जब सच की कीमत जिंदगी बन जाए : क्या हर पीड़ा की कीमत तय होती है?
पत्रकार संजय सिंह राणा के संघर्ष पर समाज और व्यवस्था से बड़े सवाल
पत्रकार दुर्गा प्रसाद शुक्ला की प्रस्तुति
देश में जब भी कोई प्राकृतिक आपदा आती है, सरकार तत्काल राहत और मुआवजे की घोषणा करती है। सड़क दुर्घटनाओं, आगजनी, बाढ़ या अन्य त्रासदियों में पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता देना सरकार का संवैधानिक और मानवीय दायित्व भी है। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा वर्ग भी है, जो किसी प्राकृतिक आपदा का नहीं, बल्कि समाज के लिए संघर्ष करने की कीमत चुका रहा है। दुखद यह है कि उसकी पीड़ा न सुर्खियां बनती है और न ही उसके लिए राहत की घोषणाएं होती हैं।
आज समाज में यह प्रवृत्ति भी बढ़ी है कि किसी भी प्रकार की क्षति होने पर सबसे पहले सरकार की ओर देखा जाता है। कहीं चोरी हो जाए तो मुआवजे की मांग, कहीं दुर्घटना हो जाए तो धरना-प्रदर्शन। कई मामलों में यह उचित भी होता है, लेकिन दूसरी ओर ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने जीवनभर समाज के लिए संघर्ष किया और आज स्वयं सहायता के लिए दर-दर भटक रहे हैं। यह स्थिति केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक संवेदनशीलता की परीक्षा है।
गरीबी में जन्मा, संघर्ष में पला और समाज को समर्पित हो गया एक युवक
पत्रकार एवं समाजसेवी संजय सिंह राणा का जीवन किसी आरामदायक परिवेश में नहीं बीता। गरीबी और अभावों के बीच पले-बढ़े राणा ने कठिन परिस्थितियों को अपनी नियति मानने के बजाय समाज की लड़ाई लड़ने का संकल्प लिया। उन्होंने कभी अपने संघर्ष को कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि उसे अपनी ताकत बनाया।
अपने परिवार की सीमित आर्थिक स्थिति के बावजूद उन्होंने उन लोगों की आवाज उठाई, जिनकी आवाज प्रशासन तक पहुंच ही नहीं पाती थी। बुंदेलखंड और पाठा क्षेत्र के गरीब, शोषित, मजदूर, आदिवासी और वंचित परिवारों के मुद्दों को उन्होंने लगातार अपनी पत्रकारिता के माध्यम से सामने रखा। उनके लिए पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम थी।
जब कलम माफियाओं से टकराई
लोकतंत्र में पत्रकार की सबसे बड़ी पूंजी उसकी निर्भीकता होती है। लेकिन यही निर्भीकता कई बार उसके लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाती है।
करीब चार वर्ष पूर्व संजय सिंह राणा ने कथित रूप से क्षेत्र में सक्रिय माफियाओं और उनके अवैध कारनामों को उजागर करने का अभियान चलाया। उनके लेखों और खबरों ने उन ताकतों को असहज कर दिया, जो वर्षों से भय और प्रभाव के दम पर अपना वर्चस्व बनाए हुए थीं।
इसी दौरान उन पर एक गंभीर हमला हुआ। आरोप है कि उन्हें जीप से कुचलने का प्रयास किया गया। यह घटना केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं थी, बल्कि उस निर्भीक पत्रकारिता पर हमला थी जो सत्ता और अपराध के गठजोड़ से सवाल पूछने का साहस करती है।
मौत से लौट आया, लेकिन जिंदगी बदल गई
कहते हैं कि जिसकी सांसें बाकी हों, उसे मौत भी नहीं रोक सकती। संजय सिंह राणा इस भीषण घटना में जीवित तो बच गए, लेकिन उनका जीवन पूरी तरह बदल गया। गंभीर शारीरिक चोटों ने उन्हें लगभग अपंग बना दिया। आज भी वे स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं। इलाज का लंबा सिलसिला, आर्थिक तंगी और शारीरिक असमर्थता ने उनके जीवन को बेहद कठिन बना दिया है।
जो व्यक्ति कभी दूसरों के लिए दौड़ता था, आज स्वयं चलने और इलाज कराने के लिए संघर्ष कर रहा है। यह विडंबना केवल उनके परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है।
गरीबों की दुआएं मिलीं, व्यवस्था का सहारा नहीं
जीवन में सबसे बड़ी पूंजी धन नहीं, बल्कि लोगों का विश्वास होता है। संजय सिंह राणा ने जिन गरीब परिवारों की आवाज उठाई, जिनकी समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाया, उन्हीं लोगों की दुआएं आज भी उनके साथ हैं। अनेक लोग मानते हैं कि यदि उन पर हुए हमले के बाद वे जीवित बचे, तो उसमें उन गरीबों की दुआओं और शुभकामनाओं का भी बड़ा योगदान है। लेकिन विडंबना यह है कि समाज की दुआएं तो मिलीं, पर व्यवस्था का अपेक्षित सहयोग नहीं मिला।
चार साल बाद भी न्याय और सहायता की प्रतीक्षा
समय बीतता गया, लेकिन राणा का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। घटना को कई वर्ष गुजर जाने के बाद भी वे स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। आर्थिक संकट लगातार गहराता जा रहा है। इलाज का खर्च उनके परिवार पर भारी पड़ रहा है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या समाज और शासन की जिम्मेदारी केवल घटनाओं के समय तक सीमित रहती है?
यदि कोई व्यक्ति समाजहित में संघर्ष करते हुए घायल होता है, तो क्या उसके उपचार और पुनर्वास की जिम्मेदारी केवल उसके परिवार की होनी चाहिए?
क्या किसी ने उनकी सुध ली?
यह प्रश्न केवल सरकार से नहीं, पूरे समाज से है। क्या किसी मंत्री ने उनके घर जाकर उनकी स्थिति जानी? क्या किसी जनप्रतिनिधि ने उनके इलाज की व्यवस्था सुनिश्चित करने का प्रयास किया? क्या किसी वरिष्ठ अधिकारी ने यह देखा कि वह पत्रकार आज किन परिस्थितियों में जीवन जी रहा है? क्या पत्रकार संगठनों ने उनकी लड़ाई को अपनी लड़ाई माना?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक है, तो यह किसी एक व्यक्ति की उपेक्षा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की उपेक्षा है।

योगी सरकार से अपेक्षा क्यों?
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार गरीबों, कानून व्यवस्था और जनकल्याण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का दावा करती रही है। अनेक योजनाओं के माध्यम से सरकार ने जरूरतमंदों तक सहायता पहुंचाने का प्रयास भी किया है।
ऐसे में यदि समाजहित में संघर्ष करने वाला एक पत्रकार वर्षों से आर्थिक और शारीरिक पीड़ा झेल रहा है, तो यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि सरकार उसकी स्थिति पर गंभीरता से विचार करे। यदि पात्रता के अनुसार किसी सरकारी सहायता, स्वास्थ्य योजना या विशेष राहत की व्यवस्था संभव हो, तो उस पर संवेदनशीलता के साथ निर्णय लिया जाना चाहिए।
पत्रकारिता केवल खबर नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी है
पत्रकार का कार्य केवल समाचार लिखना नहीं होता। वह समाज की आंख और कान होता है। वह उन लोगों की आवाज बनता है, जिनकी आवाज कहीं नहीं सुनी जाती।
यदि ऐसे पत्रकारों को असुरक्षा, आर्थिक संकट और उपेक्षा का सामना करना पड़ेगा, तो आने वाली पीढ़ी निर्भीक पत्रकारिता से दूर होती जाएगी। यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं होगा।
समाज की भी उतनी ही जिम्मेदारी
हर जिम्मेदारी सरकार की नहीं होती। समाज, सामाजिक संगठन, उद्योगपति, स्वयंसेवी संस्थाएं और पत्रकार संगठन भी ऐसे लोगों के साथ खड़े हो सकते हैं जिन्होंने अपना जीवन समाजहित में समर्पित किया है। आज यदि हम ऐसे संघर्षशील व्यक्तियों को अकेला छोड़ देंगे, तो कल समाज के लिए जोखिम उठाने वाले लोगों की संख्या कम होती जाएगी।
यह दया नहीं, सम्मान का प्रश्न है
संजय सिंह राणा किसी पर एहसान नहीं मांग रहे। यदि उन्होंने समाज के लिए संघर्ष किया है, यदि उन्होंने सच को सामने लाने का साहस दिखाया है, तो संकट की घड़ी में उन्हें सहयोग मिलना दया नहीं, बल्कि उनके योगदान का सम्मान होगा। एक सभ्य समाज अपने नायकों को संकट में अकेला नहीं छोड़ता।
निष्कर्ष: लोकतंत्र की असली परीक्षा यहीं होती है
लोकतंत्र केवल चुनावों से मजबूत नहीं होता, बल्कि उन लोगों के सम्मान से मजबूत होता है जो सच बोलने का साहस रखते हैं।
संजय सिंह राणा का संघर्ष आज केवल उनका व्यक्तिगत संघर्ष नहीं रह गया है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा है जो न्याय, संवेदना और जनसेवा का दावा करती है। यह उस समाज की भी परीक्षा है जो पत्रकारों को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहता है।
यदि समाज के लिए लड़ने वाला एक पत्रकार आज अपनी बीमारी के इलाज के लिए सहायता की आस में दरवाजे खटखटा रहा है, तो यह केवल उसकी नहीं, हम सबकी जिम्मेदारी है।
समय अभी भी है। शासन, प्रशासन, जनप्रतिनिधि, पत्रकार संगठन और समाज यदि संवेदनशीलता के साथ आगे आएं, तो एक संघर्षशील पत्रकार को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर मिल सकता है। क्योंकि सच बोलने वालों को बचाना केवल एक व्यक्ति की सहायता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा की रक्षा करना है।










