर के लिए गर्मी से राहत दे सकती है, लेकिन “एम.ए. चाय वाला” जैसे दृश्य हमें भीतर से गर्म कर देते हैं—एक बेचैनी के साथ।
पनगोत्रा साहब, आपने सैर से लौटकर केवल संस्मरण नहीं लिखा, एक सवाल पाठकों के घर तक पहुँचा दिया है।
और अनिल अनूप जी—इस सवाल को इतनी सुघड़ता से पाठकों तक पहुँचाने के लिए आपको साधुवाद।
आदरणीय कमलनयन जी,
नमस्कार!
मैंने आपका हर एक शब्द बड़े ध्यान से पढ़ा। अच्छा लगना तो स्वाभाविक है लेकिन प्रेरणा के साथ समाज के प्रति जिम्मेदारी का पाठ भी आप जैसे बौद्धिक पाठक पढ़ा रहे हैं। चौंसठ वर्ष की आयु में जहां कलम ढीली पड़ जाती है आप मुझमें चालीस का जोश भर रहे हैं।
आपसे संवाद हुआ, हार्दिक आभार
केवल कृष्ण पनगोत्रा जम्मू-कश्मीर
वाह 👏👏 कमाल संयोग है कि आज संभवतः पहली बार हम इस प्रकार लेखक, पाठक, सहयोगी सब संयुक्त रूप से मिल रहे हैं ❓इसके लिए सिर्फ और सिर्फ शब्दों के “नचैता” केवल कृष्ण पनगोत्रा भाई को श्रेय जाता है। रजनी के संग हमारे पुराने से पुराने लंगोटिया भाई गोयनका साहब आज इसी बहाने तीन दशक बाद मिल रहे हैं। स्पष्ट कर ही दूं कि रजनी से गाहे बेगाहे फोन पर दो चार बातें हो जाती हैं, लेकिन बेबाक मुलाकात आज बहुत ही दिनों बाद मुमकिन हुआ है।
बाकी सब बातें कथा के पात्रों ने और बुद्धिजीवी पाठकों ने कह ही दिया तो शेष कुछ बचा नहीं सिर्फ संपादकीय नमन के 🙏🙏🌺🌺 बने रहें, मिलते रहेंगे। पनगोत्रा साहब दिल से शुक्रिया, 🙏
प्रधान संपादक