हिंदी का उत्सव बहुत, हिंदी का भविष्य कितना मजबूत? राजभाषा से जनभाषा तक की राष्ट्रीय चुनौती

हिंदी दिवस पर हिंदी के भविष्य, राजभाषा की भूमिका, भारतीय भाषाओं से संवाद, शिक्षा, विज्ञान और तकनीक में हिंदी की चुनौतियों पर लेखक अनिल अनूप का फीचर

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लेखक : अनिल अनूप

सितंबर आते ही देश के सरकारी कार्यालयों, विश्वविद्यालयों, संस्थानों और सार्वजनिक उपक्रमों में हिंदी की याद ताजा हो जाती है। कहीं हिंदी सप्ताह शुरू होता है, कहीं हिंदी पखवाड़ा और कहीं पूरे महीने हिंदी के नाम पर कार्यक्रम चलते हैं। सभागार सजते हैं, भाषण होते हैं, कवि सम्मेलन आयोजित किए जाते हैं, निबंध और वाद-विवाद प्रतियोगिताएं होती हैं, पुरस्कार बांटे जाते हैं और हिंदी की महानता पर खूब बातें होती हैं। फिर धीरे-धीरे कार्यक्रम समाप्त हो जाते हैं, बैनर उतर जाते हैं, प्रमाणपत्र फाइलों में चले जाते हैं और हमारी भाषायी व्यवस्था लगभग वहीं लौट आती है जहां हिंदी दिवस से पहले थी। इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि हिंदी दिवस क्यों मनाया जाए। असली सवाल यह है कि हिंदी दिवस मनाने के बाद हिंदी की वास्तविक ताकत कितनी बढ़ती है? क्या हिंदी प्रशासन की सहज भाषा बन रही है? क्या विज्ञान और तकनीक का ज्ञान हिंदी में उपलब्ध हो रहा है? क्या कानून की भाषा आम आदमी की समझ में आ रही है? क्या व्यापार और रोजगार की दुनिया में हिंदी अपनी उपयोगिता बढ़ा रही है? क्या भारतीय भाषाओं से हिंदी का संवाद लगातार मजबूत हो रहा है? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या हम हिंदी को केवल राजभाषा के सरकारी दायरे में देख रहे हैं या उसे आधुनिक भारत की सक्षम जनभाषा और ज्ञानभाषा बनाने की गंभीर कोशिश भी कर रहे हैं? यही वह सवाल है जिसे हिंदी के उत्सव के शोर में अक्सर पीछे छोड़ दिया जाता है।

राजभाषा का दर्जा पर्याप्त नहीं

हिंदी को संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत संघ की राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। राजभाषा के रूप में हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के लिए दशकों से सरकारी नीतियां, आयोग, समितियां और विभाग काम कर रहे हैं। लेकिन किसी भाषा को संवैधानिक या प्रशासनिक दर्जा मिल जाना उसकी यात्रा का अंत नहीं होता, वह तो शुरुआत है। भाषा तब शक्तिशाली बनती है जब नागरिक उसे अपने जीवन के अधिकाधिक क्षेत्रों में उपयोगी पाता है। एक किसान को बैंक का काम समझने में हिंदी काम आए, एक मजदूर अपने अधिकारों की जानकारी हिंदी में हासिल कर सके, एक विद्यार्थी विज्ञान की मूल अवधारणाएं अपनी भाषा में समझ सके, एक उद्यमी सरकारी नियमों को सरल हिंदी में पढ़ सके, एक मरीज चिकित्सा संबंधी जरूरी जानकारी समझ सके और एक नागरिक अदालत तथा प्रशासन की प्रक्रिया को बिना अनावश्यक भाषायी दीवार के समझ सके, तभी भाषा राजभाषा से आगे बढ़कर जनभाषा बनती है।

हिंदी की सबसे बड़ी चुनौती अंग्रेजी नहीं, उसकी सीमित उपयोगिता है

हिंदी के सामने अंग्रेजी की चुनौती की चर्चा बहुत होती है, लेकिन समस्या को केवल हिंदी बनाम अंग्रेजी बना देना वास्तविक स्थिति को समझने से बचना है। अंग्रेजी आज विज्ञान, चिकित्सा, उच्च शिक्षा, तकनीक, कॉरपोरेट जगत, अंतरराष्ट्रीय कारोबार और डिजिटल अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उसे हटाना न संभव है और न आवश्यक। समस्या यह है कि क्या भारत में आधुनिक ज्ञान का प्रवेश केवल अंग्रेजी के रास्ते से ही होगा? अगर उत्तर हां है, तो करोड़ों भारतीयों के सामने ज्ञान की पहली सीढ़ी पर ही भाषायी बाधा खड़ी हो जाती है। इसलिए लक्ष्य अंग्रेजी को हटाना नहीं होना चाहिए। लक्ष्य होना चाहिए—अंग्रेजी का ज्ञान भी हो, हिंदी का सामर्थ्य भी हो और भारतीय भाषाओं की जड़ें भी मजबूत हों। भारत की भाषायी ताकत बहुभाषिकता है, भाषायी एकरूपता नहीं।

हिंदी को भारतीय भाषाओं से डरना नहीं चाहिए

हिंदी की शक्ति तब बढ़ेगी जब वह भारत की दूसरी भाषाओं से संवाद बढ़ाएगी। तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, मराठी, गुजराती, बंगाली, असमिया, ओड़िया, पंजाबी, कश्मीरी, डोगरी, मैथिली, भोजपुरी, अवधी, ब्रज, राजस्थानी, हरियाणवी, छत्तीसगढ़ी और देश की अनगिनत भाषायी-बोलियों में विशाल सांस्कृतिक और साहित्यिक संसार मौजूद है। इन भाषाओं को हिंदी की प्रतिद्वंद्वी मानने की मानसिकता हिंदी को मजबूत नहीं करती। इसके उलट, हिंदी को इनसे सीखना चाहिए, नए शब्द लेने चाहिए, लोक मुहावरों को स्वीकार करना चाहिए, अनुवाद की संस्कृति विकसित करनी चाहिए और साहित्य का आदान-प्रदान बढ़ाना चाहिए। भारतीय भाषाओं के बीच जितना संवाद बढ़ेगा, हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाएं उतनी ही समृद्ध होंगी।

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भाषा कोई बंद कमरा नहीं है

भाषा को शुद्धता के नाम पर इतना नियंत्रित कर देना कि वह सामान्य जीवन से कट जाए, उसके विकास के लिए घातक है। हिंदी का निर्माण स्वयं अनेक भाषाओं और बोलियों के लंबे संपर्क से हुआ है। संस्कृत से शब्द आए, प्राकृत और अपभ्रंश की परंपराओं ने उसे प्रभावित किया, फारसी और अरबी से शब्द आए, तुर्की और दूसरी भाषाओं से शब्द आए और अंग्रेजी से भी हजारों शब्द भारतीय भाषाओं में घुले-मिले हैं। आज हम रोजमर्रा की हिंदी में ऐसे शब्द बोलते हैं जिनकी उत्पत्ति अलग-अलग भाषाओं में हुई है, लेकिन वे हमारे लिए विदेशी नहीं रह गए। यही भाषा का स्वभाव है। भाषा अपने समाज के साथ बदलती है। इसलिए हिंदी को शब्दों की चौकीदारी करने के बजाय अर्थ और अभिव्यक्ति की शक्ति बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए।

उर्दू से संवाद भी हिंदी की ताकत है

हिंदी और उर्दू के बीच राजनीतिक-सांस्कृतिक विवाद अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन जनता की रोजमर्रा की भाषा इन विभाजनों से कहीं अधिक सहज है। बोलचाल में दोनों की शब्द-संपदा लगातार एक-दूसरे में घुलती रही है। अगर कोई शब्द आम भारतीय आसानी से समझता है, तो केवल उसके स्रोत के आधार पर उसे भाषा से बाहर करने का आग्रह हिंदी को समृद्ध नहीं करता। हिंदी को अपने विशाल शब्द-संसार के प्रति उदार होना होगा। भाषा जितने अधिक शब्दों को अपना सकती है, उसकी अभिव्यक्ति की दुनिया उतनी ही बड़ी होती है।

सरकारी हिंदी को सरल होना होगा

राजभाषा के विस्तार की सबसे बड़ी परीक्षा सरकारी दस्तावेज हैं। सरकारी आदेश अगर इतना कठिन हो कि आम आदमी को उसका अर्थ समझने के लिए किसी विशेषज्ञ की जरूरत पड़े, तो वहां भाषा अपनी मूल भूमिका खो देती है। हमें ऐसी हिंदी चाहिए जो गंभीर भी हो और सरल भी, कानूनी अर्थों में सटीक हो लेकिन अनावश्यक रूप से जटिल न हो, प्रशासनिक भाषा में स्पष्टता हो और सरकारी वेबसाइटों पर सरल हिंदी उपलब्ध हो। नागरिक सेवाओं के आवेदन और निर्देश सहज भाषा में हों तथा अदालतों और प्रशासन में इस्तेमाल होने वाली शब्दावली के सरल विकल्प नागरिक तक पहुंचें। हिंदी को कठिन बनाकर प्रतिष्ठित करने की मानसिकता बदलनी होगी, क्योंकि साफ और समझ में आने वाली भाषा ही लोकतंत्र की भाषा बन सकती है।

विज्ञान की भाषा कौन होगी?

हिंदी की सबसे कठिन परीक्षा साहित्य में नहीं, विज्ञान में है। कविता हिंदी में लिखना आसान है क्योंकि हिंदी का साहित्यिक संसार विशाल है, लेकिन क्या हम भौतिक विज्ञान, रसायन, जीवविज्ञान, चिकित्सा, कंप्यूटर विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष विज्ञान और आधुनिक इंजीनियरिंग की शिक्षा हिंदी में प्रभावी ढंग से दे सकते हैं? यही असली प्रश्न है। यदि कोई विद्यार्थी हिंदी माध्यम से पढ़ता है लेकिन उच्च शिक्षा में पहुंचते ही उसे अधिकांश आधुनिक सामग्री अंग्रेजी में मिलती है, तो उसकी भाषायी यात्रा अचानक टूट जाती है। इस टूटन को खत्म करना होगा। इसके लिए केवल अंग्रेजी शब्दों का हिंदी अनुवाद पर्याप्त नहीं है। जरूरत है मूल और उच्च गुणवत्ता वाली हिंदी ज्ञान-सामग्री की। अच्छी पाठ्यपुस्तकें चाहिए, डिजिटल व्याख्यान चाहिए, तकनीकी शब्दकोश चाहिए, विशेषज्ञ लेखन चाहिए, अनुवाद के साथ-साथ मौलिक लेखन चाहिए और सबसे बढ़कर ऐसे शिक्षक चाहिए जो विषय को जानते हों और हिंदी में उसे समझाने की क्षमता भी रखते हों।

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नई शिक्षा नीति ने अवसर दिया है

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने मातृभाषा, स्थानीय भाषा और भारतीय भाषाओं के महत्व को शिक्षा के विमर्श में फिर प्रमुखता दी है। यह अवसर ऐतिहासिक है, लेकिन नीति का उल्लेख कर देने से भाषायी परिवर्तन नहीं होगा। इसके लिए पाठ्यक्रम बदलने होंगे, शिक्षकों को तैयार करना होगा, डिजिटल सामग्री विकसित करनी होगी, विश्वविद्यालयों को भारतीय भाषाओं में शोध के लिए प्रोत्साहित करना होगा और तकनीकी शिक्षा में गुणवत्तापूर्ण भारतीय भाषायी सामग्री तैयार करनी होगी। अगर ऐसा नहीं हुआ तो मातृभाषा की चर्चा भी एक और सरकारी नारा बनकर रह जाएगी।

भारतीय भाषाओं को एक-दूसरे से जोड़ना होगा

भारत में भाषाओं की संख्या बहुत बड़ी है। यह विविधता चुनौती नहीं, हमारी सभ्यता की ताकत है। लेकिन भाषाओं के बीच अनुवाद की व्यवस्था अभी भी उस स्तर की नहीं है जिस स्तर की जरूरत आज के भारत को है। हमें एक ऐसी राष्ट्रीय भाषायी व्यवस्था की जरूरत है जिसमें एक तमिल लेखक की पुस्तक हिंदी पाठक तक पहुंचे, एक हिंदी लेखक का साहित्य बंगाली और मराठी पाठक पढ़ सके, पूर्वोत्तर की लोककथाएं देश के दूसरे हिस्सों में पहुंचें, कश्मीर का साहित्य दक्षिण भारत तक जाए, राजस्थान की लोककथाएं असम के पाठकों तक पहुंचें और भारत की सभी भाषाओं के ज्ञान का परस्पर आदान-प्रदान हो। हिंदी इस पुल की एक महत्वपूर्ण भाषा बन सकती है, लेकिन पुल बनने के लिए पुल को दोनों दिशाओं में यातायात की सुविधा देनी होगी।

बोलियों को भाषा का पिछला कमरा न बनाएं

भारत में अनेक बोलियां ऐसी हैं जिनमें सदियों का लोकज्ञान जमा है। अवधी, ब्रज, भोजपुरी, बुंदेली, हरियाणवी, राजस्थानी भाषायी रूप, कुमाऊंनी, गढ़वाली, छत्तीसगढ़ी और अनेक अन्य बोलियां केवल हिंदी की परिधि नहीं हैं। उनका अपना साहित्य, लोकगीत, कहावतें, स्मृतियां और सांस्कृतिक संसार है। हिंदी को इनसे समृद्ध होना चाहिए और इन भाषायी रूपों को भी सम्मान के साथ अपना साहित्यिक और शैक्षणिक स्थान मिलना चाहिए। बोली को छोटा मानकर भाषा बड़ा नहीं बनती। भाषा का वास्तविक विस्तार उसकी जड़ों को मजबूत करने से होता है।

डिजिटल युग में हिंदी की अगली परीक्षा

अब भाषा की लड़ाई किताब और कागज से निकलकर मोबाइल स्क्रीन पर पहुंच चुकी है। जिस भाषा में इंटरनेट पर गुणवत्तापूर्ण सामग्री होगी, जिसकी आवाज को तकनीक पहचान सकेगी, जिसमें मशीन अनुवाद उपलब्ध होगा, जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता काम कर सकेगी और जिसके लिए पर्याप्त डिजिटल कॉर्पस होगा, उसी भाषा की आने वाली पीढ़ियों में मजबूत उपस्थिति रहेगी। इसलिए हिंदी के सामने अब नई चुनौतियां हैं। हिंदी में उच्च गुणवत्ता वाले डिजिटल डेटाबेस कितने हैं? वैज्ञानिक सामग्री कितनी है? शोध सामग्री कितनी उपलब्ध है? हिंदी में एआई और भाषा-तकनीक के लिए पर्याप्त डेटा है? क्या हिंदी में आवाज से पाठ और पाठ से आवाज की तकनीक बेहतर हो रही है? क्या सरकारी सेवाएं हिंदी में वास्तव में डिजिटल रूप से सहज हैं? इन सवालों पर हिंदी दिवस के मंचों से चर्चा होनी चाहिए।

बजट समारोह पर नहीं, भाषायी आधारभूत ढांचे पर लगे

हिंदी सप्ताह और हिंदी पखवाड़े पर खर्च होना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन भाषा का भविष्य केवल समारोहों से सुरक्षित नहीं होगा। अगर वही धन अच्छे हिंदी तकनीकी शब्दकोश तैयार करने, भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद परियोजनाओं, डिजिटल भाषा-संग्रह बनाने, स्थानीय बोलियों के दस्तावेजीकरण, उच्च शिक्षा की पाठ्य सामग्री तैयार करने, सरकारी भाषा को सरल बनाने, हिंदी में वैज्ञानिक लेखन को बढ़ावा देने और युवाओं के लिए आधुनिक डिजिटल सामग्री तैयार करने में लगाया जाए तो उसका प्रभाव कहीं अधिक स्थायी हो सकता है। हिंदी को सजावट नहीं, बुनियादी ढांचा चाहिए।

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हिंदी का भविष्य साहित्य से आगे है

हिंदी साहित्य की दुनिया समृद्ध है, लेकिन केवल साहित्य से हिंदी की राष्ट्रीय शक्ति तय नहीं होगी। हिंदी को रोजगार की भाषा बनना होगा। हिंदी में तकनीकी प्रशिक्षण होना चाहिए। हिंदी में उद्यमिता की सामग्री होनी चाहिए। हिंदी में कानून की जानकारी होनी चाहिए। हिंदी में स्वास्थ्य संबंधी विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए। हिंदी में वैज्ञानिक संवाद होना चाहिए। हिंदी में डिजिटल कारोबार और सरकारी सेवाएं सहज होनी चाहिए। जब हिंदी इन क्षेत्रों में मजबूती से प्रवेश करेगी, तभी वह करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों से और गहराई से जुड़ेगी।

हमें हिंदी बनाम भारतीय भाषाओं का झगड़ा खत्म करना होगा

भारत में भाषा का सवाल अक्सर राजनीति का सवाल बन जाता है। कहीं हिंदी के विस्तार को दूसरे राज्यों की भाषायी पहचान के लिए खतरा माना जाता है और कहीं भारतीय भाषाओं के संरक्षण को हिंदी के विरोध के रूप में देखा जाता है। दोनों दृष्टियां अधूरी हैं। भारत को ऐसी भाषायी नीति चाहिए जिसमें हिंदी मजबूत हो और तमिल भी मजबूत हो, बंगाली मजबूत हो और मराठी भी, पंजाबी मजबूत हो और असमिया भी, कन्नड़ मजबूत हो और कश्मीरी भी। एक भाषा की मजबूती दूसरी भाषा की कमजोरी पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। भारत की भाषायी समृद्धि का अर्थ ही बहुभाषिक भारत है।

हिंदी दिवस को प्रश्न दिवस बनाइए

इस बार हिंदी दिवस पर केवल हिंदी की महानता के गीत न गाए जाएं। कुछ कठिन सवाल पूछे जाएं। क्या हमारी सरकारी भाषा आम आदमी समझता है? क्या हिंदी में आधुनिक विज्ञान की पर्याप्त सामग्री है? क्या हिंदी रोजगार और तकनीक की भाषा बन रही है? क्या भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद का मजबूत नेटवर्क है? क्या हमारी बोलियां सुरक्षित हैं? क्या डिजिटल दुनिया में हिंदी की तैयारी पर्याप्त है? क्या विश्वविद्यालयों में हिंदी में उच्चस्तरीय शोध संभव है? क्या हिंदी दूसरी भारतीय भाषाओं से पर्याप्त शब्द और विचार ग्रहण कर रही है? और क्या हिंदी को मजबूत करने के नाम पर हम भारतीय भाषाओं की विविधता को कमजोर तो नहीं कर रहे?

अगर हिंदी दिवस इन सवालों को जन्म देता है, तभी वह सार्थक होगा। वरना एक और सप्ताह बीतेगा, एक और पखवाड़ा समाप्त होगा, कुछ भाषण होंगे, कुछ पुरस्कार दिए जाएंगे और फिर हिंदी उसी पुराने सवाल के सामने खड़ी मिलेगी—राजभाषा तो हम हैं, लेकिन क्या हम सचमुच ज्ञान, रोजगार, प्रशासन और जनजीवन की शक्तिशाली भाषा बन पाए हैं?

हिंदी की अगली यात्रा समारोहों से नहीं, सामर्थ्य से तय होगी। हिंदी को बचाने की जरूरत नहीं है, उसे और सक्षम बनाने की जरूरत है। उसे भारतीय भाषाओं से लड़ाने की जरूरत नहीं है, उसे भारतीय भाषाओं से जोड़ने की जरूरत है। उसे अंग्रेजी से युद्ध करने की जरूरत नहीं है, उसे ज्ञान की दुनिया में अंग्रेजी के साथ बराबरी से खड़े होने की क्षमता हासिल करनी है। और उसे केवल राजभाषा के सरकारी कक्ष से बाहर निकालकर उस भारत के बीच ले जाना है जो गांव में बोलता है, शहर में काम करता है, मोबाइल पर पढ़ता है, दुनिया से संवाद करता है और अपनी अगली पीढ़ी को बेहतर भविष्य देना चाहता है।

हिंदी का असली उत्सव उस दिन होगा, जब हिंदी पर भाषण कम और हिंदी में काम अधिक होगा।

यही राजभाषा से जनभाषा और जनभाषा से ज्ञानभाषा बनने की वास्तविक यात्रा होगी।

यायावर
Author: यायावर

यायावर

One Response

  1. हिन्दी सम्पूर्ण विश्व की एक सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक भाषा है जिसमे हर शब्द का अपना एक अलग उच्चारण है

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