जिले की चिट्ठी ; सरयू बहती रही… सवाल ठहरे रहे, खेत हरे हैं… मगर आँखें अब भी नम हैं
चौपाल से सरयू घाट तक... देवरिया की अनकही दास्तान
— इरफान अली लारी
आदरणीय संपादक साहब,
आदाब!
आज यह चिट्ठी मैं उस ज़मीन से लिख रहा हूँ, जहाँ सूरज की पहली किरण खेतों पर नहीं, बल्कि मेहनतकश लोगों के माथे पर पड़ती है। यह देवरिया है—पूर्वांचल का वह जिला, जहाँ सरयू की लहरें इतिहास सुनाती हैं, छोटी गंडक चुपचाप बहती रहती है और हर सुबह खेतों की मेड़ों पर उम्मीदें अंकुरित होती हैं।
लोग कहते हैं कि देवरिया एक शांत जिला है। लेकिन यह शांति बाहर से दिखाई देती है। भीतर उतरिए तो हर चौपाल, हर चौराहा, हर खेत और हर घर अपने-अपने सवाल लिए खड़ा दिखाई देता है। यहाँ विकास की बातें भी होती हैं, पलायन का दर्द भी सुनाई देता है, राजनीति की गर्मी भी महसूस होती है और किसान की बेबसी भी साफ दिखाई देती है।
पिछले कई दिनों से मैं देवरिया शहर, बरहज, रुद्रपुर, सलेमपुर, भाटपाररानी, लार, बनकटा, देसही देवरिया और गौरीबाजार के बीच घूम रहा हूँ। कहीं सड़क किनारे गन्ने से लदी ट्रॉली दिखाई देती है, कहीं धान की रोपाई चल रही है, तो कहीं चाय की दुकान पर देश-दुनिया की राजनीति का फैसला चंद कुल्हड़ों के बीच हो रहा है। आज की शुरुआत मैंने बरहज की ओर से की।
सुबह के पाँच बज रहे थे। सरयू की ओर से आती हवा में हल्की नमी घुली हुई थी। मस्जिद से फ़ज्र की अज़ान की आवाज़ उठ रही थी। थोड़ी ही दूरी पर मंदिर की घंटियाँ बजने लगी थीं। खेतों की ओर जाते किसानों के कंधों पर फावड़े थे और हाथों में उम्मीद।
बरहज से आगे बढ़ते ही धान की नर्सरियाँ दूर-दूर तक हरी चादर की तरह फैली दिखाई दीं। कुछ महिलाएँ पानी में खड़ी होकर पौध बाँध रही थीं। कहीं ट्रैक्टर चल रहा था तो कहीं अब भी बैलों से खेत जोते जा रहे थे। देवरिया की यही खूबसूरती है—यहाँ पुराना और नया समय एक ही खेत में साथ-साथ काम करता दिखाई देता है।
एक खेत की मेड़ पर एक बुज़ुर्ग किसान खड़ा था। सिर पर पुराना गमछा, पैरों में कीचड़ और चेहरे पर धूप की कई ऋतुएँ। मैंने मुस्कराकर पूछा— “का हो काका, ए साल खेती-किसानी कइसन लागत बा?”
उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ मेरी ओर देखा। फिर आसमान की तरफ़ नज़र उठाई और बोले— “का बताईं बाबू… अब त खेती भगवान भरोसे ना, हिम्मत भरोसे चलत बा। खाद लेबे जइब त दाम सुनके पसीना छूट जाला। डीजल भरवावत जान निकल जाला। बरखा कब आई, कब मुंह मोड़ ली—एकर कवनो ठिकाना नइखे। किसान त बस आसरा पर जिनिगी काटत बा।”
इतना कहकर उन्होंने फिर धान की पौध सीधी करनी शुरू कर दी। उनकी पीठ खेत की ओर झुकी थी, लेकिन आत्मसम्मान आज भी सीधा खड़ा था।
संपादक साहब, देवरिया का किसान शिकायत कम करता है, मेहनत ज़्यादा करता है। मौसम चाहे जैसा हो, वह हर साल नए विश्वास के साथ खेत में उतरता है। शायद इसलिए इस मिट्टी की खुशबू आज भी उम्मीद जैसी लगती है। आगे बढ़ा तो कुछ नौजवान पीपल के पेड़ के नीचे बैठे मोबाइल फोन में नौकरी से जुड़ी वेबसाइटें देख रहे थे। मैंने पूछा— “का भइया, तैयारी कहाँ तक पहुँची?”
एक युवक मुस्कुराया— “तैयारी त सब चीज़ के चल रहल बा साहब। रेलवे, पुलिस, फौज, बैंक… जे पहिले मिल जाव, उहे भगवान के प्रसाद बा।” दूसरे ने हँसते हुए बात पूरी की—
“नौकरी ना मिली त पंजाब, गुजरात चाहे सूरत निकल जइब। गाँव में रहके खाली सपना देखला से पेट ना भराला।” उनकी हँसी में भी एक अजीब-सी थकान थी।
संपादक साहब, देवरिया के लगभग हर गाँव की कोई न कोई कहानी पलायन से जुड़ जाती है। किसी का बेटा मुंबई में है, किसी का दिल्ली में, कोई पंजाब के खेतों में मेहनत कर रहा है तो कोई खाड़ी देशों में। गाँव की चौपालों पर अब सबसे ज़्यादा चर्चा खेती की नहीं, बाहर कमाने गए बेटों की होती है।
रुद्रपुर के पास एक चौपाल पर कुछ बुज़ुर्ग बैठे मिले। बातों-बातों में एक बुज़ुर्ग ने गहरी साँस लेकर कहा— “अब गाँव में बूढ़, मेहरारू आ लइका बचल बा। जवान त सब रोजी-रोटी खातिर परदेस चल गइलें।”
यह सुनकर कुछ पल के लिए वहाँ सन्नाटा छा गया। मैं आगे बढ़ गया, लेकिन उनके शब्द मेरे साथ चलते रहे। शहर की ओर लौटते समय सड़क किनारे एक पुरानी चाय की दुकान पर रुक गया। उबलती हुई केतली, मिट्टी के कुल्हड़ और राजनीतिक बहस—पूर्वांचल की पहचान जैसे एक ही फ्रेम में दिखाई दे रही थी।
इतने में एक ग्राहक ने मुस्कुराते हुए सामने बैठे व्यक्ति से कहा— “का हो पत्रकार साहेब, फेर नेता लोग गाँव-गाँव घूमे लागल बा। लागत बा चुनाव नज़दीक आ गइल।” सामने बैठे पत्रकार साहब ने कुल्हड़ मेज़ पर रखते हुए मुस्कुराकर जवाब दिया— “नेता लोग के गाड़ी चुनाव से पहिले धूल उड़ावत गाँव पहुँच जाला। चुनाव बीतते-बीतते ऊ धूल फेर सड़क पर रह जाला, नेता शहर लौट जालन।”
दुकान पर बैठे लोग ज़ोर से हँस पड़े। लेकिन उस हँसी में बरसों का अनुभव और अधूरी उम्मीदें साफ़ सुनाई दे रही थीं।
संपादक साहब, देवरिया की राजनीति केवल भाषणों से नहीं चलती। यहाँ रिश्ते भी वोट तय करते हैं, भरोसा भी और स्थानीय मुद्दे भी। लोग नेताओं की बातें सुनते ज़रूर हैं, मगर अब पहले से ज़्यादा सवाल भी पूछने लगे हैं।
शहर के मुख्य बाज़ार में पहुँचा तो हमेशा की तरह चहल-पहल थी। सब्ज़ी मंडी में मोलभाव चल रहा था। ई-रिक्शे और मोटरसाइकिलें एक-दूसरे से रास्ता माँग रही थीं। दुकानदार ग्राहकों को बुला रहे थे।
एक कपड़ा व्यापारी ने मुस्कुराकर कहा— “भीड़ देखकर यह मत समझिए कि कारोबार बहुत अच्छा है। लोग पहले जेब टटोलते हैं, फिर सामान खरीदने का फैसला करते हैं। महँगाई ने सबसे पहले लोगों की मुस्कान छोटी कर दी है।”
उनकी बात सुनकर लगा कि बाज़ार की चमक के पीछे भी कई चिंताएँ छिपी हुई हैं। शाम होते-होते मैं फिर बरहज के सरयू घाट पहुँच गया। सूरज धीरे-धीरे नदी के पानी में उतर रहा था। घाट की सीढ़ियों पर बैठे बच्चे पानी में कंकड़ उछाल रहे थे। कुछ नावें किनारे बँधी थीं। आरती की तैयारी शुरू हो चुकी थी। नदी के ऊपर उड़ते पक्षी जैसे दिनभर की थकान अपने साथ ले जा रहे थे।
मैंने सरयू की बहती धारा को देर तक देखा। सोचा—नदियाँ कभी शिकायत नहीं करतीं। वे बस बहती रहती हैं। रास्ते बदलते हैं, किनारे बदलते हैं, लोग बदलते हैं, लेकिन नदी अपनी स्मृतियाँ सँजोए रहती है।
शायद देवरिया भी कुछ ऐसा ही है। संघर्ष है, लेकिन टूटन नहीं। तकलीफ़ है, लेकिन उम्मीद भी है। यात्रा अभी जारी है… अभी लार का बाज़ार बाकी है… भाटपाररानी की सुबह बाकी है… देसही देवरिया की गलियाँ बाकी हैं… छोटी गंडक के किनारे की सच्चाइयाँ बाकी हैं… जिला अस्पताल की हकीकत बाकी है… स्कूलों में भविष्य तलाशती आँखें बाकी हैं… और उन लोगों की कहानियाँ भी बाकी हैं, जो किसी अख़बार की सुर्खियाँ नहीं बनते, लेकिन देवरिया की पहचान उन्हीं से बनती है।
कल शाम सरयू घाट से लौटते समय मन में एक सवाल लगातार उठ रहा था—क्या देवरिया की पहचान केवल पलायन, खेती और राजनीति तक ही सीमित है? रात भर यही प्रश्न मन में घूमता रहा। आज सुबह फिर निकल पड़ा। इस बार रास्ता लार, भाटपाररानी, गौरीबाजार और छोटी गंडक की ओर था।
साहब, किसी भी जिले को समझना हो तो उसके सरकारी दफ्तरों से पहले उसके बाज़ारों में जाइए। वहाँ लोगों के चेहरों पर जिले की असली अर्थव्यवस्था लिखी मिलती है।
लार के बाज़ार में सुबह-सुबह दुकानों के शटर खुल रहे थे। दूध वाले अपनी कैनों के साथ भाग रहे थे। सब्ज़ी वाले आवाज़ लगाते हुए ग्राहकों को बुला रहे थे। चाय की भट्ठी पर केतली उबल रही थी। एक रिक्शा चालक सवारी का इंतज़ार कर रहा था।
मैंने पूछा— “का हो भइया, काम-धंधा कइसन चलत बा?”
वह मुस्कुराया, फिर बोला— “काम त चलत बा साहेब, बाकिर महँगाई हमसे तेज भागत बा। साँझ तक जेतना कमाई होखेला, आधा त घर पहुँचे से पहिले उड़ जाला।” उसकी बात सुनकर लगा कि वह केवल अपना दुख नहीं, लाखों मेहनतकश लोगों की कहानी सुना रहा है।
थोड़ी दूर एक सरकारी विद्यालय दिखाई दिया। प्रार्थना सभा चल रही थी। बच्चे पूरे उत्साह से राष्ट्रगान गा रहे थे। विद्यालय के बाहर एक अभिभावक मिला। मैंने पूछा— “बच्चन के पढ़ाई से संतोष बा?”
वह बोला— “मास्टर लोग मेहनत त करत बा, लेकिन आज के जमाना में खाली स्कूल से काम ना चली। प्रतियोगिता बहुत बढ़ गइल बा। गरीब आदमी अपना लइका के सपना पूरा करे खातिर खेतो बेच देत बा।” उसकी आँखों में चिंता भी थी और विश्वास भी।
संपादक साहब, देवरिया का हर गरीब आदमी चाहता है कि उसका बेटा या बेटी उससे बेहतर जिंदगी जिए। यही सपना इस जिले की सबसे बड़ी ताकत भी है। गौरीबाजार की तरफ़ बढ़ते हुए छोटी गंडक का किनारा दिखाई दिया।
बरसात में यही नदी कई बार गाँवों की धड़कन बढ़ा देती है। नदी जीवन भी देती है और कभी-कभी परीक्षा भी लेती है। किनारे बैठे एक बुज़ुर्ग नाविक से बात हुई।
मैंने पूछा— “काका, नदी अबहियों पहिले जइसन बा?”
उन्होंने नदी की ओर देखते हुए कहा— “नदिया त आजुओ उहे बा बाबू, बदले त हमनी के चाल-चलन बा। पहिले नदी के माई मानल जाला, अब लोग नाला समझे लागल बा।”
उनकी यह बात मेरे मन में उतर गई। सचमुच, नदियाँ केवल पानी की धारा नहीं होतीं। वे किसी जिले की सभ्यता होती हैं। संपादक साहब, देवरिया के अस्पतालों में भी गया।
मरीजों की लंबी कतारें थीं। कोई बुज़ुर्ग दवा की पर्ची लिए बैठा था, कोई अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा था। डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी अपनी क्षमता के अनुसार काम करते दिखाई दिए, लेकिन भीड़ देखकर साफ़ महसूस हुआ कि बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की ज़रूरत आज भी बड़ी है। जिला मुख्यालय से दूर रहने वाले लोगों की परेशानी और बढ़ जाती है। इलाज के लिए उन्हें कई बार लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
यहाँ यह कहना भी उचित होगा कि पिछले वर्षों में कई क्षेत्रों में सुधार के प्रयास हुए हैं। सड़कें बेहतर हुई हैं, कई सरकारी भवन बने हैं, योजनाएँ पहुँची हैं। लेकिन लोगों की अपेक्षाएँ भी उसी गति से बढ़ी हैं। इसलिए विकास की यात्रा अभी अधूरी लगती है।
दोपहर बाद मैं भाटपाररानी की ओर निकल गया। एक खेत के किनारे कुछ महिलाएँ धान की रोपाई कर रही थीं। काम करते-करते वे आपस में हँस भी रही थीं। मैंने पूछा— “बहिनी, एतना मेहनत में थकान ना लागेला?”
एक महिला ने हँसते हुए जवाब दिया— “थकान त लागेला बाबू, बाकिर घर के चूल्हा हँसी से ना, मेहनत से जराला।” उसके इस एक वाक्य ने पूरा जीवन-दर्शन समझा दिया।
संपादक साहब, देवरिया की महिलाएँ इस जिले की अनकही शक्ति हैं। खेत हो, घर हो, बच्चों की पढ़ाई हो या परिवार की जिम्मेदारी—वे हर मोर्चे पर बराबरी से खड़ी दिखाई देती हैं। लेकिन उनके संघर्षों की चर्चा अक्सर सबसे कम होती है।
शाम ढलने लगी थी। वापसी के रास्ते में फिर एक चाय की दुकान पर रुक गया। कुछ लोग अख़बार पढ़ रहे थे।
एक युवक अख़बार मोड़ते हुए बोला— “का हो पत्रकार साहेब, अखबार में त रोज बड़े-बड़े खबर छपेला, हमनी गाँव के दिक्कत कब छपाई?”
मैं मुस्कुराया।
कहा— “जब गाँव बोलेगा, तभी अख़बार भी पूरी ताकत से बोलेगा।”
पास बैठे एक बुज़ुर्ग ने तुरंत बात आगे बढ़ाई— “त लिखीं बाबू… ईहो लिखीं कि देवरिया के लोग भीख ना माँगत, मौका माँगत बा। मेहनत करे वाला हाथ खाली काम चाहत बा।”
उनकी आवाज़ में शिकायत कम थी, आत्मसम्मान अधिक। यही देवरिया है साहब। यहाँ लोग मुफ़्त की ज़िंदगी नहीं चाहते। वे अवसर चाहते हैं। सम्मान चाहते हैं। अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य चाहते हैं।
देवरिया का नौजवान आज भी सपने देखता है। किसान आज भी बीज डालता है। दुकानदार आज भी सुबह दुकान समय पर खोलता है। रिक्शा चालक आज भी उम्मीद लेकर घर से निकलता है। शिक्षक आज भी बच्चों को भविष्य का रास्ता दिखाने की कोशिश करता है। और माँ… वह आज भी अपने बेटे के परदेस से लौटने की राह देखती है।
शाम गहरा चुकी है। सरयू के किनारे फिर आकर बैठा हूँ। डूबते सूरज की लालिमा पानी पर बिखर रही है। दूर कहीं आरती की घंटियाँ बज रही हैं। उसी हवा में मस्जिद से मग़रिब की अज़ान भी घुल रही है। यही देवरिया की पहचान है—विविधता, मेहनत और उम्मीद।
इस जिले की सबसे बड़ी पूँजी इसकी मिट्टी नहीं… इसके लोग हैं। वे लोग, जो कठिनाइयों के बीच भी मुस्कुराना जानते हैं। जो बाढ़ के बाद फिर खेत सँवार लेते हैं। जो पलायन के बाद भी अपने गाँव लौटने का सपना नहीं छोड़ते। जो हर चुनाव के बाद फिर अगले बेहतर कल की उम्मीद बाँध लेते हैं।
संपादक साहब, यह चिट्ठी समाप्त कर रहा हूँ, लेकिन देवरिया की कहानी अभी समाप्त नहीं हुई। हर गाँव में एक नई कहानी है। हर चौपाल पर एक नया सवाल है। हर खेत में एक नई उम्मीद बोई जा रही है।
अगले सोमवार प्रातःकाल मैं किसी और जिले की मिट्टी से आपको एक और चिट्ठी लिखूँगा। तब तक…
सरयू की ठंडी हवा, छोटी गंडक की नमी और देवरिया के लोगों का सलाम स्वीकार कीजिए।

आपका सहयोगी
इरफान अली लारी
देवरिया, उत्तर प्रदेश










“राम-राम संपादक जी।”
हम त गाँव-देहात के साधारण किसान हईं। पढ़ाई-लिखाई जादे नइखे भइल, बाकिर खेत-खलिहान, मौसम अउर गाँव-घर के सुख-दुख समझे के अकिल भगवान देले बाड़ें। आज ‘जिले की चिट्ठी’ पढ़नी त लागल कि ई कागज पर लिखल चिट्ठी ना, हमार देवरिया के मन के बात बा।
रउआ लोग खबर ना, गाँव के धड़कन छापत बानी। किसान के पीरा, जवानन के परदेस जाए के मजबूरी, सरयू माई के ममता अउर चाय के दुकान पर होखे वाली बतकही—सब कुछ अइसन लागल जइसे हम अपने आँखिन से देखत होखी।
सबसे पहिले त जन गण दूत के पूरा संपादकीय परिवार के साधुवाद। आजकल बहुत अखबार सनसनी खोजेला, बाकिर रउआ लोग समाज के असली चेहरा देखावे के काम करत बानी। ई काम आसान नइखे। एह खातिर हिम्मत, ईमानदारी अउर गाँव-गरीब के दर्द समझे वाला मन चाहीं।
इरफान अली लारी बेटा के भी ढेर सारा आशीर्वाद। ऊ देवरिया के माटी के गंध के जइसन शब्द में उतार दिहलें, उ पढ़के मन भर आइल। अइसन लागल कि हमरे गाँव के मेड़ पर बइठल कोई अपना मन के बात कहत होखे। भगवान उनकर कलम में अइसने सच्चाई, संवेदना अउर ताकत बनवले राखसु।
हमार बस एगो विनती बा—एह चिट्ठी में जइसे गाँव के बात उठावल गइल बा, ओइसहीं आगे चलके हर गाँव, हर गरीब, हर किसान अउर हर मेहनतकश के आवाज बनल रही। तब ई स्तंभ खाली पढ़ल ना जाई, लोग एकर इंतजार करी।
रउआ सभे के बहुत-बहुत बधाई। भगवान रउआ लोगन के कलम के अउरी धार देसु।
संपादक साहब, सलाम।
आज की पत्रकारिता में अक्सर खबरें पढ़ने को मिलती हैं, लेकिन ‘सरयू किनारे… देवरिया की चिट्ठी’ पढ़कर लगा कि पहली बार किसी ने देवरिया को सिर्फ देखा नहीं, बल्कि महसूस भी किया है। यह लेख पढ़ते हुए कई बार लगा कि लेखक हमारे ही साथ स्टेशन रोड से बरहज तक सफर कर रहा है और रास्ते में हर आदमी का दर्द सुनता जा रहा है।
इरफान अली लारी ने न किसी की बेवजह तारीफ की, न किसी पर बिना वजह उंगली उठाई। उन्होंने वही लिखा, जो आम आदमी रोज देखता और महसूस करता है। यही निष्पक्षता इस चिट्ठी की सबसे बड़ी ताकत है।
जन गण दूत की संपादकीय टीम भी बधाई की हकदार है कि उसने केवल खबरें परोसने के बजाय एक ऐसा स्तंभ शुरू किया, जो जिले की आत्मा से पाठकों का परिचय कराता है। आज जब अधिकांश मीडिया टीआरपी और सनसनी की दौड़ में है, तब ‘जिले की चिट्ठी’ जैसी पहल भरोसा जगाती है कि जमीनी पत्रकारिता अभी जीवित है।
मेरी एक छोटी-सी गुजारिश है कि आने वाले अंकों में देवरिया के छोटे व्यापारियों, कारीगरों, रिक्शा चालकों, बुनकरों, महिलाओं और उन नौजवानों की आवाज़ को भी प्रमुखता मिले, जो रोज संघर्ष करते हैं लेकिन कभी सुर्खियों में नहीं आते। तभी यह चिट्ठी सचमुच पूरे जिले की चिट्ठी कहलाएगी।
इरफान अली लारी साहब, आपकी कलम इसी बेबाकी और ईमानदारी के साथ चलती रहे। देवरिया को आपकी जैसी जमीनी सोच वाले पत्रकारों की ज़रूरत है।