श्रीनगर
जम्मू-कश्मीर में सिनेमा और संस्कृति के एक नए अध्याय की शुरुआत हुई है। घाटी में पहली बार आयोजित इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ जम्मू एंड कश्मीर (IFFJK) 2026 ने न केवल देश और दुनिया के फिल्मकारों को एक मंच पर लाया, बल्कि उस पुराने कश्मीर की याद भी ताजा कर दी, जब घाटी बॉलीवुड फिल्मों की शूटिंग के लिए सबसे पसंदीदा स्थानों में गिनी जाती थी। 7 से 10 सितंबर 2026 तक आयोजित इस चार दिवसीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का उद्देश्य जम्मू-कश्मीर को फिर से वैश्विक फिल्म मानचित्र पर स्थापित करना और यहां फिल्म निर्माण, पर्यटन तथा स्थानीय रचनात्मक प्रतिभाओं के लिए नए अवसर पैदा करना रहा।
महोत्सव के उद्घाटन अवसर पर जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने उस दौर को याद किया जब फिल्मकारों के लिए कश्मीर किसी विदेशी फिल्म लोकेशन से कम आकर्षक नहीं था। उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा था जब स्विट्जरलैंड और दूसरे विदेशी स्थानों के लोकप्रिय होने से पहले भारतीय फिल्में कश्मीर में शूट की जाती थीं। उनका संदेश स्पष्ट था कि कश्मीर को केवल खूबसूरत पहाड़ों और झीलों की लोकेशन के रूप में नहीं, बल्कि कहानियों, संस्कृति, कलाकारों और रचनात्मकता की भूमि के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
135 फिल्मों और 41 देशों की भागीदारी ने बनाया वैश्विक मंच
IFFJK 2026 का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसका अंतरराष्ट्रीय स्वरूप रहा। आधिकारिक महोत्सव वेबसाइट के अनुसार आयोजन में 135 फिल्मों को 41 देशों से शामिल किया गया। इससे पहले आयोजकों को दुनिया के विभिन्न हिस्सों से 1,100 से अधिक फिल्म प्रविष्टियां प्राप्त हुई थीं, जिनमें से चयन प्रक्रिया के बाद 135 फिल्मों को प्रदर्शन के लिए चुना गया।
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह महोत्सव केवल बॉलीवुड या भारतीय क्षेत्रीय सिनेमा तक सीमित नहीं रहा। इसमें अंतरराष्ट्रीय फिल्में, भारतीय फीचर फिल्में, डॉक्यूमेंट्री, शॉर्ट फिल्में और जम्मू-कश्मीर की स्थानीय कहानियों पर आधारित फिल्मों को भी जगह मिली। इस तरह IFFJK ने एक ऐसा मंच तैयार करने की कोशिश की, जहां कश्मीर की स्थानीय आवाजें दुनिया की दूसरी सिनेमाई आवाजों के साथ संवाद कर सकें।
महोत्सव में International Competition, Cinema of the World, Bharat Panorama, Documentary, Short Films और J&K Select जैसे खंड रखे गए। आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार मास्टरक्लास, इंडस्ट्री पैनल, फिल्म विशेषज्ञों के साथ संवाद और अन्य रचनात्मक गतिविधियां भी इसका हिस्सा रहीं।
‘रंग-ए-सिनेमा’ के जरिए संस्कृति और रचनात्मकता का संदेश
इस पहले अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव की थीम ‘Rang-e-Cinema’ यानी ‘रंग-ए-सिनेमा’ रखी गई। यह नाम अपने आप में महोत्सव की व्यापक सोच को सामने रखता है। यहां सिनेमा को सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि संस्कृति, पहचान, इतिहास, सामाजिक अनुभव और आर्थिक अवसरों से जोड़कर देखने की कोशिश की गई।
जम्मू-कश्मीर के लिए यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय तक घाटी की पहचान सुरक्षा और राजनीतिक घटनाक्रमों की खबरों तक सीमित होकर रह गई थी। फिल्म महोत्सव ने उसी सार्वजनिक छवि के समानांतर एक दूसरा पक्ष सामने रखने की कोशिश की है – कला, संस्कृति, संगीत, स्थानीय कहानियां, पर्यटन और रचनात्मक प्रतिभा का पक्ष।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने फिल्मकारों से कश्मीर को केवल पहाड़ों और प्राकृतिक दृश्यों तक सीमित नजर से नहीं देखने का आग्रह किया। उन्होंने स्थानीय संस्कृति, कारीगरों, संगीत परंपराओं और यहां के लोगों की कहानियों को भी कैमरे के सामने लाने की जरूरत बताई।
यही बात IFFJK को सामान्य फिल्म समारोहों से कुछ अलग बनाती है। इसका उद्देश्य केवल फिल्मों की स्क्रीनिंग करना नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर को फिल्म निर्माण और रचनात्मक उद्योगों के लिए एक संभावित गंतव्य के रूप में स्थापित करना भी है।
कभी कश्मीर था फिल्मों की शूटिंग का पसंदीदा ठिकाना
कश्मीर और हिंदी सिनेमा का रिश्ता नया नहीं है। दशकों तक घाटी की बर्फीली पहाड़ियां, झीलें, हरे-भरे मैदान, बाग और पहाड़ी रास्ते फिल्मों की कहानी का हिस्सा बनते रहे। अनेक फिल्मों के गीतों और रोमांटिक दृश्यों में कश्मीर की खूबसूरती दिखाई देती थी।
लेकिन 1980 के दशक के अंतिम वर्षों और 1990 के दशक में बढ़ते उग्रवाद और अस्थिरता ने इस संबंध को बुरी तरह प्रभावित किया। फिल्मकारों का घाटी में आना कम हुआ और सिनेमाघरों का संचालन भी प्रभावित हुआ। सुरक्षा परिस्थितियों के कारण फिल्म शूटिंग का बड़ा हिस्सा दूसरे राज्यों और बाद में विदेशों की ओर चला गया।
कश्मीर में सिनेमाघरों का इतिहास भी इसी दौर की कठिनाइयों से जुड़ा रहा। आतंकवादी धमकियों और हमलों के कारण सिनेमाघरों को बंद करना पड़ा। बाद में उन्हें दोबारा खोलने की कोशिशें हुईं, लेकिन सुरक्षा और दर्शकों से जुड़ी चुनौतियों के कारण सिनेमाई संस्कृति को पुरानी गति हासिल करने में समय लगा।
इस पृष्ठभूमि में IFFJK 2026 का आयोजन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं बल्कि एक प्रतीकात्मक वापसी के रूप में भी देखा जा सकता है।
सिनेमाघरों से अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल तक का सफर
कभी जहां सिनेमाघरों का अस्तित्व ही चुनौती में था, वहीं अब श्रीनगर में अंतरराष्ट्रीय फिल्मों की स्क्रीनिंग हो रही है और दुनिया के विभिन्न देशों से फिल्मकार व प्रतिनिधि पहुंच रहे हैं। यही बदलाव इस आयोजन की सबसे बड़ी कहानी है।
हाल के वर्षों में कश्मीर में सिनेमाई गतिविधियों की वापसी के प्रयास हुए हैं। श्रीनगर में नए मल्टीप्लेक्स का खुलना भी इसी बदलाव का हिस्सा रहा है। ऐसे माहौल में अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का आयोजन स्थानीय दर्शकों और फिल्म उद्योग के बीच नए संबंध बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
IFFJK की स्क्रीनिंग और कार्यक्रम श्रीनगर के Sher-i-Kashmir International Conference Centre (SKICC), INOX Multiplex Srinagar, जम्मू के Movie Time Cinemas KC Central और गुलमर्ग Convention Centre सहित विभिन्न स्थानों पर आयोजित किए गए। इससे महोत्सव को केवल श्रीनगर तक सीमित न रखकर जम्मू और गुलमर्ग से भी जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है।
स्थानीय फिल्मकारों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है IFFJK?
किसी भी फिल्म उद्योग के विकास के लिए केवल बड़े सितारों या बड़े बजट की फिल्मों की जरूरत नहीं होती। स्थानीय कहानीकार, लेखक, निर्देशक, अभिनेता, सिनेमैटोग्राफर, संपादक, साउंड डिजाइनर और तकनीकी विशेषज्ञ भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।
इसी दृष्टि से J&K Select खंड विशेष महत्व रखता है। इसमें जम्मू-कश्मीर के फिल्मकारों की फिल्मों को प्रतिस्पर्धी मंच दिया गया। पांच फिल्मों को इस खंड के लिए चुना गया था, जिनमें Searching for the Grandpa, Arifa, Batt Koch (The Lost Lane), Tasrufdaar (Djinns of Kashmir) और Naqsh-e-Daur (The Story of Ghulam Nabi Dhar) शामिल थीं। इन फिल्मों में स्थानीय संस्कृति, स्मृति, पहचान, सामाजिक यथार्थ और मानवीय अनुभव जैसे विषय दिखाई देते हैं।
यानी कश्मीर की कहानी अब केवल बाहर से आने वाले फिल्मकारों के कैमरे से दिखाई देने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। स्थानीय लोग स्वयं अपनी कहानी कहें, यही किसी स्थायी फिल्म संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत हो सकती है।
पुरस्कारों से बढ़ेगा फिल्म निर्माण का आकर्षण
IFFJK ने फिल्मकारों को केवल मंच नहीं दिया बल्कि पुरस्कारों के जरिए प्रतिस्पर्धात्मक प्रोत्साहन भी दिया। आयोजन की घोषित पुरस्कार श्रेणियों में Best Film, Best Director, Best Actor Male, Best Actor Female, Best Cinematography, Best Sound Design, Best Editing, Best Debut Film of a Director और Best Film on Jammu & Kashmir जैसी श्रेणियां शामिल थीं।
आयोजन से पहले घोषित जानकारी के अनुसार कुल पुरस्कार राशि करीब 96 लाख रुपये रखी गई थी। Best Film के लिए 25 लाख रुपये, Best Director और Best Debut Film of a Director के लिए 15-15 लाख रुपये तथा J&K Select से जुड़े सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार के लिए 10 लाख रुपये की राशि तय की गई थी। अभिनय और तकनीकी श्रेणियों के लिए भी अलग-अलग पुरस्कार राशि निर्धारित की गई।
यह व्यवस्था इस बात का संकेत है कि जम्मू-कश्मीर प्रशासन महोत्सव को केवल प्रतीकात्मक आयोजन के रूप में नहीं बल्कि एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय फिल्म मंच के रूप में स्थापित करना चाहता है।
पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ा अवसर
फिल्म उद्योग का असर सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रहता। जब किसी क्षेत्र में शूटिंग होती है तो होटल, परिवहन, खान-पान, स्थानीय गाइड, कलाकार, तकनीकी कर्मचारी, कैमरामैन, मेकअप आर्टिस्ट, डिजाइनर और अनेक छोटे व्यवसाय उससे जुड़े होते हैं।
कश्मीर जैसी जगह में इसका पर्यटन पर भी सीधा असर पड़ सकता है। यदि किसी फिल्म में किसी स्थान की खूबसूरती दिखाई देती है तो वह स्थान बाद में पर्यटन के नक्शे पर लोकप्रिय हो सकता है। दुनिया के कई पर्यटन स्थलों की लोकप्रियता में सिनेमा की भूमिका रही है।
यही वजह है कि IFFJK को फिल्म पर्यटन के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकारी स्तर पर इसे पर्यटन, संस्कृति, फिल्म निर्माण और रचनात्मक अर्थव्यवस्था से जोड़ने की बात कही गई है।
फिल्म उद्योग को सिर्फ लोकेशन नहीं, पूरा इकोसिस्टम चाहिए
हालांकि केवल खूबसूरत लोकेशन किसी क्षेत्र को फिल्म हब नहीं बना सकती। इसके लिए शूटिंग की अनुमति, स्थानीय तकनीकी कर्मचारी, स्टूडियो और पोस्ट-प्रोडक्शन सुविधाएं, परिवहन, होटल, प्रशिक्षित कलाकार, सुरक्षा, इंटरनेट और प्रशासनिक सहयोग जैसे कई पहलुओं की जरूरत होती है।
मुख्यमंत्री की ओर से फिल्मकारों को कश्मीर की कहानियों और संस्कृति की ओर आकर्षित करने की अपील इसी व्यापक सोच का हिस्सा है। सरकार की ओर से एक बेहतर फिल्मिंग इकोसिस्टम, सिंगल-विंडो जैसी सुविधाओं और प्रोत्साहनों पर काम करने की बात भी सामने आई है।
यदि ये सुविधाएं वास्तव में जमीन पर मजबूत होती हैं तो IFFJK हर साल आयोजित होने वाला एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय फिल्म आयोजन बन सकता है।
आयोजन का समापन, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू
7 से 10 सितंबर तक चले पहले IFFJK का समापन 10 सितंबर को हुआ। समापन समारोह में प्रसिद्ध गायिका उषा उत्थुप ने प्रस्तुति देकर महोत्सव को सांस्कृतिक रंग दिया। फिल्मों, चर्चाओं, मास्टरक्लास और उद्योग से जुड़े कार्यक्रमों के बाद उनका संगीत कार्यक्रम समारोह का आकर्षण बना। लेकिन किसी भी पहले आयोजन की वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि उसके बाद क्या होता है।
क्या अगले साल अधिक स्थानीय फिल्में बनेंगी? क्या कश्मीर के युवा फिल्म निर्माण की तकनीक सीख पाएंगे? क्या देश और विदेश के निर्माता यहां दोबारा शूटिंग करने आएंगे? क्या स्थानीय कलाकारों को रोजगार मिलेगा? क्या फिल्म पर्यटन को स्थायी आधार मिलेगा? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल – क्या यह महोत्सव हर साल निरंतरता के साथ आयोजित होगा? इन सवालों के जवाब आने वाले वर्षों में मिलेंगे।
IFFJK सिर्फ फिल्म फेस्टिवल नहीं, बदलती कश्मीर कहानी का संकेत
जम्मू-कश्मीर में पहला अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। एक तरफ यह दुनिया की फिल्मों और फिल्मकारों को कश्मीर से जोड़ता है, तो दूसरी तरफ स्थानीय कलाकारों को अपनी कहानियां सामने रखने का अवसर देता है। इसके साथ ही यह उस दौर की याद दिलाता है जब कश्मीर भारतीय सिनेमा के सबसे पसंदीदा फिल्मांकन स्थलों में शामिल था।
उमर अब्दुल्ला का यह कहना कि कश्मीर में स्विट्जरलैंड से पहले फिल्मों की शूटिंग होती थी, महज अतीत की याद नहीं है। यह भविष्य के लिए एक राजनीतिक और सांस्कृतिक संदेश भी है – कश्मीर को फिर से सिनेमा की दुनिया में अपनी जगह बनानी है।
IFFJK 2026 ने पहला कदम उठा दिया है। 135 फिल्में, 41 देशों की भागीदारी, अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता, स्थानीय सिनेमा के लिए J&K Select, मास्टरक्लास और फिल्म उद्योग से जुड़े संवाद इस पहल को व्यापक बनाते हैं।
अब जरूरत इस बात की है कि यह आयोजन केवल चार दिनों की चमक बनकर न रह जाए। यदि इसके बाद नियमित फिल्म स्क्रीनिंग, स्थानीय फिल्म निर्माण, प्रशिक्षण, शूटिंग सुविधाओं और युवा प्रतिभाओं के लिए संस्थागत अवसर तैयार होते हैं तो जम्मू-कश्मीर वास्तव में एक नए सिनेमाई पुनर्जागरण की ओर बढ़ सकता है।
कश्मीर की खूबसूरती दुनिया पहले से जानती है। अब चुनौती यह है कि कश्मीर की कहानियां, आवाजें और प्रतिभाएं भी दुनिया जाने।
और शायद यही International Film Festival of Jammu & Kashmir 2026 की सबसे बड़ी उपलब्धि और सबसे बड़ी उम्मीद है।

























