चिल्लर गैंग फिल्म समीक्षा: जब न्याय नहीं मिला तो बच्चों ने उठा लिया कानून हाथ में

चिल्लर गैंग फिल्म समीक्षा का फीचर पोस्टर, फिल्म के कलाकारों और प्रमुख दृश्यों के साथ

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‘चिल्लर गैंग’ एक हिंदी फिल्म है, जिसका निर्देशन तरुण मोहम्मद ने किया है। फिल्म में निखिल राज, कोमल पाराशर, युवराज भड़ाना और सागर चंदीला मुख्य किरदारों में नजर आते हैं। फिल्म की कहानी मुंबई की झोपड़पट्टी में रहने वाले सात नाबालिग बच्चों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपराध और असमानता को रोज अपनी आंखों के सामने देखते हैं। लेकिन एक दर्दनाक घटना उनके बचपन को हमेशा के लिए बदल देती है और उन्हें ऐसी राह पर ले जाती है, जहां न्याय और बदले के बीच की सीमा धुंधली पड़ जाती है।

फिल्म की खासियत यह है कि यह बच्चों को केवल अपराधी के रूप में नहीं देखती, बल्कि उनके भीतर पैदा हुए आक्रोश के पीछे मौजूद सामाजिक और व्यवस्था संबंधी कारणों को भी सामने लाती है।

सात बच्चों की दुनिया और अपराध का स्याह चेहरा

मुंबई की झोपड़पट्टी में रहने वाले ये सात बच्चे उम्र में भले छोटे हैं, लेकिन उनकी दुनिया मासूम बचपन की दुनिया नहीं है। उनके आसपास अपराध, मारपीट, दबंगई और नशे जैसी तमाम समस्याएं मौजूद हैं। वे अपराध को किताबों में नहीं, बल्कि अपनी आंखों के सामने घटते हुए देखते हैं।

इसी माहौल में उनकी जिंदगी में राखी ताई आती है, जिसे वे अपनी बहन की तरह मानते हैं। वह इन बच्चों के लिए परिवार का हिस्सा है। उसके साथ उनका रिश्ता कहानी को भावनात्मक आधार देता है।

लेकिन एक दिन कुछ हाई-प्रोफाइल गुंडे राखी ताई को जबरन उठा ले जाते हैं। उसके साथ बलात्कार किया जाता है और बाद में उसे सड़क पर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। बच्चे उसे बेहोश अवस्था में देखते हैं और अपनी सीमित समझ के बावजूद उसे अस्पताल पहुंचाने की कोशिश करते हैं। यहीं से फिल्म व्यवस्था के उस चेहरे को सामने लाती है, जो कहानी को केवल अपराध-कथा नहीं रहने देता।

अस्पताल से पुलिस तक—हर दरवाजे पर निराशा

अस्पताल में डॉक्टर घायल लड़की का इलाज शुरू करने के बजाय इसे पुलिस केस बताकर पहले एफआईआर की कॉपी लाने को कहता है। बच्चे पुलिस के पास जाते हैं, लेकिन वहां भी उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया जाता और एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया जाता है। इस बीच राखी ताई की हालत बिगड़ती जाती है और अंततः उसकी मृत्यु हो जाती है।

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फिल्म का यह हिस्सा बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहीं बच्चों के भीतर वह सवाल पैदा होता है जिसे शायद समाज ने कभी गंभीरता से सुना ही नहीं—अगर पुलिस हमारी मदद नहीं करेगी तो हम किसके पास जाएं?

राखी ताई की मौत इन बच्चों के भीतर गहरा आक्रोश पैदा करती है। वे प्रण लेते हैं कि उसके हत्यारों को सजा देकर रहेंगे। लेकिन यहीं न्याय की तलाश धीरे-धीरे बदले में बदल जाती है।

‘चिल्लर गैंग’ का जन्म

सातों बच्चे मिलकर एक गैंग बनाते हैं और उसका नाम रखते हैं—‘चिल्लर गैंग’। यह नाम अपने आप में व्यंग्य है। समाज जिन्हें छोटा, कमजोर और महत्वहीन समझता है, वही बच्चे व्यवस्था को चुनौती देने निकल पड़ते हैं।

वे एक-एक करके उन गुंडों को निशाना बनाते हैं जिन्हें वे राखी ताई की मौत का जिम्मेदार मानते हैं। फिल्म इस क्रम में रोमांच पैदा करती है, लेकिन साथ ही दर्शक को लगातार असहज भी करती रहती है।

क्योंकि सवाल यह नहीं रह जाता कि बच्चे अपराधियों को कैसे मार रहे हैं। सवाल यह हो जाता है कि वे इस रास्ते तक पहुंचे क्यों?

तरुण मोहम्मद का निर्देशन

तरुण मोहम्मद का निर्देशन फिल्म को केवल बदले और हिंसा की कहानी बनने से रोकता है। कहानी का सामाजिक पक्ष निर्देशक के लिए महत्वपूर्ण दिखाई देता है। झोपड़पट्टी का वातावरण, बच्चों की मानसिक स्थिति और व्यवस्था के प्रति उनके टूटते भरोसे को कहानी के केंद्र में रखा गया है।

निर्देशन की सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि बच्चों के प्रतिशोध को न तो पूरी तरह महिमामंडित किया जाए और न ही उनकी परिस्थितियों को नजरअंदाज किया जाए। फिल्म इसी द्वंद्व को बनाए रखने की कोशिश करती है। दर्शक बच्चों के गुस्से को समझ सकता है, लेकिन उनके तरीके को सही नहीं ठहरा सकता। यही फिल्म का नैतिक संघर्ष है।

कलाकारों की भूमिका

फिल्म में निखिल राज, कोमल पाराशर, युवराज भड़ाना और सागर चंदीला मुख्य किरदारों में हैं। इन कलाकारों के माध्यम से फिल्म बच्चों और उनके आसपास की दुनिया को कहानी का भावनात्मक आधार देती है।

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खास तौर पर बच्चों के किरदारों में मासूमियत और परिस्थितियों से पैदा हुई कठोरता का विरोधाभास कहानी को प्रभावशाली बनाता है। वे जन्म से अपराधी नहीं हैं। वे उस माहौल और उस व्यवस्था के परिणाम हैं, जिसमें उन्हें बचपन से ही अपराध के बीच जीना पड़ा। कलाकारों की सफलता इसी बात में है कि दर्शक उनके किरदारों के गुस्से के पीछे छिपे दर्द को महसूस कर सके।

क्या कानून हाथ में लेना न्याय है?

फिल्म का सबसे बड़ा सवाल यही है। राखी ताई के साथ जो हुआ वह अन्याय है। पुलिस का एफआईआर दर्ज न करना व्यवस्था की गंभीर विफलता है। अस्पताल का पहले कागज मांगना संवेदनशीलता पर सवाल खड़ा करता है। लेकिन क्या इन सबका जवाब अपराधियों की हत्या है? फिल्म का उत्तर साफ है—नहीं।

जब पुलिस चिल्लर गैंग को गिरफ्तार करती है और बच्चों को बाल सुधार गृह भेजा जाता है, तब उन्हें समझाया जाता है कि कानून को अपने हाथ में लेना गलत है। अदालत भी उन्हें नसीहत देकर रिहा करती है।

यहां फिल्म अपना संतुलन स्थापित करती है। वह बच्चों की पीड़ा को समझती है, लेकिन हिंसा को न्याय का विकल्प नहीं मानती।

पुलिस के लिए भी आईना

‘चिल्लर गैंग’ का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि फिल्म केवल बच्चों को उपदेश देकर खत्म नहीं होती। वह पुलिस व्यवस्था को भी कठघरे में खड़ा करती है।

बच्चों को कानून का सम्मान करने की सीख देना जरूरी है, लेकिन पुलिस और प्रशासन को भी कानून के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।

यदि पीड़ित की शिकायत दर्ज नहीं होगी, यदि प्रभावशाली अपराधियों के सामने पुलिस कमजोर दिखाई देगी और यदि अस्पताल में घायल व्यक्ति को तत्काल इलाज के बजाय कागजी प्रक्रिया में उलझाया जाएगा, तो आम आदमी का कानून पर विश्वास कैसे कायम रहेगा? यही वह सवाल है जिसे फिल्म दर्शक के सामने छोड़ती है।

बचपन से बदले तक का सफर

फिल्म का सबसे मार्मिक पक्ष बच्चों का बदलता मन है।

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जिस उम्र में उन्हें स्कूल जाना चाहिए, खेलना चाहिए और भविष्य के सपने देखने चाहिए, उस उम्र में वे अपराध और हिंसा के बीच पहुंच जाते हैं। राखी ताई की मौत उनके भीतर न्याय की इच्छा पैदा करती है, लेकिन व्यवस्था से निराशा उसी इच्छा को बदले में बदल देती है।

इस लिहाज से ‘चिल्लर गैंग’ केवल अपराधियों और बच्चों की कहानी नहीं है। यह बचपन के छिन जाने की कहानी भी है।

अंतिम फैसला

‘चिल्लर गैंग’ अपनी कहानी के जरिए समाज और व्यवस्था दोनों से सवाल करती है। फिल्म बताती है कि अपराध से लड़ने के लिए कानून जरूरी है, लेकिन कानून पर लोगों का भरोसा उससे भी ज्यादा जरूरी है।

सात बच्चों का गैंग बनना रोमांच पैदा कर सकता है, लेकिन उसके पीछे छिपी त्रासदी दर्शक को सोचने पर मजबूर करती है।

फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि व्यवस्था की विफलता कानून हाथ में लेने का अधिकार नहीं देती, लेकिन व्यवस्था की ईमानदारी भी उतनी ही जरूरी है।

अगर पुलिस समय पर एफआईआर दर्ज करती, अगर पीड़िता को तत्काल इलाज मिलता और अगर अपराधियों के खिलाफ कानून अपना काम करता, तो शायद उन सात बच्चों को ‘चिल्लर गैंग’ बनने की जरूरत ही नहीं पड़ती।

यही सवाल फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शक के भीतर रह जाता है।

कुल मिलाकर, तरुण मोहम्मद निर्देशित ‘चिल्लर गैंग’ एक ऐसी हिंदी फिल्म है जो बच्चों की कहानी के माध्यम से अपराध, न्याय, पुलिस व्यवस्था और सामाजिक असमानता पर गंभीर सवाल उठाती है। निखिल राज, कोमल पाराशर, युवराज भड़ाना और सागर चंदीला जैसे कलाकारों की मौजूदगी कहानी को उसके मानवीय पक्ष से जोड़ती है।

यह फिल्म केवल यह नहीं पूछती कि बच्चों ने कानून अपने हाथ में क्यों लिया, बल्कि इससे बड़ा सवाल पूछती है—क्या हमारी व्यवस्था ने उन्हें कानून पर भरोसा करने का मौका दिया था?

और शायद यही सवाल ‘चिल्लर गैंग’ को महज एक बदले की कहानी से आगे ले जाकर एक सामाजिक सरोकार वाली फिल्म बना देता है।

समीक्षक — अनिल अनूप, प्रधान संपादक, जनगणदूत

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