बड़े लक्ष्यों के लिए बड़े समर्पण की जरूरत, नेताजी सुभाष चंद्र बोस का राष्ट्रवाद आज भी प्रासंगिक

दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

देवरिया के मदन मोहन मालवीय पीजी कॉलेज में सुभाष चंद्र बोस की विरासत पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में वक्ताओं और प्रतिभागियों के साथ रिपोर्टर इरफान अली लारी

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इरफान अली लारी की रिपोर्ट

देवरिया, भाटपार रानी। स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का व्यक्तित्व साहस, त्याग, राष्ट्रवाद और वैकल्पिक राजनीतिक चिंतन का ऐसा अध्याय है, जिसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। मदन मोहन मालवीय पीजी कॉलेज के प्राचीन इतिहास विभाग के तत्वावधान में तक्षशिला ग्रंथालय सभागार में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में वक्ताओं ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की विचारधारा, नेतृत्व क्षमता, राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी वैकल्पिक भूमिका पर विस्तार से विचार रखे। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद द्वारा प्रायोजित इस संगोष्ठी का विषय “नेतृत्व, राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता की वैकल्पिक विचारधाराएं : सुभाष चंद्र बोस की विरासत” रखा गया था।

संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए श्री सिंह ने कहा कि “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” केवल एक ऐतिहासिक नारा नहीं था, बल्कि यह बड़े लक्ष्य के लिए बड़े त्याग और समर्पण का संदेश था। उन्होंने कहा कि नेताजी की महानता केवल एक सैन्य सेनापति के रूप में नहीं थी, बल्कि उनकी व्यापक वैश्विक दृष्टि और असाधारण राजनीतिक सोच में भी दिखाई देती है। द्वितीय विश्व युद्ध जैसे जटिल और अनिश्चित अंतरराष्ट्रीय वातावरण में नेताजी ने यह दिखाया कि गुलामी में जकड़ा हुआ देश भी अपनी स्वतंत्रता के लिए विश्व की बड़ी शक्तियों के सामने अपनी बात दृढ़ता से रख सकता है।

राष्ट्रवाद को नेताजी ने दिया वैकल्पिक स्वरूप

श्री सिंह ने कहा कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को याद करते समय त्याग, बलिदान और अहिंसा की अनेक तस्वीरें हमारे सामने आती हैं, लेकिन इसी संघर्ष में एक ऐसी धारा भी मौजूद थी जिसने अदम्य साहस, सैन्य संघर्ष, क्रांतिकारी ऊर्जा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को स्वतंत्रता प्राप्ति का माध्यम माना। इस वैकल्पिक धारा के सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्वों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद का अर्थ केवल अपनी मातृभूमि से प्रेम करना नहीं है, बल्कि राष्ट्र को उसकी आंतरिक और बाहरी जंजीरों से मुक्त कराने की वैचारिक प्रतिबद्धता भी है। नेताजी ने अपने समय की मुख्यधारा की राजनीति के समानांतर राष्ट्रवाद का एक अधिक सक्रिय और संघर्षशील स्वरूप सामने रखा। उनके लिए स्वतंत्रता केवल सत्ता के हस्तांतरण तक सीमित नहीं थी। वे ऐसे भारत की कल्पना करते थे जिसमें सामाजिक समानता, आर्थिक न्याय, वैज्ञानिक सोच और आधुनिक राष्ट्र निर्माण को महत्वपूर्ण स्थान मिले।

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वक्ताओं ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि सुभाष चंद्र बोस भारतीय परंपरा और आधुनिकता के बीच किसी टकराव के पक्षधर नहीं थे। वे भारत की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत को आधुनिक विज्ञान, तकनीक और समाजवादी दृष्टिकोण के साथ जोड़कर देखते थे। उनके राष्ट्रवाद में राष्ट्रीय गौरव के साथ सामाजिक न्याय और आर्थिक पुनर्निर्माण की भावना भी दिखाई देती है।

गांधीवादी आंदोलन से अलग थी नेताजी की रणनीति

मुख्य अतिथि ने कहा कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाया गया अहिंसक असहयोग आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का महान प्रयोग था, लेकिन सुभाष चंद्र बोस का मानना था कि प्रत्येक ऐतिहासिक परिस्थिति अपनी अलग रणनीति की मांग करती है। उनके अनुसार ब्रिटिश साम्राज्यवाद जैसी कठोर सत्ता केवल नैतिक दबाव से पीछे नहीं हटेगी। इसलिए नेताजी ने स्वतंत्रता संघर्ष को अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और सैन्य शक्ति से जोड़ने का प्रयास किया।

उन्होंने कहा कि सुभाष चंद्र बोस को केवल इतिहास के एक अध्याय के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को सीमित करना होगा। वे एक विचार हैं, ऐसा विचार जो अन्याय के सामने झुकने से इनकार करता है और कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी लक्ष्य प्राप्त करने का साहस देता है। नेताजी का जीवन युवाओं को आत्मविश्वास, अनुशासन, त्याग और राष्ट्र के प्रति समर्पण की प्रेरणा देता है।

समावेशी राष्ट्रवाद के पक्षधर थे नेताजी

संगोष्ठी की मुख्य वक्ता डॉ. अनीता सिंह ने कहा कि सुभाष चंद्र बोस का राष्ट्रवाद समावेशी राष्ट्रवाद था। उनका विचार समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की भावना पर आधारित था। उन्होंने कहा कि नेताजी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की पहचान और सम्मान को स्थापित करने का प्रयास किया। उनका राष्ट्रवाद भारत को विश्व पटल पर मजबूत और सम्मानित राष्ट्र के रूप में देखने की आकांक्षा से जुड़ा हुआ था।

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विशिष्ट अतिथि डॉ. पवन कुमार राय ने कहा कि सत्य की खोज जितनी महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक कठिन चुनौती सत्य को व्यवहार में लागू करना है। उन्होंने कहा कि नेताजी ने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने उद्देश्य से समझौता नहीं किया। हिटलर जैसे तानाशाह से संवाद के संदर्भ में उन्होंने कहा कि नेताजी की प्राथमिकता भारत की स्वतंत्रता और भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना पैदा करना थी। उन्होंने कहा कि अन्याय के प्रति प्रतिकार और उसके खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा नेताजी के जीवन से ली जा सकती है।

छात्रों में नेताजी के व्यक्तित्व और विचारों को उतारने पर जोर

डॉ. विनोद कुमार ने कहा कि वर्तमान समय में नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे दृढ़ इच्छाशक्ति और स्पष्ट लक्ष्य वाले व्यक्तित्व की आवश्यकता महसूस होती है। उन्होंने छात्रों से नेताजी के जीवन, संघर्ष और विचारों को समझने तथा उनके व्यक्तित्व से प्रेरणा लेने का आह्वान किया। डॉ. प्रवीण कुमार शर्मा ने भी संगोष्ठी के विभिन्न पक्षों पर अपने विचार व्यक्त किए।

संस्था के प्राचार्य प्रोफेसर सतीश चंद्र गौड़ ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस कल भी प्रासंगिक थे, आज भी प्रासंगिक हैं और भविष्य में भी प्रासंगिक रहेंगे। उन्होंने कहा कि नेताजी का राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक गुलामी से मुक्ति का विचार नहीं था, बल्कि वे भारत की सर्वांगीण आजादी और व्यापक सामाजिक-आर्थिक पुनर्निर्माण की कल्पना करते थे।

शोध पत्रों में सामने आए नेताजी के राष्ट्रवाद के विविध आयाम

संगोष्ठी के दूसरे सत्र में किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के डॉ. धीरज कुमार ने शोध पत्र प्रस्तुत करते हुए सुभाष चंद्र बोस के वेदांतिक राष्ट्रवाद पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि नेताजी के राष्ट्रवाद पर स्वामी विवेकानंद के विचारों का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। उनके राष्ट्रवाद में आध्यात्मिक चेतना के साथ राष्ट्रीय पुनर्जागरण की भावना भी जुड़ी हुई थी।

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इसके बाद किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. पुनीत यादव ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन पर बनी फिल्मों और उनके माध्यम से प्रस्तुत किए गए उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि नेताजी के जीवन की अधूरी और रहस्यमय घटनाओं को फिल्मकारों ने अलग-अलग दृष्टिकोणों से पर्दे पर प्रस्तुत किया है। उन्होंने सुभाष चंद्र बोस के भारतीय मूल्यों पर आधारित राष्ट्रवाद की भी व्याख्या की।

डॉ. बृजेश कुमार शुक्ला ने सुभाष चंद्र बोस के चिंतन में साम्यवाद, राष्ट्रवाद और समाजवाद के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला। उन्होंने नेताजी के निडर नेतृत्व और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका को स्पष्ट करते हुए कहा कि उनका राजनीतिक चिंतन परिस्थितियों के अनुरूप लगातार विकसित होता रहा। संगोष्ठी में प्रवीण शाही एवं शिव प्रसाद ने भी सक्रिय सहभागिता की।

दीप प्रज्वलन से हुआ संगोष्ठी का शुभारंभ

राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ अतिथियों द्वारा मां सरस्वती के चित्र पर पुष्प अर्पित करने और दीप प्रज्वलित करने के साथ हुआ। संस्थान की छात्राओं ने स्वागत प्रस्तुति दी। आयोजक मंडल की ओर से अतिथियों का पुष्पगुच्छ, अंगवस्त्र और बैज लगाकर सम्मान किया गया। पुस्तकालय अध्यक्ष राजेश धर द्विवेदी ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया, जबकि संगोष्ठी के संयोजक डॉ. प्रदीप कुमार रंजन ने विषय प्रवर्तन किया। डॉ. दिनेश कुमार शर्मा ने आभार ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का कुशल संचालन किया।

दो दिवसीय इस राष्ट्रीय संगोष्ठी ने यह स्पष्ट किया कि सुभाष चंद्र बोस का व्यक्तित्व केवल स्वतंत्रता आंदोलन की ऐतिहासिक स्मृति नहीं है, बल्कि नेतृत्व, राष्ट्रवाद, सामाजिक न्याय, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और राष्ट्रीय स्वाभिमान जैसे विषयों पर आज भी गंभीर विमर्श का आधार है। विभिन्न शोध पत्रों और वक्ताओं के विचारों से यह संदेश सामने आया कि नेताजी की विरासत को केवल उनके सैन्य संघर्ष तक सीमित करने के बजाय उनके व्यापक राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक चिंतन के संदर्भ में समझना आवश्यक है।

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Author: यायावर

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