रिपोर्ट : ठाकुर के. के. सिंह
MATHURA फरह। बलराम छठ, जिसे ग्रामीण अंचलों में हल षष्ठी, हरछठ, ललही छठ और हलधर षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है, केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं है, बल्कि यह कृषि, पशुपालन और ग्रामीण जीवन से जुड़ी उन परंपराओं की याद भी दिलाता है, जिनमें पशुधन और उसे संभालने वाले लोगों को समाज में विशेष सम्मान दिया जाता था। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए बुधवार को टाउनशिप स्थित बलदाऊ टाउन में पशुपालक श्यामवीर ने 51 ग्वाले और ग्वालिनों को भोज कराया। भोज से पहले सभी ग्वालों और ग्वालिनों का पटुका और साफा पहनाकर सम्मानपूर्वक स्वागत किया गया।
बलराम छठ के अवसर पर आयोजित इस भोज में ग्रामीण संस्कृति की झलक देखने को मिली। पशुपालक श्यामवीर की ओर से आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में ग्वाले-ग्वालिन शामिल हुए। पारंपरिक तरीके से उनका स्वागत किया गया और इसके बाद उन्हें भोजन कराया गया। आयोजन का उद्देश्य केवल भोज कराना नहीं था, बल्कि पशुपालन से जुड़े लोगों के प्रति सम्मान और पुरानी ग्रामीण परंपरा को जीवित रखना भी था।
ग्वालों को भोज कराने की परंपरा आज भी कायम
ग्रामीण समाज में हल षष्ठी के दिन ग्वालों को भोजन कराने की परंपरा काफी पुरानी मानी जाती है। खेती और पशुपालन जब ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हुआ करते थे, उस समय किसानों के जीवन में ग्वालों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी। गांवों में बड़ी संख्या में गाय, भैंस और अन्य पशु पाले जाते थे। पशुओं को चराने और उनकी देखभाल की जिम्मेदारी अक्सर ग्वालों के कंधों पर होती थी।
ग्वाले सुबह पशुओं को लेकर चारागाह की ओर निकलते और दिनभर उनकी देखभाल करने के बाद शाम को उन्हें सुरक्षित वापस घर पहुंचाते थे। अनेक किसान और पशुपालक अपने पशुओं की देखरेख के लिए ग्वालों की सेवाएं लेते थे। ऐसे में ग्वालों का ग्रामीण जीवन और पशुधन व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान था।
समय के साथ गांवों की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में बड़ा बदलाव आया। चारागाह कम होते गए और पशुपालन का स्वरूप भी बदला, लेकिन ग्वालों को सम्मान देने की यह परंपरा कई क्षेत्रों में आज भी जारी है। बलदाऊ टाउन में आयोजित भोज इसी जीवंत परंपरा का उदाहरण बना।
51 ग्वाले-ग्वालिनों का किया सम्मान
पशुपालक श्यामवीर ने बलराम छठ के अवसर पर 51 ग्वाले और ग्वालिनों को भोज के लिए आमंत्रित किया। आयोजन से पहले उनका पारंपरिक ढंग से स्वागत किया गया। सभी को पटुका और साफा पहनाया गया। सम्मान मिलने के बाद ग्वालों और ग्वालिनों ने भी आयोजन को ग्रामीण परंपरा और आपसी सम्मान से जोड़कर देखा।
इस दौरान मौजूद लोगों ने कहा कि आधुनिक समय में जहां गांवों की पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे कमजोर हो रही हैं, वहीं इस तरह के आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम करते हैं। विशेष रूप से पशुपालन से जुड़े परिवारों के लिए यह दिन अपने काम और उससे जुड़े सामाजिक सम्मान को याद करने का अवसर भी बनता है।
कभी पशुधन को माना जाता था परिवार की बड़ी संपत्ति
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुओं का महत्व आज की तुलना में कहीं अधिक व्यापक था। गाय और भैंस केवल दूध देने वाले पशु नहीं माने जाते थे, बल्कि वे किसान परिवार की आर्थिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होते थे। दूध, दही और घी से परिवार की जरूरतें पूरी होती थीं और अतिरिक्त उत्पादन से आय भी प्राप्त होती थी।
कृषि कार्यों में भी पशुओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसी वजह से पशुधन की सुरक्षा और स्वस्थ रहने की कामना ग्रामीण धार्मिक परंपराओं का हिस्सा बनी। बलराम छठ का संबंध भी कृषि और पशुपालन से जोड़कर देखा जाता है। भगवान बलराम को हल के साथ जोड़ा जाता है और उन्हें कृषि तथा पशुपालक जीवन का प्रतीक माना जाता है।
चारागाह कम हुए, लेकिन ग्वालों को जिमाने की परंपरा कायम
बलदाऊ टाउन निवासी और झुडावई एवं हाल क्षेत्र से जुड़े पशुपालक श्यामवीर ने बताया कि वह करीब 15 भैंस पाल रहे हैं। उनसे प्राप्त होने वाले दूध को वह आसपास के लोगों को बेचते हैं। उनके लिए पशुपालन केवल रोजगार का साधन नहीं बल्कि ग्रामीण जीवन की पुरानी परंपरा से जुड़ा काम भी है।
ग्वाला कलुआ ने कहा कि पहले गांवों के आसपास पर्याप्त चारागाह हुआ करते थे, जहां पशुओं को चराने के लिए ले जाया जाता था। अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं और चारागाह काफी कम रह गए हैं। इसके बावजूद ग्वालों को जिमाने और उनका सम्मान करने की परंपरा का जारी रहना अच्छी बात है।
उनके अनुसार, इस तरह के आयोजनों से यह संदेश भी जाता है कि पशुओं की देखभाल करने वाले लोगों की भूमिका आज भी महत्वपूर्ण है। भले ही पशुपालन का स्वरूप बदल गया हो, लेकिन पशुधन की देखभाल में ग्वालों की मेहनत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हल षष्ठी और भगवान बलराम से जुड़ी मान्यता
हल षष्ठी को भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। भगवान बलराम का प्रमुख अस्त्र हल माना जाता है। इसी कारण उनका संबंध खेती-किसानी और कृषि संस्कृति से भी जोड़ा जाता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में इस पर्व को लेकर अलग-अलग स्थानीय मान्यताएं और परंपराएं प्रचलित हैं। कई स्थानों पर महिलाएं संतान की सुख-समृद्धि और परिवार की मंगलकामना के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन खेत में हल से जोती गई फसल के अन्न को लेकर भी विशेष धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।
परंपरागत रूप से हल षष्ठी के व्रत और पूजा में भैंस के दूध, दही और घी के उपयोग की मान्यता बताई जाती है, जबकि गाय के दूध और उससे बने उत्पादों का सेवन न करने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है। स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार इसमें अंतर भी देखने को मिलता है।
पशुपालक और ग्वालों के सम्मान का पर्व
बलराम छठ का एक महत्वपूर्ण सामाजिक पक्ष पशुपालन और उससे जुड़े लोगों का सम्मान भी है। ग्वाले ग्रामीण समाज में पशुधन की देखभाल का महत्वपूर्ण काम करते रहे हैं। ऐसे में उन्हें भोजन कराना और सम्मान देना केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि श्रम के प्रति सम्मान की सामाजिक परंपरा भी माना जा सकता है।
बलदाऊ टाउन में श्यामवीर द्वारा 51 ग्वाले-ग्वालिनों को भोज कराने से इसी भावना को मजबूती मिली। कार्यक्रम में पुरानी ग्रामीण संस्कृति, आपसी मेलजोल और पशुपालक समाज के प्रति सम्मान का भाव दिखाई दिया।
भोज में शामिल रहे ग्वाले-ग्वालिन
आयोजन में शामिल लोगों में जितेंद्र, बबलू, अजय, सुखवीर, कलुआ, बन्नो, चंदन, शिवनारायण, मोहन सिंह, त्रिलोकी यादव, ऋषभ यादव, मोहन श्याम, हरेंद्र, सत्यवीर, केके ठाकुर, जसवंत सिंह, उमाशंकर और योगेश यादव सहित ममता, ललिता, नेहा, निशा, शिवानी, राखी, रेवती देवी, ओमवती, हेमा आदि शामिल रहे।
इस आयोजन ने यह भी दिखाया कि त्योहार केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं हैं। इनके माध्यम से समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच सम्मान, मेलजोल और पारंपरिक रिश्तों को मजबूत करने का अवसर मिलता है। बलराम छठ पर ग्वालों को भोज कराने की परंपरा इसी सामाजिक जुड़ाव का एक उदाहरण है।
ग्रामीण जीवन में बदलती परिस्थितियों के बीच ऐसी परंपराएं स्थानीय संस्कृति को बचाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। बलदाऊ टाउन में 51 ग्वाले-ग्वालिनों को सम्मान के साथ भोज कराना इसी सांस्कृतिक निरंतरता की एक तस्वीर पेश करता है। भगवान बलराम से जुड़ा यह पर्व कृषि, पशुधन, श्रम और ग्रामीण समाज के उस रिश्ते को याद दिलाता है, जिसने लंबे समय तक गांवों की अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन को आधार दिया।

























