संजय सिंह राणा की रिपोर्ट
चित्रकूट। आकांक्षी जिले चित्रकूट में स्वच्छता अभियान को लेकर अब जमीनी स्तर पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। ‘चलो गाँव की ओर जनजागृति अभियान’ के तहत समाजसेवी ने जिले की स्वच्छता व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए सरकारी कार्यालयों में सफाईकर्मियों की तैनाती, गांवों में सफाई व्यवस्था की कथित अनदेखी, विद्यालयों में साफ-सफाई की स्थिति और सफाई कर्मचारियों की कार्यप्रणाली की जांच की मांग उठाई है।
स्वच्छता अभियान का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा माना जाएगा, जब उसका असर सरकारी कार्यालयों के साथ-साथ गांवों, विद्यालयों, सार्वजनिक स्थलों, नालियों और ग्रामीण बस्तियों में भी दिखाई दे। उनका सवाल है कि यदि सफाईकर्मियों की तैनाती गांवों की स्वच्छता के लिए की गई है तो उन्हें अन्य स्थानों पर लगाए जाने की स्थिति में ग्रामीण क्षेत्रों की सफाई व्यवस्था कैसे सुचारु रह सकती है?
हालांकि इन आरोपों और दावों की स्वतंत्र प्रशासनिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है। इसलिए संबंधित बिंदुओं की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए विभागीय रिकॉर्ड, कर्मचारियों की तैनाती, उपस्थिति और स्थलीय निरीक्षण की जरूरत होगी।
कागजों से निकलकर जमीन पर पहुंचे स्वच्छता अभियान
‘चलो गाँव की ओर जनजागृति अभियान’ के तहत सवाल उठाया है कि स्वच्छता अभियान को केवल कागजी कार्रवाई, बैठकों और सरकारी रिपोर्टों तक सीमित रखने के बजाय इसे गांवों की वास्तविक जरूरतों से जोड़ा जाना चाहिए।
चित्रकूट जैसे ग्रामीण बहुल जिले में स्वच्छता का अर्थ केवल सड़क या सरकारी भवन की सफाई नहीं है। गांव की गलियां, नालियां, सार्वजनिक शौचालय, विद्यालय परिसर, आंगनबाड़ी केंद्र, पंचायत भवन और सार्वजनिक स्थान भी स्वच्छता व्यवस्था का हिस्सा हैं।
यदि इन स्थानों पर नियमित सफाई नहीं होती तो स्वच्छता अभियान की सफलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। समाजसेवी ने इसी जमीनी अंतर को लेकर जिम्मेदार अधिकारियों से जवाबदेही तय करने की मांग की है।
उनका कहना है कि सरकारी योजनाओं की सफलता का वास्तविक मूल्यांकन कार्यालयों में बैठकर तैयार की गई रिपोर्ट से नहीं, बल्कि गांवों में जाकर किया जाना चाहिए।
सरकारी कार्यालयों में सफाईकर्मियों की तैनाती पर सवाल
‘चलो गाँव की ओर जनजागृति अभियान’ के तहत आरोप लगाया है कि जिले के कई सरकारी कार्यालयों में ऐसे सफाईकर्मियों को लगाया जा रहा है, जिनकी मूल जिम्मेदारी ग्रामीण क्षेत्रों की सफाई व्यवस्था से जुड़ी है।
यदि किसी सफाईकर्मी की मूल तैनाती गांव में है और उसे लंबे समय तक किसी सरकारी कार्यालय में लगाया जाता है तो सबसे पहला सवाल यही उठता है कि उसके मूल कार्यक्षेत्र में सफाई कौन करेगा?
जिला प्रशासन से मांग की है कि सफाईकर्मियों की पूरी तैनाती सूची सार्वजनिक की जाए। इसमें कर्मचारी का नाम, मूल तैनाती स्थल, वर्तमान कार्यस्थल और उसे अन्य स्थान पर लगाए जाने संबंधी आदेश की जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। ऐसा होने पर स्थिति काफी हद तक स्वतः स्पष्ट हो सकती है।
यदि कर्मचारी नियमों के अनुरूप कार्यालय में तैनात हैं तो प्रशासन को उसका आधार बताना चाहिए और यदि नियमों के विपरीत तैनाती पाई जाती है तो जिम्मेदारी निर्धारित की जानी चाहिए।
गांवों में सफाईकर्मियों की मौजूदगी पर भी सवाल
ग्रामीण क्षेत्रों में सफाईकर्मियों की नियमित उपस्थिति को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि कई गांवों में ग्रामीणों को नालियों और सार्वजनिक स्थानों की सफाई खुद करनी पड़ रही है।
यह स्थिति यदि किसी क्षेत्र में लगातार बनी हुई है तो इसकी जांच जरूरी है। क्योंकि ग्रामीण सफाई व्यवस्था के लिए नियुक्त कर्मचारी यदि अपने निर्धारित क्षेत्र में नियमित रूप से कार्य करें तो नालियों, सार्वजनिक स्थानों और गांव की गलियों की सफाई में सुधार दिखाई देना चाहिए।
सफाईकर्मियों की उपस्थिति की प्रभावी निगरानी की मांग करते हुए कहा है कि केवल कागजी मस्टर रोल अथवा उपस्थिति के आधार पर व्यवस्था को सही नहीं माना जाना चाहिए। इसके लिए आकस्मिक निरीक्षण, स्थानीय ग्रामीणों से जानकारी और कार्यस्थल की वास्तविक स्थिति का सत्यापन जरूरी है।
मस्टर रोल और भुगतान व्यवस्था की हो जांच
समाजसेवी की ओर से सफाईकर्मियों की कथित अनुपस्थिति और मस्टर रोल से जुड़े सवाल भी उठाए गए हैं। ऐसे आरोपों की सच्चाई जानने के लिए संबंधित अभिलेखों की जांच सबसे महत्वपूर्ण होगी।
किस कर्मचारी की किस गांव में तैनाती है, उसने कितने दिन काम किया, उसकी उपस्थिति किसने प्रमाणित की और उसके आधार पर कितना भुगतान हुआ—इन सभी सवालों का जवाब विभागीय रिकॉर्ड में मौजूद होना चाहिए।
यदि रिकॉर्ड और जमीन पर वास्तविक स्थिति में अंतर पाया जाता है तो मामला गंभीर हो सकता है। वहीं यदि रिकॉर्ड के मुताबिक सभी कर्मचारी नियमित रूप से अपने कार्यक्षेत्र में उपस्थित हैं तो प्रशासन को यह स्थिति सार्वजनिक कर भ्रम की स्थिति समाप्त करनी चाहिए।
विद्यालयों की सफाई व्यवस्था क्यों महत्वपूर्ण?
स्वच्छता का सबसे संवेदनशील हिस्सा विद्यालय हैं। बच्चों के लिए साफ शौचालय, स्वच्छ परिसर और उचित कचरा प्रबंधन केवल सुविधा नहीं, बल्कि उनके स्वास्थ्य और सुरक्षित शिक्षा वातावरण का हिस्सा है।
‘चलो गाँव की ओर जनजागृति अभियान’ के तहत समाजसेवी ने विद्यालयों की सफाई व्यवस्था पर भी चिंता व्यक्त की है। सवाल उठाया गया है कि यदि स्कूलों में सफाईकर्मियों की व्यवस्था है तो विद्यालयों की साफ-सफाई नियमित रूप से क्यों नहीं दिखाई देती?
कहीं शिक्षक को स्वयं शौचालय या परिसर साफ करने की स्थिति उत्पन्न होती है तो यह व्यवस्था की समीक्षा का विषय बन जाता है। हालांकि किसी एक तस्वीर या घटना को पूरे जिले की स्थिति का प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन ऐसी घटनाओं की शिकायत सामने आए तो संबंधित विद्यालय का स्थलीय निरीक्षण जरूर होना चाहिए।
शिक्षक पढ़ाएं या सफाई व्यवस्था संभालें?
विद्यालय में शिक्षक की प्राथमिक जिम्मेदारी बच्चों को पढ़ाना और शैक्षणिक गतिविधियों को संचालित करना है। यदि किसी विद्यालय में शिक्षक को नियमित रूप से सफाई का काम करना पड़ रहा है तो निश्चित रूप से यह सवाल उठेगा कि विद्यालय की स्वच्छता व्यवस्था किसके जिम्मे है?
समाजसेवी ने इसी मुद्दे को लेकर प्रशासन से विद्यालयों में सफाई व्यवस्था की वास्तविक स्थिति की जांच कराने की मांग की है। यदि विद्यालयों में सफाईकर्मी निर्धारित हैं तो उनकी उपस्थिति सुनिश्चित की जानी चाहिए। यदि किसी कारण से सफाईकर्मी उपलब्ध नहीं हैं तो वैकल्पिक व्यवस्था की जानी चाहिए।
बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा के वातावरण से जुड़े इस विषय को केवल औपचारिक निरीक्षण तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
नालियों की सफाई का जिम्मा आखिर किसका?
ग्रामीण क्षेत्रों में नालियों की सफाई की समस्या बरसात के दौरान और गंभीर हो जाती है। नालियां जाम होने से जलभराव, गंदगी और दुर्गंध की समस्या बढ़ सकती है। समाजसेवी ने सवाल उठाया है कि जब गांवों में सफाई व्यवस्था के लिए कर्मचारी उपलब्ध हैं तो ग्रामीणों को स्वयं नालियों की सफाई क्यों करनी पड़ रही है?
इस सवाल का जवाब स्थानीय स्तर पर निरीक्षण के बाद ही मिल सकता है। प्रत्येक ग्राम पंचायत में सफाई व्यवस्था की स्थिति अलग हो सकती है। इसलिए पूरे जिले को एक ही नजरिए से देखने के बजाय गांववार समीक्षा अधिक प्रभावी होगी।
सरकारी कार्यालय बनाम गांव: प्राथमिकता तय करने की जरूरत
सरकारी कार्यालयों में स्वच्छता आवश्यक है। कर्मचारियों और आम नागरिकों के लिए साफ कार्यालय जरूरी हैं। लेकिन इसके लिए गांवों के सफाईकर्मियों को लंबे समय तक वहां तैनात करना उचित है या नहीं, यह विभागीय नियमों और प्रशासनिक आदेशों के आधार पर तय होना चाहिए।
यदि कार्यालयों के लिए अलग व्यवस्था उपलब्ध कराई जा सकती है तो ग्रामीण सफाई व्यवस्था के कर्मचारियों को उनके मूल कार्यक्षेत्र में ही रखा जाना चाहिए। इससे गांवों की स्वच्छता व्यवस्था मजबूत होगी और कर्मचारियों की जिम्मेदारी भी स्पष्ट रहेगी।
सफाईकर्मियों की तैनाती की हो पारदर्शी जांच
इस पूरे मामले में सबसे प्रभावी कदम जिले के सभी सफाईकर्मियों की तैनाती और कार्यस्थल का पारदर्शी सत्यापन हो सकता है।
प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कितने सफाईकर्मी स्वीकृत हैं, कितने पदों पर तैनात हैं, किस ग्राम पंचायत में कितने कर्मचारी हैं और वर्तमान में वे वास्तव में कहां काम कर रहे हैं।
इसके अलावा यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या किसी कर्मचारी को किसी अधिकारी या कार्यालय में अतिरिक्त कार्य के लिए लगाया गया है। यदि ऐसा है तो उसके लिए जारी आदेश और अवधि भी स्पष्ट होनी चाहिए।
इससे न केवल वर्तमान विवाद समाप्त होगा बल्कि भविष्य में भी इस तरह की शिकायतों पर अंकुश लगाया जा सकेगा।
‘चलो गाँव की ओर’ अभियान का जोर जमीनी हकीकत पर
‘चलो गाँव की ओर जनजागृति अभियान’ के तहत समाजसेवी का जोर इस बात पर है कि ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं को केवल सरकारी फाइलों में दर्ज करने के बजाय उनकी वास्तविक स्थिति को सामने लाया जाए।
स्वच्छता ऐसा विषय है जिसे आंकड़ों के बजाय जमीन पर महसूस किया जा सकता है। गांव की साफ गलियां, खुली नालियां, साफ विद्यालय और नियमित कचरा उठान किसी भी व्यक्ति को व्यवस्था की वास्तविक स्थिति बता देते हैं।
इसीलिए अभियान के तहत उठाए गए सवालों को प्रशासन के लिए शिकायत के साथ-साथ व्यवस्था में सुधार का अवसर भी माना जा सकता है।
प्रशासन के सामने अब बड़ा सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जिला प्रशासन इन शिकायतों और सवालों की स्वतंत्र जांच कराएगा?
यदि आरोप गलत हैं तो विभागीय रिकॉर्ड के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। यदि आरोपों में तथ्य पाए जाते हैं तो संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय करते हुए व्यवस्था में सुधार किया जाना चाहिए।
सफाईकर्मियों की तैनाती, उपस्थिति और कार्यस्थल की जांच के साथ-साथ विद्यालयों और गांवों का आकस्मिक निरीक्षण भी किया जाना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जांच केवल कागजों तक सीमित न रहे। अधिकारी स्वयं गांवों में पहुंचकर देखें कि वास्तविक स्थिति क्या है।
संजय सिंह राणा की ओर से उठाए गए सवालों का समाधान आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि दस्तावेजों, स्थलीय जांच और पारदर्शी कार्रवाई से ही संभव है। प्रशासन चाहे तो सफाईकर्मियों की तैनाती, उपस्थिति और कार्यस्थल का सत्यापन कराकर कुछ ही समय में स्थिति स्पष्ट कर सकता है।
चित्रकूट में स्वच्छता अभियान को वास्तव में सफल बनाना है तो अब आवश्यकता कागजी दावों से आगे बढ़कर जमीनी निगरानी की है। गांव की नालियां साफ हों, विद्यालयों के शौचालय स्वच्छ हों, सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी न हो और निर्धारित सफाईकर्मी अपने कार्यस्थल पर मौजूद रहें—यही किसी भी स्वच्छता अभियान की असली कसौटी है।
संजय सिंह राणा की ओर से सवाल उठा दिए हैं। अब निगाहें इस बात पर हैं कि संबंधित विभाग और जिला प्रशासन इन सवालों का जवाब किस तरह देते हैं। यदि जांच होती है तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि जनता को पता चल सके कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और स्वच्छता व्यवस्था में सुधार के लिए क्या कदम उठाए गए।
कागजों पर स्वच्छता अभियान चलाना आसान है, लेकिन गांव की जमीन पर उसे उतारना ही असली परीक्षा है। चित्रकूट में अब यही परीक्षा प्रशासन, पंचायती राज व्यवस्था और स्थानीय तंत्र के सामने है।
जनता को चाहिए साफ गांव, न कि सिर्फ कागजी स्वच्छता
स्वच्छता अभियान की सफलता का अंतिम पैमाना यही है कि आम ग्रामीण को उसका लाभ दिखाई दे। गांव की नाली साफ हो, सार्वजनिक स्थानों पर कचरा जमा न हो, विद्यालयों में स्वच्छ शौचालय उपलब्ध हों और सफाईकर्मी अपने निर्धारित कार्यक्षेत्र में नियमित रूप से काम करें।
‘चलो गाँव की ओर जनजागृति अभियान’ के तहत समाजसेवी ने जो सवाल उठाए हैं, उनका समाधान आरोप-प्रत्यारोप में नहीं बल्कि पारदर्शी जांच और जमीनी कार्रवाई में है।
चित्रकूट आकांक्षी जिले के रूप में विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे में स्वच्छता व्यवस्था को भी उसी गंभीरता के साथ मजबूत करना जरूरी है। सरकारी योजनाओं की सफलता तभी मानी जाएगी जब उनका असर गांव के अंतिम व्यक्ति तक दिखाई दे।
अब जरूरत है कि प्रशासन कागजों से आगे बढ़कर जमीन पर स्वच्छता अभियान की वास्तविक स्थिति देखे, सफाईकर्मियों की तैनाती और उपस्थिति का सत्यापन करे तथा जहां भी कमी मिले, वहां तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई करे।
क्योंकि जनता का सवाल सीधा है—यदि स्वच्छता के लिए संसाधन और कर्मचारी मौजूद हैं, तो फिर गांव और विद्यालय गंदे क्यों दिखाई दें? और यही सवाल चित्रकूट की स्वच्छता व्यवस्था की असली परीक्षा भी है।

























