जिले की चिट्ठी

खेत की मेड़ से कलेक्ट्रेट तक एक ही सवाल—“साहब, हमारी सुनवाई कब होगी?”

जिले की चिट्ठी—हरदोई

✍️ अनुराग गुप्ता की रिपोर्ट

हरदोई की जमीन को दूर से देखिए तो सब कुछ बड़ा सहज लगता है। खेत हैं, हरियाली है, गांव हैं, बाजार हैं, सड़कें हैं और सरकारी योजनाओं के बोर्ड भी खूब दिखाई देते हैं। लेकिन जरा सड़क छोड़कर खेत की मेड़ पर बैठिए, गांव की चाय की दुकान पर दो घड़ी रुकिए या किसी सरकारी स्कूल के बाहर खड़े होकर बच्चों की आवाज सुनिए, तब पता चलता है कि कागज वाला हरदोई और जमीन वाला हरदोई एक-दूसरे से थोड़े अलग हैं।

यही फर्क इस चिट्ठी का विषय है। हरदोई की जनता को विकास से शिकायत नहीं है। शिकायत तब होती है जब विकास का नाम तो सुनाई देता है, लेकिन उसका असर घर की देहरी तक पहुंचते-पहुंचते कहीं रास्ते में अटक जाता है।

किसान कहता है—“बिजली मिल जाए तो खेत अपना काम खुद कर ले”

हरदोई के किसान की सबसे बड़ी जरूरतों में बिजली और सिंचाई आज भी ऊपर हैं। 17 जुलाई को किसान संगठनों ने ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली संकट और कटौती का मुद्दा जिलाधिकारी के सामने उठाया। 22 जुलाई को किसान दिवस में भी जर्जर बिजली लाइन, आपूर्ति और बंद सहकारी समितियों की शिकायतें सामने आईं।

किसान की बात को सरकारी भाषा में लिखेंगे तो वह “विद्युत आपूर्ति में सुधार की मांग” बन जाती है। मगर गांव में उसी बात का मतलब कुछ और है।

एक किसान से खेत की मेड़ पर बात हुई तो उसकी परेशानी का सार यही था—“भइया, खेत हम जोत दें, बीज हम डाल दें, खाद हम डाल दें, फसल भी भगवान भरोसे पाल दें; अब पानी के लिए मोटर चलाने को बिजली भी हम ही पैदा कर लें का?” वह हंसता है, मगर उस हंसी में परेशानी छिपी है।

उसका कहना है कि बिजली का समय ठीक-ठाक मालूम रहे तो किसान अपना काम उसी हिसाब से जमा ले। दिक्कत तब होती है जब बिजली आने-जाने का कोई भरोसा न हो। धान की रोपाई का समय हो और सिंचाई का इंतजाम गड़बड़ा जाए तो किसान के लिए यह सिर्फ असुविधा नहीं, पूरे सीजन की चिंता है।

यही कारण है कि बिजली की समस्या को महज घरेलू उपभोक्ता की शिकायत मानना ठीक नहीं होगा। हरदोई में बिजली खेत से लेकर छोटे कारोबार तक पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ी है।

“सहकारी समिति खुल जाए तो किसान का आधा चक्कर बच जाए”

किसानों ने बंद सहकारी समितियों का मुद्दा भी उठाया है। गांव के किसान के लिए सहकारी समिति कोई बड़ी प्रशासनिक अवधारणा नहीं। उसके लिए इसका सीधा मतलब है—खाद-बीज और कृषि निवेश के लिए सुविधा कहां मिलेगी? एक किसान की बात का सार सुनिए— “हमका खेती करनी है, दफ्तरदारी नहीं। अगर गांव में ही खाद-बीज का काम हो जाए तो तहसील-कस्बा का चक्कर कौन काटे? दिन भर लाइन में लगो, ऊपर से खेत का काम छूटे सो अलग।”

यह बात छोटी लग सकती है, लेकिन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की असली तस्वीर इसी में छिपी है। किसान का एक दिन सिर्फ उसका निजी समय नहीं होता। खेत में बोआई, सिंचाई, निराई या कटाई के समय एक दिन का मतलब कई बार सीधे नुकसान से होता है। इसलिए सहकारी समितियों की स्थिति सुधारना केवल विभागीय काम नहीं, किसान का समय बचाने वाला कदम भी है।

सड़क पर धान रोपना सिर्फ विरोध नहीं, व्यवस्था के लिए आईना है

बारिश आते ही ग्रामीण सड़कों की हालत पर सवाल उठने लगते हैं। हरदोई में सड़क की खराब स्थिति को लेकर विरोध का ऐसा तरीका भी सामने आया जिसमें सड़क पर धान की रोपाई करके नाराजगी जताई गई।

जरा सोचिए—किसान खेत में धान रोपता है। अगर वही किसान सड़क पर धान रोपने लगे तो यह तस्वीर प्रशासन के लिए सामान्य विरोध नहीं होनी चाहिए।

गांव के एक बुजुर्ग ने इस स्थिति को अपने अंदाज में कुछ यूं समझाया— “सड़क बनती है तो हमहूं खुश होत हैं। लेकिन बरखा में अगर सड़कवा खेत बन जाए, तौ समझो पैसा सड़क में लगा कि पानी में?” सवाल सीधा है। सड़क की गुणवत्ता का असली परीक्षण उद्घाटन के दिन नहीं, पहली तेज बारिश के बाद होता है।

गांव की सड़क सिर्फ आने-जाने का रास्ता नहीं है। उसी से बच्चा स्कूल जाता है, किसान अपनी फसल बाजार ले जाता है, मरीज अस्पताल पहुंचता है और परिवार का जरूरी सामान घर आता है। इसलिए सड़क खराब होना विकास की छोटी शिकायत नहीं है।

छात्र कहता है—“स्कूल पहुंच जाएं, फिर पढ़ाई भी ठीक से हो”

हरदोई की शिक्षा व्यवस्था में भी तस्वीर के दोनों पहलू हैं। एक तरफ जिलाधिकारी की पहल से 67 परिषदीय विद्यालयों को मॉडल विद्यालय के रूप में विकसित किए जाने की खबर है, जो सकारात्मक उदाहरण है। दूसरी तरफ 177 माध्यमिक विद्यालयों को विद्यार्थियों का विवरण पोर्टल पर अपलोड न करने के कारण नोटिस जारी किया गया।

यहां सवाल सिर्फ स्कूल की इमारत का नहीं है। गांव के एक छात्र से बातचीत की कल्पना सरकारी आंकड़ों से नहीं, उसकी रोजमर्रा की जरूरत से कीजिए। वह कहता है— “हमका स्कूल में मास्टर जी मिल जाएं, पढ़ाई हो जाए, पंखा चल जाए, पानी मिल जाए—हमका और का चाहिए? आगे पढ़ के नौकरी-वोकरी लग जाए, बस ई सपना है।” इस एक वाक्य में ग्रामीण विद्यार्थी की पूरी आकांक्षा है।

उसे स्मार्ट क्लास की तस्वीर से ज्यादा कक्षा में शिक्षक की मौजूदगी चाहिए। उसे बड़े-बड़े भाषणों से ज्यादा किताब, बिजली, पानी और पढ़ाई का माहौल चाहिए। और सबसे जरूरी—उसे यह विश्वास चाहिए कि गांव से पढ़कर निकलने वाला बच्चा शहर के बच्चे से पीछे नहीं रहेगा।

नौजवान की चिंता—“पढ़ाई कर लिए, अब काम कहां है?”

हरदोई का नौजवान एक अलग सवाल लेकर खड़ा है। गांव का युवा खेती से पूरी तरह अलग होना नहीं चाहता, मगर वह केवल खेती पर निर्भर भी नहीं रहना चाहता। कोई प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है, कोई आईटीआई या तकनीकी शिक्षा लेकर काम तलाश रहा है, कोई छोटा कारोबार शुरू करने की सोच रहा है।

एक ग्रामीण नौजवान की चिंता को स्थानीय अंदाज में कहें तो बात कुछ यूं निकलती है— “पढ़ाई कर लिहेन, फार्म भी भरत हैं, परीक्षा भी देत हैं। अब नौकरी कब लगी, ई भगवान जाने। गांव में काम-धंधा हो जाए तौ आदमी बाहर काहे जाए?”

यही सवाल हरदोई की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। अगर छोटे उद्योग, कृषि आधारित प्रसंस्करण, डेयरी, खाद्य प्रसंस्करण, बागवानी, भंडारण और स्थानीय कारोबार को बढ़ावा मिले तो नौजवानों के लिए रोजगार गांव और कस्बे के आसपास ही पैदा हो सकते हैं। लेकिन इसके लिए बिजली चाहिए, सड़क चाहिए, बैंकिंग सुविधा चाहिए, बाजार चाहिए और सबसे बढ़कर प्रशासनिक सहयोग चाहिए।

हाल ही में जिला उद्योग बंधु और व्यापार बंधु की बैठक में उद्यमियों ने बिजली ट्रिपिंग से औद्योगिक इकाइयों के प्रभावित होने की शिकायत की। उनके अनुसार इससे मशीनरी और कच्चे माल को भी नुकसान होता है। देखिए, किसान हो या उद्यमी—बिजली की समस्या दोनों को अलग-अलग तरीके से परेशान कर रही है।

गांव की महिला का सवाल भी सुनना जरूरी है

हरदोई की चिट्ठी अगर केवल किसान और नौजवान की बात करके खत्म कर दी जाए तो तस्वीर अधूरी रहेगी।

गांव की महिला के लिए विकास का अर्थ है—घर के पास पानी, बच्चों की पढ़ाई, राशन की सुविधा, स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंच और परिवार की आमदनी में स्थिरता। अंत्योदय कार्डधारकों के लिए जुलाई में 35 किलो अनाज और तीन किलो चीनी दिए जाने की व्यवस्था की खबर है। सरकारी योजना जरूरी है, मगर गांव की महिला की कसौटी बहुत सीधी होती है— “राशन मिल गवा, ठीक बात है। लेकिन घर में कमाने वाला बीमार पड़ जाए, बच्चा बीमार हो जाए, पानी की दिक्कत हो जाए तो हम कहां जाएं?” यानी कल्याणकारी योजना के साथ स्थानीय स्वास्थ्य, पेयजल और रोजगार की व्यवस्था भी जरूरी है।

स्कूल चमक रहे हैं तो बाकी स्कूलों की बारी कब?

हरदोई में 67 परिषदीय विद्यालयों को मॉडल विद्यालय बनाने की पहल निश्चित रूप से उल्लेखनीय है। लेकिन हरदोई के गांवों में लोग यह भी पूछेंगे कि जो विद्यालय अभी मॉडल नहीं बने, उनका क्या? गांव के एक अभिभावक का सवाल बहुत साधारण है— “साहब, जिन स्कूलन में रंग-रोगन हो गवा, उहां बढ़िया है। बाकी स्कूल के बच्चन का भी नंबर कब आई?” यही सवाल प्रशासन के लिए चुनौती है।

एक अच्छे मॉडल स्कूल की तस्वीर देखकर खुशी होती है। मगर शासन की असली सफलता तब होगी जब अच्छे स्कूल अपवाद नहीं, सामान्य स्थिति बन जाएं।

हरदोई की असली लड़ाई शिकायत बनाम सरकार नहीं, व्यवस्था बनाम लापरवाही की है

यहां एक बात साफ होनी चाहिए। हर समस्या के लिए सरकार को दोष देना भी पत्रकारिता नहीं है और हर सरकारी योजना को उपलब्धि बताना भी पत्रकारिता नहीं।

सवाल यह है कि जो व्यवस्था बनाई गई है, वह जमीन पर कितनी असरदार है? बिजली विभाग है—तो बिजली कितनी भरोसेमंद है? सहकारी समिति है—तो किसान को सुविधा कितनी मिल रही है? स्कूल है—तो बच्चा क्या सीख रहा है? सड़क बनी है—तो बारिश में कितने दिन चलती है? पानी की योजना है—तो नल में पानी कितनी नियमितता से आता है? यही वे सवाल हैं जिनका जवाब हरदोई के गांव मांग रहे हैं।

हरदोई में उम्मीद की जमीन भी कम नहीं

इस चिट्ठी को केवल शिकायतों का पुलिंदा बनाना ठीक नहीं होगा। हरदोई में कृषि और बागवानी की संभावनाएं हैं। किसान प्रशिक्षण पा रहे हैं, विद्यालयों को बेहतर बनाने की पहल हो रही है और प्रशासनिक स्तर पर विभिन्न समस्याओं पर बैठकें भी हो रही हैं। यानी इच्छाशक्ति की कमी हर जगह नहीं है।

अब जरूरत है कि अच्छे प्रयासों को लगातार निगरानी, पारदर्शिता और समयबद्ध कार्रवाई से जोड़ा जाए। क्योंकि गांव का आदमी बहुत जल्दी समझ जाता है कि काम सचमुच हुआ है या सिर्फ कागज पर हुआ है।

और आखिर में हरदोई से एक छोटी-सी बात

हरदोई की इस चिट्ठी को कलेक्ट्रेट के किसी कमरे में रखी शिकायत समझना भूल होगी। यह खेत की मेड़ से निकली आवाज है।

किसान कह रहा है—“बिजली दे दो, समय से दे दो।” छात्र कह रहा है—“स्कूल में पढ़ाई करा दो।” नौजवान कह रहा है—“काम का रास्ता खोल दो।” गांव की महिला कह रही है—“पानी, इलाज और रोजमर्रा की सुविधा आसान कर दो।” और बुजुर्ग कह रहा है—“सड़क ऐसी बना दो कि बरखा में खेत और सड़क में फर्क रहे।”

इन मांगों में कोई आसमान नहीं मांगा गया है। जनता बस अपने हिस्से का सामान्य जीवन मांग रही है। इसलिए हरदोई के जिम्मेदार अधिकारियों से सवाल भी बहुत बड़ा नहीं है— क्या अगली बार जब गांव से कोई शिकायत आएगी तो उसे एक और आवेदन माना जाएगा, या उसके पीछे खड़े उस किसान, छात्र, नौजवान और परिवार को देखा जाएगा जिसकी जिंदगी उस शिकायत से जुड़ी है?

क्योंकि हरदोई की जनता को अब सिर्फ यह नहीं जानना कि किस योजना में कितना पैसा आया। वह यह देखना चाहती है कि— “हमरे गांव में उससे बदला का?” यही हरदोई की जमीन से उठती इस चिट्ठी का सबसे जरूरी सवाल है।

— अनुराग गुप्ता

संपादकीय नोट: ऊपर किसान, छात्र, नौजवान और महिला के संवादों को किसी व्यक्ति के वास्तविक शब्दशः उद्धरण के रूप में नहीं, बल्कि उपलब्ध मुद्दों के आधार पर ग्रामीण बोलचाल में प्रस्तुत किया गया है।

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