रिपोर्ट : ठाकुर बख्श सिंह
कैंची धाम वाले नीम करोली बाबा आज भारत की आध्यात्मिक परंपरा के उन संतों में गिने जाते हैं जिनकी लोकप्रियता देश की सीमाओं से बहुत आगे निकल चुकी है। उत्तराखंड की पहाड़ियों में स्थित कैंची धाम कभी एक शांत, अपेक्षाकृत एकांत साधना-स्थल था, लेकिन समय के साथ यह दुनिया भर से आने वाले श्रद्धालुओं और आध्यात्मिक जिज्ञासुओं का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। बाबा की शिक्षाओं, उनके जीवन से जुड़ी कथाओं और उनके भक्तों की स्मृतियों ने उन्हें आधुनिक समय के सबसे चर्चित संतों में शामिल कर दिया है।
11 सितंबर 1973 को वृंदावन में उनके शरीर त्यागने के बाद भी उनकी लोकप्रियता कम नहीं हुई, बल्कि आने वाले दशकों में बढ़ती गई। आज कैंची धाम में देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं। एप्पल के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स और फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग के साथ कैंची धाम का संबंध भी बाबा की अंतरराष्ट्रीय पहचान का बड़ा कारण बना। भारत सरकार और उत्तराखंड पर्यटन से जुड़े स्रोत भी कैंची धाम को नीम करोली बाबा की आध्यात्मिक विरासत से जोड़ते हैं।
लेकिन आखिर कौन थे नीम करोली बाबा? एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में जन्मे लक्ष्मीनारायण किस तरह साधु बने? उन्हें नीब करौरी बाबा क्यों कहा गया? कैंची धाम कैसे उनकी पहचान का सबसे बड़ा केंद्र बना? और उनकी मृत्यु के पांच दशक से अधिक समय बाद भी दुनिया उन्हें क्यों याद करती है?
कौन थे नीम करोली बाबा?
नीम करोली बाबा का जन्म लगभग 1900 के आसपास उत्तर प्रदेश के अकबरपुर गांव में एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में हुआ माना जाता है। उनके जन्मस्थान और शुरुआती जीवन से संबंधित विवरण अलग-अलग स्रोतों में थोड़ा अलग मिलता है। कई भक्त-परंपराओं में उनका बचपन का नाम लक्ष्मीनारायण शर्मा बताया गया है।
उनका जीवन सामान्य पारिवारिक जीवन से बिल्कुल अलग दिशा में चला गया। बचपन और युवावस्था से ही उनका झुकाव आध्यात्मिक साधना की ओर बताया जाता है। भक्तों की परंपरा के अनुसार उन्होंने कम उम्र में ही घर छोड़ दिया था और साधु के रूप में उत्तर भारत तथा गुजरात के विभिन्न क्षेत्रों में भ्रमण किया।
उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा गुजरात के बबानियां क्षेत्र से जुड़ा माना जाता है। यहां उन्होंने वैष्णव साधना और तपस्या की। उनके बारे में प्रचलित कथाओं में कहा जाता है कि वे लंबे समय तक कठोर साधना करते थे। पानी में खड़े होकर साधना करने की कथा भी भक्तों के बीच काफी प्रसिद्ध है। इसी कारण उनके कई प्रारंभिक नामों में ‘तलैय्या बाबा’ का उल्लेख मिलता है।
हालांकि उनके जीवन की शुरुआती अवधि के बारे में उपलब्ध विवरणों का बड़ा हिस्सा मौखिक परंपरा, भक्तों के संस्मरण और बाद में लिखी गई पुस्तकों से आता है। इसलिए हर घटना को दस्तावेजी इतिहास मानने के बजाय बाबा की जीवन-परंपरा के हिस्से के रूप में देखना अधिक उचित है।
लक्ष्मीनारायण से लक्ष्मण दास और फिर महाराज जी
नीम करोली बाबा का जीवन एक जगह टिककर रहने वाले संत का जीवन नहीं था। वे लगातार यात्रा करते रहे। अलग-अलग क्षेत्रों में साधना करते हुए उनके आसपास लोगों का समूह बनता गया।
भक्तों के अनुसार उनका एक नाम लक्ष्मण दास भी था। वे अत्यंत साधारण जीवन जीते थे। उनका पहनावा, भोजन और रहन-सहन किसी बड़े धार्मिक गुरु जैसा भव्य नहीं था। यही सादगी उनके व्यक्तित्व की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में गिनी जाती है।
समय के साथ उनके अनुयायी उन्हें ‘महाराज जी’ कहकर संबोधित करने लगे। यह संबोधन आगे चलकर उनके भक्तों के बीच इतना लोकप्रिय हुआ कि आज भी दुनिया के अनेक देशों में उनके अनुयायी उन्हें ‘महाराज जी’ के नाम से याद करते हैं।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह बताई जाती है कि वे आध्यात्मिकता को केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं करते थे। प्रेम, सेवा, करुणा और ईश्वर-स्मरण उनके संदेश के प्रमुख आधार माने जाते हैं।
हनुमान जी के अनन्य भक्त थे बाबा
नीम करोली बाबा की पहचान सबसे अधिक भगवान हनुमान की भक्ति से जुड़ी है।
उनके आश्रमों में हनुमान मंदिरों की उपस्थिति इस भक्ति का स्पष्ट संकेत है। भक्तों के बीच यह विश्वास गहरा है कि बाबा स्वयं हनुमान जी के अवतार या अंश थे। यह धार्मिक आस्था है और इसे ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि उनके अनुयायियों की श्रद्धा के रूप में समझना चाहिए।
बाबा के जीवन और शिक्षाओं में हनुमान भक्ति का केंद्रीय स्थान रहा। उनके आश्रमों में हनुमान चालीसा, राम नाम और भक्ति की परंपरा आज भी दिखाई देती है।
कैंची धाम में स्थित हनुमान मंदिर इसी आध्यात्मिक परंपरा का प्रमुख केंद्र है। उत्तराखंड सरकार भी कैंची धाम को नीम करोली बाबा द्वारा स्थापित हनुमान मंदिर और आश्रम के रूप में वर्णित करती है।
ट्रेन वाला प्रसंग और कैसे पड़ा नीब करौरी नाम?
नीम करोली बाबा के जीवन से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कथाओं में ट्रेन का प्रसंग है।
भक्त-परंपरा के अनुसार एक बार बाबा बिना टिकट ट्रेन के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में बैठे थे। टिकट निरीक्षक ने उन्हें बिना टिकट यात्रा करते हुए देखा और कथित तौर पर उन्हें ट्रेन से उतार दिया। यह घटना नीब करौरी गांव के आसपास की बताई जाती है।
कहा जाता है कि बाबा के उतरने के बाद ट्रेन आगे नहीं बढ़ी। यात्रियों और रेलवे कर्मचारियों ने तमाम प्रयास किए, लेकिन ट्रेन नहीं चली। तब यात्रियों ने बाबा से दोबारा ट्रेन में बैठने का अनुरोध किया।
लोकप्रिय कथा के अनुसार बाबा ने पहले रेलवे अधिकारियों से संतों और साधुओं के साथ सम्मानजनक व्यवहार करने की बात कही। इसके बाद उनके ट्रेन में बैठते ही ट्रेन चल पड़ी।
इसी घटना को उनके नाम ‘नीब करौरी बाबा’ से जोड़कर देखा जाता है। बाद में उच्चारण और प्रचलन के कारण ‘नीम करोली बाबा’ नाम अधिक लोकप्रिय हो गया।
यह प्रसंग आज बाबा की सबसे प्रसिद्ध चमत्कार-कथाओं में शामिल है, लेकिन इसके सभी विवरणों की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे बाबा की भक्त-परंपरा में प्रचलित कथा के रूप में ही प्रस्तुत करना अधिक सावधानीपूर्ण होगा।
क्या सचमुच उनके कहने पर रेलवे स्टेशन बना?
ट्रेन की कथा का दूसरा हिस्सा नीब करौरी रेलवे स्टेशन से जुड़ा हुआ है। भक्तों के बीच प्रचलित कहानी के अनुसार बाबा ने रेलवे अधिकारियों के सामने कुछ शर्तें रखीं और उनमें से एक शर्त यह थी कि जिस स्थान पर उन्हें ट्रेन से उतारा गया, वहां रेलवे स्टेशन बनाया जाए। कथा के अनुसार बाद में वहां स्टेशन बनाया गया।
लेकिन इस प्रसंग के संबंध में भी लोककथा और दस्तावेजी इतिहास को अलग-अलग रखना आवश्यक है। बाबा से जुड़े अनेक लोकप्रिय किस्से पीढ़ियों से उनके भक्तों और अनुयायियों के माध्यम से चलते आए हैं। इन कथाओं का धार्मिक महत्व बहुत अधिक हो सकता है, लेकिन प्रत्येक घटना की प्रशासनिक या रेलवे रिकॉर्ड से पुष्टि अलग विषय है।
यही कारण है कि नीम करोली बाबा पर लिखते समय ‘कहा जाता है’, ‘भक्तों के अनुसार’ और ‘प्रचलित कथा’ जैसे शब्द अधिक उपयुक्त हैं।
कैंची धाम बना बाबा की सबसे बड़ी पहचान
अगर नीम करोली बाबा के जीवन से जुड़े किसी एक स्थान का नाम सबसे पहले लिया जाए तो वह कैंची धाम है।
कैंची धाम उत्तराखंड के नैनीताल जिले में नैनीताल-अल्मोड़ा मार्ग पर स्थित है। उत्तराखंड सरकार के अनुसार यह भवाली से लगभग 9 किलोमीटर और नैनीताल से करीब 17 किलोमीटर दूर है। ‘कैंची’ नाम इस क्षेत्र की दो तीखी हेयरपिन जैसी सड़क मोड़ों से जुड़ा है और इसका संबंध वास्तविक कैंची से नहीं है।
कैंची धाम में नीम करोली बाबा का आश्रम और हनुमान मंदिर है। सरकारी पर्यटन स्रोत इसे एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और तीर्थ केंद्र के रूप में बताते हैं।
कैंची धाम की स्थापना की तारीख को लेकर भी विभिन्न स्रोतों में अंतर मिलता है। उत्तराखंड पर्यटन की वेबसाइट इसे 1962 में बाबा द्वारा स्थापित बताती है, जबकि अन्य आश्रम-संबंधी स्रोत जून 1964 में पहले मंदिर के उद्घाटन का उल्लेख करते हैं।
इस अंतर के बावजूद एक बात निर्विवाद है कि 1960 के दशक में कैंची धाम बाबा की आध्यात्मिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका था और बाद के वर्षों में यही स्थान उनकी वैश्विक पहचान का सबसे बड़ा प्रतीक बना।
कैंची धाम का वातावरण और बाबा की साधना
कैंची धाम पहाड़ों, हरियाली और कोसी नदी के आसपास का शांत क्षेत्र है। यह भौगोलिक वातावरण ही इसे दूसरे धार्मिक स्थलों से अलग अनुभव देता है।
यहां पहुंचने वाला व्यक्ति केवल मंदिर नहीं देखता, बल्कि उसे एक ऐसा वातावरण मिलता है जिसमें साधना, मौन, भजन और सेवा की परंपरा साथ-साथ दिखाई देती है।
आधिकारिक पर्यटन जानकारी के अनुसार आश्रम परिसर में बाबा की समाधि और हनुमान मंदिर सहित कई महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल हैं।
बाबा के अनुयायियों के लिए यह स्थान केवल पर्यटन स्थल नहीं है। यह उनके गुरु की स्मृति और उनके संदेश से जुड़ा तीर्थ है।
स्टीव जॉब्स और कैंची धाम का संबंध
नीम करोली बाबा की वैश्विक लोकप्रियता में सबसे चर्चित नामों में एप्पल के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स का नाम आता है।
जॉब्स 1970 के दशक में भारत आए थे और आध्यात्मिक खोज के दौरान कैंची धाम भी पहुंचे। महत्वपूर्ण बात यह है कि जब जॉब्स कैंची धाम पहुंचे, तब नीम करोली बाबा 1973 में शरीर त्याग चुके थे।
इसलिए यह कहना अधिक सही है कि जॉब्स बाबा की आध्यात्मिक विरासत और आश्रम से जुड़े, न कि उन्होंने स्वयं बाबा से प्रत्यक्ष मुलाकात की।
जॉब्स के भारत आने और कैंची धाम पहुंचने की कहानी ने बाद में पश्चिमी दुनिया में बाबा और उनके आश्रम के प्रति जिज्ञासा को बढ़ाया।
कैंची धाम से जुड़े सरकारी पर्यटन स्रोत भी स्टीव जॉब्स के दौरे को इस स्थान की अंतरराष्ट्रीय पहचान बढ़ाने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं में शामिल करते हैं।
मार्क जुकरबर्ग तक पहुंची कैंची धाम की चर्चा
स्टीव जॉब्स के बाद फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग का नाम भी कैंची धाम से जुड़ा।
जुकरबर्ग ने सार्वजनिक रूप से बताया था कि स्टीव जॉब्स ने उन्हें भारत आने और कैंची धाम जाने की सलाह दी थी। यह प्रसंग भारत में विशेष रूप से तब चर्चित हुआ जब जुकरबर्ग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ सार्वजनिक बातचीत में इसका उल्लेख किया।
इसके बाद कैंची धाम तकनीक और स्टार्टअप की दुनिया में भी चर्चा का विषय बन गया। इससे बाबा की छवि केवल एक पारंपरिक भारतीय संत की नहीं रही, बल्कि पश्चिमी दुनिया में भी उन्हें ऐसे आध्यात्मिक व्यक्तित्व के रूप में देखा जाने लगा जिनकी शिक्षाओं से आधुनिक पेशेवर और उद्यमी प्रेरणा लेते हैं।
बाबा की सबसे बड़ी शिक्षा: प्रेम और सेवा
नीम करोली बाबा के बारे में लिखी गई अनेक पुस्तकों और संस्मरणों में उनके संदेश का मूल ‘प्रेम’ और ‘सेवा’ बताया गया है।
उनकी आध्यात्मिक दृष्टि में भगवान की भक्ति केवल मंदिर में बैठकर पूजा करने तक सीमित नहीं थी। भूखे को भोजन देना, जरूरतमंद की सहायता करना, दुखी व्यक्ति के साथ खड़ा होना और हर व्यक्ति में ईश्वर का दर्शन करना उनकी शिक्षाओं के महत्वपूर्ण हिस्से माने जाते हैं। यही कारण है कि उनके आश्रमों में भंडारे की परंपरा विशेष महत्व रखती है।
कैंची धाम में होने वाला वार्षिक भंडारा आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। भारत सरकार के पर्यटन स्रोत के अनुसार यहां आयोजित वार्षिक भंडारे में बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं।
राम नाम और हनुमान भक्ति का संगम
नीम करोली बाबा की आध्यात्मिकता में भगवान राम और हनुमान दोनों का विशेष स्थान था। वे राम नाम के स्मरण पर जोर देते थे। भक्तों के अनुसार बाबा अक्सर राम नाम लिखते और लोगों को ईश्वर के नाम का स्मरण करने की प्रेरणा देते थे।
उनकी हनुमान भक्ति इसी राम भक्ति से अलग नहीं थी। भारतीय धार्मिक परंपरा में हनुमान को राम के अनन्य भक्त के रूप में देखा जाता है और बाबा की साधना में भी यही भाव दिखाई देता है।
उनकी शिक्षाओं का सार किसी जटिल दार्शनिक सिद्धांत में नहीं बल्कि साधारण जीवन में दिखाई देता है—ईश्वर को याद करो, प्रेम करो और दूसरों की सेवा करो।
बाबा चमत्कारों से अधिक अपने व्यवहार के लिए याद किए जाते हैं
नीम करोली बाबा के जीवन से चमत्कारों की अनेक कहानियां जुड़ी हैं। ट्रेन की कहानी, भविष्य की घटनाओं का आभास, दूर बैठे भक्तों की समस्याओं का पता चलना और अचानक किसी संकट का समाधान हो जाना जैसी अनेक कथाएं भक्तों के बीच प्रचलित हैं। लेकिन उनके व्यक्तित्व की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता केवल चमत्कार नहीं थी।
वे अत्यंत सहज और साधारण दिखाई देते थे। उनके अनुयायियों के संस्मरणों में उनका व्यवहार कभी कठोर तो कभी बेहद करुणामय दिखाई देता है। वे दिखावे से दूर रहते थे और अपने आसपास के लोगों को सेवा तथा भक्ति के लिए प्रेरित करते थे।
यही कारण है कि उनके अनुयायी उन्हें केवल चमत्कारी बाबा के रूप में नहीं बल्कि ‘महाराज जी’ और गुरु के रूप में याद करते हैं।
दुनिया भर में फैली उनकी आध्यात्मिक विरासत
नीम करोली बाबा के जीवनकाल में ही उनके आसपास भारत और विदेशों से लोग आने लगे थे। लेकिन उनकी वास्तविक वैश्विक लोकप्रियता उनके शरीर त्यागने के बाद कई गुना बढ़ी।
उनसे प्रभावित भक्तों ने उनके जीवन और शिक्षाओं पर किताबें लिखीं। राम दास की प्रसिद्ध पुस्तक ‘Miracle of Love’ ने पश्चिमी दुनिया में बाबा की पहचान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके अनुयायियों में अमेरिकी आध्यात्मिक साधक, लेखक और कलाकार भी शामिल रहे। इस प्रक्रिया में कैंची धाम भारत के बाहर भी एक परिचित नाम बन गया।
आज इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में बाबा की तस्वीरें, उनके कथन और उनकी शिक्षाएं दुनिया के अनेक देशों में साझा की जाती हैं।
कितने आश्रम और मंदिर उनकी परंपरा से जुड़े हैं?
नीम करोली बाबा की विरासत केवल कैंची धाम तक सीमित नहीं है। उनके जीवन से वृंदावन और अन्य स्थानों के आश्रम भी जुड़े रहे।
भक्त परंपरा में भारत के अलग-अलग हिस्सों में हनुमान मंदिरों और आश्रमों की एक बड़ी श्रृंखला को बाबा की आध्यात्मिक विरासत से जोड़ा जाता है। हालांकि ऐसे मंदिरों की सटीक संख्या अलग-अलग स्रोतों में अलग बताई जाती है।
इसलिए ‘108 मंदिर’ जैसी संख्याओं को निश्चित ऐतिहासिक आंकड़ा मानने के बजाय भक्त परंपरा में प्रचलित विवरण के रूप में देखना बेहतर है। उनका मूल संदेश मंदिरों की संख्या से कहीं अधिक व्यापक था—मानव सेवा, प्रेम और ईश्वर-स्मरण।
11 सितंबर 1973: वृंदावन में शरीर त्याग
नीम करोली बाबा ने 11 सितंबर 1973 को वृंदावन में शरीर त्याग किया। उनके अंतिम समय को लेकर उपलब्ध विवरण बताते हैं कि वे स्वास्थ्य संबंधी समस्या से जूझ रहे थे और उन्हें अस्पताल ले जाया गया। इसके बाद उन्होंने शरीर त्याग दिया।
उनकी मृत्यु के बाद उनके भक्तों ने उनकी स्मृति में आश्रमों और मंदिरों में धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाया। कैंची धाम में उनकी समाधि और मंदिर आज भी श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख आकर्षण हैं।
यानी 11 सितंबर केवल उनके निधन की तारीख नहीं है। उनके भक्तों के लिए यह उस गुरु को स्मरण करने का दिन है जिसने उन्हें प्रेम, सेवा और भक्ति का रास्ता दिखाया।
पुण्यतिथि पर क्यों याद किए जाते हैं नीम करोली बाबा?
किसी संत की लोकप्रियता केवल उनके जीवनकाल से तय नहीं होती। असली परीक्षा यह होती है कि उनके जाने के बाद उनकी शिक्षाएं कितने लोगों के जीवन में बनी रहती हैं। नीम करोली बाबा के मामले में यह प्रभाव आज भी दिखाई देता है।
उनका नाम कैंची धाम के साथ जुड़ा है। उनकी तस्वीरें घरों में दिखाई देती हैं। उनके भक्त उन्हें ‘महाराज जी’ कहकर याद करते हैं। हनुमान मंदिरों में उनकी स्मृति जीवित है। राम नाम और सेवा की उनकी शिक्षा आज भी दोहराई जाती है। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनकी लोकप्रियता केवल धार्मिक समुदाय तक सीमित नहीं रही।
तकनीक की दुनिया के स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग जैसे नामों के साथ कैंची धाम का संबंध सामने आने के बाद दुनिया के आधुनिक, शिक्षित और कारोबारी वर्ग में भी बाबा के प्रति जिज्ञासा बढ़ी।
नीम करोली बाबा की विरासत का असली अर्थ
नीम करोली बाबा के जीवन को केवल चमत्कारों की कहानियों के माध्यम से देखना उनके व्यक्तित्व को छोटा कर देना होगा। उनकी वास्तविक विरासत उस विचार में दिखाई देती है जिसमें भक्ति और सेवा को अलग नहीं माना गया।
वे लोगों को ईश्वर का नाम लेने के साथ-साथ मनुष्य की सेवा करने की प्रेरणा देते थे। यही कारण है कि उनके भक्तों के लिए कैंची धाम केवल एक मंदिर नहीं बल्कि एक अनुभव है।
कैंची धाम का सरकारी परिचय भी इसे शांति और आध्यात्मिकता के केंद्र के रूप में प्रस्तुत करता है। दो पहाड़ियों के बीच स्थित यह आश्रम आज एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल बन चुका है।
क्या नीम करोली बाबा सचमुच हनुमान जी के अवतार थे?
यह प्रश्न आज भी सबसे अधिक पूछा जाता है। इसका उत्तर आस्था और इतिहास के आधार पर अलग-अलग होगा।
भक्तों की गहरी श्रद्धा है कि नीम करोली बाबा हनुमान जी के अंश या अवतार थे। उनकी हनुमान भक्ति, उनके आश्रमों में हनुमान मंदिरों की स्थापना और उनसे जुड़ी चमत्कार-कथाओं ने इस विश्वास को मजबूत किया।
लेकिन इतिहास की दृष्टि से किसी संत को देवता का अवतार सिद्ध करना संभव नहीं है। इसलिए पत्रकारिता की भाषा में यह कहना अधिक उचित है कि ‘उनके भक्त उन्हें हनुमान जी का अंश या अवतार मानते हैं।’
यही संतुलन उनकी आध्यात्मिक महत्ता को भी बनाए रखता है और तथ्यात्मक लेखन की मर्यादा को भी।
शरीर चला गया, लेकिन ‘महाराज जी’ की कथा जारी है
नीम करोली बाबा का जीवन जितना रहस्यमय है, उतना ही प्रेरक भी।
अकबरपुर के एक संपन्न परिवार में जन्मे लक्ष्मीनारायण से लेकर घूमने वाले साधु, फिर लक्ष्मण दास और अंततः लाखों भक्तों के ‘महाराज जी’ बनने तक की यात्रा भारतीय संत परंपरा की एक अनोखी कहानी है।
उनके जीवन में कितनी घटनाएं ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित हैं और कितनी भक्तों की आस्था और मौखिक परंपरा का हिस्सा हैं, यह अलग विषय है। लेकिन इससे यह तथ्य नहीं बदलता कि पांच दशक से अधिक समय बाद भी उनका नाम करोड़ों लोगों की श्रद्धा से जुड़ा है।
कैंची धाम आज भी पहाड़ों के बीच स्थित उस आध्यात्मिक केंद्र के रूप में खड़ा है जहां लोग शांति, प्रार्थना और आत्मिक अनुभव की तलाश में पहुंचते हैं। सरकारी पर्यटन स्रोत भी इसे नीम करोली बाबा की विरासत से जुड़े प्रमुख तीर्थस्थल के रूप में मान्यता देते हैं।
11 सितंबर 1973 को वृंदावन में बाबा ने शरीर छोड़ा, लेकिन उनके अनुयायियों के लिए उनका जाना अंत नहीं था।
शायद यही किसी संत की सबसे बड़ी पहचान होती है—उसकी देह समाप्त हो जाती है, लेकिन उसके विचार लोगों के जीवन में चलते रहते हैं।
नीम करोली बाबा की विरासत का सबसे सरल सार शायद यही है—राम का नाम लो, हनुमान को याद करो, प्रेम करो और जरूरतमंद की सेवा करो।
इसी संदेश ने एक साधारण जीवन जीने वाले संत को भारत की सीमाओं से निकालकर दुनिया के आध्यात्मिक नक्शे पर स्थापित कर दिया।

























