चित्रकूट

11 साल पहले हो चुकी थी आरोपी की मौत, फिर भी वारंट लेकर पहुंची पुलिस ; अदालत ने बंद किया 17 साल पुराना मुकदमा

सड़क दुर्घटना के मामले में न्यायालय के आदेश पर वारंट तामील करने पहुंची पुलिस को मिली चौंकाने वाली जानकारी, मृत्यु प्रमाण पत्र के आधार पर अदालत ने समाप्त किया मुकदमा।

संजय सिंह राणा की रिपोर्ट 

Chitrakoot. न्यायिक प्रक्रिया में लंबित मामलों के समयबद्ध निस्तारण की आवश्यकता को एक बार फिर उजागर करने वाला मामला सामने आया है। सड़क दुर्घटना से जुड़े एक पुराने मुकदमे में न्यायालय के निर्देश पर जब पुलिस वारंट लेकर आरोपी के घर पहुंची तो पता चला कि जिस व्यक्ति की तलाश की जा रही थी, उसका वर्षों पहले ही निधन हो चुका है। इसके बाद पुलिस ने संबंधित दस्तावेज एकत्र कर अदालत में प्रस्तुत किए, जहां मृत्यु की पुष्टि होने पर न्यायालय ने मुकदमे को समाप्त करने का आदेश पारित कर दिया।

यह मामला न्यायिक और पुलिस व्यवस्था में लंबित मुकदमों की धीमी प्रगति तथा समय-समय पर अभिलेखों के अद्यतन न होने की समस्या को भी सामने लाता है।

वर्ष 2008 में दर्ज हुआ था सड़क हादसे का मुकदमा

जानकारी के अनुसार वर्ष 2008 में सड़क दुर्घटना से जुड़े एक मामले में बांदा जनपद के मर्दन नाका निवासी ताहिर खां के खिलाफ कर्वी कोतवाली में लापरवाहीपूर्वक वाहन चलाने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया था। मामला न्यायालय में विचाराधीन रहा और वर्षों तक इसकी सुनवाई चलती रही।

समय बीतने के बावजूद मुकदमे का अंतिम निस्तारण नहीं हो सका। इसी बीच न्यायालय ने मामले में आगे की कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए आरोपी के विरुद्ध वारंट जारी किया और पुलिस से उसकी तामील कर प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।

वारंट लेकर पहुंचे उपनिरीक्षक, परिजनों ने बताई मौत की जानकारी

न्यायालय के आदेश के अनुपालन में उपनिरीक्षक कैलाश नाथ यादव वारंट लेकर आरोपी के घर पहुंचे। वहां मौजूद परिजनों और स्थानीय लोगों ने पुलिस को बताया कि ताहिर खां का निधन कई वर्ष पहले हो चुका है।

परिजनों के अनुसार आरोपी की मृत्यु 5 अक्टूबर 2015 को हुई थी। पहले तो पुलिस ने जानकारी की पुष्टि की और फिर आवश्यक दस्तावेजों की मांग की।

आरोपी की पत्नी नसरीन बेगम ने पुलिस को लिखित सूचना देने के साथ-साथ मृत्यु प्रमाण पत्र भी उपलब्ध कराया, जो 15 अक्टूबर 2015 को जारी किया गया था। पुलिस ने दस्तावेजों का सत्यापन करने के बाद उन्हें अपने कब्जे में लेकर न्यायालय में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया पूरी की।

मृत्यु प्रमाण पत्र और साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने लिया फैसला

सुनवाई के दौरान उपनिरीक्षक कैलाश नाथ यादव ने न्यायालय के समक्ष अपनी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की और आरोपी की मृत्यु की पुष्टि की। इसके साथ ही मृत्यु प्रमाण पत्र एवं अन्य आवश्यक अभिलेख भी अदालत में दाखिल किए गए।

न्यायिक मजिस्ट्रेट अभिनव कुमार दुबे ने उपलब्ध दस्तावेजों और पुलिस रिपोर्ट का परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान ही आरोपी की मृत्यु हो चुकी थी और इस तथ्य के पर्याप्त प्रमाण न्यायालय के समक्ष मौजूद हैं।

कानूनी स्थिति को देखते हुए न्यायालय ने आरोपी की मृत्यु के आधार पर मुकदमे को समाप्त करने का आदेश जारी कर दिया।

17 साल तक लंबित रहा मामला

यह मामला वर्ष 2008 में दर्ज हुआ था और अब जाकर इसका अंतिम निस्तारण संभव हो पाया। इस दौरान आरोपी की वर्ष 2015 में ही मृत्यु हो चुकी थी, लेकिन न्यायिक अभिलेखों में यह जानकारी समय पर दर्ज नहीं हो सकी।

करीब 17 वर्षों तक मामला लंबित रहने और आरोपी के निधन के लगभग 11 वर्ष बाद वारंट जारी होने की घटना ने न्यायिक प्रक्रिया की गति और रिकॉर्ड प्रबंधन पर भी कई सवाल खड़े किए हैं।

रिकॉर्ड अपडेट न होने से बढ़ती हैं ऐसी परिस्थितियां

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी मुकदमे के दौरान आरोपी का निधन हो जाता है तो संबंधित पक्ष अथवा पुलिस के माध्यम से इसकी जानकारी समय पर न्यायालय तक पहुंचना आवश्यक होता है। ऐसा होने पर न्यायालय आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी कर मुकदमे के संबंध में उचित आदेश पारित कर सकता है।

हालांकि कई मामलों में जानकारी समय पर अभिलेखों में दर्ज नहीं हो पाती, जिसके कारण वर्षों बाद भी समन या वारंट जारी होने जैसी स्थितियां सामने आ जाती हैं। इससे न्यायालय, पुलिस और संबंधित परिवार सभी को अनावश्यक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।

लंबित मुकदमों के समयबद्ध निस्तारण की आवश्यकता

यह प्रकरण केवल एक व्यक्ति के विरुद्ध दर्ज मुकदमे का अंत नहीं है, बल्कि न्यायिक व्यवस्था के सामने मौजूद उस चुनौती की भी याद दिलाता है, जिसमें वर्षों तक लंबित मामलों के कारण कई बार वास्तविक परिस्थितियां अभिलेखों से मेल नहीं खातीं।

विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल रिकॉर्ड, समय-समय पर सत्यापन और विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय से ऐसी स्थितियों से काफी हद तक बचा जा सकता है। यदि मृत्यु, पता परिवर्तन अथवा अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां समय पर अपडेट होती रहें तो न्यायिक प्रक्रिया अधिक प्रभावी और पारदर्शी बन सकती है।

अदालत के आदेश के बाद हुआ मुकदमे का पटाक्षेप

सभी उपलब्ध दस्तावेजों, पुलिस की रिपोर्ट और मृत्यु प्रमाण पत्र के परीक्षण के बाद न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आरोपी की मृत्यु हो चुकी है। इसलिए उसके विरुद्ध चल रही आपराधिक कार्यवाही को आगे बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं रह जाता।

इसी आधार पर न्यायिक मजिस्ट्रेट ने मुकदमे को समाप्त करने का आदेश पारित किया। इसके साथ ही लगभग 17 वर्षों से लंबित यह मामला कानूनी रूप से समाप्त हो गया।

 

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