जिले की चिट्ठी—रायबरेली – विकास की रफ्तार, गांव के सवाल

जिले की चिट्ठी—रायबरेली में ठाकुर बख्श सिंह की तस्वीर के साथ गांव, किसान, पंचायत, रेल कोच फैक्ट्री, एम्स और एनटीपीसी ऊंचाहार की झलक

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प्रिय संपादक जी,

रायबरेली से राम-राम!

रायबरेली की चिट्ठी लिखने बैठा हूं तो मन सबसे पहले किसी सरकारी दफ्तर, किसी राजनीतिक बयान या किसी विकास योजना की फाइल में नहीं जाता। मन चला जाता है गांव की उस पगडंडी पर, जहां सुबह-सुबह सिर पर गमछा रखे किसान खेत की ओर निकलता है और लौटते समय रास्ते में मिलने वाले हर आदमी से दो मिनट बतिया लेता है।

रायबरेली को समझना हो तो केवल जिला मुख्यालय देख लेने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए बछरावां की गलियों में उतरना पड़ेगा, लालगंज की ओर जाना पड़ेगा, ऊंचाहार के खेतों और बाजारों को देखना पड़ेगा, सरेनी-सलोन के गांवों की चौपाल पर बैठना पड़ेगा और उन घरों के भीतर झांकना पड़ेगा जहां सरकारी योजनाओं की चर्चा से ज्यादा जरूरी यह सवाल होता है कि “इस बरखा में पानी किधर से निकरी?”

रायबरेली इतिहास का जिला है, राजनीति का जिला है, उद्योग का जिला है और गांव की अपनी जीवंत दुनिया वाला जिला भी है। सरकारी जिला परिचय इसे स्वतंत्रता आंदोलन और शहादतों से जुड़ी धरती के रूप में रेखांकित करता है। आज यहां एनटीपीसी ऊंचाहार, रेल कोच फैक्ट्री लालगंज और इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्री जैसे बड़े सरकारी उपक्रम भी जिले की औद्योगिक पहचान का हिस्सा हैं। (Raebareli) लेकिन संपादक जी, इतने बड़े नामों के बीच एक छोटा-सा सवाल बार-बार सिर उठाता है— रायबरेली जितना बड़े संस्थानों में बदला है, क्या उतना ही गांव की गलियों में भी बदला है?

बारिश आई और पानी ने व्यवस्था का हिसाब मांग लिया

अभी बछरावां की तस्वीर सामने आई। भारी बारिश के बाद घरों से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र परिसर तक जलभराव की खबर आई। स्थिति को लेकर सपा कार्यकर्ताओं ने पानी के बीच बैठकर जल सत्याग्रह किया। इसके बाद नगर पंचायत प्रशासन ने पंपिंग सेट और इंजन लगाकर पानी निकालने तथा नालियों की सफाई का काम शुरू कराया।

साहब, बारिश तो हर साल आती है। बादल को कौन रोक सकता है? लेकिन पानी कहां ठहरेगा और कहां से निकलेगा—यह तो आदमी को तय करना ही पड़ेगा। गांव का आदमी इस बात को बहुत सरल ढंग से समझता है। उसके लिए जलनिकासी कोई तकनीकी शब्द नहीं है। उसके लिए इसका मतलब है—दरवाजे पर पानी खड़ा रहेगा या नहीं।

पंचायत की नाली समय पर साफ हुई या नहीं। सड़क इतनी ऊंची बनी कि पानी घर में घुसे या नहीं। स्कूल जाने वाले बच्चे की चप्पल पानी में डूबेगी या नहीं। और बीमार आदमी को अस्पताल ले जाते समय रास्ता मिलेगा या नहीं। यही विकास का असली भूगोल है।

गांव की पंचायत और चौपाल की भाषा

रायबरेली की गांव की दुनिया को समझना हो तो पंचायत की चौपाल से बेहतर कोई जगह नहीं। बैठक में कोई खड़िया से कागज पर योजना समझा रहा होगा, कोई मोबाइल में फोटो दिखा रहा होगा और पीछे बैठा बुजुर्ग अपनी मूंछों पर हाथ फेरते हुए शायद यही सोच रहा होगा कि “बबुआ, कागज मा सड़क बनि गय होई, हमका त अबहिनौ कीचड़ै पार करै का परत है।”

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यह किसी एक व्यक्ति का वास्तविक कथन नहीं, बल्कि उस गंवई मनःस्थिति की तस्वीर है जिसमें सरकारी कागज और जमीन की हकीकत का अंतर तुरंत पकड़ लिया जाता है।

रायबरेली की ग्रामीण बोली में अवधी का अपना मीठा रंग है और बैसवारा अंचल में उसकी अलग छटा दिखाई देती है। भाषा-अध्ययन के स्रोत रायबरेली को अवधी क्षेत्र में रखते हैं और बैसवाड़ी को रायबरेली-उन्नाव-लखनऊ के कुछ हिस्सों में प्रचलित अवधी रूप के तौर पर उल्लेखित करते हैं।

इसीलिए पंचायत की बातचीत में कभी सुनाई पड़ सकता है— “का प्रधान जी, पहिले पानी निकरवाईं कि फेर विकास के फोटो खिंचवाई?”

और कोई दूसरा मुस्कराकर कह सकता है— “भइया, फोटो मा त सब बढ़िया लागत है, जमीनी हाल पूछब त घुटना भर पानी मिलत है।”

फिर कोई बुजुर्ग अपनी धीमी आवाज में जोड़ देगा— “हमका भाषन नाहीं चाही, काम चाही। बरखा आवै से पहिले नाली साफ होय, इत्ते भर कर द्या।”

यही तो गांव की खूबसूरती है। वह बड़ी-बड़ी योजनाओं को अपने छोटे-छोटे सवालों की कसौटी पर कसता है।

चुनाव की आहट और पंचायत का महत्व

गांव की राजनीति का मौसम भी अलग होता है। चुनाव दूर हो तो चौपाल पर विकास की चर्चा होती है और चुनाव करीब आए तो रिश्तेदारी, बिरादरी, सड़क, नाली, आवास, पेंशन और पुराने वादे सब याद आने लगते हैं।

डीह क्षेत्र से पंचायत चुनाव जल्द कराने की मांग को लेकर संभावित प्रत्याशियों की सक्रियता की खबर भी सामने आई है। यहां एक बात समझने की जरूरत है।

पंचायत चुनाव केवल प्रधान चुनने का अवसर नहीं है। यह गांव को यह तय करने का मौका भी है कि अगले कार्यकाल में उसकी प्राथमिकताएं क्या होंगी। किसी गांव में नाली सबसे बड़ा मुद्दा हो सकता है।

कहीं स्कूल। कहीं सड़क। कहीं पीने का पानी। कहीं स्वास्थ्य केंद्र। कहीं रोजगार। और कहीं सरकारी कागजों में अटके किसी गरीब परिवार का अधिकार। इसलिए पंचायत को केवल चुनावी गणित से देखना गांव के साथ अन्याय है। गांव की पंचायत दरअसल लोकतंत्र की पहली सीढ़ी है।

रायबरेली में बड़े संस्थान हैं, अब बड़ा सवाल भी होना चाहिए

रायबरेली की पहचान आज केवल खेत और गांव तक सीमित नहीं है। ऊंचाहार में एनटीपीसी है। लालगंज में रेल कोच फैक्ट्री है। एम्स रायबरेली स्वास्थ्य सुविधाओं की एक बड़ी संस्थागत पहचान बन चुका है।

जिले की सरकारी वेबसाइट भी इन संस्थानों को रायबरेली की प्रमुख पहचान में शामिल करती है। (Raebareli) तो फिर सवाल उठता है—इन बड़े संस्थानों की मौजूदगी का फायदा जिले के सामान्य परिवार तक कितनी गहराई से पहुंचा? क्या स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए रास्ते खुले?

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क्या छोटे कारोबारियों को नए बाजार मिले? क्या आसपास के गांवों की सड़क, परिवहन और दूसरी सुविधाएं बेहतर हुईं? क्या जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था पर इसका सकारात्मक असर गांव तक पहुंचा? ये सवाल किसी संस्था के खिलाफ नहीं हैं। बल्कि वे विकास की अगली सीढ़ी पूछते हैं।

संस्थान बन जाना विकास की शुरुआत है, उसका लाभ आम आदमी तक पहुंचना विकास की सफलता।

किसान अभी भी रायबरेली की धुरी है

रायबरेली चाहे जितना औद्योगिक हो जाए, गांव की अर्थव्यवस्था में खेत की जगह कोई नहीं ले सकता। किसान के लिए मौसम अभी भी सबसे बड़ा समाचार है। बारिश समय पर हो गई तो चेहरे पर राहत।

ज्यादा हो गई तो चिंता। कम हुई तो चिंता। बाजार भाव गिरा तो चिंता। खाद महंगी हुई तो चिंता। डीजल महंगा हुआ तो चिंता। और फसल तैयार होने के बाद खरीद व्यवस्था में परेशानी हुई तो फिर चिंता। किसान की जिंदगी में “चिंता” शब्द इतना घुल गया है कि वह खुशी को भी सावधानी से मनाता है।

लेकिन रायबरेली का किसान कमजोर नहीं है। वह हर मौसम के साथ नई शुरुआत करना जानता है। उसके खेत में केवल फसल नहीं उगती—वहीं से परिवार की पढ़ाई, बेटी की शादी, घर की मरम्मत और अगली पीढ़ी के सपने भी निकलते हैं।

गांव का नौजवान अब सवाल पूछता है

आज का रायबरेली का ग्रामीण युवा पुराने समय के युवा से अलग है। उसके हाथ में स्मार्टफोन है। वह लखनऊ देखता है। प्रयागराज देखता है। दिल्ली-मुंबई देखता है। दुनिया देखता है। उसे पता है कि दूसरे जिलों और राज्यों में किस तरह के रोजगार हैं।

इसलिए उससे सिर्फ यह कहना कि “गांव में रहो, खेती करो” अब पर्याप्त नहीं। उसे गांव में बेहतर शिक्षा चाहिए। कौशल प्रशिक्षण चाहिए। इंटरनेट चाहिए। छोटे उद्योग चाहिए। बाजार चाहिए।

और ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें वह अपनी जमीन से जुड़े रहते हुए भी आधुनिक अवसरों तक पहुंच सके। अगर यह हुआ तो पलायन मजबूरी नहीं रहेगा, विकल्प बन जाएगा।

इतिहास की धरती को भविष्य की जमीन भी बनना है

रायबरेली की ऐतिहासिक पहचान बहुत मजबूत है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में यहां जनआंदोलनों, गिरफ्तारियों और पुलिस दमन की घटनाओं का इतिहास दर्ज है। जिला प्रशासन की आधिकारिक जानकारी भी इस विरासत को रेखांकित करती है। (Raebareli)

लेकिन इतिहास केवल स्मारकों पर फूल चढ़ाने के लिए नहीं होता। इतिहास यह भी पूछता है कि जिन लोगों ने बेहतर समाज का सपना देखा था, क्या हम उस सपने को आगे ले जा रहे हैं? अगर आज किसी गांव की महिला को पेंशन के लिए बार-बार दौड़ना पड़े तो सवाल है।

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अगर किसी किसान को अपनी फसल की सही कीमत के लिए परेशान होना पड़े तो सवाल है। अगर बारिश में गांव का रास्ता बंद हो जाए तो सवाल है। अगर नौजवान को रोजगार के लिए अपनी मिट्टी छोड़नी पड़े तो सवाल है। और अगर पंचायत में ग्रामीण की आवाज केवल चुनाव के समय सुनी जाए तो भी सवाल है।

रायबरेली की असली तस्वीर कहां मिलेगी?

संपादक जी,

रायबरेली की असली तस्वीर न तो केवल जिला मुख्यालय में मिलेगी और न ही बड़े-बड़े संस्थानों के चमकते भवनों में। वह तस्वीर मिलेगी उस गांव में जहां शाम को चबूतरे पर चार बुजुर्ग बैठकर दिनभर की खबरों का हिसाब लगाते हैं। वह मिलेगी उस महिला में जो स्वयं सहायता समूह की बैठक से लौट रही है।

वह मिलेगी उस किसान में जो मौसम देखकर आसमान नाप रहा है। वह मिलेगी उस बच्चे में जो बारिश के बाद कीचड़ से बचते हुए स्कूल जाने की कोशिश कर रहा है। और वह मिलेगी उस पंचायत की चौपाल में जहां कोई संकोच छोड़कर कह देता है— “साहब, हमका ज्यादा कुछ नाहीं चाही, बस जउन हक है, उ मिल जाए।” यही वाक्य किसी भी जिले की सबसे बड़ी मांग है।

रायबरेली की चिट्ठी को किसी शिकायत-पत्र की तरह खत्म करना ठीक नहीं होगा। क्योंकि यह जिला शिकायत से कहीं बड़ा है। यह शहीदों की धरती है। यह खेतों की धरती है। यह उद्योग की धरती है। यह राजनीति की धरती है। यह अवधी-बैसवाड़ी की मीठी गंवई आवाज वाली धरती है। और सबसे बढ़कर यह उम्मीद की धरती है।

जरूरत केवल इतनी है कि विकास की रफ्तार और गांव की जरूरतों के बीच की दूरी कम हो। बारिश आए तो पानी निकले। किसान बोए तो फसल का भरोसा रहे। बच्चा पढ़े तो आगे बढ़ने का रास्ता मिले। युवा गांव छोड़े तो मजबूरी में नहीं, अपनी पसंद से।

पंचायत चुनाव हो तो जातीय जोड़-तोड़ से आगे गांव के मुद्दे चर्चा में आएं। और प्रधान के दरवाजे पर पहुंचा ग्रामीण यह महसूस करे कि वह किसी पर एहसान मांगने नहीं, अपने अधिकार की बात करने आया है। तभी तो कहा जा सकेगा कि रायबरेली सचमुच बदल रहा है। वरना बड़े भवनों की चमक अपनी जगह है और गांव की कच्ची गली का अंधेरा अपनी जगह।

रायबरेली की असली तरक्की उस दिन होगी, जब दोनों के बीच का फासला मिटेगा।

बस, आज की चिट्ठी यहीं रोकता हूं। अगली बार फिर किसी गांव की पगडंडी पकड़ेंगे, किसी चौपाल पर बैठेंगे, किसी किसान की बात सुनेंगे और देखेंगे कि जिले की बड़ी तस्वीर में उस छोटे से गांव का रंग कितना दिखाई देता है।

आपका,
ठाकुर बख्श सिंह
रायबरेली

यायावर
Author: यायावर

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